शनिवार, 28 अप्रैल 2018

धुँधलका

चार-पाँच दिनों से जय पढ़ने नहीं आया है , पता नहीं क्या बात है ? हमेशा आता है । उसके आसपास का कोई और बच्चा मालती के पास आता नहीं है । मालती के घर से करीब दो-ढाई किलोमीटर की दूरी पर एक छोटी सी बस्ती है , वहीं रहता है जय । फोन भी नहीं है उसके घर की उसका हालचाल जान लेती । जो दूसरे बच्चे  पढ़ने आते हैं  , वो भी जय को पहचानते नहीं हैं ।

बच्चों को पढ़ाकर अभी फारिग हुई  है मालती । सारा कमरा अस्त-व्यस्त पड़ा है ‌। पाँचवीं से नवमी कक्षा के बच्चों को गणित, विज्ञान पढ़ाती है मालती । दो बार ,दो घंटे की कक्षा रखती है । कुल दस-बारह बच्चे होते हैं ।
उन बच्चों के बीच उसका अपना मन लगा रहता था ।
उनके साथ वह भी , एक बार फिर पुराने समय को जी लेती थी ।

सोफे पर कुशन ठीक से लगाए और मेज़ पर पड़ा अखबार नीचे रखा । कुर्सियाँ सब जगह पर व्यवस्थित करने के बाद , देखा तो बच्चों की पेन और पेंसिल छूट गई हैं । यह तो रोज का ही काम है  , कोई घर पर भूल आता तो कोई यहाँ छोड़ जाता । वही उनको याद से देती थी ।

रसोई की ओर जाते हुए सोचने लगी कि सुरेखा भी दो दिनों से आई नहीं है । फोन भी बंद आ रहा है । गैस पर चाय का पानी रखकर वह अदरक कूटने लगी । कुछ मठरियाँ प्लेट में डाल लिया और प्याली में चाय छानकर बरामदे में आ गई । बारिश के अलावा सभी मौसम में यह जगह उसकी पसंदीदा  है । बारिश में भी वो चाय तो यहीं पीती है । बादलों की आवाजाही , बूँदा बाँदी , सामने आम के पेड़ पर अपने आपको बचाते पक्षियों को देखकर , लगता था कि उन्हें अपने घर में आश्रय दे दूँ ।

बेंत की कुर्सी पर फैलकर बैठते हुए सोचने लगी कि रात खाने में क्या बनाऊँगी ?  सुरेखा कभी कभी भाजी साफ कर दिया करती है । दो दिनों से घर का काम , बच्चों की पढ़ाई में मालती थक जा रही है । अभी बच्चों के लिए कुछ नाश्ता बना देना चाहिए नहीं तो आने के बाद उनको खाने की जल्दी रहती है ।

रवि को आने में आठ बज जाते हैं । वो आने के बाद समाचार देखते हुए ही खाना खाते हैं । सोनू ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ता है और नेहा सातवीं में । सोनू विज्ञान लेकर पढ़ रहा है , नवमी तक तो वो खुद सब विषय पढ़ाती थी परंतु दसवीं के लिए सोनू को बाहर कक्षा  लगवाया था । रवि एक कंप्यूटर इंजीनियर हैं और सोनू को कंप्यूटर में जो भी कठिनाई होती थी वही समझा देते हैं ।

हलुआ की कढ़ाई में चम्मच घुमाते हुए मालती को फिर जय याद आ गया । जब वह पहली बार आया था तो मालती ने उसको हलुआ दिया था । कितना खुश हुआ था वह । ऊपर से मना कर रहा था पर खाने का मन भी था , जबरदस्ती उसके हाथ में प्लेट थमा कर अंदर आ गयी थी ।
सातवीं में पढ़ने वाला , एक होनहार बच्चा है जय । गरीब परिवार की तीसरी संतान , पिता किसी कारखाने में काम करते थे और माँ  बर्तन , कपड़े किया करती ।
सोलह साल की उम्र में ही बड़ी बहन की शादी कर दी गई । जय से बडा भाई नवमी की पढ़ाई अधूरी छोड़कर कुछ छोटा-मोटा काम करने लगा । छोटे दोनों भाई-बहन जय के ही शाला में पढ़ते हैं ।

