बूँद-बूँद ज़िंदगी (कहानी)
दो घंटों से तितलियों के पीछे भागता जोमू, थककर चूर हो गया था। उसके काँच की चौड़े मुँह वाली शीशी में, अब रंग-बिरंगी तितलियांँ दम साधे फड़फड़ा रही थीं।
"कितने देर तक खेलेगा तू जोमू, सूरज छुपने को आया है, घर नहीं जाना है क्या?" सिर पर टोकरी रखे, दोनों हाथों से अपने सात साल के बेटे को खींचते हुए थीरा ने कहा।
"तुम जाओ ना, मैं थोड़ी देर बाद आ जाऊंगा।" माँ का हाथ झटकते हुए वह फिर पेड़ पौधों के बीच घुसने लगा।
"अरे चल भी, कितना बुरा काम करता है रे तू। पाप पड़ेगा पाप, सब तितलियों को उड़ा दे, मर जाएंगी सब। तेरे को कोई बंद करके रखेगा तो कैसा लगेगा जोमू?" थीरा ने उसके हाथों से बोतल लेकर ढ़क्कन खोल दिया।
"मत उड़ाओ ना..!" कहता हुआ जोमू रूआंसा हो गया।
रंग-बिरंगी तितलियों ने सूरज की रक्तिम आभा को अपने शरीर पर महसूस किया। सुखद स्पर्श से आल्हादित होकर वे सब गगन की ओर उड़ने लगीं। कुछ देर का बंधन मानो सदियों की वेदना दे गया था। पंखों को नई ऊर्जा से प्रसारित कर, नसों को ढीली करके वे उन्मुक्त उड़ान भरने लगीं।
बड़े छोटे आकार के, न जाने कितने रंगरूप में फूल ही फूल भरे हैं माना में। 'फूलों का टापू' भी नाम दे रख सकते थे इस जगह का। इन फूलों पर मंडराती तितलियांँ, कीड़े और खूबसूरत पंछियों के झुंडों को देखने के लिए ही तो आजकल यहाँ सैलानी आने लगे हैं।
तीस-बत्तीस वर्ष की स्त्री थीरा, अपने बेटे को खींचते हुए घर ले जा रही थी।
"शीरु को घर छोड़ आई हूँ जोमू। वो छोटी है ना, पर तू समझता ही नहीं। सारा दिन गाँव भर घूमता रहता है। तेरे को ढूँढने के लिए गांँव भर चलती हूँ रोज। तेरे बाबा का क्या, नाव निकाला चले गए समुद्र में, मेरे पीछे दुनिया का काम पड़ा रहता है, शाम हो रही है खाना पकाना है..!" पूरे रास्ते एक औरत अपने घर-गृहस्थी के दबाव को जैसे शब्दों से हल्का कर रही थी और साथ चलने वाला अपनी अगली योजना पर विचार करते खिंचा चला जा रहा था।
इस छोटे टापू माना के एक तरफ़ रखवाला पर्वत माचल, जिसे देवता मानकर पूजते हैं माना के निवासी। साल में एक बार नावों से जाकर, पूरा गाँव माचल की पूजा करता है।
पिछले कुछ सालों से यह टापू दुनिया के नक्शे में कुछ ज्यादा ही चमक गया और छोटे शांत माना में, अब आधुनिकता बढ़ने लगी थी। थीरा के पति थमांग का मछलियों का व्यवसाय बढ़िया चलने लगा।
"अच्छा है थीरा, लोग हमारे टापू पर रुकते, खाते-पीते और घूमते हैं, सबको काम मिल रहा है। ऐसा ही दो सीज़न चल जाएगा तो अपनी झोपड़ी पक्की हो जाएगी।" पक्के मकान की कल्पना से थमांग के साथ, थीरा भी दमकने लगती। आखिरकार घर बनाने का सपना तो हर दंपत्ति देखता ही है।
'जहाँ चाह वहाँ राह' दो सालों में, सुंदर छोटा पक्का घर बना लिया दोनों ने। बाँस से बाहर की बाड़ बाँध ली और स्नानघर भी। इस नए घर में शीरु पैदा हुई।
"माँ, ये कितनी छोटी है ना, हम इसको पालेंगे। खाना भी देंगे।" गोल-मटोल शीरु के गालों को सहलाता जोमू बोल पड़ा।
"बेटा, ये तेरी बहन है। हमारे साथ ही रहेगी। ये कोई पालने वाला प्राणी नहीं है।" हँसते हुए थमांग ने समझाया।
