सोमवार, 26 अप्रैल 2021

ग़ज़लें १२२२ १२२२ १२२ एवं 122 122 122 122

आर... तुकांत, क़ाफ़िया
होगा...पदान्त, रदीफ़

1222  1222  122

१)  हृदय में भाव का आगार  होगा
   तभी भावुक सकल संसार होगा।

२) सनेही रूठ कर कोई विलग हो
गले लग नेह से मनुहार होगा।

३) कली घूंँघट उठाती जब लजाकर
करे भंवरा निवेदन प्यार होगा।

४) क्षितिज पर हाथ थामें व्योम भू जब
बरसता प्रेम जल भंडार होगा।

५) जलद आया नगाड़े ढ़ोल ले कर
धरा पर पौध नव तैयार होगा।

५) मिले अब पेट भर रोटी सभी को
क्षुधित कोई नहीं लाचार होगा।

६) बढ़े जंगल यहां सीमेंट के अब
तरू कटने कहीं लाचार होगा।

७) तिरोहित हो चला सूरज यहां से
प्रखर होगा जहां साकार होगा।


*****************


122 122 122 122

जगत जीव माया बड़ी ही गहन है
भला कौन इसमें नहीं जो मगन है। 1।

तिमिर घोर छाए भटकता मनुज जब
तभी हौसलों की चमकती किरन है। 2।


बुराई भरी सोच आती हृदय में
सरल भाव धरकर करें फिर दहन है। 3।

बुरे वक्त में साथ देने खड़े जो
वही रूप भगवान, उनको नमन है। 4।

उजाला करे दीप छोटा जले जब
हटाता तमस ठान मन में लगन है। 5।

मिला श्रेष्ठ जीवन सभी से मनुज को
करें काज अच्छे यही तो भजन है । 6।

मधुर बोल बन कर दिखावा रिझाता
वचन सत्य की ही परख का चलन है। 7।

भरी जेब रिश्ते निभाना सरल सब
गरीबी पड़े तब न भाई बहन है।8।

सिपाही वतन के लिए जान देता
शहीदी मिले बस यही इक लगन है। 9 ।

शर्मिला चौहान



मंगलवार, 20 अप्रैल 2021

राम कथा घनाक्षरी

मनहरण घनाक्षरी

बड़ा शुभ चैत मास, नवमी  तिथि है खास।
सबके हृदय आस, राम जन्म आज है।

सांवली सूरत प्यारी, मारे हंँस किलकारी।
मोहनी मूरत देखो, सुंदर रूप साज है।

अवध में छाई धूम, बधाई दें घूम घूम।
घर घर लड्डू बंटें, शगुन का काज है।

चंदन का पलना है, राम प्यारा ललना है।
कौशल्या झुलाए डोर,ममता का राज है।

🌺🌸🌼🌸🌺🌼🌸🌺🌼

मनहरण घनाक्षरी

 ब्याह की हुई तैयारी, मिथिला सजी निराली।
शिव धनु तोड़ें हम, सबने ये ठान ली।

मुनि संग आए राम, तोड़ा चाप बढ़ा मान।
जानकी के हृदय की,रामजी ने जान ली।

जनक की प्यारी लली, सीता सुकुमारी चली।
सारी सीख जननी की, बिटिया ने मान ली।

परछन थाल सजी, ढ़ोल शहनाई बजी।
अवध की बहू सीता, सासूओं से ज्ञान ली।

🌺🌸🌼🌸🌺🌼🌸🌺🌼

मनहरण घनाक्षरी

कैकयी ने मांगा वर, रामजी ने छोड़ा घर।
लखन सिया के संग, चले वन राह हैं।

धरे वेष मुनियों का, करें काम क्षत्रियों का।
रहूँ मिल सब संग, करें यही चाह हैं।

पंचवटी आए राम, राक्षसों को भेजा धाम।
ऋषियों की रक्षा करें, बोलें सब वाह हैं।

 केवट गले लगाए, शबरी के बेर खाए।
सुग्रीव से की मिताई, धर लिए बांह हैं।

🌼🌺🌸🌼🌺🌸🌼🌺🌸

कृपाण घनाक्षरी