बच्चों की आवाज से मालती की सोच को विराम लग गया  । नेहा ने आते ही शिकायत की _"मम्मी , मैंने सब सही लिखा था फिर भी टीचर ने पूरे नंबर नहीं दिए । पूजा ने भी वैसा ही लिखा , उसको मुझसे ज्यादा दिए ।"
" हाँ  , तेरे  से तो दुश्मनी है टीचर की । खुद ठीक से काम करती नहीं और फिर शिकायत भी करती है ।"
सोनू ने उसको डाँटते हुए कहा ।

" अच्छा चलो अब हाथ पैर धोकर आओ , मैंने आज हलुआ बनाया है ।" मालती ने बचाव करते हुए कहा ।
बच्चे खेलने के लिए बाहर गए और मालती फिर रसोईघर में । पुलाव के लिए सब्जियांँ  काटते हुए वह फिर पुरानी बातें याद करने लगी । एक दिन सब्जी साफ करते समय ही सुरेखा ने जय के बारे में उसे बताया था _  "  दीदी , मेरे पड़ोस में एक बच्चा रहता है । जय नाम है उसका । बहुत होशियार है दीदी । गणित में थोड़े कम नंबर मिलते हैं । आप तो सब बच्चों को पढ़ाती हो , उसको भी पढ़ा दो ना दीदी । गरीब घर का लड़का है आपको फीस नहीं दे सकता , पर  उपकार जरूर मानेगा ।"  मैंने सहज ही कह दिया _" ठीक है ले आना उसे ।"

अगले दिन ही  वह जय को ले आई । साँवला रंग , भोला- भाला चेहरा , प्यारी सी मुस्कान । आते ही पैरों में झुककर प्रणाम किया । उसके संस्कार ने मुझे मजबूर कर दिया कि मैं  अनजाने ही दूसरे बच्चों से  उसकी तुलना करने लगी । हाथ जोड़ कर नमस्कार करने में भी आज बच्चे कतराते हैं ।

"आप मुझे गणित समझा देंगी टीचर ? "  उसकी आशा भरी आवाज मेरे दिल में उतरती चली गई ।
" तुम कैसे आओगे , तुम्हारी बस्ती तो यहाँ से दूर है ?"
मैंने प्रश्न किया ।
"मैं रोज आऊँगा । आपको मालूम है कि स्कूल में दौड़ में मैं हमेशा प्रथम आता हूँ । मैं भागते भागते पढ़ने आ जाऊँगा ।" चमकते चेहरे से उत्तर दिया ।
" ठीक है तुम अगले सप्ताह से आ जाना ।"हँसते हुए मालती ने कहा ।
तभी उसने उसे खाने के लिए हलुआ दिया था ।

" मम्मी , कल स्कूल में चार्ट बनाना है । मुझे  कागज दो ।"  नेहा की आवाज से मानो मालती वापस आज में आ गई  ।
" खुद लो नेहा । अपने काम स्वयं करना सीखो ।" गुस्से से मालती ने कहा ।
सोनू भी कंम्पयूटर पर बैठा काम कर रहा था ।

रवि  के आने पर सब खाना खाने बैठे । हलुआ मुँह में डालकर रवि ने कहा _" स्वादिष्ट बना है हमेशा की तरह ।"   " पापा मुझे आपसे कुछ समझना है , कल मुझे कंप्यूटर का काम जमा करना है " सोनू ने तुरंत अपनी बात रखी ।  "ठीक है बाबा , पहले खाना तो खाने दो । " अनमने मन से रवि ने कहा  ।
ऑफिस से आने के बाद रवि को टेलीविजन पर प्रसारित समाचारों के अलावा कुछ और अच्छा नहीं लगता ।
रवि और सोनू कमरे में गए और  नेहा सुबह के लिए बैग ठीक करने लगी । टेबल पर से बर्तन हटाकर मालती ने साफ-सफाई की , सुबह के लिए सब्जी तोड़ते हुए नेहा को आवाज दी _" नेहा , बैग जमा लिया तो अब सो जाओ ना । सुबह उठती नहीं तुम । सो जल्दी से ।"
रवि ने कोई समाचार चैनल लगाया था , सामने ही बैठकर वह सब्जी साफ करने लगी  । किसी बस्ती का दृश्य है , खूब लोग जमा थे । संवाददाता जोर जोर से सबके सामने जाकर पूछ रहा था ।
" ओहो !  कितने जोर जोर से चिल्लाए जा रहा है ।"
मन में गुस्सा करते हुए उसने टेलीविजन बंद करने के लिए कदम उठाए ।

