चांद अपनी पूर्ण कलाऐं दिखाता हुआ , चांदनी में नहाई धरती को देख गर्व से इठला रहा था । शुभ्र ज्योत्स्ना का सृष्टि पर अनवरत बरसता स्नेह , मंत्रमुग्ध कर रहा था ।
फागुन महीने की पूर्णिमा, वैसे भी वसंत की मादकता समेटे , उन्मुक्तता लिए , वातावरण को बौरा देने का सामर्थ्य रखती है । प्रकृति के इस अद्भुत सौंदर्य का असर जड़ और चेतन में गोचर हो रहा था ।
गांव के चौक में , होलिका दहन की तैयारी पूरे जोश-खरोश के साथ हो रही है । ठाकुर सूरजभान का पूरा परिवार भी इस होली को यादगार बनाना चाहता है ।
इस होली में उनका बेटा कैप्टन प्रतापसिंह , एक महीने की छुट्टी पर आया है । दीपावली के समय , सिर्फ दो दिनों में ही वापस लौट गया था क्योंकि छुट्टियां रद्द कर दी गई थी । यही कारण है कि इस बार पूरे एक महीने के लिए वह घर आया है ।
" अरे..भई मैं तो चला होलिका दहन की तैयारी करने । आप सब आना आराम से । दो साल हो गए गांव की होली देखे । नहीं तो बस्स... अपने फौजी साथियों के साथ ही थोड़ी-बहुत होली हो जाती थी । " बरामदे में आते हुए प्रताप ने सबको आवाज लगाई ।
" हां-हां , बेटवा जाओ । तुम्हारे बिना तो फगुआ का कौनों मजा ही ना रहा । फाग तो सभै गा लेत रहे , मुई ढोलक कौनों ना बजा पाएं । जाओ तुम , हम सब पीछे पहुंचत हैं । चाहो तो अपने बाबू को लै जाओ संगे । " अम्मां ने प्रताप के पीठ पर हाथ रख कर कहा ।
" अरे..जाए दो प्रताप का । हम का करब बच्चन के बीच । हम तो अपनी बहुरानी के साथ चलब । हमारी कैप्टन तो हमरी बहुरिया ही है । एक महीने बाद ऐ तो चले जाएंगे , हमारी बहु हमारी साथिन है भाई । " ठहाका मारकर ठाकुर साहब ने शोभा की ओर गर्व से देखा ।
शोभा का दिल अपने ससुर की जिंदादिली और गांव में उनके रूतबे का कायल था । व्हील चेयर पर बैठे उस व्यक्ति को देखकर वह गर्व का अनुभव करती थी जिसने देश की खातिर , स्वयं के दोनों पैर गंवाकर भी दुश्मन को जिंदा ना जाने दिया।
" ठीक है, तो फील्ड मार्शल शोभाजी , आप अम्मां - बाबू के साथ समय पर पधार जाना । और हां.. पूजा की कोई सामग्री भूलना मत , वरना इस कैप्टन को ही वापस भेजा जाएगा ।" शरारत से प्रताप ने कहा और अपनी भूलने की आदत पर व्यंग्य सुनकर शोभा उसको घूरने लगी ।
तभी बाहर से टोली की आवाज आने लगी _ " प्रताप , आओ चलें । एक घंटा रंग जमाते हैं यार । आज तो फगुआ पर तुम्हारी ढोल का मजा आएगा । " सुनकर लगभग दौड़ता हुआ प्रताप हाथ हिलाकर बाहर निकल गया ।
अनायास ही शोभा ने हाथ हिलाकर उसको विदा किया और फिर उसी की सोच में जकड़ गई ।
उसका पति , छह फीट ऊंचा , कसा शरीर , सांवले रंग का बेहद जिंदादिल और खुशमिजाज इंसान है । एक ही नजर में किसी का भी मन मोह लेता है ।
चार साल पहले जब शोभा को देखने आए थे तो बिना किसी प्रश्र के , दोनों परिवारों के बीच रिश्ता जम गया था । शोभा , दिखने में बहुत ही सुन्दर और एक मध्यम वर्ग के परिवार की दूसरी नंबर की बेटी थी । विज्ञान में स्नातक होने के बाद ही यह रिश्ता आया और बात तय हो गई ।
वैसे दोनों परिवारों में जमीन आसमान का अंतर है ।
