मंगलवार, 24 नवंबर 2015

चिड़िया

उठ भिनसारे मेरे घर पर
चुग्गा चुगने आ जाती है ,
ना छत की मुंडेर है
ना खपरैलों की ढलान ,
बस छोटी खिड़की के बाहर
अपना डेरा लगा जाती है ।

ना धानों की बालियाँ सुनहली
ना सूप फटकते हैं यहाँ ।
फिर भी आकर रोज सबेरे
अपना प्यार जता जाती है ,
दस दाने चावल के रूचि से
चुग कर तृप्ति पा जाती है ।

सिर घुमाती ,पंख झडाती
फुदक -फुदक कर नाच दिखाती ।
छोटी ,नन्ही,भोली भाली ,
भूरे पंखों वाली चिड़िया
अमृत गीत सुना जाती है ।

शुष्क हृदय में गाकर जैसे
मीठा सोत जगा जाती है ।
मेरे घर से अपना रिश्ता ,
अटूट कितना बना जाती है ।
कितनी मोहक ,कितनी प्यारी ,
मुझे भी तुमसे बहुत प्यार है ।

गुरुवार, 19 नवंबर 2015

रचना

सोच में डूबी थी एक दिन ,
गंभीर-सी शांत भाव में लीन ।
सहसा लगा मुझे किसी ने दस्तक दी ,
कौन है जिसकी दस्तक इतनी प्रबल है ?

क्यों समझ ना पाई मैं अनभिज्ञ थी ,
अपने ही ह्रदय की आवाज से ।
उत्सुकता हुई क्या चाहता है मन ?
क्यों जगा रहा है मुझे ?

बोला , "मेरे अंदर भाव पल रहे हैं ।
कई विचार, कई ख्याल उबल रहे हैं ।
उनको शब्दों का जामा पहना दो
पिरोकर माला में अपनी रचना बना लो " ।

क्यों जटिल है अंतर्मन का सुनना ?
साहस करके कहा मैंने -
"क्या न्याय कर पाऊँगी मैं ?
तुम्हारे भावों को सही मायने दे पाऊँगी मैं ?

तुम्हारी जननी बनने से पहले
तुम्हारा भविष्य जानना चाहती हूँ ।
शब्दों के कई अर्थ लगाए जाते हैं ,
अग्निपरीक्षा से नवजात भी नहीं बच पाते हैं "।

खिलखिलाकर हँस पड़ा बेबाक मन ,
बोला -"तू ही मेरी माँ हो सकती है ।
मुझे चिंता नहीं लोगों की ,
सिर्फ तू ही मुझे समझ सकती है ।

अपना शिशु जानकर जब तू
शब्दों को कागज पर सजाएगी ।
अपने आप वात्सल्य भर जाएगा ,
तेरी रचना अप्रतिम बन जाएगी ।।

शनिवार, 7 नवंबर 2015

सुनहली धूप (अंतिम )

नदी के किनारों की चमक ,
वातावरण में प्रतिबिंबित होने लगी ।
पहाड़ी नवयौवनाएँ भी रूककर ,
सुनहली धूप का स्वागत करने लगीं ।

गोरी देह , कसी काया
चेहरों पर उम्र का गुलाबीपन ।
हँसती ,खिलखिलाती बेफिक्र चाल ,
बाँस की टोकरियों में मानो सपने समेटें ।

मृदुल धूप ने अपनी चूनर सरकाई ,
सारी ऊर्जा भरकर उसमें
हाथों से युवतियों को पहनाई
गुलाबी रंग का सुनहरे से मिलन हुआ ।

नाक की लौंग का लश्कारा ,
काँच के कंगन हीरे-से चमकने लगे ।
सारी हरी,सुप्त वादी में ,
सुनहरे रंग बिखर कर खिलने लगे ।।

मंगलवार, 3 नवंबर 2015

सुनहली धूप (निरंतर )

कितने घने,  कितने लंबे
देवदार और चीड के तने ।
सहज ठिठकी एक पल को ,
लगी सोचने कैसे जाऊँ मिलन को ।

ओह ! छनकर गुजरना होगा ,
पत्तों की ओट से छुपते छुपाते ।
अपनी पलकें मूँद ,आँचल लपेटती ,
सरकती हुई सी फिसल गई ।

कंचन सी काया ,कोमल लचीली
हल्की सी तपिश है गालों में ।
बढ़ चली आगे है मंजिल ,
सोचा ना रूकेगी राहों में ।

कानों में गूँजती कल-कल ध्वनि ,
यह शुभ्र नवयौवना कौन चली ?
मुड़ते ,रूकते , छल -छल बहते ,
इतराती, बल खाती चली ।

स्वच्छ निर्मल उथला पानी ,
गोल, चिकने पत्थरों से टकराकर
उन्हें खूबसूरती से सजाकर ,
निरंतर आगे बढ़ता जा रहा है ।

देवदार से छनी ,कोमल स्वर्णिम
अल्हड कच्ची धूप जब पड़ती है ।
सारे पत्थर चमककर मानो
नदी को रत्नों से भर देते हैं ।

                          क्रमशः ...

सोमवार, 2 नवंबर 2015

सुनहली धूप ।

पर्वतों के उत्तुंग शिखर से ,
झाँकती ,अकुलाती सुनहली धूप ।
पारकर इन ऊँचाइयों को ,
वादियों में बिखर जाने को तैयार ।

उफ्फ ! कितना इंतजार करे कोई ,
मौन-मूक खड़ी हैं ये श्रृँखला ।
धानी वादियाँ बाँहें पसार ,
प्रेमालिंगन कर लेने को तैयार ।

सहसा नुपूर की आवाजें गहराई ,
छम-छम ,छम-छम ,छम-छम ।
वादियों में सुनहरा रंग भरने ,
कच्ची अधखिली धूप घूँघट सरकाते आई ।।