"आवत ही हरषै नहीं, नैनन नहीं सनेह" (व्यंग्य)
पिछले दो दिनों से अच्छेलाल की दाहिनी आँख, स्वचलित यंत्र सी फड़फड़ा रही थी। अँगुलियों से उसे रोकने का प्रयास जब असफल हुआ तब अच्छे को अपना निकट भविष्य धुँधला लगने लगा।
"सुनते हो, आज शाम ननकू आ रहा है। उसकी नई-नई नियुक्ति हुई है ना प्राथमिक शाला शिक्षक के लिए।" अपने भाई की नियुक्ति का समाचार सुनाते हुए उमा का मुखमंडल चढ़ते सूरज सा दैदीप्यमान था।
"पिछले छह महीनों से दिन में छह बार यह समाचार सुनाती हो, जैसे कल ही लगा तुम्हारा भाई नौकरी में। हाथ में माला ले लो जिससे भाई की नौकरी का जाप पूरा हो जाए।" अपनी फड़फड़ाती आँख को रोकते हुए अच्छे कुरकुराए।
"पूरी बात सुने बिना, अपनी बेतुकी बात का झंड़ा गड़ाने की आदत पुरानी है तुम्हारी।" आँखें तरेरती उमा ने आगे कहा,"पास के गाँव में ननकू की जनगणना ड्यूटी लगी है। हमारी माँ कह रही थीं कि जमाई बाबू साहब को ननकू के संग भेज देना, वैसे भी घर में ही तो बने रहते हैं।" अच्छे के माथे में उभरी लकीरें इस पत्नी नामक जीव को घूर रही थीं जो एक ओर जमाई बाबू साहब और दूसरी ओर घर में बैठने वाला, मान और उपहास का इतना सुन्दर सम्मिश्रण कर सकती है।
"तुम्हारे भाई को सिफारिश और पैसे के दम से नौकरी मिली है वरना इतने दिनों वह भी घर की रोटी तोड़ रहा था।" सामने खड़ी उस औरत के होंठों पर छाई कुटिल मुस्कान से अच्छे को अहसास हुआ कि अनजाने में ही उसने अपना 'घर की रोटी तोड़ना' स्वीकार कर लिया था।
शाम को ननकू जी का अभूतपूर्व स्वागत हुआ। हलुआ, पूड़ी, आलू की सूखी चटपटी सब्ज़ी और मुन्ना के रेस्टोरेंट का समोसा। सोने के लिए चारपाई पर पसरे भाई को, गिलास भर दूध थमाते हुए उमा ने कहा, "बड़ा काम करना पड़ता है थोड़ा दूध घी खाया करो नहीं तो सेहत बिगड़ जाएगी।" अच्छे के चौखटे को षट्कोण में बदलता ताड़कर ननकू बोल पड़ा, "जीजा, सुबह-सुबह की बस से निकल पड़ेंगे। ज़्यादा दूर नहीं है बस से दो घंटे बता रहे थे हमारे साथी।"
"अब इनका पूरा नाम लिया कीजिए, ननकू ननकू थोड़े ही अच्छा लगता है। अब काम करता है, कमाई लाता है हमारा ननकू।" दूध का गिलास खाली करवा कर, भाई को जुबान की मलाई खिला रही थी उमा।
सुबह भाई को बस स्टैंड तक पहुँचाने के लिए, उमा सुंदर साड़ी पहनकर तैयार खड़ी थी।
"अरी भागवान, गाँव में घर-घर, गली-मोहल्ला भटकने जा रहा तुम्हारा भाई, सीमा पर लड़ने नहीं जो पहुँचाने जाना है तुम्हें।" अच्छे ने तेज़ स्वर में कहा।
"देश की जनसंख्या गिनना, आकाश में तारे गिनने और पीपल के पत्ते गिनने से तो अच्छा ही है।" बातों की कटार चलाने में कुछ ज़्यादा ही माहिर थी उमा।
आज अच्छेलाल ने अपनी हाल फिलहाल खरीदी, टेलर से कमर फिट करवाई इकलौती जीन्स, झक्क सफेद सूती कमीज़ पहन रखा था। बालों को तेल का जामा ना पहनाने से वो स्वतंत्र इठला रहे थे।
