गुरुवार, 25 जनवरी 2024

ग़ज़ल 2122 2122 2122 212



2122  2122  2122  212

फ़िलबदीह क्रमांक-10
दूसरा चरण 
क़ाफिया- आया
रदीफ़- था कभी

धुन पे मुरली की कन्हैया ने नचाया था कभी
गोपियों को प्रेम का अमृत पिलाया था कभी।।1।।

भूलकर गोकुल की गलियाँ श्याम तू तो खो गया
याद कर लेना यहीं तो दिल लगाया था कभी।।2।।

मौन यमुना मौन पंछी कुंज गलियां मौन हैं
गीत तेरे साथ कान्हा सबने गाया था कभी।।3।।

जल में यमुना के स्वयं को ढूँढती है कनुप्रिया
मुस्कुराता वो जिसे दिल में छिपाया था कभी।।4।।

प्रेम सागर पैठ कर उसने ही मोती पाया है 
जिसने निश्छल प्रेम-नौका को तिराया था कभी।।5।।


शर्मिला चौहान

गुरुवार, 18 जनवरी 2024

ग़ज़ल 2122 2122 2122 212

आदरणीय अनिल सर के मार्गदर्शन के अनुसार संशोधित ग़ज़ल -

आप सभी के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास_

फ़िलबदीह क्रमांक-10
मिसरा-ए-तरह  
और फिर इक दिन इसी मिट्टी में मिट्टी मिल गई

शाइर/ शाइरा  - मुनव्वर राणा
क़ाफिया- ई की मात्रा
रदीफ़- मिल गई
वज़्न -2122  2122  2122 212


बचपने को जब घरों से सीख सच्ची मिल गई
देश गढ़ने के लिए मज़बूत मिट्टी मिल गई।।1।।

चल पड़े थे देश हित जो बाँधकर सर पर कफ़न
भारती की राह पर उनको शहीदी मिल गई।।2।।


धूप बारिश झेलकर हैं काम करते रात दिन
शाम को खुशियों मनाते आज रोटी मिल गई।।3।।

ढोल ढम ढम झाँझ झम झम गीत फगुआ गूँजता
राह के उस मोड़ पर मस्तों की टोली मिल गई।।4।।


छल कपट चालाकियों से उम्र भर परहेज था
हर कदम पर क्यों मगर दुनिया फरेबी मिल गई।।5।।

मिसरा-ए-तरह

रार थी तकरार थी था गर्व अपने आप पर
और फिर इक दिन इसी मिट्टी में मिट्टी मिल गई।।

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शर्मिला चौहान

मंगलवार, 16 जनवरी 2024

अनंत की बारात का गीत

" जय राजाराम जी की"

लेकर बारात चलें भैया, राजा राम की नगरिया।
ओरछा बिराजै जानकी मैया, राजाराम की नगरिया।।
राम की नगरिया श्रीराम की नगरिया ‌
हनुमत रक्षा करैया, राजाराम की नगरिया।।२।।

लेकर बारात चलें भैया, राजा राम की नगरिया।।१।।


घर को सजाना, दीपक जलाना।
प्यारे बन्ने को हल्दी लगाना।।
हरा हरा मंड़प, खंबा रंगभरा।
चूड़ियांँ लाल हरी, सखियों के मनभरी।।
सखियां देतीं बधैया।
राजाराम की नगरिया।।२।।

राम की नगरिया, श्रीराम की नगरिया
लेकर बारात चलें भैया, राजाराम की नगरिया।।२।।

दादा भी चल पड़े, दादी भी चल पड़ी।
पापा भी चल पड़े, मम्मी भी चल पड़ी।।
सज धज के चाचा चाची हैं आगे।
बुआ फूफा जी सबसे पीछे भागे।

बुआ नाचै ता ता थैया, राजाराम की नगरिया।।२‌।

लेकर बारात चलें भैया, राजाराम की नगरिया।।३।।

भैया भी सज गए, भाभी भी सज गई।
दीदी और जीजा नेग पे अड़ गए ।
मौसा और मामा बस पर आगे।
मौसी और मामी भी जल्दी से भागे।

बहनें लेतीं बलैया, राजाराम की नगरिया।२।

लेकर बारात चलें भैया, राजाराम की नगरिया।।४।।

ढोल शहनाई बाजे, डी.जे.पे बाराती नाचैं।
साफा शेरवानी, मोतियों की माला।
बन्ना मेरा दिखता, सबसे निराला।।
आरती उतार रही मैयाँ, राजाराम की नगरिया।।२।।

लेकर बारात चलें भैया, राजाराम की नगरिया।। ५।।

सजी धजी बन्नी, हाथ जयमाला।
डाल रही बन्नी, बन्ने को वरमाला।
राम जी की नगरी में, ब्याह रचा है।
सियारामजी के मन, जोड़ा जंंचा है।

आशीष देतीं जानकी मैयाँ, राजाराम की नगरिया।।६।।

राम की नगरिया श्रीराम की नगरिया।
लेकर बारात चलें भैया राजाराम की नगरिया।।
हनुमत रक्षा करैया, राजाराम की नगरिया।।

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शर्मिला चौहान 

सोमवार, 15 जनवरी 2024

212 212 212 212 पर ग़ज़ल

आदरणीय अनिल सर के मार्गदर्शन से संशोधित ग़ज़ल 🙏

फ़िलबदीह क्रमांक - 9
क़ाफिया- आया
रदीफ़- नहीं


मन भटकता रहा ठौर पाया नहीं
 झूठ का दौर था जो कि भाया नहीं।।1।।

सूर्य किरणें थकीं खोज कर आसरा
शुष्क होती धरा पास छाया नहीं।।2।।

ओस चंचल हुई फुनगियों पर मटक
दिन का चढ़ना उसे रास आया नहीं।।3।।

तोड़कर पिंजरा कब पखेरू उड़ा
बात इतनी समझ कोई पाया नहीं।।4।।

राम सबके लिए प्रेरणा पुंज हैं 
गुण भजन राम का किसने गाया नहीं।।5।।


शर्मिला चौहान

गुरुवार, 4 जनवरी 2024

ग़ज़ल 212 212 212 212

नमस्कार दोस्तों 🙏
आज महीनों बाद ग़ज़ल कहने का प्रयास किया है। आप सभी के सुझावों की प्रतीक्षा रहेगी।

फ़िलबदीह क्रमांक- 9
मिसरा-ए-तरह _ 
संग उसके ये कितनी सरल सी लगे
क़ाफिया - अल
रदीफ़-  सी लगे

212  212  212  212

दूर से ज़िंदगी, बस तरल सी लगे
पास से जब चखो, वो गरल सी लगे।।1।।

चाँदनी में नहा, सेंकती धूप को
भोर की नवकिरण, तब धवल सी लगे।।2।।

फूल तितली नदी, बाग वन वाटिका
मुस्कुराती धरा, नित नवल सी लगे।।3।।

प्रेम भर चंग जब, डोर बाँधे उड़ी
चूमकर फिर गगन, वह चपल सी लगे।।4।।

कुछ लजाती खड़ी, ओढ़ चूनर बढ़ी
साँझ प्रिय से मिलन, को विकल सी लगे।।5।।

गिरह का शेर

ज़िंदगी गम कई राह मुश्किल बड़ी
संग‌ उसके ये कितनी सरल सी लगे ।।


शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)