जस करनी तस भोगहू ताता..(व्यंग्य)
कोई गाँव कस्बे में बदलता है तो उसके पहले गाँववाले कस्बेरियन बन जाते हैं। बालों की स्टाइल, कपड़ों, जूतों में जिहाद आ जाता है। आसपास के शहरों से आने-जाने वालों से, नए फैशन का सामान मंगवाना, गर्व की बात हो जाती है।
अच्छेलाल के ही घर लक्ष्मी का आगमन नहीं हुआ था बल्कि शहर से आने वाले मुख्य मार्ग से आती पैसों की हवा ने हर खिड़की, रौशनदान से घुसपैठ मचा दी थी। जो रही-सही कसर थी वो मोबाइल फोन ने पूरी कर दी।
"अम्माँ, हम सोचते हैं कि मर्दाना कपड़ों की एक दुकान खोल लें।" अच्छे ने, अच्छे समय पर, अपना अच्छा विचार अपनी अच्छी अम्माँ को बताया।
"चलो, हमारे जीते जी यह सुभ काम भी हो गया बेटा।" अम्माँ ने अपने इकलौते बेटे को घूरते हुए देखा फिर बात पूरी की, "कि आधी उमर पार कर तुम अब सोचने भी लगे हो।" अम्माँ के हृदय भेदी बाण, मुँह से निकल गए थे।
"विपक्ष की तरह हमारी बातों में हमेशा मीन-मेख निकालती हो अम्माँ, इसी कारण तुमसे बात करने का जी नहीं होता हमारा।" अच्छेलाल का मुँह उतर गया।
"अरे, क्यों नहीं! जब हम ब्यूटी पार्लर चला सकते हैं तो तुम मर्दाना बुटीक क्यों नहीं।" चहकती हुई उमा को अपने पति की बात भा गई।
"ये बुटीक का बला है, हम तो कपड़े की दुकान कह रहे थे।" अच्छेलाल पल में होने वाले इस परिवर्तन को समझने में उस मतदाता की तरह नाकाम थे, जिसे मतदान केंद्र पर जाते तक अपने क्षेत्र के उम्मीदवार का नाम समझ नहीं आता।
"अब तो तुम शहर आते-जाते हो और बुटीक हमसे पूछ रहे हो? अरे कपड़े की दुकान को जरा तामझाम सजा के, काँच लगवाकर, दो-चार कपड़े लटका दो, बस.. कपड़ों की कीमत, देश के जीडीपी की तरह जूमम्म बढ़ जाती है।" अच्छे मुँह बाये इस औरत के गणित और अर्थशास्त्र की समझ को समझ रहा था।
अब वित्त मंत्री ने प्रपोजल को हरी झंडी दिखा दी, तो विदेश मंत्री अपनी सीट छोड़कर बाहर निकल गईं।
पार्लर के बाजू का कबाड़खाना साफ होने लगा। पुराने टूटे फ़ूटे पीतल के बर्तन, फावड़ा, कुदाल, तसले, तीन पैर वाली दो कुर्सियांँ, भविष्य के लिए सहेजे बिजली के पुराने तार, कुछ प्लास्टिक पाइप और कई ऐसे सामान जिनके उपयोग करने का मुहूर्त निश्चित नहीं था, सब आँगन में इठलाने लगे।
सीतलू बढ़ई, अपना अस्त्र-शस्त्र, औजार की टीन वाली पेटी लिए पधारे।
"भौजी, हम दरवाजा, पल्ला, खिड़की, पीढ़ा पटा बनाना जानते हैं कहो तो ये बुटीक का बला है?" बाईं हथेली में खैनी धरे, दाहिने अँगूठा से उस पर जोर आजमाता सीतलू बोला।