बस से उतरकर गाँव की संकरी, पक्की सड़क के बाद की पहली गली में साला-जीजा के जोड़े ने प्रवेश किया। अपने बैग में से फ़ार्म निकाल कर, हाथ की कलम को तलवार बनाकर, ननकू पहले घर के लिए सज्ज हो गया।
घर के सामने दालान में बैठे बुजुर्ग से ननकू ने कहा, "सरकारी स्कूल से जनगणना में आए हैं।"
लुंगी के ऊपर कुर्ता लटकाए, सफेद बालों को मेंहदी की लालिमा दिए बैठे उस बुज़ुर्ग ने, दोनों अजनबियों को नज़रों से तौला।
"सकूल में पढ़ाने से जी चुराकर, आदमी गिनने निकल पड़े मास्टर। बच्चों को तालीम दोगे तो बड़े होकर दुआ देंगे।" पोपले मुँह से अपना दायित्व निभा दिया बुजुर्ग ने।
"चाचा, स्कूल से ही भेजा है। अपने आप नहीं आए।" ननकू बोल पड़ा, "बताइए आपके घर कितने सदस्य हैं, पानी की क्या व्यवस्था है, कितने पढ़ने वाले, नौकरी वाले लोग हैं आराम से सब बताइए।" ननकू अपना पहला फार्म भरने के लिए उत्सुक था।
बुज़ुर्ग के माथे पर साँप के चाल समान बल पड़ गए।
"अरे चाचा, बताइए ना।" ननकू ने फिर कहा।
"बड़ी जल्दी में हो मास्टर, बता रहा हूँ गिन तो लूँ।" नवाबी अंदाज़ में बुज़ुर्ग ने फरमाया।
"अठारह।" हिसाब पूरा हुआ था।
"अठारह लोग इस दड़बे में।" अच्छे का मुँह खुला रह गया।
"हमारे ताजमहल को दड़बा कहते ज़ुबान गिरी नहीं तुम्हारी। कैसे बेअदब आदमी को लेकर आए हो मास्टर।" बुज़ुर्ग तमतमा गया।
"शांत हो जाओ चाचा, बस इन्हें तो मसखरी करने की आदत सी है। आप बताओ सभी के नाम, उम्र सब।" ननकू ने बात संभाली।
बुज़ुर्ग ने एक, दो और फिर तीसरी बीबी का सिलसिलेवार ब्यौरा दिया। पहली की मौत तक तीन बच्चे, दूसरी से तलाक तक पाँच की पलटन और वर्तमान वाली ने चार बच्चों से खानदान को रौशन किया है।
"इस सरकारी पुर्जे में तो आपके खानदान को संभालने का हौंसला नहीं है।" कहते हुए ननकू ने अपने साथ लाया रजिस्टर निकाल लिया।
"पहली और दूसरी बीवी तो यहाँ हैं नहीं फिर अठारह कैसे हुए, चौदह हुए ना।" ननकू ने कुनबे के सरगने से पूछा।
"मास्टर, हिसाब कच्चा है तुम्हारा। दो बीवियांँ अब नहीं हैं पर पहली के दो छोकरों की बीवियांँ और एक एक बच्चा है ना।" बुज़ुर्ग अपने बड़े और रंगीन दाँत दिखा रहा था।
अच्छेलाल को दिन में तारे नज़र आने लगे, सामने बैठे इस आदमी ने अपनी सेवाओं से, अपने समाज और देश को समृद्ध कर दिया था।
रजिस्टर के तीन पन्ने इस खानदान के खाते में चले गए और जीजा-साले की जोड़ी शून्य में।
माथे का पसीना सुखाते हुए वे दोनों अगले घर की ओर चल पड़े। सामने दो औरतें खड़ी थीं। अपने घर अजनबियों को आता देख, उन्होंने सिर का पल्ला रंगमंच के पर्दे की तरह अपने मुखमंडल पर गिरा लिया।
"सुनिए, हम आपके परिवार वालों, बाल-बच्चों की जानकारी लेने आए हैं।" ननकू ने ऊँची आवाज़ में कहा।
"तनिको लाज ना आए रही बबुआ। घर के मनई ना हैं और तुम घुसे चले आए मेहरारून में।" प्रौढ़ महिला गुर्राई।
"तो बुला लो घरवालों को, हम भी सरकारी ड्यूटी कर रहें हैं।" ननकू भी गरम हो गया।
