गुरुवार, 25 अप्रैल 2024

व्यंग्य - बिगड़ी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय ( रहिमन फाटे दूध को, मथे ना माखन होय)

व्यंग्य -"बिगड़ी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय 
(रहिमन फाटे दूध को, मथे ना माखन होय)

"घंटे भर से बाथरूम में कैद होकर लाख टाइमपास  कर लो, बात बनेगी नहीं।" कोकिला की कर्कश आवाज़ से मधुर के गाने की तन्मयता भंग हो गई।
"अब बाथरूम के समय का भी हिसाब देना पड़ेगा क्या तुम्हें?" चिढ़कर मधुर तुरंत टॉवेल लपेटता बाहर आ गया।
विजयी मुस्कान लिए कोकिला किचन में गई और मधुर तैयार होने लगा।
सामने आइने में अपना कच्चा-चिट्ठा देख, अपने अस्तित्व को एक क्षण के लिए नकार दिया उसने।‌
सिर पर चमकते चाँद की झलक, अपना पैर पसारे दूर तक पेट का फैलाव, शुभ्र बालों का जनसंख्या की तरह तेजी से विस्तार, सचमुच मधुर   अपने इस बदलाव पर हैरान खड़ा रह गया।

"आज से अपना लंच बॉक्स मत देना, हज़ार बार कहा कि दो रोटी ही दिया करो परंतु नहीं, तीन तीन पराठे और डिब्बे की सांस फूलते तक सब्जी़ ठू़ंँसती हो।" अपने शरीर के फैलाव का सारा दोष मधुर ने कोकिला के माथे पहना दिया।

ऐसे ताज पहनना तो क्या, कोकिला को अपने सिर पर एक क्षण भी ना रखना गंवारा
नहीं था।

अपनी आँखों की पुतलियों को, पलकों से बाहर ढकेलती हुई, कमर में चुन्नी लपेटे, हाथों में बेलन लिए वो किचन से बेडरूम में आ धमकी।
"फलाने चोपड़ा के टिफिन के आलू पराठों की क्या खुशबू आती है, ढिकानी मिताली मैडम के अंडे बिरयानी तो किसी फाइव स्टार से लाए लगते हैं वाह!" ज़रा सांस लेकर बोली, "घर की रोटी-सब्जी नहीं बल्कि मक्खन लगे आलू पंराठे और शुद्ध घी की अंडा बिरयानी लटक रही है शर्ट से बाहर।"  अपनी सारी आहुति हवन में डाल, प्रज्ज्वलित अग्नि को बिना देखे ही वह वापस चली गई।

"शाम को सिर्फ सलाद और सूप ही पियूंँगा।" दृढ़ संकल्प मधुर की आवाज़ में झलक रहा था।
सामने खड़ी स्त्री ने, एक सौ अस्सी अंश पर सिर दांए से बाएं हिलाया और गाने लगी, "हमको मन की शक्ति देना...!" 

डाइनिंग टेबल पर रखे बिस्किट, नमकीन, वैफर्स के पैकेटों को जाते जाते मधुर ने, बाजू की आलमारी के निचले खंड‌ में फेंक दिया और सौ ग्राम वजन कम हो जाने का अहसास लिए ऑफिस निकल गया।

फोन पर सारे सोशल मीडिया, विज्ञापन छानकर पाँच जिमों में फोन घुमाया। 
"कमाल है, जिम जैसी मेहनत वाली जगहों पर कोमल मीठी वाणी से फोन उठाने वाली रिसेप्शनिस्ट रखी जातीं हैं।" मधुर के मन में जिम के प्रति उत्साह बढ़ गया।

लंच टाइम होते होते, पेट ने आसपास से अपनी शिकायत शुरू कर दी। कुलबुलाहट ही आवाज़, चोपड़ा के डिब्बे की महक से कुछ ज़्यादा ही बढ़ गई। 
परेशान होकर मधुर बाहर निकलने लगा कि दोस्तों ‌ने पूछा, "आओ यार, आज टिफिन नहीं लाए क्या? आ जाओ सबके साथ खा लो।"
डिब्बों की सब्जियांँ, मसाले, अचार, चटनी की खुशबू से मधुर की जीभ लार के तालाब में तैर रही थी।