"अरे ! यह तो जय लगता है ।" अपने परिचित चेहरे को देखकर हड़बड़ा गई । उसी भीड़ में सुरेखा भी नजर आई । "हे भगवान ! क्या हुआ इनके साथ ? " मन में सोचते हुए मालती ने ध्यान से देखा ।
आसपास का क्षेत्र काफी गंदा नजर आ रहा था । संवाददाता बोल रहा था कि जहरीली शराब पीने से इस बस्ती के कई लोगों की मौत हो गई ।

मिलों , कारखानों में काम करने वाले लोगों की बस्ती है और तो और रोज़ी-मजदूरी करके अपना जीवन व्यतीत करते हैं यहाँ के लोग ।  औरतें भी आसपास की कॉलोनी में घर के काम करतीं हैं । सुरेखा ने कई बार बताया था कि _" क्या करें दीदी , सबको शराब की आदत है । जो कमाते हैं थोड़ा-बहुत ही घर में देते हैं बाकी शराब पीने में बरबाद कर देते हैं । घर परिवार, बच्चों की कोई फ़िक्र ही नहीं ।"

अनिष्ट की आशंका से हाथ-पैर काँपने लगे । घबराकर उसने टेलीविजन बंद कर दिया । भारी कदमों और बोझिल मन से अपने कमरे तक आई । जय का चेहरा उसकी आँखों से ओझल ही नहीं हो रहा था ।
खिड़की से आमों की खुशबू लिए हवा आ रही थी , जो मालती को बहुत आनंद दिया करती थी । आज वही हवा भयावह लग रही है  । पत्तों की सरसराहट दहला रही है । हर आहट कुछ अनचाहा कह रही थी । उठकर खिड़की बंद कर दिया , जब मन अस्थिर हो तो कुछ अच्छा नहीं लगता ।

रवि आकर कब सो गए , पता ही नहीं चला । बहुत रात तक वह छटपटाती रही कि पता नहीं क्या हुआ है ?
छः महीने से वह जय को पढ़ा रही है और अब अगले सप्ताह से उसकी वार्षिक परीक्षा होनी है । मालती पहले ही दिन समझ गई थी कि वह बहुत होशियार और मेहनती लड़का है । हमेशा गृहकार्य करके लाता , एकाग्रतापूर्वक सब समझता था ।

जब पहली बार उसने गृहकार्य करके नहीं लाया तब मालती ने बहुत गुस्से से कहा था _" ऐसे नहीं चलेगा कि मैं तुम्हारे लिए अपना समय और दिमाग लगाऊँ और तुम दिया काम ना करके लाओ ।"

सिर नीचा करके उसने कहा था _" टीचर , कोई कॉपी नहीं है मेरे पास । जो स्कूल से मिलीं हैं वो वहीं के लिए हैं । मैं कॉपी खरीद नहीं सकता । मैंने गृहकार्य किया है सच बोल रहा हूंँ । घर के सामने आँगन में मैंने लकड़ी के टुकड़े से मिट्टी में गणित किया है । आप कोई भी करवा लीजिए , मुझे आएगा ।"

ना जाने क्यों उसकी निष्कपट , भोली और आत्मविश्वास से भरी बातें मेरे मन को छू गई । मैंने उसे सोनू और नेहा की पुरानी आधी लिखी कॉपियाँ दे दीं ।
इतना खुश हुआ मानो गड़ा हुआ खजाना मिला हो ।
अब तो गृहकार्य के अलावा भी मेरे पास रखी दूसरे लेखकों की गणित पुस्तकों के गणित करता था । उसकी लगन देखकर लगता कि "काश ऐसे बच्चे को थोड़ी सुविधा , अच्छी देखभाल मिल जाती तो यह क्या नहीं कर सकता ।"