"अरी मोरी मैया, बड़ा जोर बोलत है ई तो।" प्रौढ़ा ने अपने सिर का पल्ला थोड़ा ऊपर खींच लिया।
"काकी, आप तो बड़ी हो, समझदार हो आप ही सब कुछ लिखवा दो। हर घर से जानकारी ले रहे हैं।" नाम के मुताबिक अपनी आवाज़ में बोले अच्छे।
"ठीक है, पूछो का बताएं।" अब महिला का पल्ला माथे के ऊपर चला गया और चेहरे के हाव-भाव दृष्टिगोचर होने लगे।
"इस घर में कितने लोग रहते हैं?" ननकू ने फिर पहला फार्म निकाला।
"एक, दुई, तीन, चार..पाँच.और छह.. कुल छह प्रानी रहते हैं इहाँ।" पाँच और छह अँगुलियों के बीच वह ताल बिठा रही थी।
"घर के मुखिया का नाम बताइए?" ननकू की कलम स्याही उगलने के लिए बेताब हो रही थी।
"बहुतई बेसरम मनई हो, कभी मेहरारू अपने मरद का नाम लिया करे है भला।" वह दोबारा बिफर पड़ी।
"अब नाम नहीं बताओगी तो क्या लिखूंँ?" परेशान ननकू ओसारे के नीचे की छोटी दीवार पर बैठ गया और अच्छे उसकी बगल में।
दूसरी औरत, जो दुबली-पतली शायद कम उम्र की थी उसने प्रौढ़ा को कुछ समझाया।
"ई हमार बहुरिया, इसारे से अपने ससुर का नाम बताएगी, समझो और लिखो।" प्राथमिक शाला के शिक्षक पर छात्र बनने की मजबूरी थी।
बहू, घूँघट खींच कर गेंदें का फूल तोड़ लाई।
"गेंदालाल।" ननकू की आँखें चमक गईं।
उसने ना में सिर हिलाया।
"गेंदाराम।" अच्छे ने पूछा।
उसका सिर घड़ी के पेंडुलम की तरह दाएं बाएं हिल रहा था।
अब उसने एक गुलाब का फूल भी तोड़ लिया।
"गुलाबचंद" ननकू और अच्छे एक साथ बोल पड़े।
वह ना में अटल रही।
अब उसने सफ़ेद फूल, कनेर के पीले फूल, हथेली में भर लिए।
"फूलचंद।" अच्छे और ननकू ने आखिरकार परीक्षा पास की और परिणाम में प्रौढ़ा ने लजाकर अपना मुखमंडल पुनः ढांँक लिया।
छह सदस्यों के नाम, उम्र और कामकाज लिखने में दोनों को चक्कर आने लगे।
एक गिलास पानी मांँगने पर, प्रौढ़ा ने पिछले साल लगे हैंडपंप की कुंडली निकाल ली। अब एक गिलास पानी के लिए इतना और कौन सुनता, सो दोनों हाथ जोड़कर बाहर निकल गए।
नीम के चबूतरे के दूसरी ओर वह कुख्यात हैंडपंप था। अच्छे के कंधे पर कुछ गिरा और उसने अँगुलियों से झटक दिया।
हाथ में चिपचिपा सा कुछ चिपक गया। सफेद सूती कमीज़ भी कंधे पर चिपचिपा गई थी।
"ये क्या किए जीजा, यहाँ पीने का पानी नहीं और आपने गंदा कर लिया।" ननकू के कहते ही अच्छे भभक पड़े, "ये हमने किया है? एक तो तुम्हारा साथ देने आए पागलों की बस्ती में तिस पर तुम्हारे ये तेवर।" कहते हुए अच्छेलाल पेड़ पर बैठे पंछियों में से अपने दुश्मन को ढूँढने लगे।
साले साहब के पंद्रह मिनट की परिश्रम के बाद, हैंडपंप से निकले चुल्लू दो चुल्लू पानी से नहा निचोड़कर आगे निकल पड़े।
आगे किराने की दुकान और पिछले हिस्से में रहवासी घर था। दुकान पर आवाज़ देते हुए पाँच मिनट हो चुके थे और वो आगे बढ़ते कि दस-बारह साल का लड़का आया।
"क्या चाहिए?" टेलीविजन के बंद करके आने की झुंझलाहट उसके चेहरे और आवाज़ में थी।