एक साधारण सोच के साथ , दो बेटियों को पढ़ा लिखाकर , अच्छे घरों में विवाह करने के लिए प्रयत्नशील परिवार । पिताजी बैंक में लिपिक के पद पर कार्यरत थे और दो वर्ष पूर्व ही दीदी का विवाह किया था ।
दूसरी ओर यह परिवार , जिनके रग-रग में वीरता और देशप्रेम मानो उबाल ले रहा था । बाबू रिटायर्ड सूबेदार मेजर और प्रताप तभी कैप्टन हुए थे । अम्मां , मानो धरती का कर्ज अदा कर चुकी थी।
बातों ही बातों में बाबू ने शोभा के परिवार वालों को बताया _ " आपका और हमारा परिवार एक सा है । आपके घर दो बेटियां और हमारे दो बेटे । " खुशी से भरी आवाज थी उनकी ।
" आपका दूसरा बेटा कहां है ठाकुर साहब ? उसे साथ नहीं लाए ? " लड़की के पिता का स्वाभाविक प्रश्न था ।
" समधी साहब , वह पहला बेटा था । प्रताप दूसरा बेटा है हमारा ।" ठहाका मारकर आगे कहने लगे _ " बड़ा बेटा , आजाद सिंह था । राजस्थान सीमा पर घुसपैठियों से मुठभेड़ जारी थी । कर्नल साहब ने बताया कि मेरा आजाद आठ-दस पर अकेले भारी था । दुश्मन की एक गोली पर उसका नाम लिखा था । भारत माता के ऋण से मुक्त हो गया ।" आंखों में नमी पर आवाज में गुरूर था बाबू के ।
एक क्षण के लिए मानो सन्नाटा पसर गया । शोभा तो ठगी सी , मूर्तिवत उस व्यक्ति को देख रही थी जो खुद व्हील चेयर पर थे और अपने जवान बेटे की शहादत का गौरव गान कर रहे थे ।
अम्मां , उस क्षण थोड़ी व्याकुल हो गई और प्रताप ने अपना हाथ उनके हाथ पर रख दिया ।
एक सामान्य असैनिक परिवार के लिए तो मानो शांत रिहायशी इलाके में बम विस्फोट हो गया ।
कैसा परिवार है यह ? कैसे लोग हैं जो भारत माता के कर्ज को चुकाने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं ? इतना खो चुके फिर भी कोई शिकायत, कोई आलोचना कोई परेशानी नहीं दिखाते ।
शोभा की मां ने तो डरकर शादी नहीं करने की बात कह दी ।
प्रताप के व्यक्तित्व का जादू , परिवार का निश्छल प्रेम शोभा के मन में बस गया । वह समझ गई थी कि पति के रूप में एक आकर्षक , प्रतिभावान और देशभक्त नवयुवक को पाना उसका सौभाग्य होगा ।
" शोभा बेटी , प्रताप के साथ पहली होली मनाने का मौका मिला है । सज-धज कर चलो , बेटा फाग गाएगा तो हमारी बहू राधा से कम है क्या ?" अम्मां ने पास आकर जैसे शोभा को झकझोर दिया ।
" ओह...! अभी तैयार होती हूं । " कहते हुए शोभा कमरे में भाग गई और अम्मां -बाबू हंस पड़े ।
शोभा ने अपनी शादी की लाल बनारसी साड़ी पहनी , गहनों से लदी, अपने को शीशे में निहारने लगी । गोरा रंग , माथे पर चटक लाल बिंदी , भर मांग सिन्दूर , ढ़ीली गूंथी चोटी और उस पर मोगरे की लड़ियां ।
मोगरे के फूलों की महक , जी भर श्वास से पी लेना चाहती है वह ।
शाम को चुपके से प्रताप ने हाथ में थमाते हुए कहा था_ " मेरी सुंदर परी के लिए होली का खूबसूरत तोहफा ।" शरमा कर शोभा ने हाथ में लेते हुए बनावटी गुस्से से कहा _ " फौजी आखिर फौजी ठहरे । लाए भी तो सिर्फ फूल।"
" पूरी दुनिया में इनसे कोमल , सुंदर , मासूम और क्या हो सकता है ? तुम कहो तो दो चार दुश्मनों का सिर काट कर तुम्हारे सामने रख दूं ? " खिलखिलाता हुआ प्रताप उसके सामने से ओझल ही नहीं होता ।