अपने दिल दिमाग के घोड़ों पर लगाम कसकर मधुर ने अति मधुर स्वर में अपनी डाइटिंग, फिटनेस का संकल्प बताया। सिर हिलाते हुए दोस्तों की आँखों में झलकता अविश्वास, मधुर को घायल कर गया।

बाहर भी लंच टाइम का माहौल था। रेस्टोरेंट और आसपास के ठेलों पर लोगों की भीड़ लगी हुई थी। नारियल पानी खरीदकर पीने ही वाला था कि गड़गड़ाते पेट ने फिर गुहार लगाई। 
ठेले से एक वड़ा पाव लेकर, इधर-उधर देखते हुए मुँह में ठूँस लिया उसने। अब तो उदराग्नि भड़क गई थी, पेट और आहुति मांँग रहा था। दूसरा वड़ा पाव अंदर समर्पित कर, आराम से कुर्सी पर बैठकर सिप सिप नारियल पानी पीने लगा।

आत्मिक  संतुष्टि की चरम सीमा थी। कैसी दुनिया है ऊपरी दिखावा जानती है, अंदर सभी का मन एक ही है। इस शरीर से बड़ी आत्मा है हर एक प्राणी में समान है। 
अपने आपको आध्यात्मिक लहरों के बीच पाया मधुर ने। 

ऑफिस के सैकंड हॉफ में, सारे जरूरी काम दिल लगाकर खत्म किए मधुर ने।

जिम क्या था, काँच का बना सुंदर शो-केस जिसमें बड़े बड़े यंत्र-तंत्र सजे थे। कोई अभिमन्यु सा वजन उठाए ललकार रहा था तो कोई मशीन पर दौड़ते दौड़ते अपना पसीना बहा रहा था, कोई गोल बड़ी सी गेंद पर लोट लोट कर घूम रहा था।

"आपको आपकी बॉडी के एकार्डिंग फिटनेस प्लान दिए जाएंगे। पर्सनल ट्रेनर रहेगा, डाइटीशियन के साथ आपकी हर सप्ताह बात होगी। सप्ताह भर का खान-पान गाइडेंस किया जाएगा।" मधुर की कल्पना सेभी ज़्यादा खूबसूरत रिसेप्शनिस्ट सामने खड़ी थी। मधुर ने अनुमान लगाना शुरू किया कि इसकी आवाज़ ज़्यादा अच्छी है या ये खुद।


"इधर आओ, आपका मैज़रमेंट लेना है।" कानों में गरम शीशे की तरह उतरने वाली आवाज़ थी।
कंधों पर रखा उसके हाथ के वजन को मन ही मन आंकता मधुर पीछे मुड़ा। करीब सवा छह फीट ऊँचा, काला, टकला,गठीले बदन का पहलवान नुमा आदमी सामने खड़ा था।
"मुझे कोई कपड़ा-वपड़ा नहीं सिलाना भाई।" मधुर ने उसका हाथ कंधे से हटाने की असफल कोशिश की।
अंगद के पैरों का तो सुना था, उसके हाथों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी उसे। 
"आपके फिटनेस फीस के लिए ही माप रहा हूँ।" कहते हुए उसने मधुर के कंधों पर बैताल की तरह चिपके बैग को निकाल कर, बाजू की मशीन पर लटका दिया।
छाती, पेट, भुजाओं, हिप्स सभी को बारी बारी मापकर उसने अपनी कॉपी में लिख लिया। बड़े ही रहस्यमय अंदाज़ से मुस्कुराते हुए उसने रेट कार्ड समीर को पकड़ा दिया। 

लाल रंग का, बहुत खूबसूरत कार्ड देख समीर पढ़ने लगा।

चैस्ट बढ़ाना:
प्रति इंच मूल्य

पेट कम करना :
प्रति इंच मूल्य

मसल्स मजबूत करना:
बाइसेप्स मूल्य

(जी.एस.टी., डाइटीशियन फीस, स्पेशल ट्रेनर फीस अलग) 

"जब ज्वाइन करोगे तो डाइटीशियन के प्लान के हिसाब से खाना पीना। हर सप्ताह का मील प्लान करतें हैं यहाँ।" कड़क, टका सा जवाब देकर टकला चला गया।‌
मधुर अपने एक्स्ट्रा इंचेस को मन ही मन गिनना चाह रहा था परंतु ये ऑफिस का हिसाब किताब थोड़े ही था जो राव सर के सिर मढ़ कर हाथ झाड़ लिया जाए।

