221 2121 1221 212
अनजाने में ही बीज बबूलों के बो लिए
पैरों में अपने आप के नश्तर चुभो लिए।।1।।
कटता नहीं अकेले कि लंबा था रास्ता
जो काफिला मिला उसी के साथ हो लिए।।2।।
शब्दों की तेज़ धार से ज़ख्मी हुआ जो मन
आँखों के बहते नीर से फिर उसको धो लिए ।।3।।
खानाबदोशों सी थी हमारी ये ज़िंदगी
थक कर रुके कदम जहाँ उस घर में सो लिए।।4।।
सब राज़ मेरे पूछ के चुप हो गए हैं आप
अपने भी पत्ते सामने अब मेरे खोलिए।।5।।
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तरही मिसरा
अब कौन सुनता दुखड़ा किसी और का यहाँ
खुद दिल से दिल की बात कही और रो लिए।।
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शर्मिला चौहान
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