सोमवार, 27 फ़रवरी 2023

122 122 122 122

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गमों को हमेशा छुपाती है औरत
भरी आँख खुशियाँ लुटाती है औरत।।1‌‌।।

बनी नींव सहती रहे बोझ सबका
मकां को मगर घर बनाती है औरत।।2।।

खड़ी धूप में खुद थपेड़ों को झेले
कि आँचल से छैयाँ कराती है औरत।।3।।

दिए ज़ख्म लाखों ज़माने ने उसको
मगर हँस के मरहम लगाती है औरत।।4।।

नदी बन के सींचे वो रिश्तों की धरती
किनारों को पुल बन मिलाती है औरत।।5।।

घना खूब छाए तिमिर जब जगत में
तो आँगन में दीपक जलाती है औरत।।6।।

पड़ी चंद बूँदें भरी नेह से जब
महक मोगरे सी वो जाती है औरत।।7।।

निभाती रहे झुक के बंधन खुशी से
ग़लत बात पे सिर उठाती है औरत।।8।।

कहाँ से चली थी कहाँ आज पहुँची
सरल राह खुद ही बनाती है औरत।।9।।

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शर्मिला चौहान

गुरुवार, 23 फ़रवरी 2023

प्रयोगात्मक लघुकथाएं

[01/12/2022, 16:09] Sharmila Chouhan: लघुकथा_ "असैनिक सैनिक"  ( छंदबद्ध काव्य शैली दोहा एवं मनहरण घनाक्षरी छंद)



लेकर के सेना बड़ी, हमलावर के वेश।
बड़ा देश हमला करे, झेले छोटा देश।।(दोहा)


जनता हौसले वाली, देशहित मतवाली
बूढ़े बच्चे घर रख, निकले वो आज हैं।
अस्त्र शस्त्र सीख रहे, शत्रु पर चीख रहे
युवानों ने प्रण लिया, यही सच्चा काज है।
शत्रु की ताकत बड़ी, नभ थल सेना खड़ी
दाँव पेंच खेल रहा, शक्ति का आगाज़ है।
सीमा पर शत्रु खड़ा, जिद पे अपनी अड़ा
लोगों का साहस देख, आती खुद पे लाज है।।(मनहरण)


नागरिकों का हौसला, बढ़ता देख अपार।
क्रोधित हो दुश्मन प्रबल, करता तीव्र प्रहार।।
नवयुवान झंडा लिए, आगे चलता वीर।
भागो ये मेरा वतन, सीना रख दूँ चीर।।


जोर की आवाज हुई, छतें कई उड़ गईं
गोली से घायल गिरा, युवा वो महान है।
धरती पे गिरा लाल, ध्वज रखा है संभाल
गौरव निज देश का, करे गुणगान है।
हौसला जो मन भाया, दुश्मन निकट आया
जाओ घर लौट जाओ,हमने ली ठान है।
खून लोगों का बहाते, सैनिक क्यों हो कहाते
जंग हम जीत लेंगे, मुझे अभिमान है।। (मनहरण घनाक्षरी)

सांँसें धीमी सी हुई, झंड़े पर थे नैन।
लहराता रहे हरदम, दिल पाएगा चैन।।
सैनिक को अफ़सोस था, आकर बैठा पास।
घर तू वापस लौट जा, करता जीवन नास।।

जन्मदिन माँ का आज, करता मैं देश काज
लौट नहीं पाऊंँगा जो, कोई ना मलाल है।
साबित मैं कर पाऊँ, धरा का  ऋण चुकाऊँ
मेरी माता करे गर्व, ये तो मेरा लाल है।
सैनिक का मन भीगा, प्यारा वो युवक लगा
बोला मेरी माता का भी, बस यही हाल है।
दोनों वीर मिल रहे, नैना नीर बह रहे
माता की यादों के संग, दोनों देखें काल हैं।।( मनहरण)


धीरे धीरे टूटती, सांँसों की थी डोर।
बैरी कायल हो गया, नम आंँखों की कोर।।


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शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
मो.नं. 9967674585

sharmilachouhan.27@gmail.com
[02/12/2022, 18:59] Sharmila Chouhan: "असैनिक सैनिक"( काव्यात्मक शैली)


लाव लश्कर से सजी बड़े देश की सेना चली‌। हवाई हमलों की मार सहता छोटा देश मगर ना डरता।

देश खातिर जान देंगे दुश्मनों से ना डरेंगे। जन्मभूमि है हमारी हाथ से जाने ना देंगे। छोटे देश की आम जनता अभ्यास शस्त्रों का करने लगी। बूढ़े, बच्चों को घर पे छोड़, नवजवानों की टोली बढ़ने लगी।

देख ज़ज्बा आम जन का, शत्रु मुस्काने लगे। आम जन में देश के सैनिक नज़र आने लगे।
लाख हिदायतों के बाद, वो आगे बढ़ते जा रहे थे। देश की रक्षा का प्रण बस, वे सभी दोहरा रहे थे।

दनदनाती शत्रु गोली, चीरकर दिल को गई। गिर पड़ा धरा पर नवयुवान, रक्तधार सतत् बह चली। देख हौसला उस युवक का शत्रु पास आने लगा। बैर भूला बैठ नीचे हाथ सहलाने लगा।

जीत दुनिया देखती कैसे भी फिर हालात हों। जीतता तो बस वही जिसमें भरे ज़ज्बात हों।
साँसें धीमी पड़ रहीं थीं आँखों में था देश परचम। मैं रहूँ या ना रहूँ, लहराता रहे तू हरदम।

मन ही मन आक्रमणकारी उसे सलाम कर रहा था। बिना किसी दबाव के वो युवक अपने देश पर मर रहा था।
हथियार चलाकर बलपूर्वक अधिकार जमाते हो. देशभक्ति के नाम पर लोगों का खून बहाते हो।
तिलमिलाकर शत्रु सैनिक ने कहा यह सच नहीं। देश का आदेश है और इसपे मेरा बस नहीं।
धीमी होती आवाज़ में नवयुवक फुसफुसाया, अपने सीने में दफ़न इक राज फिर बताया। 
सैनिक बनने की लालसा थी बड़ी, वह दिल की दिल में रही दबी। आज अब मौका आया है देश ने उसे बुलाया है।

बस एक ग़म हमेशा रह जाएगा, आज माँ का जन्मदिन है ये बेटा मिल ना पाएगा। शत्रु सैनिक काँप गया, उसके अंदर का बेटा जाग गया।
अपने देश की सेना से मैं बात करुँगा, तुम माँ से मिल सको ये फरियाद करुँगा। ना होगा माँ को स्वीकार कि मैं दुश्मन से झुक जाऊँ, चाहे धरती की खातिर सौ बार भी मैं मर जाऊँ। 

माँ तेरी मेरी होती नहीं, बस माँ तो माँ होती है। अपने लाल को जब ठोकर लगे, माँ सौ सौ आँसू रोती है।
आँखों में दोनों की इक नमी झलकने लगी, माता का चेहरा याद कर फिर चार आँखें चमकने लगीं। साँसें नवयुवक की और धीमी हो जाती है, बंद होती पलकों में धुँध सी छा जाती है।
धीरे से डूब जाती है वो दमदार आवाज़, शत्रु नतमस्तक हो जिसका वंदन करता आज।


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शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
मो.नं. 9967674585

sharmilachouhan.27@gmail.com
[03/12/2022, 15:42] Sharmila Chouhan: "जीत का फंडा" (साक्षात्कार शैली)

प्रश्नकर्ता - अपनी नई पुस्तक के लिए विश्वस्तर पुरस्कार विजेता लेखक श्री रमेश देव जी का हमारे चैनल पर हार्दिक स्वागत है। 
नमस्कार एवं अभिनंदन आपका सर।

लेखक- (हाथ जोड़कर) आपके चैनल एवं सभी दर्शकों को नमस्कार, धन्यवाद।

प्रश्नकर्ता - सर, पुरस्कार प्राप्त करने के बाद आज देश में  आपका प्रथम साक्षात्कार हमारे चैनल पर है। हमारे दर्शकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। मुझे कहने में कोई संकोच नहीं होगा कि हमारी टी.आर.पी. रिकार्ड तोड़ देगी।

लेखक - आपने मुझे अपने चैनल पर आमंत्रित किया, मेरा सौभाग्य है।

प्रश्नकर्ता - सर,आपने कितनी पुस्तकें लिखीं और अपने शुरुआती दौर के बारे में हमारे दर्शकों को थोड़ा बताइए।

लेखक- मैंने अपने कॉलेज के दिनों से लिखना शुरू किया था। नुक्कड़ नाटकों और गीत लिखने का शौक था। (मुस्कुराते हुए) कई नाटकों का दोस्तों के साथ मंचन भी किया। कहानियों और फिर उपन्यास विधा पर कलम चलाई।
मेरे करीब बीस एकल संग्रह आए हैं।

प्रश्नकर्ता - सर,आपकी पूर्व में लिखित पुस्तकों को पाठकों ने दिल से सराहा परंतु राष्ट्रीय स्तर पर आपको कोई पुरस्कार प्राप्त नहीं हुआ।
इस नई पुस्तक को देश में उतनी ख्याति नहीं मिली परंतु विश्व स्तर पर विजेता रही। इसका क्या कारण है सर?

लेखक- (मौन)

प्रश्नकर्ता - सर, आज  हजारों की संख्या में जुड़े हमारे दर्शकों को यह जानने की बहुत इच्छा है। आप का उत्तर ही उनका समाधान करेगा।

लेखक- देखिए, शुरूआती दौर में मैं अपने सुख, अपने आनंद के लिए लिखता था। धीरे धीरे मैंने लोगों की पसंद नापसंद जानकर लिखना शुरू किया। लोगों से सराहना तो मिली पर कोई पुरस्कार नहीं मिला।
यह पुस्तक मैंने विश्वस्तर के निर्णायकों के दिलोदिमाग का, सूक्ष्म अध्ययन करके लिखी और पुरस्कार जीतने में सफल रहा।

(अचानक दर्शकों का ग्राफ तेजी से नीचे आने लगा)

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शर्मिला चौहान
ठाणे (पश्चिम)
मो.नं.9967674585
[06/12/2022, 15:11] Sharmila Chouhan: लघुकथा- "मनबावरा" 
(एकालाप शैली)



मुझे माफ़ कर दीजिए मैनेजर साब! मुझसे बहुत बड़ी ग़लती हो गई।
मैं सात सालों से यहाँ काम कर रहा हूँ, ना जाने ऐसा क्यूँ हो गया?  मैंने हज़ारों रुपयों का व्यवहार किया परंतु दो बार से मन बेकाबू हो गया। 
पहली बार दो महीने पहले पाँच हज़ार निकाले थे। तभी आपको अंदाजा हो गया होगा.. मुझे इस बार माफ़ कर दीजिए। मेरे बीबी-बच्चों का बुरा हाल हो जाएगा। 
आज मैंने पाँच हज़ार.. नहीं शायद छ: हज़ार निकाले। मैं हिसाब में बराबर करने वाला था पर आपने मेरी नीयत पहचान ली। होटल के गेट पर पुलिस आई है।
मैं आपके हाथ जोड़ता हूँ, पाँव पकड़कर माफ़ी माँगता हूँ। दया कीजिए, मुझे पुलिस के हवाले मत कीजिए। मैं ये रूपए अभी वापस रख दूँगा। भीख मांगता हूँ।

उद्विग्नता वश वह अपने पास ही के  टेबल पर, दो दिनों से मृत पड़े फोन पर मैनेजर से इकरार कर रहा था। खिड़की से होटल के गेट के सामने खड़ी पुलिस की जीप देखकर, पसीने से भीगा थर-थर काँप रहा था। अपने कमीज़ में रखे नोटों से मुक्ति चाह रहा था।
अगले मिनट पुलिस की गाड़ी रास्ता पूछते हुए आगे निकल गई और  नोटों के बंडल पर उसकी अँगुलियाँ फिर कसने लगीं।


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शर्मिला चौहान
ठाणे महाराष्ट्र
9967674585
sharmilachouhan.27@gmail.com

शनिवार, 18 फ़रवरी 2023

अनंत आकांक्षा वैवाहिक कार्यक्रम 🌹

॥ ॐ श्री गणेशाय नम: ॥
     ॥ जय माँ आशापूरा ॥

कुलदैवत दुल्हादेव की असीम कृपा से 

चि. अनंतपाल
 एवं
 चि. आकांक्षा

के शुभविवाह समारोह का आयोजन होटल अमर महल पैलेस ओरछा, बेतवा नदी के किनारे 4/12/2023 करने का निश्चय किए हैं।

दिनांक 1/12/2023 को वैवाहिक  कार्यक्रम का श्रीगणेश माताजी की पूजा, बड़े देव की पूजा से होगी। 

2/12 को बस से नागपुर से ओरछा के लिए हम सब प्रस्थान करेंगे जो 10-12 घंटे का होगा।

3/12 को वैवाहिक कार्यक्रम और  4 /12 को विवाह विधि सायंकाल तक संपन्न करने का विचार है।

दि.5/12 को सुबह ओरछा से नागपुर के लिए निकलना है।

दि. 6/12 को दूल्हा देव के बधाई की  पूजा होगी। 
उसी दिन शाम को नागपुर में reception समारोह सेंटर पॉईंट होटल में आयोजित करेंगे।

दि. 7/12 को सुबह श्री सत्यनारायण भगवान की कथा का आयोजन करेंगे।
शाम तक नागपुर से ठाणे आयेंगे। 

दि. 8/12 के शाम को ठाणे में  reception रखेंगे।

परिवार के प्रत्येक सदस्य का यथायोग्य सहयोग अपेक्षित है। विवाह की तैयारियों हेतु समूह पर चर्चा होती रहेगी।

चौहान परिवार

लघुकथाएंँ

‌"जैसे को तैसा"



अपनी भुजाओं को शान से देखता छंगू , शेर की मस्त चाल से गली पार कर रहा था। आसपास के लोग उसे सलामी देकर  अपना फर्ज़ निभा रहे थे।

"अबे रतन, एक गिलास लस्सी तो पिला, मलाई मारके।" सड़क किनारे के हाॅटल में घुसते हुए छंगू ने आदेश दिया।

उसके आते ही सुई पटक सन्नाटा छा गया। मालिक ने नौकरों को घूरकर देखा। इस छंगू को रोज़ मुफ्त की लस्सी पिलाना सबको भारी पड़ता था।

"अबे! सब के सब मुँह क्या ताक रहे हो? लस्सी पिलाओ।" छंगू की दबंग आवाज़ गूंँज रही थी।

"पहलवान साहब, आप को एक क्या दो-दो गिलास लस्सी पीनी चाहिए। आज हम चंदा जमा करने में लगे हैं। जो सबसे ज्यादा चंदा देगा, उसको कल हार पहनाकर सम्मानित किया जाएगा। " सांँस लेकर रतन ने फिर कहा, "आपको मालूम अभी जग्गू दादा भी आने वाले हैं। हम उन्हीं का इंतजार कर रहे हैं।‌ आखिर उनसे ज्यादा दरियादिल कौन है इस कस्बे में।" लस्सी पर मलाई भरकर रतन ने छंगू को दिया।

"क्या सचमुच जग्गू आने वाला है?" छंगू ने रतन को टटोला।

"आने भी वाले हैं और सुना है कि हॉटल के इस काम में दिल खोलकर गुप्त दान भी देने वाले हैं। असली दान तो गुप्त ही होता है पहलवान जी।" रतन ने तीर छोड़ा।

"ऐसा भी क्या रतन, मैं तो हमेशा ही आता हूँ यहाँ। अब मेरे पास अभी तो दांव में जीते दो हजार रुपए हैं। ये मैं दान करता हूँ परंतु तुझे तो मालूम हैं ना कि मैंने रुपए दिए‌ हैं, तो अब कल हार मुझे पहनाना‌।" आज रतन ने पासा पलट दिया था। आज छंगू ने दो हजार की एक गिलास लस्सी पी ली थी।


शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2023

221 2121 1221 212

221 2121 1221 212

लफ्ज़ों के तीर खूब चलाता है आदमी
दुश्मन बहुत ज़ुबां से बनाता है आदमी।।1।।

अपनी खुशी की चाह में भटके वो दर-बदर
औरों की चाहतों को चुराता है आदमी।।2।।

घर उसने जो खड़ा किया अब वो मकान है
सामान कीमती से सजाता है आदमी।।3।।

मौका मिला कभी तो भरी जेब ही सदा
पैसों के जोर सबको नचाता है आदमी।।4।।

मतलब निकल गया तो गया भूल फिर जहां
माता पिता का प्यार भुलाता है आदमी।।5।।

हैं ऐब खुद में लाख कहे पाक खुद को पर
औरों की गल्तियों को गिनाता है आदमी।।6।।

फैला रखे जो स्याह ज़रुरत के दायरे
निज स्वार्थ के ही दीप जलाता है आदमी।।7।।


शर्मिला चौहान