"आइए सर, आपको अपना ऑफिस दिखातीं हूँ।" उस खूबसूरत लड़की की आवाज़ ने कानों में पुनः मिसरी घोल दी। 
मंत्रमुग्ध उसके पीछे-पीछे समीर कब काँच के बने, एयरकंडीशंड ऑफिस में आकर, कुर्सी पर बैठ गया, पता ही नहीं चला।
"आप बिल्कुल फ़िक्र ना करें सर, एक बार हमको ज्वाइन कर लिया तो इस ऑफिस में आपकी भी ऐसी ही डेशिंग फोटो लगेगी।" एक दिलकश अदा से वह उसे चारों तरफ लगी तस्वीरों का परिचय बताने लगी।
उसके अंदाज़ से मधुर को विश्वास हो गया कि दीवारों पर लटकते इन सुंदर, सजीले, आकर्षक नवजवानों का वज़न उससे उन्नीस बीस ही रहा होगा और वह उनके बीच में अपनी फिट फोटो को फिट करने की कोशिश करने लगा।

"मुझ जैसी चार पर्सनल ट्रेनर हैं, आपकी चॉइस से आपको प्रोवाइड की जाएंगी। स्पेशल ट्रीटमेंट से बहुत जल्दी आप एकदम परफेक्ट मॉडल बन जाएंगे।‌बस, इसके लिए थोड़ा एक्स्ट्रा चार्ज रहेगा जो आप दे ही देंगे।" इतना अधिकार और विश्वास तो किसी ने उस पर नहीं किया था, उसने खुद ने भी नहीं।
खुशी से हलका हो, कल्पना के पंख लगाए वह आसमान में अपने आपको ढूंँढने चला।
रोज़ इस खूबसूरत साथी के साथ रिलेक्सिंग समय, हल्की-फुल्की एक्सरसाइज, नपा तुला  बढ़िया सा खाना और फिर दुनिया के इस मंच पर एक चमकते सितारे "मधुर"  का जन्म होगा। अभी मन के घोड़ों को बेलगाम छोड़ दिया था उसने।

"आइए सर, कुछ फार्म पढ़कर आप साइन कर दीजिए। तब तक मैं आपके लिए चाय भिजवाती हूँ।" ऑफिस में कुछ कागज़ों के साथ उसे छोड़कर, वह बाहर चली गई। 

उस फॉर्म को पढ़ता हुआ, नियमों को समझता हुआ जब मधुर, मासिक फीस के कॉलम में आया तो एयरकंडीशन कमरे में भी चेहरे पर कुछ बूँदों के सरकने का अहसास हो गया ‌ 

उसके शरीर के बढ़े हुए इंचेस ने इस कागज़ की गर्मी बढ़ा दी थी। बारह हज़ार महीने का जिम, स्पेशल ट्रेनर। बाद में प्रोटीन, खाने-पीने का अलग। 

आज उसे अपने बढ़े हुए शरीर पर गुस्सा आ रहा था। अरे, अब आदमी हवा पीकर तो नहीं जी सकता ना, दो टाइम खाने पर सुरसा के मुँह की तरह फैल गया।

बड़ी ब्रांड के कप प्लेट में दी हुई हैल्दी ग्रीन टी, मधुर को कसैली और बेस्वाद लगने लगी। सारे कागज़ बैग में भर, उस लड़की से कल‌ आने का वादा कर मधुर तेज़ी से बाहर निकल गया।

बाइक को चार-पांँच बार आदेश दिया पर वो टस से मस नहीं हुई। अपनी सर्विसिंग के लिए उसका भी मुँह फूला था। 
मधुर ने अनुनय विनय किया और सर्विसिंग के आश्वासन का पेट्रोल पाते ही वह स्टार्ट हो गई। आश्वासन के पेट्रोल से तो देश की गाड़ी भी चलती रहती है फिर इस बाइक की क्या बात।

अपने घर से आती सौंधी खुशबू से मधुर विचलित हो गया। 
"हाथ मुँह धोकर आ जाओ, आज तुम्हारी पसंद का खाना बनाया है।" सुबह की आवाज़ और अभी की मिठास से किसी अप्रत्याशित की कल्पना कर ली थी मधुर ने।

"तुमको कहा था ना कि शाम को सिर्फ सलाद और सूप लूँगा। मुझे अपने संकल्प से कोई नहीं हटा सकता।" मधुर ने आवाज़ तेज़ की।