मन उन बच्चों के बारे में सोचने पर बाध्य हो गया जो तमाम  सुख-सुविधाओं के बावजूद पढ़ाई से जी चुराते हैं । अत्याधिक  लाड़-प्यार एवं मनमानी पैसों के कारण , किसी भी वस्तु का मूल्य समझते नहीं ।

सुबह काम जल्दी जल्दी निपटाया और रवि तथा बच्चों के जाने के बाद वह जय का हालचाल जानने निकल पड़ी । उसे रास्ता मालूम नहीं था क्योंकि बस्ती में जाने की कभी जरुरत ही नहीं पड़ी ।
एक आॅटो वाले को बताया तो उसने सही  जगह पर पहुँचा दिया । कल टेलीविजन पर इसी इलाके को दिखाया गया था । चौक पर कुछ लोग बैठे थे उनसे जय का नाम , उम्र बता कर उसके घर का पता पूछा ।

"  सामने गली के आखिरी घर में रहता है टीचर जी ।" एक नौजवान ने गली की ओर इशारा करते हुए कहा ।

" तुमने मुझे टीचरजी क्यों कहा ? क्या तुम मुझे जानते हो ? " मालती ने आश्चर्य से पूछा ।

" आपके बारे में जय हमेशा सबको बताता है । आपके पढ़ाने की तारीफ करते नहीं थकता । आप जो सिखाती हैं वो दूसरे बच्चों को भी सिखाता है , जिनको गणित कठिन लगता है वो सब उसके पास आते हैं ।"  सहजता से उसने कहा ।

आज ना जाने क्यों मालती को अपने शिक्षिका होने पर और जय के विद्यार्थी होने पर गर्व महसूस हो रहा था ।
"धन्यवाद " के साथ उसने कदम गली की ओर बढ़ा
लिए ।
आख़िरी मकान के सामने पहुँचकर  उसने इधर उधर देखा । छोटा-सा घर , सामने एक पानी से भरी टंकी ,
वही शायद स्नानघर है । दीवारों पर चिपका पोस्टर , जो चुनाव के बाद भी अब तक पैर जमाये रखा है । दरवाजे पर एक मोटी चादर , जो कुछ जगहों से फटी हुई थी , परदे का काम कर रही थी ।
यहाँ -वहाँ बेतरतीबी से फैली चीजें , जिनपर गंदगी दिखाई दे रही थी । ऐसे जगह में कैसे रहते हैं ये लोग ? साफ तो रख सकते हैं । अंदर से कई लोगों की मिली-जुली आवाजें आ रही हैं ।

एक बच्चा अंदर जाकर मालती के आने का समाचार दे आया । अगले ही क्षण जय तेजी से दौड़ता हुआ बाहर निकला । एकाएक मालती ने उसको पहचाना नहीं । इन तीन दिनों में वो कितना बदल गया है ।

बिखरे बाल , सूजी हुई आँखें , सूखे होंठ , बेजान और निस्तेज चेहरा , मानो कभी इसमें मुस्कुराहट थी ही नहीं । यकायक वह मालती से चिपट कर रोने लगा _" मैं अब नहीं पढ़ सकता टीचर जी । मेरे बाबा मर गए । मेरा बड़ा भाई भी जहरीली शराब पीने के कारण अस्पताल में भर्ती है । डॉक्टर कहते हैं कि वो भी नहीं बचेगा । मेरी माँ , मेरे छोटे भाई-बहन की देखभाल मुझे करनी है । काम करना पड़ेगा मुझे । मुझे माफ कर देना टीचर जी । मुझे अपने परिवार का सवाल हल   करना है , जिंदगी का गणित सीखना होगा ।" मालती ने उसे कसकर चिपटा लिया ।

थोड़ी देर बाद बिना किसी से कुछ बोले मालती वापस आने वाली थी कि जय की माँ सामने आ गई । कमजोर , थकी हुई, जिंदगी से लड़ते हुए अपनी हार स्वीकार करती । आँखों में आँसू भरकर कहने लगी _" बहुत से लोग मर गए । कितने परिवार बर्बाद हो गए टीचर जी । सुरेखा का घरवाला भी नहीं रहा । पिछली गली में उसका घर है । अब यहाँ नहीं रहेगी । अपनी माँ के गाँव चली जाएगी । मेहनत मजदूरी करके बच्चों को पालेगी । सब कुछ खत्म हो गया । " वह सुबकने लगी ।