बोतल में बंद तितलियों, पानी टंकी में पड़ी मछलियों, चिड़िया को पकड़ने के लिए उनके पीछे भागने वाले जोमू को, शीरु उनसे बिल्कुल अलग नहीं लग रही थी।
माना में लोगों की आवक के साथ प्रदूषण भी बढ़ता जा रहा था। सैलानी अपने साथ आधुनिक उपयोगी चीजें लाते और उनके अवशेष धरती के आँचल में बिखेर जाते। द्वीप में वाहन, रोजगार बढ़ने लगा और धरती की सांँसें फंसने लगी थी । किनारों से सैलानी माचल तक नावों, स्पीड बोट से जाते, मौज-मस्ती करके, शाम तक वापस माना के कैंप, छोटे-बड़े होटलों में वापस आ जाते। उधर माचल अपने चरणों तले, अपने चारों ओर उनकी छोड़ी फेंकी गंदगी से विकल हो जाता। टापू के मूल निवासियों के जीवन में भी अनजाने में ही आधुनिक सुविधाओं का पदार्पण हो गया था।
"अब कहाँ जा रहा है जोमू, चल अंदर। शीरु भी उठ गई होगी।" घर के पास पहुँचकर जोमू ने माँ से हाथ छुड़ा लिया और पेड़ की ओर भाग गया।
सिर पर से कंद, भाजी की टोकरी उतारती थीरा ने देखा कि वह कूद फांदकर पेड़ पर चढ़ने की कोशिश कर रहा है।
थोड़ी देर बाद डूबती सांँझ ने करवट बदली और रक्तिम किरणों ने श्यामल रुप ले लिया। लहरों का स्वर कुछ बढ़ गया, चाँद से मिलने की उत्कंठा उनकी उछाल में दिखने लगी थी।
जोमू भी उछल कूद कर शांत हो गया था। अपने बाबा की नाव उसे दूर से दिख गई और दुगने उत्साह से वह किनारे की ओर भागने लगा।
"बाबा, बाबा। आज मांँ ने मेरे बोतल की सारी तितलियांँ उड़ा दी। कुछ सुनती नहीं माँ, बाबा तुम बोलो ना कि मेरी तितलियाँ न उड़ाया करें।" थमांग के नाव किनारे लाकर, बांधने तक जोमू की शिकायतों का पिटारा खुलता रहा।
"तू उड़ती तितलियों को पकड़कर बंद ही क्यों करता है?" मछलियों से भरा जाल पीठ पर लादकर थमांग, बेटे के साथ घर की ओर चल पड़ा।
किनारे पर बंधी नाव को टाटा करते, पिता की पीठ पर जाल में फड़फड़ाती मछलियों को देखकर, जोमू सिर खुजलाने लगा।
"बाबा, पेड़ पर चिड़िया के दो बच्चे हैं ना, मुझे देखकर आँख मटकाते हैं। उनको कुछ नहीं आता, सिर्फ़ चीं-चीं, चीं-चीं करते हैं दिनभर..!" बातों का अंतहीन सिलसिला जारी रहा।
"पहले नहा लो थमांग, दिनभर का पसीना, मछलियों की बू से शीरु को मत उठाओ।" कहती हुई थीरा ने पति के नहाने के लिए टंकी का पानी बाल्टियों में भर दिया।
खाना खाते समय इस परिवार के चार प्राणियों के साथ, पेड़ पर चिड़िया के बच्चों की हल्की हल्की चिचियाहट शामिल हो गई।
रात गहराती जा रही थी और प्रकृति की गोद में यह टापू, नन्हें शिशु सा बेसुध सो रहा था।
हवा की गुदगुदी से पेड़ पौधे इठला रहे थे। उनकी सरसराहट और लहरों की लयबद्धता पर चाँद का मनभावन नृत्य सिर्फ़ माचल देख रहा था।
पहले माचल समुद्री लहरों को और दूर सुदूर बसे अन्य छोटे टापूओं तक साफ देख लिया करता था परंतु अब समय के साथ सबकुछ धुँधलाने लगा था। किनारों पर रात रात तक होती पार्टियों के शोर-शराबे से, प्रकृति अस्वस्थ होती जा रही थी।
पंछियों की प्रभाती से थीरा जाग गई।
