"सपनों का सच: स्विट्जरलैंड" (इंटरलेकन एवं माउंट टिटलिस)
कश्मीर और लेह देखने के बाद, बर्फ़ से ढंकी उन पहाड़ियों को पास से देखने की इच्छा और तीव्र हो गई जिन्हें फिल्मों में कई बार देख चुकी थी। स्विट्जरलैंड जाने का यह योग 2025 के अप्रैल महीने में बना, फलीभूत हुआ।
सोलह दोस्तों को साथ चौदह दिनों की योजना बनी और मुंबई से ट्रेवल एजेंसी के मार्गदर्शक श्री विनायक जी साथ थे। यहाँ सूरज के तेवरों को झेलने के बाद, ठंडी और बर्फ़ से परिपूर्ण जगह पर जाने की कल्पना मात्र से दिल बल्लियों उछल रहा था।
गर्म कपड़े, रेनकोट, पोंचू, अच्छे जूते (जो बारिश और स्नो में पैरों की पकड़ बनाए रखें), कैमरा, खाने के लिए भारतीय नाश्ता, जरूरी दवाइयांँ और खूब सारा उत्साह भरकर, हम सब मुंबई एयरपोर्ट पर मिले।
मुंबई से ज्यूरिख की आठ घंटे की फ्लाइट में, अच्छे भारतीय भोजन के बाद भी नींद आँखों से रूठी रही मानो अब तो उन्हें सपने में नहीं सच में ही स्विट्जरलैंड देखने का आभास हो गया था।
सुबह आठ बजे हमारा ग्रुप, सारी अंतरराष्ट्रीय जाँच प्रक्रिया पूरी करके ज्यूरिख एयरपोर्ट से निकल गया था। हमने एक पच्चीस सीटर बस की थी जिसे लेकर बस चालक (यूरोपीय देशों में कोच कैप्टन कहते हैं) उपस्थित थे। सामान व्यवस्थित कर, हम सबने उस कंपकंपाती ठंड का सामना करने के लिए अपने जैकेट, मफलर कस लिए। स्विट्जरलैंड में हमारे रूकने की व्यवस्था Zug शहर के होटल में थी।
सपनों के सच होने का पहला दिन, एयरपोर्ट से 134 किलोमीटर पर स्थित इंटरलेकन शहर देखना। बस कैप्टन और हमारे गाइड विनायक ने रास्ते की दर्शनीय स्थलों की जानकारी दी। हमें पता चला कि यहाँ बस कैप्टन का काम, बहुत महत्व रखता है। उनको एक बढ़िया तनख्वाह के साथ मान-सम्मान भी खूब मिलता है। जिस होटल में हमारे रूकने की व्यवस्था थी उसी में वैसा ही कमरा उनके लिए भी बुक था। होटल के भोजन में भी वो शामिल रहते। उनका अपनी बस और यात्रियों के प्रति जिम्मेदारी यह थी कि यदि रास्ते में बस खराब हो जाती है तो वो स्वयं ही उसे सुधारते हैं अर्थात मैकेनिक नहीं बुलाते और ना ही किसी यात्री से सहायता लेते हैं।( हमने यात्रा के दौरान इस सच्चाई का अनुभव किया)
इंटरलेकन, दो झीलों (Thun और Brienz) के बीच स्थित एक छोटा सा, बेहद खूबसूरत शहर। झीलों का हल्का नीला हरा पानी, अपने चारों तरफ बर्फ़ से ढके पहाड़, खुला नीला आसमान और जितने रंगों को पहचान सकते हैं उनसे कई गुना ज्यादा संख्या में रंग-बिरंगे फूलों से भरा यह शहर, पल भर के लिए भी पलकें मींचने की अनुमति नहीं देता।
झील के किनारे किनारे पैदल चलकर, पास ही स्थित Casino Kursaal बगीचे में आ गए। इस बगीचे के मध्य में भारत के प्रसिद्ध दिग्दर्शक स्व. यशराज चोपड़ा की एक प्रतिमा लगी है, जो सभी भारतीय यात्रियों को आकर्षित करती है।
इंटरलेकन, प्रकृति की गोद में बसा बेहद सुंदर शहर है, जहाँ भारतीय रेस्टोरेंट भी हैं। हमने भारतीय भोजन का आनंद लिया और वहाँ होटल मैनेजमेंट के दो भारतीय छात्रों से मुलाकात हुई। महाराष्ट्र से यूरोप पढ़ने गए ये बच्चे, अपनी इंटर्नशिप कर रहे थे। अब वो मराठी, हिंदी, अँग्रेजी के अलावा फ्रेंच और जर्मन भी सीख रहे थे। अपनी देशी भाषा में बात करके, वे बड़े उत्साहित हो गए।
स्विट्जरलैंड की प्रसिद्ध ट्रेन से, पहाड़ियों, स्टेशनों, झीलों को अपने कैमरे और हृदय में कैद करने हेतु, हमारा समूह इंटरलेकन के रेल्वे स्टेशन पर ट्रेन का इंतज़ार कर रहा था।
इतने बड़े समूह को महिला टिकट कलेक्टर ने, बड़ी ही कुशलता से एक डिब्बे में स्थान दिया। उन्हें मालूम था कि ये पर्यटक हैं और सब साथ में आनंद लेना पसंद करेंगे।