मालती ने उसके कंधों पर हाथ रखा , कहने के लिए शब्द नहीं थे । सुरेखा से भी मिलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी । क्या इन औरतों को सांत्वना देने के लिए उसके पास शब्द हैं ? जिंदगी के हर दिन जो नए सवालों का सामना कर रहीं हैं , बिना किसी सूत्र के अनजाने समीकरण हल करतीं हैं , उन्हें उसके किताबी ज्ञान से क्या शांत कर पाएगी वो?

जय और उसकी माँ की ओर एक दृष्टि डालकर मालती ने मुँह फेर लिया । तेज गति से कदम बढ़ाते हुए मानो परिस्थिति से भाग जाना चाहती हो । नज़रों के सामने एक धुंँधलका सा छा रहा है , आगे का कुछ साफ नजर नहीं आता ।

गुरुवार, 5 अप्रैल 2018

कारीगरी

थोड़ा सा चावल लिए , सूप में फटकती रधिया के कानों में मोटर की आवाज आई । गर्दन उठाकर देखा, तो उसकी ही झोपड़ी के आगे एक सुंदर , लंबी गाड़ी खड़ी हुई । ऐनक को साड़ी के पल्लू से घसकर साफ किया और फिर से पहनकर देखने लगी । गाड़ी से एक गोरी, सुंदर सी स्त्री उतर रही थी । रधिया ने अपनी बूढ़ी आँखो से उसे पहचानने की नाकामयाब कोशिश की ।

सहसा , उसनेे आकर रधिया के दोनों हाथ अपने हाथ में लेकर, उसी खनकती आवाज में कहा_"माई , ऐसे टुकुर-टुकुर क्या देख रही हो ? पहचाना नहीं, लल्ली हूँ तुम्हारी। " वह मुस्करा रही थी ।
"अरे...! मेरी मैया ।" रधिया ने सिर पर हाथ लगाया । "लल्ली ,बिट्टो कितनी बदल गई हो , अपनी अम्माँ जैसी दिखने लगी हो । बस आवाज जस की तस है बिटिया ।"
"बात ही करोगी , मुझे कुछ खाने को नहीं दोगी ।" हँसते हुए लाली ने कहा ।
"अरी बिटिया ,आ बैठ ,लाती हूंँ कुछ ।" कह तो दिया रधिया ने पर घर में "कुछ" होगा या नहीं , उसे पता नहीं था ।
अचानक ध्यान आया कि परसों काम करते वक्त किसी ने गुड़ की डली दी थी , सो आधा बचा लाई थी । परसों जो शाल ओढ़ी थी उसके पल्लू से वो गुड़ का टुकड़ा निकाल कर लोटा भर पानी लेकर लाली के सामने खड़ी हो गई ।बचपन की तरह ही लाली ने गुड़ एक बार में ही पूरा मुंँह में डाल लिया ।

"लल्ली ,बिट्टो थोड़ा थोड़ा खा , गले में अटक पडे़गा ।"कहते हुए रधिया हँस पड़ी ।
"माई ,घर आना । मुन्ने को देखोगी नहीं । मुझे तुमसे काम भी है कुछ । आना जरुर । अभी दस-बारह दिन मैं हूँ यहाँ ।" पानी का घूँट भरते हुए लाली ने कहा ।
"क्यों नहीं बिट्टो , जरुर आऊँगी । अपनी लाली के लल्ले को देखे बगैर मन मानेगा मेरा ।" रधिया ने हँसकर कहा ।
हाथ हिलाती लाली गाड़ी में बैठ वापस चली गई और रधिया को अपनी यादों में डूबने-उतराने के लिए छोड़ गई । वहीं नीचे बैठ रधिया , पुरानी बातों को चलचित्र की तरह देखने लगी ।
चौंसठ-पैंसठ साल की रधिया , छोटी कद-काठी ,साँवला रंग ,बाल सफेद-काले खिचड़ी से ,आँखों में काले फ्रेम का चश्मा , घुटने से थोड़ी नीचे साड़ी , सिर पर  पल्लू , होंठों पर सदा खेलने वाली मुस्कुराहट ।