"आज तो हमारे पापा का बर्थडे है इसलिए सब बनाए हैं। मम्मी पापा, भैया भाभी मंदिर दर्शन के लिए गए थे तो आज रात यहाँ रुकते हुए जाएंगे।" कहते हुए कोकिला ने मधुर के हाथ का बैग लेकर अंदर रख दिया।
"पूरी की पूरी दाल ही काली है आज तो।" हाथ पैर धोते हुए मधुर अपनी सास की तीक्ष्ण दृष्टि को शरीर में घुसता महसूस कर रहा था। 

"जो खाए सो खाए, मेरे लिए तो सलाद काट दो बस।" आज मधुर भी अपने संकल्प से हटने को राज़ी नहीं था।

गिलास भर पानी से आई डकारों ने लंच का राज खोलने की पुरजोर कोशिश की।‌
कोकिला की छठी इंद्रिय ने उसे क्या बताया कि वो एक कटोरी खीर सामने पटक गई।

"हमारे मायके वालों के जाने के बाद अपने चोंचले करते रहना, वैसे भी छोटे की शादी तय हो रही है तो मैं तो दो महीने पहले ही चली जाऊंगी मायके, तब शांति से अपनी फिटनेस, डायटिंग करते रहना। सुबह सारी दुनिया वाकिंग करती है, तब तो मुँह ढांके सोते रहते हो और फिटनेस लाएंगे।" 

डाइनिंग टेबल पर विविध व्यंजन सजाती उस अन्नपूर्णा को देख मधुर ने गहरी सांस रोककर, अपने पेट को सपाट दिखाने की प्रेक्टिस शुरू कर दी।

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शर्मिला चौहान

बुधवार, 24 अप्रैल 2024

व्यंग्य - "अनसेफ किनारा"

व्यंग्य- "अनसेफ किनारा"


कुछ फार्मल मीटिंग्स के बाद सर्वेक्षण टीम तैयार हो गई। अलग-अलग विभागों के आठ लोगों को, समुद्री जीवों की विलुप्त होती प्रजातियों के अध्ययन एवं कार्यशालाओं के आयोजन का कार्य सौंपा गया।

चार ऑफिसर्स और साथ चार उनके सहयोगियों को समुद्री किनार पट्टी पर समय बिताने का सुअवसर प्राप्त हुआ था। 

प्रमोद, आनंद, जयंत और शरत ने तटीय क्षेत्रों की सबसे आरामदायक और सुंदर रेलगाड़ी में अपनी टीम का आरक्षण करवा लिया।

"शादी के बाद आई-बाबा पहली बार आएं हैं, उन्हें तो साथ ले जा सकते हो। आखिरकार जंवाई के पद का कुछ तो फायदा होगा।" प्रमोद की नवब्याहता ने ठुनकते हुए कहा।
"अरे! सरकारी दौरा है। ऐसा नहीं चलता।" प्रमोद ने असफल विरोध किया।
"कोई मुश्किल नहीं तुम्हारे लिए, बाबा को लकवे के बाद से हवा-पानी बदलना था, समुद्र किनारे की हवा, केकड़े का सूप उनको स्वस्थ बना देगा।" नवब्याहता की मनुहार और सामने खड़े  ससुर को देखा, जिन्होंने अपनी चाल को और अधिक टेढ़ी मेढ़ी करने की कोशिश चालू कर दी थी।

"साहेब, थांबा थांबा। ही महत्वाची फाइल तुम्ही विसरला होतात ऑफिस मध्ये।" स्टेशन पर ट्रेन छूटने के पहले चपरासी ने नियम, सूचनाओं की फाइल टीम को सौंपी।
 
आठ सरकारी और दो गैर सरकारी जीवों ने, आगामी सप्ताह के अपने खूबसूरत समय का अनुमान लगा लिया।

स्टेशन पर लोकल सरकारी लोग, कुछ पर्यावरण संरक्षण वाली संस्था के लोग, टीम के स्वागत के लिए तैयार थे।
"आठ माला लाए थे, ये दस लोग कैसे हो गए?" टीम का एक्स्ट्रा एक्सटेंशन, स्टेशन पर खड़े लोगों को हाइपरटेंशन दे गया।

"अब रहने खाने का भी तो दो एक्स्ट्रा इंतजाम करना होगा।" अधेड़, अनुभवी स्वागत कर्ता बुदबुदाया। उसको अपने समुद्र किनारे के रिसोर्ट का एक और कमरा, बलि चढ़ता दिखाई देने लगा।