"कुछ नहीं भैया, कुर्सी मेज और लकड़ी के फ्रेम में काँच लगाकर स्टाइल वाली दुकान बनाना है।" कहते हुए उमा अपने स्मार्टफोन से बुटीक की तस्वीरें दिखाने लगी।
चाय पीकर, बातचीत करके सीतलू अपनी पेटी उठाकर कल आने का वादा करके गधे के सींग की तरह नदारद हो गए।
दो दिन उसको जगह-जगह तलाशते अच्छे का पारा चढ़ने लगा।
"हम दुकान कह रहे थे तो तुमको बुटीक बनाना था, अब लो कौन बनाएगा इस गाँव में बुटीक?" उमा की ओर भृकुटी तनी थी।
"करो जो जी में आए, कोई स्टैंडर्ड की बात तुमको कभी अच्छी ही नहीं लगती।" कहते हुए उमा ने घर में घुसकर दरवाजा बंद कर लिया।
अम्माँ की गाँठ से कुछ इंतजाम करके, किराएदारों से नकदी वसूल कर और उमा से मनुहार करके उसकी जमा-पूंजी लेकर दूसरे दिन अच्छेलाल मोटरसाइकिल पर सवार, शहर की ओर निकल गए।
एक थान कपड़े से पूरे परिवार की कमीज़ें, ब्लाउज़, पर्दे और बचा तो थैलियां सिलते देखा था अच्छे ने।
"वही ज़माना है वापस, दो अलग-अलग बचे टुकड़े को जोड़कर कमीज़, कुर्ता बन जाता है। पैंट में छेद कर दो, कीमत दुगुनी..वाह भाई। रंग चोखा।" मन ही ही मन विचार करता अच्छेलाल ने शहर के मुख्य बाजार की सड़कों पर बिकने वाले, तैयार कपड़े की खुली दुकानों के पास मोटरसाइकिल खड़ी कर दी।
"अबे, अनपढ़ है या अंधा! देख नहीं रहा नो एंट्री का बोर्ड, बस घुसा दी मोटरसाइकिल। चल, कागज दिखा सब, लाइसेंस बनाया क्या?" डंडा पटकते हवलदार ने डाँट लगाई।
"अँग्रेजी जानते तो बुटीक ही खोलते साहब, दुकान नहीं।" अच्छे फुसफुसाया।
"रख इधर गाड़ी, चल मेरे साथ।" अच्छे समझ गए कि हवलदार बोहनी किए सिवा मानेगा नहीं आखिर पूरे दिन की शुभ शुरूआत थी उसकी।
आधे घंटे की हील हुज्जत के बाद, हवलदार की जेब भारी हुई और अच्छे हल्के होकर खरीदी करने चले। फैशन के दरिया में डूबते-उतराते आखिर कार, एक गट्ठर कपड़े लिए, कल्पनाओं के पँख लगाए अच्छेलाल ने अपने घर का रास्ता पकड़ लिया।
"चीज जैसी भी हो उसका विज्ञापन बढ़िया होना चाहिए। हमारे ब्यूटी पार्लर का उद्घाटन मीरा बहन जी से करवाया और छुटपुट छूट दी थी, वो दिन है और आज का दिन सरकारी आश्वासनों की तरह औरतों की लाइन लंबी होती जा रही है।" अपने कमाई का श्रेय अपनी कुशलता को देते हुए उमा ने सलाह दी।
"अब तुम पिंकी के मायके की कौन सी दुकान से पुराने क्रीम, पाउडर मंगवा लेती हो, कम कीमत में पुराना माल लेकर सबको पोत देती हो। ऐसी छूट हम कहाँ से देंगे?" अच्छे बड़बड़ाए।