रौशनदान से झिरती रवि रश्मियाँ, जोमू के घुँघराले काले बालों में घुसकर, उसके मस्तिष्क को दिन भर की ऊर्जा देने में जुट गई थीं।
"उठ जोमू! सूरज चढ़ गया, तेरी चिड़िया के बच्चे भी नाश्ता कर रहे हैं। तू बिस्तर पर पड़ा है, उठ चल, स्कूल जाना है ना।" घुँघराले बालों को अपनी अँगुलियों से सुलझाती, लड़ियाती थीरा ने कहा। जोमू ने करवट बदल कर सिर पर चादर ढांँक लिया।
"अरे थमांग जल्दी उठ गया आज! लगता है मैं बहुत देर सोती रह गई।" पति से बाद में उठने की आत्मग्लानि के साथ उसकी सुबह हुई।
बालों का जूड़ा बनाया और आँगन में खड़ी होकर एक भरपूर अंगड़ाई ली थीरा ने। सूर्य की नव किरणों के स्पर्श को, हृदय में समेटने लगी।
"होमार होमार बाबा।" आँगन के एक पत्थर पर बैठे गोंतू बाबा को अभिवादन किया थीरा ने।
"होमार होमार, जोमू उठा नहीं क्या थीरा? नहीं उठा होगा तभी तो सुनसान है आँगन वरना अपने बाबा की नाव तक, चिड़िया के घोंसले तक और मेरे इस थोड़े फटे जाल तक जरूर पहुँच जाता।" इस घर से चार-पांच घर दूर रहते हैं गोंतू बाबा और उनकी पत्नी सौरवी।
"अच्छा है, मेरे चाय बनाते तक बिस्तर पर रहे वरना भागदौड़ चालू कर देगा।" कहती हुई थीरा ने चूल्हे में लकड़ियां जला दी और खुद मुँह धोने लगी।
पैंसठ साल के गोंतू बाबा और उनकी पत्नी सौरवी, थीरा और थमांग के परिवार के हितैषी थे। इस नि:संतान दंपत्ति ने, अपने वात्सल्य की एक एक बूंद, जोमू और शीरु पर लुटाया है। बच्चों की पैदाइश पर बिना माँ-बाप की थीरा की सेवा में किसी प्रकार की कमी नहीं छोड़ी थी इस वृद्ध दंपत्ति ने।
बूढ़े ने अपनी बीड़ी सुलगा ली।
"माँ यहाँ आकर देख नहीं सकती ना इसीलिए यहाँ सुबह बीड़ी जला ली बाबा। मैं बताऊंँगी माँ को। अब वो खुद खड़ी हो जाती है, लाठी लेकर चलने की कोशिश करती है।"
बड़बड़ाती हुई थीरा ने रसोई में जाकर, चूल्हे पर चाय चढ़ा दी। उबलते पानी के साथ विचारों की अपनी दुनिया में खोने लगी थीरा।
इस गाँव को थमांग लावारिस ही मिला था परंतु थीरा के माता-पिता थे। इकलौती बेटी में जान बसाने वाले उसके माँ-बाप, एक दिन नाव लेकर गए और ज़िन्दगी से बहुत, बहुत दूर चले गए। सागर अपने में सिर्फ़ प्राणियों को पालता है निष्प्राण देह किनारों पर छोड़ जाता है। हाथों में अटके कंगन से, 'माँ' की पहचान हुई, बाबा का तो कोई अता-पता नहीं मिला था।
उस कठिन समय में थमांग ने लोगों के साथ, थीरा की दिल से सहायता की।
समय अपनी गति से चलता रहा और इस गाँव के ये दोनों युवा, धीरे-धीरे करीब आने लगे। माना में मौसम के विभिन्न रूपों और फसलों के अनुसार उत्सव मनाएं जाते थे।
वसंत के आगमन के समय, जब शीत उष्ण का मिलन होता तो माना में तीन दिवसीय उत्सव मनाते थे निवासी।
प्रथम दिन नावों को सजाकर सारे पुरुष, माचल जाते थे। बाजों, फूलों और विविध फसल, पकवानों से माचल के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते। वापसी पर समुद्र किनारे खड़ी स्त्रियांँ, उनपर फूलों की वर्षा करतीं, आरती उतारतीं।