आई सेना सेतु पार, वानर दल अपार।
दानवों पे किए वार, लंका में मची है रार।

बड़े बड़े हथियार, तीर भाला तलवार।
पत्थर फेंके हजार, दुष्टों का हुआ संहार।

रावण का अहंकार, हर लाया सीता नार।
रामजी ने दिया मार, बताया जीवन सार।

लंका का शासन भार, विभीषण है तैयार।
दशहरे का त्यौहार, रामजी की जयकार।

🌼🌺🌸🌼🌺🌸🌼🌺🌸
रुप घनाक्षरी

 पुष्पक विमान चढ़, पहुँचे अयोध्या गढ़
नगर में दीप जलें, गली गली बाजे ढो़ल।

आकुल हैं जन जन, राम की लगी लगन
राह निहारे सब, नैनों के किवाड़ खोल। 

खुश हुईं महतारी, तिलक की है तैयारी
नैनन से आँसू गिरें, बिके सब बिना मोल।

राम दरबार  साजे, ढ़ोल ताशे खूब बाजे
राम के चरण दाबे, जय हनुमान बोल।

🌸🌺🌼🌸🌺🌼🌸🌺🌼

गुरुवार, 8 अप्रैल 2021

फाग गीत २७/३/२०२१

"कान्हा संग होरी"

खेलो खेलो रे कन्हाई आज, जी भर कर होरी।
मन बसे मेरो फागुन रास, मैं ब्रज की छोरी।।

प्रेमरंग की भर पिचकारी, तोसे खेलन आई।
इत-उत ढुँढू तोहे कन्हाई, ढूँढ नहीं मैं पाई।।

कैसै जाऊंगी लौट कर आज, कोरी की कोरी।
खेलो खेलो रे कन्हाई आज, जी भर कर होरी।।

अबीर गुलाल से भरी हथेली, भाव नेह भर लाई।
मनमंदिर में बसने वारे, ढूंढे मिला ना कन्हाई।

रंगभरी मेरी सुन ले पुकार, नाजुक मैं गोरी।
खेलो खेलो रे कन्हाई आज, जी भर कर होरी।।

श्यामवर्ण पीतांबर सोहे, गले बैजयंती माला।
मुरली मधुर बजावर वारे, रूप तेरा निराला।

धुन ऐसी बजाना आज, मन कर ले चोरी।
खेलो खेलो रे कन्हाई आज, जी भर कर होरी।।


खोजत खोजत थक गई मोहन, मिला ना तू हरजाई।
नैन बंद कर नाम पुकारुँ, हृदय में मूरत पाई।।

खुल गए अब बंद कपाट, श्यामा भई गोरी।
खेलो खेलो रे कन्हाई आज, जी भर कर होरी।।

आँखें खोलूं अब मैं माधव, तू ही तू मुस्काए।
जमुना किनारे, गली चौबारे, ठौर ठौर दिख जाए।।

अँसुवन की बहती धार, अद्भुत ये होरी।
खेलो खेलो रे कन्हाई आज, जी भर कर होरी।‌।

अपने रंग रंगाना कान्हा, बहुत दूर से आई।
जन्मों की प्यासी, तेरी दासी, आस तुम्हीं ने जगाई।

मेरी नैया लगाना पार, अस्तुति कर जोरी।
खेलो खेलो रे कन्हाई आज, जी भर कर होरी‌।।
मन बसे मेरो फागुन रास, मैं ब्रज की छोरी।।

शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)

फागुन गीत २७/३/२०२१

"द्वार फागुन आ गया"

है बिदाई अब बसंत की, कलियों का मन मुरझा गया।
खोल पलकें देखतीं वो, द्वार फागुन आ गया।।

बन संवर के मौज में, अपनी चला आता है वो,
गीत बन भ्रमरों के मुख, गुंजार भर लाता है जो।
कलियों की अठखेलियों पर, चुपके से मुस्काने लगा,
फिर फागुनी बयार बन, हौले से सहलाने लगा।

अधखिले फूलों को जब, भ्रमरों का गुंजन भा गया।
खोल पलकें देखते वो, द्वार फागुन आ गया।।


आगमन से उसके हर्षित, झूमती गाती धरा,
खिलते टेसूओं ने उसका, अंक रंगों से भरा।
त्याग काया जीर्ण-शीर्ण, नव किसलय से दमकते,
बूढ़े बरगद और पीपल,बन युवान हैं चमकते।

रुप यौवन से भरा, मदमस्त मौसम छा गया।
खोल पलकें देखते वो, द्वार फागुन आ गया।।


ना कंपकंपी है शीत की, ना आग सा मौसम अभी,
कोयलों की कूक पर, मनमुग्ध हो जाते सभी।
बौरों का सेहरा बाँध, आमकुंज अब लजाने लगे,
ढ़ोल थाप, नगाड़ों की धुन पर, पाँव थिरकाने लगे।


स्वर्ण बालियों का चमकना, सूरज को भरमा गया।
खोल पलकें देखता वो, द्वार फागुन आ गया।।

हृदय को आसक्त करती, झांकती चलती बयार
मत्त महुआ और तेंदु, हो गई उन पर सवार।
हैं हुलसते, सरसराते, चटक दिखते अब पलाश
फागुन की अगवाई में, साथी की करते हैं तलाश।

मस्त पवन का एक झोंका, सांसों को महका गया।
खोल पलकें देखता वो, द्वार फागुन आ गया।।


बाट जोहती साल भर मैं, ओ मेरे प्यारे सजन
हूँ कली मैं आज जो, छू लो तो खिल जाए चमन।
बांकी चितवन से निरखती, हुई कुसुमित सलज्ज धरा
कूचिका से प्रेम रंग फिर, सजन स्वागत में भरा।

मनमौजी सजन सखी, चूनर उसकी सरका गया।
खोल पलकें देखती वो, द्वार फागुन आ गया।।

होली की दहकी अगन, बसंत का ठिठक कर देखना
विरहिन कोयल का नित उठ, आकुल होकर कूकना।
यत्र तत्र सर्वत्र, हृदय बरबस मुस्काने लगे
प्रकृति का प्रेमल फाग गीत, कण कण गुनगुनाने लगे।

घुलती भांग का नशा, जनमानस पर छा गया।
खोल पलकें देखते वो, द्वार फागुन आ गया।।
द्वार फागुन आ गया।।


शर्मिला चौहान

फाग गीत २७/३/२०२१

"कान्हा संग होरी"

खेलो खेलो रे कन्हाई आज, जी भर कर होरी।
मन बसे मेरो फागुन रास, मैं ब्रज की छोरी।।

प्रेमरंग की भर पिचकारी, तोसे खेलन आई।
इत-उत ढुँढू तोहे कन्हाई, ढूँढ नहीं मैं पाई।।

कैसै जाऊंगी लौट कर आज, कोरी की कोरी।
खेलो खेलो रे कन्हाई आज, जी भर कर होरी।।

अबीर गुलाल से भरी हथेली, भाव नेह भर लाई।
मनमंदिर में बसने वारे, ढूंढे मिला ना कन्हाई।

रंगभरी मेरी सुन ले पुकार, नाजुक मैं गोरी।
खेलो खेलो रे कन्हाई आज, जी भर कर होरी।।

श्यामवर्ण पीतांबर सोहे, गले बैजयंती माला।
मुरली मधुर बजावर वारे, रूप तेरा निराला।

धुन ऐसी बजाना आज, मन कर ले चोरी।
खेलो खेलो रे कन्हाई आज, जी भर कर होरी।।


खोजत खोजत थक गई मोहन, मिला ना तू हरजाई।
नैन बंद कर नाम पुकारुँ, हृदय में मूरत पाई।।

खुल गए अब बंद कपाट, श्यामा भई गोरी।
खेलो खेलो रे कन्हाई आज, जी भर कर होरी।।

आँखें खोलूं अब मैं माधव, तू ही तू मुस्काए।
जमुना किनारे, गली चौबारे, ठौर ठौर दिख जाए।।

अँसुवन की बहती धार, अद्भुत ये होरी।
खेलो खेलो रे कन्हाई आज, जी भर कर होरी।‌।

अपने रंग रंगाना कान्हा, बहुत दूर से आई।
जन्मों की प्यासी, तेरी दासी, आस तुम्हीं ने जगाई।

मेरी नैया लगाना पार, अस्तुति कर जोरी।
खेलो खेलो रे कन्हाई आज, जी भर कर होरी‌।।
मन बसे मेरो फागुन रास, मैं ब्रज की छोरी।।

शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)

नई गज़लें 1222 1222

 १२२२  १२२२
रदीफ़....है
क़ाफ़िया...आना


१) अँधेरों को हराना है
   बुझे दीपक जलाना है।

२) चमन उजड़ा हुआ दिखता
    गुलों से फिर सजाना है।

३) कठिन है राह जीवन की
    सरल इसको बनाना है।

४) निराशा से भरी दुनिया
     नई आशा जगाना है।

५) कहर है रोग कोरोना
    सभी जीवन बचाना है।

६) हवाएं तेज चलती अब
    कदम जमकर बढ़ाना है।

७) दिवाना मन हुआ मेरा
   इसे रस्ता दिखाना है।

८) मधुर लय ताल छेड़े जो
      तराने वो सुनाना है।

९) बहुत से हैं विषय ऐसे
    कलम जिनपर चलाना है।

************************

 1222  1222

रदीफ़.... पढ़ लेना
क़ाफ़िया...आर

१)  मेरे अशआर पढ़ लेना
     गज़ल दो चार पढ़ लेना।
      

२) चमकती प्रेम से आंखें
     सजन मनुहार पढ़ लेना।

३) किताबें हैं सवालों की
     अजी सरकार पढ़ लेना।

४) धड़कता दिल मेरा नाज़ुक
     उसे दिलदार पढ़ लेना।

५) लिखे जो ख़त तेरी खातिर
    सनम हर बार पढ़ लेना।
     
 ६) बदलते रंग दुनिया के
    हजारों बार पढ़ लेना।

७) शिकायत पर जमाने की
     पड़ी फटकार पढ़ लेना।

****************
 १२२२  १२२२
रदीफ़....है
क़ाफ़िया...आना


१) अँधेरों को हराना है
   बुझे दीपक जलाना है।

२) चमन उजड़ा हुआ दिखता
    गुलों से फिर सजाना है।

३) कठिन है राह जीवन की
    सरल इसको बनाना है।

४) निराशा से भरी दुनिया
     नई आशा जगाना है।

५) कहर है रोग कोरोना
    सभी जीवन बचाना है।

६) हवाएं तेज चलती अब
    कदम जमकर बढ़ाना है।

७) दिवाना मन हुआ मेरा
   इसे रस्ता दिखाना है।

८) मधुर लय ताल छेड़े जो
      तराने वो सुनाना है।

९) बहुत से हैं विषय ऐसे
    कलम जिनपर चलाना है।

**********************

 1222  1222

रदीफ़.... पढ़ लेना
क़ाफ़िया...आर

१)  मेरे अशआर पढ़ लेना
     गज़ल दो चार पढ़ लेना।
      

२) चमकती प्रेम से आंखें
      सनम इक़रार पढ़ लेना।

३) किताबें हैं सवालों की
     अजी सरकार पढ़ लेना।

४) धड़कता दिल मेरा नाज़ुक
     उसे दिलदार पढ़ लेना।

५) लिखे जो ख़त तेरी खातिर
     सजन हर बार पढ़ लेना।
     
 ६) बदलते रंग दुनिया के
     अरे फनकार पढ़ लेना।

७) शिकायत पर जमाने की
     पड़ी फटकार पढ़ लेना।

**************

1222  1222
रदीफ़.….है
क़ाफ़िया...आया


१) सिपाही लौट आया है
     तिरंगे से सजाया है।

२) हमेशा काम हो सच्चा 
    बुज़ुर्गों ने सिखाया है।

३) महक फैली हवाओं में
      गुलाबों से नहाया है।

४) मुसाफ़िर छाँव को तरसे
    तरू किसने हटाया है।

५) नज़र लग जाएगी उनको
     डिठौना भी लगाया है।

६) बहुत बेचैन रहता दिल
    मुहब्बत का सताया है।

७) बहर छोटी लगे प्यारी
     कलम इस पर चलाया है।