"तुमको तो धंधे का कोई ज्ञान नहीं है, समझना भी नहीं है बस। अरे..दो सौ की खरीदी पर बीस-पच्चीस की छूट रख दो, धंधा जमते तक।" किसी बिजनेस स्कूल के प्रोफेसर जैसी गर्दन तान कर, वह अपने पार्लर की साफ-सफाई करने चली गई।
विज्ञापन वाली बात अच्छे के दिमाग में, सही नाप के जूतों की तरह फिट हो गई थी सो लाए कपड़े पहनकर, आइने में खुद को निहारने लगे।
"बताओ, लग रहा कि हैंगर का विज्ञापन हो रहा है। सब प्रकार के कपड़ों को लटकाने वाला एकमात्र हैंगर।" आँखों से हँसती उमा ने टोक दिया।
"लो तुम ही पहन लो पैंट कमीज़, तब खुश होगी।" भिनभिनाते हुए अच्छेलाल ने तुरंत नए कपड़े उतार दिए।
"सही कह रहे हो, मर्दों की चीजें, औरतें ही तो बेचती हैं। टेलीविजन पर देखते नहीं, मर्दाने क्रीम, बनियान सब में औरतें रहतीं हैं।" उमा के मन की बात अच्छे ने कह दी थी।
दूसरे दिन, ब्यूटी पार्लर में उमा, जमुनिया और पिंकी ने मर्दों के कपड़े पहनकर, मोबाइल की गैलरी भरते तक तस्वीरें खींची।
"चुनाव पोस्टर वाले से कहो ना कि एक-दो पोस्टर बना दे। छत पर लटका देंगे, देखना सबकी नज़र जाएगी और कपड़े हाथों-हाथ बिकेंगे।" अच्छे को यह समझ गया कि उमा अब कदम पीछे नहीं लेगी आखिर कार अपने पैसे भी तो दिए थे उसने।
पोस्टर कैसे बना, क्या क्या पापड़ बेलकर शहर से पोस्टर वाले ने, तड़कते-भड़कते रंगों से सजा पोस्टर, अच्छेलाल के घर की छत पर चढ़ा दिया और दुसरा मुन्ना के रेस्टोरेंट के सामने खड़ा कर दिया।
लुंगियाँ, कमीज़-पैंट, कटी-फटी जीन्स पहनी उमा, पिंकी बहुरिया और जमुनिया के पोस्टर देखकर बूढ़ी जीभों में जवानी आ गई।
"घोर कलयुग आ गया, अच्छेलाल की बहुरिया तो गाँव का नाम डुबा रही है।" पोपले मुँह से हवा के साथ शब्द फेंक रही थी दीनू की अजिया।
"सास काहे नहीं रोकती? गांव भर की मेहरारून को बिगाड़ रही है उसकी बहुरिया।" पंडाइन काकी ने अँगुलियाँ तोड़ते हुए कहा।
बूढ़ों का अलग हाल था।
"बहुतई नीक कपड़ा लाए हैं अच्छन, चला देख आई।" टेलीविजन पर देखें रहे मर्दाने कपड़ों में औरतें, अपने गाँव की मेहरियाँ पोस्टर में पहने दिखीं तो बूढ़ों ने अच्छेलाल के घर की राह पकड़ ली।
सरकारी मुफ़्त अनाज दुकान की कतार से एकाध मीटर ज़्यादा ही लंबी कतार, अच्छेलाल के घर के सामने लग गई।
कपड़े सुखाने वाली रस्सियों में अलग-अलग सूरत-शक्ल के कपड़े अकड़ रहे थे। अधेड़ भोला ने पूछा " ये कमीज़, कितने की है अच्छे?"