दूसरे दिन गाँव की देवी के स्थान पर पूजा की जाती, रात को सज-धजकर बड़ी संख्या में युवा स्त्री-पुरुष जमा होते। शाम से ही ढ़ोल की थाप, मधुर गीतों पर थिरकती लड़कियों की चपलता, सौंदर्य को देखना, हर युवा लड़के का सपना होता है।
उस साल का उत्सव, आज भी थीरा के रोम-रोम में प्रेम भर देता है। मृदुल चाँदनी रात, मंद सुगंध बयार और सागर के फैले किनारे पर, जब थमांग ने उसे फूलों का गुच्छा पकड़ाते हुए, उससे अपने जीवनसाथी बनने का अनुरोध किया था।
गाँव के चहेते, हृष्ट-पुष्ट, मिलनसार, होनहार युवक का प्रस्ताव, थीरा ने स्वीकार कर लिया। थीरा के मधुर गीतों और ढोल के थाप पर नृत्य करने वालों में, थमांग सबसे आगे था। अर्धरात्रि दोनों हाथों में हाथ लिए नृत्य करते हुए, देवी का आशीर्वाद ले रहे थे।
तीसरे दिन ग्राम देवी के स्थान पर जो सजावट की जाती, उसमें थीरा ने सुंदर फूल, पंछी, पर्वत, सूरज, चाँद उकेर दिया था। सहेलियों के साथ फसल की बालियांँ, नारियल, सुपारी और फूलों से थीरा ने हमेशा अपने और थमांग के साथ की प्रार्थना की थी।
स्नेह की फसल तो औरतें हर ऋतु में उगाती हैं। इतनी नमी कहांँ से लाती हैं कि भावनाओं को बोया कि स्नेह का पौधा सिर उठाने लगता है। अपनी देह से परे, सूँघकर ही भाव गढ़ने लग जाती हैं औरतें। थमांग के जीवन मरूस्थल को प्रेम से सींचकर, थीरा ने खुद के लिए बगिया बना ली थी। इस वृद्ध दंपत्ति को माली का स्थान देकर, उनके सान्निध्य को अपना बना लिया था।
"आज उबला पानी ही पिलाओगी क्या थीरा?" आँगन से आते हुए थमांग ने कहा।
"क्या करेगी बेचारी, तू सामान नहीं लाकर देता घर के लिए..हा..हा..हा..।" बूढ़ा गोंतू खाँसने लगा।
"बीड़ी क्यों पीते हो बाबा, कितनी खाँसी आती है।" बाबा की पीठ को सहलाते हुए थमांग डांँट रहा था।
"थीरा, चाय जल्दी बनाया कर,देख बैठे बैठे बीड़ी फूंँकते हैं बाबा।" थमांग का बड़बड़ाना जारी था, "कहता हूँ अब नाव मत निकाला करो, हम चार के साथ और दो लोगों का भात नहीं पक सकता क्या? हमारे माँ-बाप होते तो क्या अलग खाना बनाते।"
"तू भी ना, बात का बतंगड़ बना देता है थमांग।" अपनी खाँसी को छुपाने की कोशिश करते हुए गोंतू बाबा बोले।
थोड़ी देर बाद, तीनों चाय पी रहे थे। बाबा के सामने चार बिस्कुट प्लेट पर रखकर, थीरा ने अपना प्रेम उड़ेल दिया था। वो अपनापन, वो प्रेम जीवन की रंगत बनी बूढ़े के चेहरे पर चमक रही थी।
"माचल दो दिनों से, आग उगल रहा है। कल नाव पर सवारी थी तो वापस लौटा लिया।" बूढ़ी आवाज़ में कुछ भय समाया था।
"हाँ बाबा, गर्म लपट हवा में जान पड़ रही है।" प्रकृति के संग जीने वाले, उसके हर रूप को समझते हैं।
"लोग भी तो समझते नहीं, कल रात तक किनारे पर जोर से गाने लगाकर, नाचते थे। वो तो सरकारी लोगों ने सब बंद करवाया, वरना ये सैलानी..।" बाबा ने बताया।
"पाँच साल पहले भी गुबार निकाला था माचल ने।" थीरा ने आकाश की ओर देखकर हाथ जोड़ लिया।
घंटे भर बाद, थमांग लगभग खींचते हुए ही जोमू को स्कूल पहुँचा आया था। सोती हुई शीरू के गाल को सहलाने लगा कि थीरा बोली, "मत उठाओ उसको। अभी खाना बनाना है, तुम्हारा डिब्बा देना है थमांग।"