"कुछ जानकारी।" ननकू ने बताया।
"नहीं रखते हम दुकान में।" कहते हुए वह पलट कर अंदर घुस गया।
"अरे..ओ! किसी बड़े को बाहर भेजो।" दोनों की आवाज़ें टेलीविजन की तेज़ आवाज़ में दब गईं।
"अजीब गाँव है भाई।" अच्छे के अच्छे दिलो-दिमाग में ऐसी दुनिया की हवा भी नहीं थी।
दो प्लॉट छोड़कर खपरैल का बड़ा मकान था।
सामने चारपाई पर हुक्का गुड़गुड़ाते, घुटनों तक धोती, ऊपर बंडी और सिर पर गमछा लपेटे बुजुर्ग बैठे थे।
"राम राम बाबा।" ननकू ने शुभ शुरुआत की।
"जय राम जी की, हम पहचाने नहीं बचुआ कौन हो?" अपना चश्मा ठीक करते हुए उन्होंने पूछा।
"बाबा, हम शिक्षक हैं। गाँव की जनसंख्या, शिक्षा, कामकाज, सुविधा सबकी जानकारी लेने भेजा है सरकार ने।" अब अच्छे अपने अंदाज़ में बोले।
"का करोगे लिखकर, अरे हमारे घर का खपरैल पार साल इतना चुअत रहा कि जानो बाढ़ आ गई। तुम्हार सरकार हमरा खपरैल बदलेगी का।" बुज़ुर्ग घूरने लगा।
"बाबा, आपके घर कितने लोग हैं, उनकी उम्र, काम-धाम, पीने के पानी की व्यवस्था सब आराम से लिखवा दो।" ननकू ने फार्म, कलम फिर हाथ में ले लिया।
"हमारा नाम सुखलाल है मूला जिनगी में कौंनो सुख नहीं देखे। पीने का पानी हमारे बुढ़िया कुआँ से भरती हैं।" ननकू जानकारी लिखने लगे।
"बाबा, आपकी उम्र बताओ या आधार कार्ड दिखा दो।" आधार कार्ड ही सरल उपाय लगा सबकी उम्र पता करने का।
"काहे बाबू, काहे देंगे अपना आधार कार्ड तुमको? हमार बेटवा मना किए हैं केहुका आधार कार्ड ना देंगे।" बुज़ुर्ग ऐसे घूरने लगा जैसे उसकी तिजोरी लूटने आए हैं।
"ठीक है बाबा, अपनी उम्र, जन्म तारीख ही बता दो।" परेशान ननकू बोला।
"सावन-भादो की झड़ी लगी थी, हमारी अम्माँ बताया करतीं कि हम नवमी को तड़के पैदा हुए थे।" बुढउ के चेहरे पर ऐसी चमक आ गई जानो उस दिन दुनिया का उद्धार हो गया।
"दिन, तारीख, साल हमारे लंगोटिया यार मनसुख बता देगा। हम उससे आठ दिन बड़े हैं।" कहते हुए वो चारपाई से उठ कर पच्चीस साल के जवान की चाल से सड़क पर निकल पड़े।
वो आगे-आगे, साला जीजा का जोड़ा पीछे और सबसे पीछे उनकी पत्नी।
सामने से आते एक ऊँचे कद-काठी, बड़ी घनी मूँछों वाले रोबदार बुजुर्ग को देखकर साथ वाले बुजुर्ग चिल्लाए, "अरे ओ मनसुखवा! इनको तोहार जनम साल, जनमदिन बता दे तनिक, तोहरे से आठ दिन पहले हमार रहा ना।" सुखलाल ने मनसुख का हाथ पकड़ लिया।
"दद्दा, तुमको मालूम है ना हमारा सरीर बड़ा, दिमाग छोटा है। हमें कहाँ कुछ याद रहता है।" लंगोटिया यार की अपनी विपदा थी।
"हमारी अम्माँ ने बताया था कि हम नागपंचमी को जनम लिए थे, तब हमारे बाउजी अखाड़े में कुश्ती लड़ रहे थे।" इस उम्र में भी अपनी भुजाओं को अभिमान से देख रहे थे मनसुख जी।
सुखलाल और मनसुख को कुंभ में बिछड़े भाइयों की तरह गले मिलते देख, ननकू ने पूछा, "पानी जहाँ से भरकर लाना पड़ता है वह कुआंँ कहाँ है?"