"ई कमीज़ तुम पहनोगे भोले भैया? कौन मेहरिया का मुँह बना है उसको छाती में चिपकाए घूमोगे? राम-राम, हमारी देवरानी का करेगी बेचारी।" अम्माँ के प्रलाप से घबराकर भोला काका ने, हाथ में पकड़ी कमीज़ को ऐसे फेंक दिया जैसे साँप हो।
शहर के फैशन, पहनावे से परिचित, एक जवान लड़के ने कहा, "ए बुआ, कोई मेहरारू नहीं है। अमरीका का बड़ा रुतबे वाला गायक मनई है।"
"ऐ दैया...! तू रामसरन भैया का बेटा है ना। का हालत बनी है, बेटवा तू बिटिया कब बन गया ?" लड़के ने लंबे बालों को हेयर बैंड से बांध रखा था, कानों में छोटी बालियाँ, कलाई पर रंग-बिरंगे धागों से बने बंद और ढीला-ढाला प्लाजो पहना था।
सिटपिटा गया और उसी रास्ते बाहर आ गया जहाँ से भोला काका निकले थे।
"अम्माँ, पहले दिन की ग्राहकी क्यों खराब करती हो, मुँह बंद करके बैठ जाओ तो भला हो।" उमा के तल्ख़ स्वर से अम्माँ ने मुँह दूसरी दिशा में फेर लिया।
अब कबाड़खाना पूरे आँगन में फैल गया था। जवान, बूढ़े सब फैशन वाले शहरी कपड़े पहन पहनकर देख रहे थे। अम्माँ की सूखती हुई साड़ी से पर्दा बना लिया गया था जिसे अम्मांँखींच ले गईं।
कोई हाफ पैंट, कोई सौ छेदों वाली जीन्स की पैंट तो कोई लुंगी बांधे आँगन आँगन भर घूम रहा था। बाहर भैंस आवाजें लगा रही थी जिसआंगन में उसका अधिकार था, आज पूरी बारात खड़ी है।
"अच्छे भैया, जरा देखो तो यह कपड़ा तुम्हारे फूफा को फिट पड़ गया है का?" मायके आईं बिजया बुआ अपने पति को कुर्ते में फंसे देख अच्छेलाल को बुला लाई।
"ऐ बुआ, यह तो फंस गए। घुसाया कैसे इनको, अब वैसे ही निकालो।" अच्छे ने देखा गणेश भक्त फूफा ने गणेश जी से बुद्धि की जगह तोंद ही मांग ही थी शायद।
"कैसे दुकानदार हो, ऐसा कपड़ा क्यों बेचते हो कि आदमी फंस जाए। हम अपनी ससुराल में क्या मुंह दिखाएंगे।" बुआ का करूण विलाप सुन सब चारों ओर जमा हो गए।
"उनका मुंह तो निकाल पहले फिर अपना मुंँह दिखाना ससुराल में।" औरतें चिल्लाने लगीं।
चार आदमियों ने फूफाजी को पकड़ा, दो उनकी बाँहों को कुर्ता मुक्त करने में लगे थे, दो सिर से ऊपर खींचने में।
चर्ररर.. कुर्ते की सिलाई खुलती गई, बादल हटते ही फूफाजी का शरीर चाँद की तरह बाहर आ गया।
"काम करना जाए तो जरा सोच-समझकर वरना बेकारी ही भली।" अपने पति का हाथ खींचकर फटे कुर्ते को अच्छे के हाथों फेंकती बिजमा बुआ निकल गईं।
फटे कुर्ते से ज़्यादा टुकड़े अच्छे के दिल के हो गए।
"इस पर का फरी दोगे बेटवा?" बिरजू काका एक कमीज़ को अपने शरीर से सटाते हुए पूछे।
"काका, दो कमीज़ पर एक बनियान फ्रीईई.. है।" मुफ्त की महिमा अपरम्पार है सो अच्छे ने फ्रीईई..पर लंबा जोर डाला।
"जो हमको एक ही कमीज़ लेना है तो?" सीधा प्रश्न ग्राहक का।
"ताऊ, आपका गणित बहुत कच्चा है। दो पर एक तो एक पर आधी बनियान। हमारे पापा की पुरानी बनियान फाड़कर हमारी मम्मी पोंछा, झटकन सब बना लेती हैं, आप नई बनियान का पोंछा ले जाना।" सब लोग हँसने लगे और निष्क्रिय सांसद की तरह काका इस चलते सदन से गायब हो गए।
"ऐ बबुआ, जरा टिकाऊ मजबूत सरकार की तरह कोई टिकाऊ लुंगी दिखाओ।"
"ये कैसी चिंदी फटी पैंट उठा लाए बेचने अच्छन बेटवा, हम लोगों को भिखारी समझते हो क्या?"