बाबू की व्हील चेयर की चरमराती आवाज से शोभा संभल गई । बरामदे में आई तो अम्मां ने पूजा की थाली सजा ली थी ।
नारियल , बताशे का हार , अबीर-गुलाल और उपलों की माला , सब रख लिया था ।
शोभा जब थाली की सामग्री देख रही थी तब ठकुराइन अपनी बहू की भोली सुंदरता का रसपान कर रही थी । कानों के नग जडे झुमके , जो उन्होंने अपनी इस प्यारी बेटी को शादी में चढ़ाए थे , एक समय पूरी ठाकुर टोली की औरतों में चर्चा का विषय रहता था । आज भी उसकी चमक बरकरार है, नक्काशी के एक एक तार सजीव जान पड़ते हैं ।
नगों की चमक में ठकुराइन ने ठाकुर साहब की ओर निहारा और उन्हें अपनी ही तरफ ताकते देख संकोच से भर गई ।बहू के बालों में महकते गजरों को देख वृद्ध माता-पिता सुख और तृप्ति से उसे ही देखते रहे ।
" अम्मां , अब चलें क्या ? " अपनी ओर सास - ससुर को टकटकी लगाए देख कर शोभा असहज होती हुई अपने बालों को पल्ले से ढांकने लगी।
" हां-हां , चलो चलें । फूलों को मत ढांकों बहू । सुंदर दिखते हैं , खुला ही रहने दो ।" अम्मां ने प्रेम से कहा ।
अम्मां हमेशा ही शोभा से शुद्ध हिंदी में बोलने का असफल प्रयास करतीं थीं ।
घर से निकलते ही कई लोग मिल गए जो बाबू की व्हील चेयर लेने के लिए आगे आ गए । सब लड़कियां , बहुएं आपस में हंसी ठिठोली करते , एक-दूसरे को रंग में सराबोर करने की योजना बनाते चल रहीं थीं ।
" कैसे जाऊं सखी री , होरी खेलत हैं कन्हाई ।
होरी खेलत हैं कन्हाई , होरी खेलत हैं कन्हाई .....। " फाग गीत के शब्दों की स्पष्टता बढ़ती जा रही थी और लय के साथ मिलती ढोलक की थापों का नशा पूरे गांव को होलिका के पास खींच कर ला रहा था ।
दूर से ही शोभा ने देखा , प्रताप रमकर ढोलक बजा रहा है । बीच-बीच में गीत का मुखड़ा दोहराता जाता है ।
चंद्रमा अपनी चांदनी बिखेर रहा है , शुभ्रता के आवरण में लिपटी प्रकृति होली के दिन रंगीन हो जाने को बेताब नजर आ रही थी ।
ढोलक बजाते हुए प्रताप ने ऊपर नजर उठाई और सामने लाल बनारसी साड़ी में लिपटी , मोगरे के फूलों से बाल सजाए शोभा को देखा , तो बस.. देखता ही रह गया।
निगाहें मिलीं और चेतन जग जड़ हो गया । जो बातें जुबान से भी ना कही जा सकती थी वो चांदनी से पिघलकर दिलों से बहने लगी ।
फागुन की पूर्णिमा , फगुआ के बोल , होली का उन्माद और हृदय से बहता असीम स्नेह प्रवाह।
प्रताप के हाथ रूक गए । उसे यूँ टकटकी लगाए देखकर , युवकों की टोली ने गाना शुरू किया _
" राधा बन गई भौजी हमार , कान्हा हैं भैया फौजदार ।
छुट्टी मिल गई है इस बार ,
फगुआ मनेगा जी भर यार ।
प्रताप चौंककर फिर मुस्कुराने लगा । बाबू भी सबके साथ ताल में ताल मिला कर गा रहे थे ।
चार दिन पहले यही बाबू , पत्ते के खड़कने से भी अपनी व्हील चेयर लिए सामने जाते थे कि कहीं प्रताप तो नहीं आ गया ।
जीवन भर सेना में रहने वाला सख्त , अनुशासन प्रिय , देशभक्त व्यक्तित्व , कहीं ना कहीं पितृत्व में दब गया था ।
रात खाना खाते समय अम्मां ने घोषणा कर दी _ " शोभा बिटिया ने यह जिम्मा हमरे कांधे सौंपा है कि यह बताया जाय कि अबकी दिवाली हम चार नाही , पांच लोग मनाइब । प्रताप बेटवा , ये बार दिवाली में सप्ताह -पंद्रह दिन की मंजूरी डालना । "