"कुआँ तो हमारे घर के पिछवाड़े है, अब का ई हमार मेहरारू बाहर के कुआँ में जाके पानी लावै के उमर की है।" सुखलाल ने तपाक से उत्तर दिया।
"हे भगवान! बताया क्यों नहीं कि पानी की व्यवस्था घर पर है।" अब अच्छे उकता गए थे।
"का का बताया जाए बोलो कि हम पंचे का खात हैं, कहाँ आत-जात हैं, धंधा, पैसा कौड़ी सब बतावैं का। आ जाते हैं सरकारी टट्टू। लिखो जो लिखना हो, चला चली हो घर।" पहली बार बुज़ुर्ग महिला ने मुँह खोलना और ऐसा कि दोनों अजनबियों का मुँह खुला रह गया।
"आ गए हैं मनई गिने खातिर।" जाते-जाते सुखलाल ने इतना कहकर सुख का अनुभव कर लिया।
थके मांदे जीजा-साले ने कोने पर दिख रही चाय टपरी की ओर कदम बढ़ा लिए।
"कौन गाँव के हो भाई?" टपरी वाले ने समझ लिया की दोनों अजनबी हैं।
"गाँव तो तुम्हारा कमाल का है भाई। सरकारी सुविधाएं, मुवायजा सबको चाहिए परन्तु जानकारी किसी को नहीं देना है।" अच्छेलाल को टपरी वाला, अपने मुन्ना जैसे ही लग रहा था।
"अरे भाई, कोई छुट्टी वुट्टी के दिन आना चाहिए था। लड़के बच्चे रहें, तो बताएं सब।" टपरी वाले ने सलाह दी।
"अब हम छुट्टी के दिन काम करें।" ननकू का मुँह कडुवा गया।
पास ही दो आदमी चाय पी रहे थे। थोड़ा पास खिसक आए और बोले, "अरे, हमारे गाँव में हमारे रहते आपको तकलीफ़ हुई, बुरा हुआ। हम आपके साथ चलतें हैं घर-घर, सब जानकारी मिलेगी आपको।" धीमे और शांत स्वर में एक ने कहा।
"आप चलोगे हमारे साथ!" खुशी से अच्छे ने पूछा।
"हाँ हाँ, क्यों नहीं। सुबह से अभी चाय पिएं हैं हम दोनों। भूखे तो नहीं चलेगी शरीर की मशीन।" दोनों ने एक साथ कहा।
"हमारे जीजा बड़े दिलवाले हैं भाईयों, खाने खिलाने के शौकीन, है ना जीजा।" साले की इस अदा पर अच्छे ने हामी में सिर हिलाया।
चारों ने छक कर समोसा, कचौड़ी उड़ाया और तीनों के जीजा बने अच्छे ने कड़क नोट देकर रिश्ता निभाया।
अब चारों गाँव की गलियों में घूमने लगे। चौपाल, गलियों में आते जाते लोग उन्हें सिर से पैर तक घूर रहे थे।
"आप पहली गली में घूम आएं ना, अब दूसरी छोड़ तीसरी गली से निकलते हैं।" कहते हुए वो दोनों आदमी आगे आगे चलने लगे। कुछ कदमों के बाद एक बोला, "अरे..! मैंने अपना पर्स टपरी के मेज़ पर छोड़ दिया।"
"पैसे तो मैंने दिए भाई और पर्स तुम छोड़ आए।" अच्छे ने टोका।
"आप दोनों के आने से पहले चाय पिए थे ना, उसी समय निकाले थे।" एक आगे बोला, "इस गली का अंतिम घर श्यामलाल जी का है, आप चलो हम पर्स लेकर आते हैं।" कहते हुए दोनों टपरी की ओर वापस चले गए।
तीसरी गली का अंत आता ही नहीं था। श्यामलाल का घर तो नहीं मिला, पर कोने में खड़ी पगुराती श्यामल भैंस मिली। पेटभर खाया खाना, प्रेम से जुगाली कर पचा रही थी। इस पूरे गाँव में इन्हीं कजरारी आंँखों से स्नेह झरता देख, साला-जीजा की आत्मा तृप्त हो गई।
उसकी जुगाली का अंदाज़ देखते जब आधा घंटा बीत गया तब जीजा और साला को अपनी स्थिति का भान हुआ।
अब उस टपरी पर जाकर अपनी और गति करवाना मंजूर नहीं था उनको।
भारी दिल और थके कदमों से बस स्टैंड की ओर लौटती जोड़ी में से, जीजा अचानक चिल्ला पड़े, "ननकू, अभी-अभी हमारी दाहिनी आँख ने फड़फड़ाना बंद कर दिया है।"
बस पर सवार ननकू सोच रहा था कि अब जनगणना ड्यूटी में तभी आएंगे जब जीजा की बाईं आंँख फड़केगी।
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शर्मिला चौहान