शनिवार, 4 जनवरी 2025

2122 2122 2122 212 पर ग़ज़लें

फ़िलबदीह-33

2122  2122  2122 212

क़ाफ़िया -अर
रदीफ़- कहना उसे

है हवाओं में यहाँ की वो असर कहना उसे
भा रहा मुझको अनोखा ये शहर कहना उसे।।1।।

सहमी सी आँखों में उसकी थे हज़ारों प्रश्न जो
पढ़ लिया करता था उसकी हर नज़र कहना उसे।।2।।

कुछ समय का साथ उसका, याद बनकर रह गया 
रंग भरने का उसी में है  हुनर कहना उसे।।3।।

 उसके जाते ही ये दुनिया फिर हुई ख़ामोश सी
चूड़ियों से था खनकता मेरा घर कहना उसे।।4।।

क्या लिखूँ बस सोचता हूँ शब्द होते मौन अब 
गीत ग़ज़लें नज़्म बनते बेबहर कहना उसे।।5।।


तरही मिसरा-

फ़िक्र में उसकी धुआँ होता रहा मैं रात भर
वो‌ न समझा है, न समझेगा मगर कहना उसे।


***********************

2122 2122 2122 212

धरती से करता ठिठोली सूर्य आवारा मिला 
शाम को गठरी में बाँधे एक बंजारा मिला।।1।।


अंक में नव रश्मियों के खेलता नित मोद से 
खोल पलकें मुस्कुराता नन्हा वो प्यारा मिला ‌।।2।।


पर्वतों के शिखरों पर  बादलों का राज था
भोर सूरज का उन्हीं को स्वर्ण उजियारा मिला।।3।।


शाम को लहरें मचलतीं पार जाने के लिए 
डूबते सूरज को साथी एक मछुआरा मिला।।4।।


ओढ़ मेघों की रजाई ऊँघता करवट बदल
बारिशों में अनमना सा वो थका हारा मिला।।5।।


बदले तेवर जेठ के वो दीदे फाड़े देखता
होड़ देता आग को उसका बढ़ा पारा मिला।।6।।


मुट्ठी में आकाश भर के चूम लेती सूर्य को 
पर हथेली को मिरी बस टूटा इक तारा मिला।।7।।


***************

शर्मिला चौहान

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें