मंगलवार, 27 अगस्त 2024

जन्माष्टमी पर गीत

श्याम तेरे कितने रूप, कितने नाम?
कोई कहे तुझे मुरली मनोहर,
कोई कहे घनश्याम।
वृंदावन की कुंज गलियों में,
रहे सदा तेरा धाम।

जीवन का हर रंग है सुंदर, 
चाहे सुबह या शाम,
खेलकूद कर, रास-रंग कर,
किया कर्म योग को महान।

प्यार, दोस्ती, रिश्ते-नाते
सब होते हैं जीवन में अहम्।
कृष्ण रंग है सबसे अलौकिक,
तोड़ दे सारे माया भ्रम।

बुद्धि, भक्ति और कर्म का,
 जिसने किया है संगम।
गीता संदेश दिया जग को,
कहलाया पूर्ण पुरूषोत्तम ।

उद्धव का अलबेला श्याम,
गोपी जन वल्लभ है श्याम।
संतजनों के तारक श्याम,
दुष्टो के संहारक श्याम।

राधेश्याम राधेश्याम, गोपी जन वल्लभ हैं श्याम।

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शर्मिला चौहान

शुक्रवार, 23 अगस्त 2024

11212 11212 11212 11212 पर दो ग़ज़लें




फ़िलबदीह क्रमांक 24
प्रथम चरण 
रदीफ़ - करो
क़ाफिया - आ की मात्रा 

11212  11212 11212  11212


जो बिछड़ गए कभी उनसे भी तो  मिलन की आस रखा करो।
ज़रा दिल में झांक के देख लो, वहीं रोज़ उनसे मिला करो।।1।।

कभी साथ साथ चले थे जो,  वो हैं फ़ासले पे खड़े हुए 
वो जो दो कदम भी बढ़ें अगर, दो कदम तो तुम भी चला करो।।2।।

मुझे मुफ़्त में तू मिली नहीं, मेरी ज़िंदगी मेरी ज़िद है तू।
मेरे दिल में तू जो समा गई, सुनो साँस बन के जिया करो।।3।।

खिले फूल अब तो पलाश के, लगी आग ज्यों वसुधा में है।
कहे डर का मारा सूर्य भी, धरा कम ज़रा सा सजा करो।।4।।


न ग़ज़ल बनी न ही गीत ही, न भजन कोई न ही छंद ही।
भरे प्रेम से ये दो शब्द हैं, मेरी प्रीत बन के झरा करो।।5।।

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तरही मिसरा-
 
मेरे संग बैठ कभी कभी, सुनो गीत फिर वो पुराने ही।
यूँ ही बेसबब न फिरा करो किसी शाम घर भी रहा करो।


शर्मिला चौहान
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फ़िलबदीह क्रमांक 24
दूसरा चरण 

11212  11212  11212  11212


ये जो बावली सी चली हवा, कहीं दीप कोई बुझा न दे।
वो झुकी हुई सी जो शाख है, उसे पेड़ से तो गिरा न दे।।1।।

बड़े साहसी हैं जवान वो, डटे रात दिन जो हैं सीमा पे।
रखें ध्यान वो यही हर समय, कोई ‌शत्रु झंडा झुका न दे।।2।।

ज़रा सोचकर तो कहा करो, बड़ी धारदार ज़ुबान है।
चले वो जो ऐसी ही चाल से, किसी दिल पे घाव बना न दे।।3।।

छिपा बदलियों में जो सूर्य तो, विरहिन किरण उसे ढूँढती।
कहे सबसे आँखें तरेर कर, कोई इसको मेरा पता न‌ दे।।4।।

जो मकान खूब चमकते हैं, किसी त्याग का ये तो रंग है।
करो बात तुम कभी नींव से, कहीं तुमको फिर वो रुला न दे।।5।।

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शर्मिला चौहान

गुरुवार, 8 अगस्त 2024

"काम बिगारे आपनों जग में होता हँसाय" (व्यंग्य)

"काम बिगारे आपनो, जग में होत हंँसाय"
(व्यंग्य)

गर्मी की लू धूल का घाघरा घुमाती, बाँध को तोड़ने  वाली नदी की तरह उन्मादी  हो चली थी।‌ पीपल बरगद की बपौती को आँखें दिखाती   जब गुज़रती तो सर-सर, सूँ-सूँ से पूरा इलाका गूँजने लगता। सिर पर गमछा लपेटे, जेब में एक प्याज़ ठूंसते हुए अच्छेलाल ने, आँगन में खड़े होकर तपते सूरज के तेवर से अपने तेवर को मिलाने की कोशिश की।

"अब भरी दोपहरी में किसको कांधा देने जा रहे हो अच्छन। कम से कम इस झांय झांय वाली लूं पर तनिक रहम खा लो।"  बरामदे पर से झांँकती अम्माँ की वाणी ने अच्छेलाल के माथे पर सिकुड़न ला दी। 

"अम्माँ, हमने एक कदम भी कभी तुम्हारी मन मर्ज़ी के बिना उठाया है कभी, तो किसी की अर्थी कैसे उठा लेंगे। आते जाते टोकने की आदत हो गई है, ना जाने कब जाएगी?"  सूरज की चढ़ती किरणों ने, अच्छे के कूल दिमाग को भी गर्म कर दिया था।
"कब जाएगी बेटा, सीधे सीधे कहो ना कि, अम्माँ अब चली जाओ। तुम सबकी छाती पर पत्थर की तरह धरी पड़ी हूँ।" अम्माँ की आवाजें अच्छे के कानों में पूरा शीशा उड़ेलती, इसके पहले ही अच्छे को सूरज का ताप ज़्यादा मध्यम और कोमल जान पड़ा।

चौपाल का हॉल, चुनाव के बाद नया नया खड़ा हुआ था। अपनी विशालता, नए रंग रोगन से अकड़ा हुआ वह, आज की इस सभा का आतिथेय (मेज़बान) बना खड़ा है।
इस भीषण गर्मी में दो बड़े कूलर हॉल की चर्चा का तापमान संतुलन करने के लिए लगे थे। 
"दोनों कूलर और पानी की टंकी में पानी भरने के लिए नगर निगम का टैंकर आया था सुबह।" बिहारी ने अच्छे को बताया।
"अरे यार! ये दो कूलर और फुट दो फुट की टंकी में पानी भरने के लिए क्या टैंकर भर पानी लगता है?" अच्छे ने आश्चर्य से पूछा।
"बाकी पानी तो विधायक जी की कोठी की टंकी और उनके बगीचे में डाल दिए, पैसे तो आज की मीटिंग के खाते में ही जाएगा ना।" अपेक्षाकृत धीमी आवाज़ में फुसफुसाया।

सामने दीवार पर बड़ा बैनर लगा था_
"पर्यावरण बचाओ-पेड़ लगाओ"
"एक एक पेड़ -जीवन के एक एक साल"
"पेड़ रहेंगे जब तक-साँस चलेगी तब तक"
सुंदर अक्षर, चित्रों से सजे मनमोहक बैनर को देखकर, अच्छेलाल और बाकी सब भी प्रभावित हो गए।

विधायक जी के इंतज़ार में कूलर बंद करके रखें गए थे,  आम जनता जनार्दन ने सामने के छतनार पीपल और बरगद के नीचे ही पसीना सुखाना बेहतर समझा। 
छोटी-बड़ी स्टील की टंकियों में बर्फ़ डालकर रखा शरबत भी, विधायक जी के इंतज़ार में गर्म हो चला था।
"ऐ भइया, गर्मी से व्याकुल लोगों को तनिक ठंडा, मीठा शरबत ही पिला दो। जीभ और गला दोनों लाल मिर्ची की तरह सूखकर सिकुड़ रहें हैं।" एक अधेड़ ने आयोजक नवमंडली से आग्रह किया।
"चाचा, अभी एक घंटे भी नहीं हुए, गला सूख गया आपका, यदि आजादी की की लड़ाई लड़ते तो क्या होता?" बीस साल के सुंदर ने बाईं आंँख दबाते हुए बत्तीसी निपोरी।
"जो समोसा की जूठन हॉल के पीछे की दीवार पर फेंक आए हो ना तुम सब, वहीं खाकर लड़ लेते।" अधेड़ की बातों ने सुंदर के श्यामल चेहरे को लोहित कर दिया।

चार अन्य कारों के बीच, फूलों से सजी विधायक जी की चमचमाती कार आ गई। सिर पर ब्रांडेड कैप, आँखों पर धूप का चश्मा, सफेद लिनेन की शर्ट और हल्की नीली हाफ जैकेट पहने विधायक जी, फिल्मी स्टाइल में उतरे।
उनकी जय जयकार, माल्यार्पण और आरती उतारने के बाद उनका भाषण था। कुछ गर्म होते शर्बत में दो बर्फ़ के बड़े बड़े टुकड़े और समा गए। पीते हुए लोगों ने नाक-मुंँह सिकोड़कर, लाल रंग का ठंडा पानी ही पिया। शक्कर तो आजकल ट्रेंड में है भी नहीं।‌

सामने खड़े विधायक जी की जुबान पर साक्षात सरस्वती ने आसन जमा लिया था। उनके पास लक्ष्मी की कृपा का रास्ता, माँ सरस्वती स्वयं तय करतीं थीं। 
पेड़-पौधों, हरियाली, पानी का संरक्षण, जलवायु के बारे में बोलते हुए विधायक जी ने पूरी श्रोता मंडली को हरे-भरे बाग, वन-उपवन की सैर करा दी। खुद अच्छे ने अपने फेफड़ों को प्रसारित करके बड़ी मात्रा में शुद्ध वायु खींचकर, पहले से ज़्यादा तरोताजा महसूस किया।

आनेवाले पर्यावरण दिवस में इस क्षेत्र का रुप बदलने के प्रत्येक नागरिक ने कमर कस ली थी। अपनी भावी पीढी के लिए टनों ऑक्सीजन का इंतज़ाम करने वाले लोगों का उत्साह, आज सूरज को दीपक दिखा रहा था।
कुछ बातों को बार-बार बताकर मानो लोगों को कंठस्थ करवाया जा रहा था। 
हर एक परिवार पाँच पेड़ लगाए।
हरे रंग का कपड़ा पहनें, यह हरियाली का प्रतीक है।
इको फ्रेंडली बैनर, पोस्टर बनाकर लाना है।
अपने पीने के लिए और लगाए पौधों को सींचने के लिए, पानी की बोतल सब खुद लाएं।

नवयुवकों ने पास के हाइवे नर्सरी से फलदार, छायादार पौधे मंगवा लिए थे। विधायक जी ने अपने बंगले तक की सड़क पर पौधे लगाने वालों के लिए चाय नाश्ता स्पांसर कर दिया था।
प्रतिदिन ग्राउंड लेवल की रिपोर्ट मुन्ना के रेस्टोरेंट से मिलने लगी। चाय समोसा के साथ पर्यावरण दिवस की गहमा-गहमी से, बगल में खड़ा बूढ़ा पीपल मंद-मंद मुस्कुरा रहा था। उसने अपनी जड़ों की ओर देखा, मिट्टी बह जाने से नागिन की तरह भूमि की सतह पर खुली रेंग रहीं थी। टपरी की छत का काम करने वाले पीपल की, इन खुली जड़ों को मिट्टी का कवच पहनाने का सोचते सोचते मुन्ना की टपरी रेस्टोरेंट में बदल गई थी। 

पीपल के कंधों पर चढ़ने वाली, उसकी शाखाओं की बांँहों में झुलने वाली, जल चढ़ाकर दीया जलाने वाली पीढ़ियाँ, अब अपने बाल बच्चों के साथ शहरों की ओर कूच कर गई थी‌ परंतु पीपल की उन उभरी खुली जड़ों को मिट्टी से ढांकने का समय किसी को नहीं मिला।
देवी देवताओं की खंडित मूर्तियांँ और फोटो की बढ़ती संख्या ने, उन जड़ों पर और बोझ बढ़ा दिया था। 

"हरा रंग हम कैसे पहन लें बच्चा, हम तो सफ़ेद सूती साड़ी ही पहनते हैं?" अम्माँ का यक्ष प्रश्न था।
"दादी, हम हरे रंग के कुछ पत्ते, आपकी साड़ी पर प्रिंट कर देंगे। हमारे स्कूल में हमें सिखाया है कपड़ों पर चित्रकारी।" दीपू और गोपी को अपनी कलाकारी दिखाने का सुनहरा मौका मिला था।
"अरे!  कहांँ रंग रोगन करेंगीं इस उम्र में अम्माँ, हाथ में पेड़ की हरी डाली पकड़ लेंगीं और क्या?" उमा की यह बात एक बार में ही अम्माँ को जँच गई।

पाँच तारीख आते तक, पूरा गली-मोहल्ला उत्साह से भर उठा। सौ पौधे खरीद लाए थे नवयुवक पार्टी के युवा।
"इतने पुण्य का काम है, हमारे घर से भी पाँच पौधे हम ले आएंगे।" अच्छे ने अपनी कॉलर खड़ी कर ली।
"अच्छे भैया, पौधे लाना ही नहीं है बल्कि उन्हें लगाकर उनकी रोज उनकी जी-हजूरी भी करना है।" मुन्ना ने दाँत निपोरते हुए कहा।
"हमें ज्ञान ना ही दो तो अच्छा है मुन्ना। ये पीपल का अधनंगा पेड़ रोज तुमको गरियाता होगा तनिक आसपास से मिट्टी लाकर ढांक दो  उसको।" अच्छे भैया के तेवर से मुन्ना सहम गया और हँसते पीपल ने झूम-झूमकर प्राणायाम शुरू कर दिया। 
अपने खेत की मेड़ों पर उग आए पीपल और बरगद के नन्हें पौधों को हाथों में थामे, हरा कुर्ता पहने अच्छेलाल को आज सृष्टि की हरीतिमा में अपने योगदान के प्रति गर्व हो रहा था। 
"खेत के किनारे पीपल, बरगद बढ़िया लगवा दिए थे सुंदरवा से कह कर। तुम काहे उखाड़ लाए अच्छन?" अम्माँ  तमतमा गईं।‌
"अरी अम्माँ! खेत पर कितने ही लोग जाते हैं जो इस बड़े पेड़ की छाया में बैठने का सुख लेते।‌ इस गली में लगा देंगे तो कुछ सालों बाद ठंडी हवा, छाँव देगा सबको। चार लोग बैठेंगे नीचे, पंछियों को आसरा मिलेगा।"
 अम्माँ के तेवरों में ढीलापन देखकर अच्छे ने उत्साह से कहा "पेड़ के तने में बाबूजी का नाम भी लिखवा देंगे अम्माँ।" अच्छे के पिचके गालों में चमक के साथ उछाल आ गई।
नए बने हॉल के बाहर, सारे लोग जमा हो गए। सामने लगे छतनार वृक्षों को समझ नहीं आ रहा था कि सब आज उनकी शाखाओं, पत्तियों को तोड़कर अपने पोस्टर और बैनरों में चिपका रहा थे।
"आज कौन सा विशेष दिन है भाई, जो सभी लोग हमारे अंगों को तोड़-मरोड़ कर दुखी कर रहें हैं।" पीपल अपनी नन्हीं शाखाओं के तोड़ लिए जाने पर व्यथित हो गया।
"कहते हैं कि आज नए पेड़ उगाकर, धरती को हरा-भरा बनाएंगे।" बूढ़ा बरगद अपनी जटाओं पर झूलते बच्चों से परेशान हो रहा था।
"ये प्लास्टिक की थैलियों में लाए हैं छोटे छोटे पौधे, अरे वाह! चलो अपना परिवार बढ़ेगा परंतु हमें तोड़ क्यों रहें हैं?" पीपल कराहने लगा।
हाथों में टहनियांँ लिए, बैनर पकड़े, हरे कपड़े पहने लोगों का झुंड फोटो खींचने-खिंचवाने में व्यस्त था। औरतों ने तो पीपल, बरगद के साथ सैकड़ों सैल्फी‌ ले डाली।

"सुनो सुनो, बड़ा बैनर इस जटाधारी बरगद पर‌ लगाकर, सब एक साथ खड़े हो जाते हैं। पर्यावरण दिवस पर इससे सुंदर फोटो इंस्टा पर किसी की ना होगी।" शहर में पढ़ने वाले सोशल मीडिया में एक्टिव मुकुंद ने सलाह दी।
आनन फानन बरगद की भुजाओं पर कीलें ठोंक कर, बैनर लटका दिया गया और की कई कोणों से फोटो लेने लगे।
जुलूस चला, आगे आगे विधायक और दाएं-बाएं ट्रेनी युवा नेता चल रहे थे।

गड्ढे खोदने का काम कुछेक लोगों को सौंपा गया था, पेड़ लगाने वालों की संख्या तो टिड्डी दल की तरह भिनभिना रही थी। फोटोग्राफर परेशान था कि किस पर फोकस करें और किसकी फोटो खींचे।‌ तीन-चार घंटों बाद, सड़क किनारे नए पौधों की फ़ौज अपना सिर उठाने के लिए तैयार थी। सूरज के तेवरों से उन नन्हों की सूरत उतर गई थी।