"कमीज़ कैसी है भाई, आगे से एक बित्ता छोटी, सामने का कपड़ा काटकर रूमाल बना लिए क्या अच्छेलाल? हे भगवान, कैसा जमाना आ गया है।"
सारा आँगन युद्धक्षेत्र में तब्दील हो गया था। स्वनिर्मित शब्दों की मिसाइलें लगातार आघात कर रहीं थीं और कुछ दिल तक घुस जातीं तो कुछ उमा और अच्छे द्वारा रोक ली जाती। बेमौसम बरसात की तरह सुझाव बरस रहे थे।
चाय बनाकर पिलाती उमा और उसकी टीम थक गई हर आनेवाले कड़ी मीठी बढ़िया दूधवाली चाय का लुत्फ़ कम से कम दो-तीन बार उठा ही रहा था।
"अच्छे बेटा, सौ रूपए वाली लुंगी लिए जाते हैं। अभी पचास रखो, फसल कटाई पर बचा पचास दे जाएंगे।" लुंगी सीने से चिपकाए, पचास रुपए पकड़ाकर सुंदर चाचा निकल गए।
सुशीला भाभी कब पीछे रहतीं।
" अच्छे भैया, तनिक ये कमीज़ पहन के दिखावा तो। तोहार भैया हैं नहीं उनके लिए हमें लेना है।" अगले मिनट अच्छे के इकहरे बदन पर नीली, बड़े बड़े फूलों वाली ढीली कमीज़ झूल रही थी।
"अरे भैया..जरा अच्छी फिटिंग का पहन दिखाओ।" अखाड़े में पहलवानी करने वाले, इस गाँव के सबसे हट्टे-कट्टे पहलवान के लिए भाभी, अच्छे के शरीर पर कमीज़ पहना रही थीं।
"दीदी, भैयाजी को ही भेज देना, अपनी पसंद की कमीज़ खुद देखभाल कर लें लेंगे।" उमा झट मैदान में कूद पड़ी और अच्छे हैंगर बनने से बच गए।
"उमा बहन, अब पहलवान आदमी का क्या ठिकाना, कब आएंगे कब पसंद करेंगे। तब तक तो यहाँ लूट खत्म हो जाएगी। ऐसा करती हूँ चार कमीज़ लिए जाती हूँ जो पसंद आएगी रख लेंगे नहीं तो वापस कर जाऊंगी।" बिना उत्तर की प्रतीक्षा करे सुशीला भाभी ने चार कमीजों का गट्ठा बनाया और तीर की तरह निकल गई।
चार घंटों में कपड़ों की अफरातफरी मच गई और हाथ आए चार सौ रुपए। चार-छह कपड़े खींचातानी में, अपने हिस्से गवां चुके थे, कराहते हुए टुकुर-टुकुर देख रहे थे।
दुधारू भैंस कब तक रंभाती, अम्माँ गेरवा बाँधकर उसे लड़ियाती आँगन में बाँध गई।
"हम जो कहे रहे बेटा कि तुम सोचा न करो, सोच-विचार तुम्हारे बस का नहीं। दूध की चंदी का पैसा, घर किराया सब देखो फटा बिखरा पड़ा है इहाँ से उहाँ तक।" अम्माँ ने गर्व से दुधारू भैंस के गर्दन को सहलाते हुए कहा।
"अम्माँ, हमारी भी ब्यूटी पार्लर की कमाई का पैसा सब डूब गया। सही कहती हो अम्माँ, धंधा बिजनेस तुम्हारे बेटे के बस का काम नहीं।" सात फेरे में ली, सुख-दुख में साथ निभाने की कसम हमेशा की तरह उमा ने फिर तोड़ दी और अम्माँ के साथ खड़ी होकर भैंस को पुचकारने लगी।
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