 फोटोग्राफर की व्यवस्था भी थी ताकि कल के समाचार में, शासन द्वारा इस जगह के संरक्षण और संवर्धन की सजगता का उल्लेख किया जा सके।
स्टेशन पर ट्रेन से उतरे यात्रियों को, समाचार पत्र में छपने का चारा फेंका गया और इस सर्वेक्षण टीम के चारों ओर भीड़ का सुंदर कवरेज फोटोग्राफर को मिला। 

अपने बालों का संरक्षण ना कर पाने के दुख और शर्मिंदगी को अधिकारी जयंत ने, टोपी पहन कर छुपा लिया था।

समुद्र किनारे पर बने इस रिसोर्ट को, ऐसे ही सरकारी-गैर सरकारी जीवों के लिए अनाधिकृत रूप से खड़ा किया गया था। 

नाश्ते में पोहा, उपमा और चना देख, टीम का आवेश पूर्णिमा की समुद्री लहरों सा उफान पर आ गया।
"हम क्या यहाँ घासफूस खाने आएं हैं? समुद्र के किनारे रहकर फिश, क्रेब और सी फूड खाएंगे या ये सब?" चारों की अनुमानित प्रतिक्रिया के दस मिनट बाद ही टेबल पर विभिन्न आकार प्रकार के केकड़े, मछलियों के क्रिस्प सज गए। 

"साहेब, हमको लगा कि आप सब  सरकारी सर्वेक्षण टीम वाले, जल जीवों के संरक्षण के लिए आए हैं तो हम तो कैसे आपको वही जीव खिलाते।" हाथ जोड़े रिसोर्ट मालिक सामने था।
 
"सर्वे ही करने आएं हैं ना, कोई भूख हड़ताल तो नहीं। आज तक तुम लोगों ने सैकड़ों किलो मछली, केकड़े खाए-पचाए, अभी बड़े नियम कानून वाले बन गए।" जयंत अपने टकले को पंखे की हवा खिलाते हुए गरजा।

"मला दोन्हीं टाइम खेकड्याच्या सूप द्या, डाक्टर ने सांगितले आहे मला।" सरकारी अधिकारी के गैर सरकारी ससुर आदेश था।

टेबल पर कुछ जिंदा केकड़े प्रदर्शन के लिए लाए गए, उन केकड़ों ने उस घिसटकर चलते हुए प्राणी को देखा और अपनी ही प्रजाति का बड़ा जीव समझकर अपनी ख़ैर मनाते हुए आँखें बंद कर लीं।

नाश्ता डकार कर, लंच के लिए कुछ स्वादिष्ट, कीमती समुद्री स्पेशल डिशेस तय करके, टीम अपने कुछ विशेष सहायकों के साथ आसपास का दौरा करने चली गई।

पुराने समय के बने छोटे-छोटे घर, अपनी अपनी आजीविका की नौका द्वार पर रखे, वर्षों से टकटकी बाँधे, सामने गरजते मित्र की गतिविधियों का सूक्ष्म अध्ययन कर रहे थे। 
"क्यों रे, नया घर बाँधा है अभी?"  कुछ चमकती दीवारों से घिरे घर के आँगन में लगे काजूओं के ढेर को देख टीम रुक गई थी।

"नाही जी, जुनीच है, फक्त कलर किया। आजोबा के हाथ का घर है साहेब।" घर का मालिक सहमते हुए बोला।

"निकाल रे गाड़ी से मोजणी टेप, एक इंच भी इधर-उधर हुआ तो तोड़ना पड़ेगा।" टकले आफिसर ने सिर  खुजलाते हुए, जुगाड़ के बादल जमा किए।
"साहेब, मोठे वादळ आया था, घर गिर गया था तभीच नवा किया साहेब, थोड़ा इधर-उधर हो गया होगा।"  घर मालिक ने अपनी घरवाली को कुछ इशारा किया।
"साहेब, रोज फ्रेश सुरमई, खेकडे देगी ये आपके रिसोर्ट में। मेरे बाग के काजू सबसे बड़े हैं साहेब, आपके लिए भेजता हूँ फ्रेश।" कोकम शरबत का गिलास घरवाली से लेकर टीम के सभी लोगों को देने लगा वह।