काँच की बड़ी खिड़कियों में आँखें मानो चिपक गईं थीं। दो घंटे की इस यात्रा में गर्दन 180 डिग्री पर दाएं-बाएं घूमती रही जिससे दोनों साइड के नैसर्गिक सौंदर्य में से किसी एक को भी देखने से आँखें वंचित न रह जाए। पहाड़ियों में उगाई फसलों से हरे खेत, दूसरी ओर स्वच्छ बड़ी-बड़ी, नीली झीलें, किनारों पर फूलों की बाड़ों से आँख मिचौली करते छोटे-छोटे प्यारे घरों की छबि हृदय में उतारते, हम सारनेन स्टेशन पर उतर गए। हमारी बस इंतजार कर रही थी और हम जुग स्थित अपने होटल की ओर चल पड़े। सुबह एयरपोर्ट पर उतरने के बाद, आज के पहले दिन को दिलो-दिमाग पर और पुख्ता करते, हमने रात बिताई।
दूसरे दिन सुबह नाश्ते के बाद, बर्फीले पहाड़ पर जाने की पूरी तैयारी से लैस हमारी टीम निकल पड़ी। होटल से 47 किलोमीटर दूर एंजलबर्ग शहर के पास माउंट टिटलिस है। माउंट टिटलिस के बर्फीले पहाड़ों को हिंदी फिल्मों में देखा था और आज उसकी सुंदरता को अनुभूत करने की लालसा सभी को थी। मार्गदर्शक ने बार-बार अच्छे जूते पहनने की सलाह दी क्योंकि बर्फबारी लगातार जारी थी।
3020 मीटर की ऊंचाई पर दो केबल कारों से पहुँचना बहुत रोमांचक रहा। पहली केबल कार, दुनिया की सबसे प्रथम रोटेटिंग कार थी, जो ऊपर ले जाते तक अपने अक्ष पर 360 डिग्री घूम गई। श्वेत शॉल लपेटे माउंट टिटलिस को हर कोण से देखने पर भी, आँखों को कहीं कोई रंग नजर नहीं आ रहा था।
माउंट टिटलिस के टेबल टॉप (समतल स्थान) पर पहुँचकर, स्नो फाल और तेज ठंडी हवाओं से मुठभेड़ हुई। अब बारी थी यूरोप के सबसे बड़े झूला पुल (suspension bridge) पर चलने की। _4 डिग्री पर, हवा और बर्फ़ के थपेडों से घबराकर कुछ मित्रों ने दस-बारह कदम चलकर, वापसी कर ली और कुछ अंत तक चलते गए। उफ्फ... कितना भयावह, नीचे देखने की हिम्मत नहीं और ऊपर से महीन-महीन बर्फ़ हमें ढंक लेने को तैयार थी। 3020 मीटर से अब आगे 3040 मीटर तक की ऊंचाई से, flyer ride (एक साथ चार लोग) करके बेहद खूबसूरत, खतरनाक और दिलचस्प दृश्यों को कैद करने के लिए, फोन या कैमरा उठाने से अँगुलियाँ इंकार कर रही थीं। इस बर्फानी हवा में, दूर दूर देशों से आए कुछ दक्ष खिलाड़ी स्केटिंग एवं स्कीइंग कर रहे थे। अपना व्यक्तिगत प्रदर्शन और अच्छा करने का उनके लिए यह अच्छा समय था।
जब इतना दुस्साहस लोग कर रहे थे तो हमारे समूह की सभी महिलाओं ने भी भारतीय परिधान साड़ी पहनने की हिम्मत कर ही डाली। हाथों के दस्ताने, जैकेट और टोपी उतारकर साड़ी लपेटना कितना बड़ा काम था, अभी सोचकर मुस्कुराने लगती हूँ। इतने में ही अँगुलियाँ खुद बर्फ़ बनने की फ़िराक में थीं।
काँपते ठिठुरते हम लोगों ने इसी शिखर पर स्थित भारतीय रेस्टोरेंट में शरण ली। यहाँ एक अच्छा तापमान बनाकर रखा था। वहीं भोजन करके हम पुनः उन दो केबल कारों पर विराजमान माउंट टिटलिस से नीचे उतर गए।
इन केबल कारों में विभिन्न देशों के नाम और ध्वज लगे थे। पूछने पर पता चला कि तकरीबन अस्सी कारें हैं और जिस देश की सहभागिता यहाँ के पर्यटन में जैसी है वैसी ही केबल कारों को उस देश के नाम से दर्शाया जाता है। हमने आते-जाते वक्त भारत का तिरंगा फहराते, चार केबल कारें दिखीं जिससे भारतीय पर्यटकों की भारी संख्या का अनुमान लगा सकते हैं।
बस से होटल वापसी के वक्त हमने , घर से साथ लाए चकली, चिवड़ा और लड्डू का भरपूर आनंद उठाया।
भारतीयों का विश्व पर्यटन में बहुत बड़ा योगदान होता जा रहा है। कई भारतीय समूह मिले और आपस में बातचीत करने पर पता चला कि हमारे देश के सभी भागों से बड़ी संख्या में लोग अब विश्व घूमने का मन बनाने लगे हैं।
हमारी संस्कृति ही 'वसुधैव कुटुंबकम्' और 'चरावेति चरावेति प्रचलाम निरंतरम्' की है।
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शर्मिला चौहान
ठाणे महाराष्ट्र
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