अम्मां के ऐलान करते ही मानो गोले दग गए _ " तुमने मुझे बिल्कुल अनजान रखा । हेडक्वार्टर से आए आदेश की तरह अम्मां ने संदेश दिया ..।" कहते हुए प्रताप ने लड्डू शोभा के मुंह में ठूंस दिया ।
दिन क्षणों में बीतने लगे । मोटरसाइकिल पर दोनों रोज घूमने जाते थे ।
" शोभा जरा आराम से , प्रताप अपनी गाड़ी तनिक धीरे चलाना ।" अम्मां सावधान करती ।
" प्रताप की अम्मां , नाहक चिंता ना किया करो । सूबेदार का पोता , फौजी बाप का बच्चा इतनी कच्ची मिट्टी का नहीं बना है। जाओ बच्चों , घूमो-फिरो ।" बाबू ने मूंछों पर ताव देते हुए कहा और अम्मां मुस्कुरा पड़ी ।
प्रताप के जाने के एक दिन पहले ही शोभा ने अपने मन की बात कही _ " प्रताप , हम अपने बेटे को इंजीनियर या डाक्टर बनाएंगे। यहां आसपास कोई अच्छा डाक्टर नहीं है, शहर जाना पड़ता है । जरूरी है क्या कि वह भी फौज में जाए ।" शोभा की आंखों में छिपा डर प्रताप ने पढ़ लिया।
" अरे.. अभी से ये सब मत सोचो । बेटी भी हो सकती है । तुम पढ़ी लिखी लड़की हो , स्वस्थ बच्चे के विषय में ही सोचना चाहिए । वो क्या करेगा , कैसे करेगा..,सब बाद की बात है ।" समझाते हुए प्रताप ने कहा ।
प्रताप को लखनऊ तक दोस्तों ने पहुंचाया । जाते समय भी प्रताप सबकी नजर बचाकर शोभा को आश्वस्त कर रहा था कि बच्चा दोनों का है और मां का अधिकार ज्यादा होता है ।
करीब सप्ताह घर में सन्नाटा रहा । प्रताप की चिट्ठियों से समाचार मिलते रहे । ठाकुर साहब के घर फोन भी था परन्तु ज्यादातर समय वह खराब ही रहता था । अभी भी संचार व्यवस्था उतनी सुधर नहीं पाई थी ।
अम्मां बाबू तो पोते के सुंदर स्वप्न में खोए रहते । बीच में शोभा एक महीने के लिए मायके भी गई ।
शोभा की मां , उसकी पसंद का खाना बनाती , पिताजी भी पूरे समय ध्यान रखते थे । पता नहीं क्यों , पर शोभा का मन अपने उस घर के आंगन में अटका रहता जहां वृद्ध बाबू व्हील चेयर पर और अम्मां चारपाई पर बैठे एक एक पल काट रहे थे ।
" मां , पन्द्रह दिन हो गए । अब मुझे वापस घर जाना चाहिए । फोन भी लगता नहीं है पता नहीं अम्मां बाबू कैसे होंगे ? " दबी आवाज में जब कहा तो पिताजी हैरान रह गए पर मां ने इशारों में उनको दुनियादारी समझा दी ।
पिताजी खुद छोड़ने आए और अचानक समय से पहले बहू को सामने पाकर अम्मां निहाल हो गई। भूसी से सने हाथों से उसे छाती से लगा लिया ।
दरवाजे पर खड़ा पीपल भी झूम उठा ।
कैसा रिश्ता है अनोखा , दिमाग की सोच से परे । बुरे लोग , बुरी ससुराल , क्रूर सास , दहेज के लिए प्रताड़ना ,क्या ये सिर्फ कहानियों और सिनेमा की कथावस्तु होती है ? "
आनन-फानन में ही अम्मां ने मोहल्ले भर को बता दिया कि बहू आ गई ।हम बूढ़ों को छोड़ कर रह ना सकी ।
अम्मां अपनी तैयारियों में जुटी रहती । गोबर के उपले सुखाकर ऊपर रखवा दिया ताकि बारिश में ना भींगे । जच्चा-बच्चा के मालिश सेंक के लिए दाईं तय कर ली ।
कल ही नरम मुलायम कपड़ों की गुदड़ी सिलना शुरू कर दिया है ।
प्रताप का फोन कभी कभार ही आता था पर चिट्ठी हर सप्ताह पहुंचती थी ।
एक कठोर सैनिक के दिल की सहजता , स्याही की तरलता बनकर कागज पर उतर जाती थी।
प्रताप ने लिखा था कि उत्तर भारत में आजकल घुसपैठ और आतंकियों का जोर बढ़ गया है और इस कारण पूरी इकाई सावधान रहती है । कभी भी , बिना कोई पूर्व सूचना के कहीं भी ड्यूटी का आदेश आ जाता है ।
चप्पे-चप्पे में इकाई के लोग फैल जाते हैं । कभी कभी तो एक स्थान से वापस लौटते ही , दूसरे जगह का आदेश दे दिया जाता है।
करीब महीने भर से प्रताप का ना फोन आया और ना ही कोई चिट्ठी। शोभा की निगाहें डाकिए पर टिक जाती थी ।अम्मां बाबू भी सोच में पड़ गए थे ।
बाबू ने पड़ोस के मनोज भैया को साथ लिया और तारघर जाकर सेना प्रमुखालय से संपर्क करने की कोशिश की । वहां के अधिकारियों ने बताया कि एक महीने से कश्मीर के अनंतनाग में प्रताप की ड्यूटी है और वहां से किसी भी प्रकार का संदेश देने की सुविधा नहीं है । सब कुशल है और टीम दो-तीन दिन में वापस आ जाएगी ।
इधर डाक्टर ने शोभा को पंद्रह-बीस दिनों का समय बताया था । अम्मां बाबू के कहने पर शोभा की मां भी आ गई ।
कमरे में टहलती हुई शोभा फोन की घंटी सुनकर चौंक गई ।
" अरे.... आज तो फोन ठीक हो गया है लगता " मन ही मन सोचते हुए शोभा ने फोन उठाया _ " हैलो...।" कुछ भारी और हांफती हुई आवाज में कहा ।
" वाह वाह शोभाजी , महीने भर दुश्मनों से लोहा मैंने लिया और हांफ आप रही हो ..भई कमाल करती हो । " इतने दिनों बाद प्रताप की आवाज सुनकर शोभा की आंखों से अविरल धारा बहने लगी ।
" एक महीने से ना फोन ना चिट्ठी । कुछ खबर पता ही नहीं रहता । सिर्फ हंसी मजाक सूझता है तुम्हें ।" शोभा सिसकने लगी ।
" रोओ मत प्लीज़ । मेरी ड्यूटी ही ऐसी थी कि कहां जाना है , कुछ भी पता नहीं था । अब नियमित फोन और चिट्ठी आएगी । पक्का...।" शोभा ने बाजू में खड़ी अम्मां को फोन दे दिया ।
आज घर का माहौल सामान्य हो गया । बाबू भी "आल्हा " की लाइनें गुनगुना रहे थे _
" खट-खट , खट-खट तेगा बाजे ,
छपक-छपक चली तलवार ।
खूब लडैया हैं दो भाई
नाम कमाए महोबे क्यार ।"
प्रताप ने बताया कि उसे दिपावली में शायद एक महीने की छुट्टी मिल सकती है क्योंकि अभी की हुई ड्यूटी को ध्यान रखते हुए ऐसा हो सकता है ।
अगले सप्ताह की चिट्ठी में प्रताप ने अपना हालचाल बताया और शोभा के बारे में जानकारी ली ।
पंद्रह दिन पूरे हुए और अगली रात को शोभा को तकलीफ होने लगी । रात दस बजे शहर ले जाया गया ।
आश्विन मास की शुरुआत हो गई थी । हलकी गुलाबी ठंड पड़ने लगी थी । सुबह पांच बजे नन्हे-मुन्ने , गोल-मटोल ,गोरे प्यारे से स्वस्थ बच्चे ने दुनिया में कदम रखा । शोभा ने उसे भर आंख निहारा और फिर आंखें मींच ली ।
अम्मां ने घर पर खबर करवा दी थी तो पिताजी मिठाई लेकर आए और मिठाई बांटते हुए कहा _ " समधी जी बहुत ही खुश हैं । असली घी के लड्डू ले जाने का हुक्म दिया है ।"
प्रताप के मुख्यालय में खबर दे दी थी और अगले ही घंटे उसने अस्पताल में फोन किया और सब हालचाल पूछकर ही संतुष्ट हुआ ।
अम्मां बता रही थी कि _ " अब दौड़ा दौड़ा आएगा , बेटवा हुआ है । मुंह देखने के लिए भागा आएगा । तुम घर जाकर बात कर लेना बेटी ।" शोभा ने सिर हिला दिया ।