मौसम, समुद्र और लहरों के मिजाज को समझने वाले इस परिवार ने, सरकारी लोगों की नब्ज पकड़ ली थी।‌

"शाम को सब आसपास के लोगों को जमा करो, साहेब लोग कुछ जानकारी देने वाले हैं। समुद्री जीव जंतु के संरक्षण, संवर्धन पर कुछ नवीन बातें बताएंगे तुम सबको।"  कहते हुए टीम ने कड़कती धूप में, रिसोर्ट पर आराम करने पर सहमति बनाई।

लंच पर भरवें केकड़े, शिंपले की खासियत सुनते हुए सर्वे टीम ‌ने, डेढ़ दर्जन केकड़ों को भवसागर से पार करा दिया।
"प्रमोद राव, तुम्हारे ससुर को फ्रेश केकड़ा सूप आठ-दस दिन मिलेगा तो ठन-ठन चलने लगेंगे।" सासू का लाड़ जंवाई पर बरस रहा था।
"अभी तो काम शुरू किया है, आगे थोड़ा एक्सटेंशन भी ले लेंगे।" प्रमोद सरकारी आफिसर से ज्यादा,अपने आपको श्रेष्ठ जंवाई साबित कर रहा था।

शाम की सभा खास थी। मछुआरों के जाल में फंसकर  आने वाले, कुछ विलुप्त बेशकीमती समुद्री जीवों को सरकारी कार्यालय या पर्यावरण संरक्षण कर्ताओं की जानकारी में लाकर, वापस समुद्र में छोड़ने पर, घोषित सरकारी ईनाम की जानकारी दी गई।
मछुआरे हैरान थे, बरसों से वो यही बिना ईनाम कर रहे थे।
समुद्र किनारे पर इतनी चहल पहल से, किनारों पर आराम से पड़े रहने वाले जलीय जीव परेशान होकर, इधर-उधर भागने लगे और भीड़ के पैरों तले दबने‌ लगे।

सुबह किनारे पर क्रिकेट खेलती सर्वेक्षण टीम के ब्रांडेड जूतों ने, किनारों पर लघु जीवों के अंडों की बलि ले ली। सुबह-शाम अपने शरीर को धूप में खुला छोड़ देने वाले समुद्री जीवों को अब ये किनारे खतरनाक लगने लगे थे। 

नन्हें-नन्हें जलीय प्राणियों को उनकी माताओं ने, किनारों का डर दिखाना शुरू कर दिया था। "जाना नहीं, नहीं तो  ये मगरमच्छ  तुम्हें खा जाएंगे।" इसी तर्ज पर वे अपने नन्हों को सावधान करने लगीं।

सूर्यास्त के बाद पूर्ण शांति के साथ समुद्र की लय ताल को सुनने वाले किनारे पर, अब हर रात पार्टी होने लगी। लहरों और नारियल के पेड़ों की संगीत की जगह, फिल्मी गानों की तेज़ आवाजें गूँजती। बड़ी बड़ी लाइट्स ने रात को दिन में बदल दिया। रात की पार्टी, हो-हल्ला और सुबह किनारे पर बोतल, पैकेट्स और पालीथीन बैग इधर-उधर पड़े रहते। समुद्री प्राणी टुकुर-टुकुर इन नयी चीज़ों को ताक रहे थे।‌

समुद्री जीवों ने इस डरावने अनुभव को समुद्री मीडिया में शेयर करना शुरू कर दिया।
प्राकृतिक संसाधनों, सौंदर्य से भरपूर इस जगह पर सर्वेक्षण टीम ने अपना स्टे और बढ़ा दिया।

लोकल निवासियों से मिलकर टीम ने, जलीय जीवन के बारे में अपनी जानकारी बहुत बढ़ा ली थी। प्रकृति के सान्निध्य में, ताजे भोज्य पदार्थों, शुद्ध हवा और आनंदमय वातावरण से सर्वेक्षण टीम के सदस्यों के वजन में इज़ाफ़ा होना जायज़ ही था।

पंद्रह दिनों के इस सर्वेक्षण मुहिम के बाद, महानगर से आई यह टीम आज वापस जा रही थी। बारिश में इस स्थान की खूबसूरती के किस्सों से प्रभावित टीम ने अपनी रिपोर्ट में, हर मौसम में समुद्री किनारों एवं जलीय प्राणियों के संरक्षण संवर्धन की आवश्यकता पर विशेष बल दिया।