सबकुछ परिवार पर न्यौछावर करने वाली औरत, अपने आराम की परवाह ही नहीं करती।
"अब ऐसे टुक-टुक देखते रहोगे, जाओ धूप चढ़ जाएगी।" पानी से भरा कनस्तर और खाने का डिब्बा थमांग के पकड़ाते हुए थीरा ने शीरू को गोद में उठा लिया।
पति के साथ कदम मिलाती वह किनारे तक आ गई।
"ओहहह..आग की लपटें और चिंगारियांँ ऊपर तक दिखने लगी थमांग।" थीरा का स्वर कांप रहा था।
"हाँ, आज शाम तक माचल की धधक कम नहीं हुई तो बहुत मुश्किल हो जाएगी। वो देख, बाबा की नाव कितनी दूर चली गई।" थमांग ने दूर क्षितिज पर नजर आती बाबा की नाव देखकर कहा।
किनारे पर खड़ी हाथ हिलाती थीरा ने घर की ओर रूख किया। चिड़िया के प्यारे बच्चे जोमू और शीरू की तरह मुंँह खोल रहे थे।
शीरू को खिला पिलाकर अब एक चक्कर माँ की तरफ निकल गई थीरा।
"थीरा..! माचल को देखा।" उसकी हमउम्र मंती ने पूछा।
"हाँ देखा ना, सुबह से अभी दो घंटे में और जोर जोर से आग निकल रही मंती, पता नहीं क्या होगा।" कहती हुई थीरा माँ के घर में घुस गई।
"होमार-होमार माँ!" थीरा ने अभिवादन किया।
चूल्हे पर हल्की आँच देखकर थीरा बोली, "अभी थोड़ा चलना शुरू किया तो चूल्हा जला लिया माँ। मैं आती हूंँ ना नाश्ता देने।" थीरा की बात सुनकर वृद्धा मुस्कुरा पड़ी।
"मैंने नहीं, बुड्ढ़े ने जलाया। चाय बनाकर दिया और नहाने के लिए पानी चढ़ा गया, बोला-"थीरा आने के बाद नहाना, खुद से नहीं उठाना; बुड्ढा भी ना।" गले में लटके कपड़े से मुँह ढांँककर हँसने लगी सौरवी।
उम्र के इस पड़ाव में भी, प्रेम अपनी रंगत चेहरे पर बिखेर गया। इसी रंग से सराबोर सौरवी ने आँखें मींच लीं।
माँ को नहलाकर, उनकी चोटी बाँधकर, उन्हें दूध में मिला उबला कंद थीरा ने दिया।
"आज फूल ही नहीं लाई नहीं तो माला आपके बालों में लगाती।" थीरा अक्सर अपने हाथों से बनी माला, मांँ के बालों में सजा देती है।
"तू भी ना, बुढ़िया के सफेद बाल में माला सजाती है।" माँ ने कहा।
"मेरी माँ के लिए भी बनाती थी मैं। जिस दिन वो आखिरी बार बाबा के साथ समुद्र में गई थी, मेरी बनाई माला लपेटी थी जूड़े में।" स्मृतियों के पन्ने फड़फड़ा गए थे।
बाहर रिक्शे पर स्पीकर लिए एक आदमी घोषणा कर रहा था।
"ये क्या कह रहा है थीरा?" वृद्धा ने पूछा।
"गाँव वालों और सैलानियों को सचेत कर रहा है माँ। माचल से लावा धधक रहा है पिछले दो दिनों से। आज तो बहुत बढ़ गया है।" थीरा ने सौरवी को आँखों देखा हाल सुनाया।
"ओह!! शरण शरण देबी।" वृद्धा के चेहरे का रंग एकदम बदल गया।
शाम तक तो लावे की नदियांँ माचल के शरीर से उतरने लगीं। चिंगारियांँ, हवा पर सवार सब दिशाओं में चमकने लगीं।
"माँ, यह आग हमारे घर तक आएगी क्या?" जोमू एकदम गंभीर दिख रहा था।
"नहीं रे बुद्धू, कभी पानी से तैरकर आग आती है भला।" थीरा ने उसके सिर पर हाथ फेरा।
थमांग की नाव आती देख जोमू भागा।
"रूक जोमू, मत भाग।" कहती हुई थीरा, शीरू को गोद में लेकर उसके पीछे भागी।
"बाबा, माचल जल रहा है देखो तो।" बच्चे ने अपना अचरज पिता को दिखाया।