धरमू को गए अब दस-बारह साल हो गए । यह लाली उनके सामने ही पैदा हुई थी । सेठजी ने खूब धूमधाम से उसका बारसा किया था । पूरा गाँव दोनों जून खाया ,बचा तो बाँध भी लाए ।

सेठानी ने कई बार उनसे गुदड़ी बनवाई थी । धरमू बहुत उम्दा नमूने निकालता था । सफेद-रंगीन , छोटे-बडे़ कपड़ों को जोड़कर खूबसूरत गुदड़ी बनाते थे दोनों । हर गुदड़ी अपने आप में एक बेहतरीन नमूना होती थी । आसपास के गाँवों में भी लोग उनको मानते थे । लाली के बारसे में अपनी तरफ से उन्होंने गुदड़ी ही भेंट दी थी।

यादों के सागर में गोते लगाती रधिया उठकर चारपाई पर बैठ गई । एक दिन जब दूकान वाले लाला के घर दोनों काम कर रहे थे तब गुदड़ी का नमूना देख रधिया ने कहा _" ना जाने तुम कैसे सोच पाते हो ? कितना सुंदर जोड़ा है कपड़ों को । मुझे तो समझ ही नहीं आता।"
ठहाकर धरमू बोला _" अरी ,तू कुछ कम है क्या ? कितने महीन धागे भरती है । एक समान सिलाई ,वह तो मुझे नहीं आती ।" दोनों खिलखिलाकर हंँस पड़े थे ।
वो दोनों मिलकर एक-डेढ़ दिन में ही गुदड़ी पूरी कर लेते थे ।

धरमू के जाने के बाद रधिया अकेली पड़ गई । उसने धरमू के सिखाए मुताबिक कपड़े लगाने की कोशिश की। पहले पहल तो मुश्किल हुई ,पर बाद में काम जमने लगा । अब जमाना भी बदल रहा है । लोग बड़ी , मोटी , आरामदायक  गद्दियों में सोना पसंद करते हैं । कभी कभी कोई बुला लेता , तो रधिया उसी के आँगन में बैठ कर काम करती ।

चारपाई से उठकर रधिया ने चूल्हा जलाया । सूप में से एक मुट्ठी चाँवल लेकर पकने  धर दिए । थोड़ा चाँवल कल के लिए बचाकर रखा , आजकल काम कम ही मिलता है । काम करते वक्त कोई गुड़ रोटी देता है तो भी वह थोड़ा रात के लिए बचाकर रखती है । मेहनताना कभी मुँह से माँगा नहीं रधिया ने । कोई दो रुपए दे देता , कोई तीन । वह खुशी से रख लेती । उस परिवार के आँगन में बिताए चार-पाँच दिन ही उसके लिए मेहनताना थे ।

बाल-बच्चे तो थे नहीं ।अकेली पेट के लिए क्या झिकझिक करना । धरमू से वह हमेशा कहती थी कि_"ना जाने कौन सा करम किए हैं कि भगवान ने अपनी कोई औलाद नहीं दी ?" धरमू शांति से कहता_"अरी ,गाँव भर के बच्चे क्या अपने नहीं हैं ? हर घर का बच्चा हमारी सिली गुदड़ी पर सोता है । उसको ओढ़ता है , उसपर लोटता है । हमारी गुदड़ी उनके जीवन में भर-भर खुशियांँ  लाएगी । क्यों ,तू हमेशा बच्चे की सोच लेकर बैठती है ? "
सचमुच धरमू ने उसके मन से बच्चे का ख्याल निकाल दिया। गाँव भर के बच्चे अब उसे अपने ही लगते ।

देगची में चाँवल उबल रहे थे और रधिया के मन में बातें।
इसी लल्ली के जन्म पर धरमू के साथ मिलकर उसने पालने पर बिछाने के लिए गुदड़ी सी थी । नरम , मुलायम और सुंदर नमूने की थी । रधिया को सख्त हिदायत दी थी कि धागे महीन , सिलाई बारीक रखे जिससे बच्चे को चुभे नहीं । मोर-मोरनी का जोड़ा निकाला था ,जो देखता देखते ही रह जाता । किनारी भी झालरदार थी ।

