कर्म और ज्ञान बांहों में पलते,
भारत भूमि सुंदर समन्वय है ।
राम, कृष्ण ने मार्ग दिखाया,
'गीता' सत्यम शिवम सुंदरम है ।
बालकृष्ण ने जिद थी ठानी,
चंद्रखिलौना लेने की ।
दृष्टि दिया था सकल जगत को,
चंद्र की राह पकड़ने की।
कवियों की कल्पनाओं का 'चंद्र'
शायरों की कलम ने कहा ' चाँद' ।
बच्चों का वो सुंदर मामा ,
अब दूर नहीं उसको पाना ।
लगे रहे दिन रात 'संत'
इस राह को सुगम बनाने को ।
दौड़ पड़ा था 'चंद्रयान'
चंद्रमा को गले लगाने को ।
अथक प्रयास, गूढ़ चिंतन
जो चंद्रयान यूँ दौड़ चला ।
जल है उस सुंदर गोले में ,
ये राज भी वो खोल चला ।
देश में जितने घोटाले हुए ,
उसका एक हिस्सा भी ना लगा ।
गर्व से तिरंगा साथ लिए ,
प्रेमी से मिलने आतुर हो चला ।
अथक प्रयास विज्ञान संत का ,
कभी वृथा नहीं जाएगा ।
अगली बार ' चंद्रयान' हमारा ,
चाँद पर तिरंगा फहराएगा ।
"भारत माता की जय"
शर्मिला चौहान
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