"मैं जल्दी आ गया थीरा, सैलानियों को वापस लाने का आदेश हुआ। मछलियांँ भी नहीं पकड़ने दे रहे थे। थोड़ी मिली हैं जो इस बक्से में हैं।" नाव किनारे पर लाते थमांग ने बताया।
"आज बाबा नहीं आए थमांग। नाव भी नहीं दिख रही और पहले बच्चों से मिलकर ही घर जाते हैं वो।" थीरा के माथे पर लकीरें स्पष्ट थीं।
"अरे! मैं देखता हूँ थीरा। सब वापस आ रहे हैं। वो भी आते होंगे।" कहते हुए थमांग ने नाव वापस घुमा दी।
"जोमू, माँ के साथ घर जाओ चुपचाप बेटा।" कहते वह तेजी से नाव खेने लगा।
शीरू को कमर में कपड़े से कसकर, सिर पर मछलियों का बक्सा और हाथ में बेटे को लेकर, चिंतातुर थीरा घर की ओर चल पड़ी।
"माँ देखो-देखो, बच्चों ने पँख खोल लिए।" चिड़िया के बच्चों के फैले पँखों ने जोमू की आवाज़ में जान डाल दी।
रात गहराने के साथ माचल का उन्माद बढ़ने लगा। तरल आग सब दिशाओं में बहने लगी, जिसकी तपिश गाँव में फ़ैल गई थी।
किनारे पर खड़े नाववाले, पड़ोसी सभी थमांग का इंतज़ार कर रहे थे। थीरा माँ को भात-साग खिला आई थी।
"बाबा और थमांग साथ ही आ जाएंगे माँ।" थीरा के शब्दों को तौल रही थी अनुभवी आँखें।
करीब आधी रात खोजी दस्ते ने, बेहोश गोंतू और थके थमांग को किनारे पर पहुँचाया। गाँववालों की मदद से उन्हें घर लाई थीरा। गर्म चाय, तेल की मालिश से बाबा को कुछ ठीक लगा। वो अपने घर जाना चाहते थे जहाँ एक जोड़ी आँखें उसका इंतज़ार कर रही थीं।
बाबा ने अपनी पूरी ज़िंदगी में माचल का इतना रौद्र रूप नहीं देखा था। सुबह ही गाँव वालों को अपनी गृहस्थी समेटकर, दूसरे सुरक्षित स्थान पर जाने का लगातार आदेश होने लगा।
ज़िंदगी को कुछ बोरों, गट्ठरों में बाँधे लोगों ने, जहाजों की ओर रूख कर लिया। अपने घरों, बचे सामानों को समुद्र, माचल और गाँव देवी के सुपुर्द कर, वो निकलने लगे थे।
"मैं नहीं जाऊंगा बाबा सब छोड़कर।" स्कूल के बैग के अलावा सारे खिलौने, कंचों का बक्सा, काँच की शीशी छाती से लगाए जोमू रो रहा था।
"चिड़िया के छोटे-छोटे बच्चे भी जाएंगे साथ।" वह बाहर पेड़ की ओर भागा।
"बेटा, छोटी मछलियाँ टंकी के पानी में छोड़ दो। चिड़िया अपने बच्चों को उड़ा कर ले जाएगी जोमू, उन्होंने पंख फैलाए थे ना।" बड़ी मुश्किल से बच्चे को समझाते माँ-बाप मानो खुद को तसल्ली देते जहाज तक आ गए।
कुछ घंटों बाद तीन जहाज चलने को तैयार था।
"माँ..बाबा..! देखो, जहाज पर हमारी चिड़िया अपने बच्चों के साथ बैठी है।" जोमू नाचने लगा।
सबने देखा, एक माँ ने अपने बच्चों के पँखों में इतनी शक्ति, ऊर्जा और स्फूर्ति का संचार कर दिया था कि वो भी गाँव वालों के साथ, नई जगह के लिए तैयार हो गए थे।
अश्रुपूर्ण नेत्रों से लोगों ने माचल से शांत हो जाने और जल्दी अपने घर वापसी की प्रार्थना में हाथ जोड़ लिए।
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प्रमाणपत्र - यह मेरी मौलिक, स्वरचित एवं अप्रकाशित कहानी है।
शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
C-1401 निहारिका, कनकिया स्पेसेस
लोकपुरम मंदिर के सामने
ठाणे (पश्चिम)400610
महाराष्ट्र
भारत
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