गरम भात में नमक डालकर ,प्याज के टुकड़ों के साथ रधिया ने खा लिया । चूल्हा साफ कर , लीप पोतकर बर्तन किनारे सरका दिया । रात में बर्तन साफ करने का मन नहीं हुआ । कल सेठजी के घर जाऊँगी , क्या लेकर  जाऊँगी ? मुन्ने को खाली हाथ तो नहीं देखूँगी ।

आले पर रखा पीतल का डिब्बा ,कुंडी खोलकर देखा तो डेढ़ रुपए थे । क्या करुं , नये कपड़े भी नहीं है कि छोटी गुदड़ी ही सी देती । सवा रुपया ही दे दूँगी ।
इतने बड़े बंगले में सवा रुपए लेकर जाने की बात सोच कर ही उसका सिर नीचा हो रहा था ।

विचारों में डूबते-उतराते रात बीत गई । सुबह घर कामकाज निपटाकर उसने अपनी सबसे अच्छी साड़ी और चोली  पहन ली । पल्लू में सवा रुपए बाँध लिए और बची चवन्नी का ढ़ेला भर गुड़ ले लिया ।
बंगले के सामने उसे किसी ने रोका नहीं । एक नौकर उसको अंदर ले गया । बीमार सेठानी लेटी थी , बाजू के पालने में लल्ली का मुन्ना सोया था ।

सेठानी ने उठते हुए कहा_"आओ रधिया , तुम तो रास्ता ही भूल गई । लल्ली ना जाती , तो शायद तुम आती ही नहीं ।"
"नहीं नहीं मालकिन ,ऐसी बात नहीं है । थोड़ा-बहुत काम जो मिलता है उसी को पूरा करती रहती हूँ । आप  लेटी रहिए ।" कहते हुए रधिया , सेठानी के पांँव के पास बैठ गई ।
"मुन्ने को तो देखो माई , मुझ पर गया है या अपने पापा पर ... कहते हुए लाली , रधिया का हाथ पकड़ कर पालने के पास ले गई ।

पालने में गोल-मटोल ,गोरा-चिट्टा मुन्ना सोया था । जी-भरकर उसे निहारने के बाद रधिया ने "सवा रुपए"मुन्ने की मुट्ठी में पकड़ा दिए और गुड़ की डली लाली के हाथ धर दी ।
" बिटिया मुन्ना तो हुबहू तुम्हारी तरह दिखता है । दूध-सा गोरा  , गोल-मटोल , छोटी सी नाक और बड़ी बड़ी आँखें । है ना मालकिन , अपनी लल्ली ऐसे ही दिखती थी ना बिल्कुल ।" खुशी से दमकते हुए रधिया ने कहा ।

पालने की गुदड़ी पर नजर जैसे जमकर रह गई  । चौबीस-पच्चीस साल पहले की कारीगरी पालने पर बिछी थी । मोर-मोरनी का जोड़ा अभी भी उम्दा है ।अचकचाकर कह पड़ी _" लल्ली इतने सालों इस गुदड़ी को जतन करके रखे रही ।" आँखों में पानी भर आया ।पल्लू से ऐनक साफ किया ।
"गुदड़ी नहीं है ये , माई और  बाबा का आशीर्वाद है । मेरे बच्चे को भी उसमें लोटने का मौका मिला है ।" खिलखिलाती लाली ने कहा । मुन्ने को पालने से उठाकर रधिया की गोद में डाल दिया । मुन्ने को निहारती  रधिया के कानों में धरमू की बात गूँज रही थी "पूरे गाँव के बच्चे अपने ही तो हैं ।"