काजू, कटहल, अचार, मसाले, सूखी मछलियांँ, कोकम शरबत और दुनिया में प्रसिद्ध स्वादिष्ट आम के डिब्बों को अपने संरक्षण में लेकर टीम के लोग स्फूर्ति से स्टेशन की ओर, गाड़ियों में बैठ निकल पड़े। उड़ती धूल का गुबार, उनके विलुप्त होने का आनंदमय संकेत दे रहा था।

आज शाम किनारे को पूर्ववत शांत पाकर, शहरी मगरमच्छों से निर्भय सारे जलीय प्राणियों ने  किनारों पर रात भर पार्टी की। आज उनकी सारी प्रजाति, अपने आपको शत प्रतिशत सुरक्षित महसूस कर रही थी।  

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शर्मिला चौहान

मंगलवार, 23 अप्रैल 2024

122 122 122 12 पर ग़ज़ल

आदरणीय अनिल सर एवं सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏(संशोधित रूप)

फ़िलबदीह क्रमांक -16
मिसरा-ए-तरह
धुआं तक नहीं लेकिन अखबार में 
क़ाफ़िया - आर
रदीफ़- में 


122 122 122 12

छिपा था जो ईश्वर निराकार में 
मेरे सामने आया साकार में।।1।।


बढ़ी कीमतें इस कदर चीज़ों की
लगे  मन नहीं अब तो सत्कार में।।2।।

तनिक बात का वो बतंगड़ करें 
भले कुछ नहीं हो समाचार में।।3।।

बड़ी हड़बड़ी में ये दुनिया चली
सुनेगी नहीं बात विस्तार में।।4।।

भरी जेब से सौदा करने गए 
मिली ही नहीं खुशियांँ बाज़ार में।।5।।

तरही मिसरा- 

लगी आग दिल में हुआ खाक सब
धुआं तक नहीं लेकिन अखबार में।।

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शर्मिला चौहान

मंगलवार, 9 अप्रैल 2024

गीत-, नववर्ष आया (गुड़ी पाड़वा २०२४)

"नववर्ष आया"


आम्र बौरों से धरा महकती,
फूलों की रांगोली सजती।
सीना ताने रवि मुस्काया,
देखो, शुभ नववर्ष है आया।।१।

बागियों में कोयल का कूंजन,
चिड़ियों का आँगन में गुंजन।
कचनार अमलतास मन भाया,
देखो, शुभ नववर्ष है आया।।२।।

पीपल के किसलय आँख मले,
टेसू के सुंदर दीप जले।
पुष्प परिधान नीम को भाया,
देखो, शुभ नववर्ष है आया।।३।।

चैत्र माह वसुधा को प्यारा,
रूप निखरता उसका न्यारा।
भरी धूप जब यौवन छाया,
देखो, शुभ नववर्ष है आया।।४।।


नवरात्रि शक्ति की उपासना,
शीश नवा करते हैं प्रार्थना।
स्वस्थ निरोगी हो हर काया,
देखो, शुभ नववर्ष है आया।
देखो, शुभ नववर्ष है आया।।५।।


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शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
मो.नं. 9967674585

बुधवार, 3 अप्रैल 2024

फ़िलबदीह 15( 2122 1122 1122 22)

(संशोधित रूप)

फ़िलबदीह क्रमांक 15

मिसरा-ए- तरह
मुझको दीवार बनाने पे तुली है दुनिया

2122  1122  1122  22

झूठ के दाँव से अक्सर ही गिरी है दुनिया
थाम सच्चाई को फिर उठ के चली है दुनिया।।1।।

साँस घुटती सी नज़र आये सभी रिश्तों की 
वेंटिलेटर पे लगे आज पड़ी है दुनिया।।2।।

दौर इतना तो ज़माने में दिखावे का है
फोन फिल्टर को लगा  खूब सजी है दुनिया।।3।।


लाख मुश्किल भी मिले राह पे आगे बढ़ती
रोकने से भी भला कब ये  रुकी है दुनिया।।4।।

चक्र जीवन का चले बरसों से जग में यूँ ही
मरते हैं लोग नहीं मरती कभी है दुनिया ‌‌।।5।।


गिरह का शेर-

बन शिखर खूब चमकने की थी  मेरी चाहत
मुझको दीवार बनाने पे तुली है दुनिया।।


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शर्मिला चौहान