विधायक जी की कोठी के सामने चाय-नाश्ते का इंतज़ाम था। मुन्ना अपने अस्सिटेंट लिए, मुस्तैदी से इस मोर्चे को संभाल रहा था। 
मुन्ना को ऐसे आपाधापी में खाना पसंद नहीं था और वो भी सपरिवार, इसीलिए अपनी गली में खेतों से लाए आम बरगद और पीपल के पौधे लगा दिए। मुन्ना के हॉटल से सटे पीपल की जड़ों को दो-तीन टोकरी मिट्टी का अर्ध्य देकर, अच्छे का पर्यावरण दिवस पूर्ण हुआ।
तपती धूप से अम्माँ‌ और बाकी सब घरवालों के दिमाग गर्म हो रहे थे। हाथ में टहनी पकड़े सारे कस्बे घूमकर अम्माँ का पेट भूख से कुलबुला रहा था। उमा ने रसोई में जाकर जब बर्तनों की झनझनाहट की, तब कहीं सभी के पेट में कूदते‌ चूहे आश्वस्त हुए।

थाली में गर्म खिचड़ी और आँगन में टहनी, बैनर ‌और पत्तों के बने पोस्टर फैल रहे थे।‌
शाम ढले दिनभर की जायज़ा लेने अच्छेलाल चौपाल की ओर निकले। अपनी गली में दोपहरी को लगाए पौधों को‌ ना देखकर उनके होश‌ उड़ गए।
भैरव की श्यामा, कुछ ही दूरी पर जुगाली कर‌ रही थी और उसके बड़े-बड़े सींगों पर चिपकी पीपल की कोमल पत्ती, अपनी शहीदी की दास्तां कह रही थी।

आज सुबह तक खेत में हँसते मुस्कुराते इन पाँच पौधों की बलि चढ़ाकर, चौपाल की चर्चा में मुँह खोलना अच्छे को नहीं भाया‌।

आँगन में बैठी अम्माँ के‌ चुभते‌ प्रश्नों से टकराने की हिम्मत अच्छे में बिल्कुल नहीं थी, मुन्ना का हॉटल भी गाँववालों‌ की जिह्वा को संतुष्ट करने में लगा‌‌ था‌  अतः अच्छे‌ मुन्ना के‌ पड़ोसी पीपल से बतियाने ‌निकल‌ पड़े।
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शुक्रवार, 2 अगस्त 2024

2122 2122 2122 पर दो ग़ज़लें

फ़िलबदीह क्रमांक 23
तरही मिसरा- मत कहो आकाश में कोहरा घना है।

2122  2122  2122

मानवों में लुप्त होती भावना है 
बस यही धरती की गहरी ‌वेदना है।।1।।

भावनाएं बर्फ़ सी कुछ जम गईं अब
आदमी ही आदमी से अनमना है।।2।।

पेड़ टूटे बाग सूखे मौन कलरव
नेह से अपने इन्हें फिर सींचना है।।3।।


है विषमताओं की बढ़ती दूरियां जो
खुद प्रयासों से उन्हें अब जोड़ना है।।4।।

है समय अब जाग जाए सुप्त मानव
हे प्रभो कर जोड़ तुमसे प्रार्थना है।।5।।


पीठ पर बस्ते दिमागों में भविष्यत 
आज बच्चा भूलता बस बचपना है।।6।।

काल बीते सृष्टि की अपनी कलाएं
मौसमों में हर लगे नवयौवना है।।7।।

तरही मिसरा-

नित्य करता सामना सूरज  उन्हीं से 
मत कहो आकाश में कोहरा घना है।

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आदरणीय अनिल सर एवं आप सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏-

फ़िलबदीह  23
दूसरा चरण 

2122  2122  2122


अपनी धरती से ज़रा सा प्यार कर लें 
स्वर्ग धरती पर चलो साकार कर लें।।1।।

फाड़कर छप्पर जो ईश्वर ने दिया सब
बैठ उसके सामने आभार कर लें।।2।।

पीठ पीछे तुम भुनाते रिश्तों को क्यूँ
खोल कर बाज़ार कुछ व्यापार कर लें ।।3।।

चंद कमियांँ हैं हरिक मानव के भीतर 
चल हृदय में झाँक कर स्वीकार कर लें।।4।

काम करते बीतता जीवन ये सारा
साल में दो-चार तो इतवार कर लें।।5।।

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शर्मिला चौहान