लल्ली ने जबरदस्ती उसे खाना खिलवाया , खुद गुड़ के टुकड़े चबा रही थी । वापसी में सुंदर सी साड़ी और साथ एक शाल भी दिया ।
" बिटिया , ऐसा गजब ना करो । लड़की से कोई लेता है क्या ?  उल्टी गंगा तो मत बहाओ ।" रधिया ने सकुचाते हुए कहा ।
" माई , कमाती हूँ मैं । शहर में एक दूकान है मेरी , जहाँ कपड़े और कई चीजें बिकती हैं । ये कुछ सफेद-रंगीन नये कपड़े और धागे लाई हूँ । तुम घर पर ही बैठ कर गुदड़ी बनाया करना । महीने में एक बार मेरा आदमी आकर सिली गुदड़ी ले जाएगा और कपड़ा -धागा दे जाएगा ।" लाली ने समझाते हुए कहा ।

रधिया के हाथ में सौ रुपए का नोट रखते हुए बोली_"
ये  पेशगी है माई , बाकी गुदड़ी बिकने के बाद । तुम अपनी मर्जी से जितना काम कर सकती हो करना । तुम्हारी मेहनत की सही कीमत है यह ।" रधिया को तो जैसे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था ।
गाड़ी में कपड़े, धागे का बंडल रखकर ड्रायवर व्यक्ति से कहा _" माई को घर तक छोड़ आओ ।"
रधिया के दोनों हाथ अपने हाथों में लेकर लाली कहने लगी _" माई , तुम्हारी कारीगरी बेशकीमती है । आजकल शहरों में लोग फिर से गुदड़ी उपयोग कर रहे हैं । तुम आराम से काम करो । घर- घर जाने की जरूरत नहीं ।"

गाड़ी में बैठ कर रधिया के झुर्रीदार चेहरे पर चमक आ गई । मुड़ कर देखा तो उसकी लल्ली हाथ हिलाकर विदा कर रही थी ।

बुधवार, 4 अप्रैल 2018

"अचार"

बरामदे में बाबूजी ने थैले पलटे ,

छोटे-बड़े ,कलमी, दसहरी

लुढ़ककर करतब करने लगे ।


उन्हें उठाकर प्यार से अम्माँ 

पानी में डाल नहलाने लगीं ।

अमिया से भरे टोकरे गर्मियों में सजा करते थे,

और ऐसे अचार बना करते थे....


बिन्नो दौड़ी , न्यौता दे आई 

मिसराईन चाची,गौरी बुआ

दोपहर ,सज धज कर आईं ।

नुमाइश में रखे आम इठलाया करते थे ,

और ऐसे अचार बना करते थे...


कलमी फाँकने के बहाने ,

भैय्या भी मौका पा जाते ।

तिरछी निगाहों से भाभी को

जी भर निहार जाते ।

अनजाने ही सही पल्लू सरकने लगते थे ,

और ऐसे अचार बना करते थे....


चाची,अम्माँ और बुआ के

बतियाने का सिलसिला जारी रहता ।

नमक,हल्दी,राई, कलौंजी 

आँखों से तुलता रहता ।

हींग की छौंक से दिल गमकने लगते थे ,

और ऐसे अचार बना करते थे....


मसाले में लिपटी आमों की फांँकें 

चटखारे लेकर बाबूजी ने चखी ।

अम्माँ ने जब आँख तरेरी ,

चाची झट आँचल मुंँह पे धरी ।

रिश्तों पर जब ये रंग चढ़ा करते थे ,

और ऐसे अचार बना करते थे....


मर्तबान में सजी फांँकें ,

श्वेत,महीन चुनरी से बँधी ।

धूप सेंकने को तैयार ,

बिन्नो छत पर रखने चली ।

पड़ोस की छत पर निगाहें घूम रहीं थी,

किसी को मानो आसपास ढूँढ रहीं थी ।

कागज़ों के पुर्जे छतों के बीच उड़ा करते थे ,

और ऐसे अचार बना करते थे...


गली, मोहल्ले में अचार घूमने लगे,

कटोरियों में ढंक कर बंँटने लगे ।

खट्टे आमों में, अनुभव का मसाला 

प्यार का तेल भरा करते थे ,

और ऐसे अचार बना करते थे....


आज अचार तैयार मिलते हैं ,

सजी-संवरी दुकानों, माॅल में बिकते हैं ।

पूछने पर मेरे,वो बेबाक कहते हैं ,

अचार तो पहले ही बना करते थे ।