तीन दिन बाद जब घर गए तब बाबू दरवाजे पर व्हील चेयर पर स्वागत के लिए तैयार थे । आज पहली बार उसने बाबू को वर्दी में देखा था । बच्चे को " जय हिन्द " का नारा लगाकर गोद में ले लिया।
सप्ताह बीत गया पर प्रताप की चिट्ठी , फोन का पता नहीं था ।
बच्चे के काम काज में अम्मां और मां , पूरी तरह से व्यस्त हो गई । जब पालने में वो रोता तो बाबू बड़ी आवाज में सैनिक कारनामे सुनाते या देशभक्ति के गीत गाने लगते ।
" दादा बनकर तो तुम सठिया ही गए हो परताप के बाबू । दस-बारह दिन का बच्चा क्या समझ रहा है ।" अम्मां खिसिया जाती ।
" अरी भागवान .., पूत के पांव तो पालने में ही दिखाई देते हैं । जिसका दादा , ताऊ , बाप फौजी , उसको देशप्रेम सीखने में क्या बरसों लगेंगे ? " गर्व से चेहरा चमक रहा था ।
फिर प्रताप का समाचार मिला की वह धनतेरस के दिन पहुंच जाएगा और तभी बारसा कर लिया जाएगा ।
बारसा की तैयारी और शुभ समय देखने के लिए चौबे जी महाराज पंचांग लेकर पहुंचे । बोले _ " बालक की जन्मपत्रिका भी बन जाएगी । अरे.... जिसका दादा फौलाद है उसके पोते की कुंडली में क्या मुसीबत आएगी ? " और चौबे जी ने अपने हिस्से के लड्डू साफ कर दिए ।
धनतेरस के दिन सुबह पूजा कथा और शाम को नाश्ता का प्रावधान रखा था । प्रताप सुबह आने वाले थे और शाम को जल्दी कार्यक्रम खत्म करने का प्रयास किया जाएगा जिससे लोग अपने घर में धनतेरस की पूजा कर सकें ।
शोभा के मन में लड्डू फूट रहे थे।होली की हुड़दंग और रंग वह भूली नहीं थी । अब दीवाली पर भी वैसी ही चहल-पहल रहेगी ।
शोभा को शादी के बाद की पहली दीवाली अच्छे से याद है । प्रताप को पता है कि वह पटाखों से बहुत डरती है इसलिए वह आंगन में पटाखे लगाकर उसका हाथ पकड़ कर सामने ले जाता ।
" प्रताप , मुझे पटाखों से डर लगता है। उनकी आवाज से धड़कन बढ़ जाती है । मुझे नहीं जाना है बाहर.. ।" कहते हुए वह हाथ झटक कर बरामदे में भाग आई ।
" वाह ! क्या बात है ? इनको पटाखों की आवाज से डर लगता है और वहां सेना में लड़कियों की बटालियन है , वायुसेना के विमान उड़ाती है लड़कियां । युद्ध श्रेत्र में रसद ले जाना , घायलों के इलाज की व्यवस्था , सारी जिम्मेदारी औरतें संभालती हैं । " एक लंबी सांस लेकर उसने आगे कहा _ "मुझे मालूम है कि तुम बड़ी हिम्मती हो । एक सामान्य परिवेश में बढ़ी लड़की ने , सबके विरोध के बावजूद एक फौजी से विवाह के लिए हामी दी । यह कोई साधारण बात नहीं है ।" गर्व और प्रेम से प्रताप ने स्वीकारा ।
" पर चाहे तुम जो भी कहो मैं पटाखे नहीं फोड़ सकती ।" कहकर वह घर के अंदर भाग गई थी ।
काफी रात हो चुकी थी और कल की सारी तैयारियां भी करीब हो गई थी । हलवाई अपना सामान रखवा गए थे।घर रंग-रोगन से चमचमा रहा था मानो पूरे देश की दीवाली इसी घर में आई है ।
बाबू व्हील चेयर पर घूम घूमकर मुआयना कर रहे थे कि सब बढ़िया तो है । आंगन में बिजली का बड़ा सा लट्टू लगवा दिया था जिसकी सुनहली रोशनी बिखर रही थी ।
अम्मां ने बाबू को शाल उढा़ते हए कहा _ " परताप के बाबू , अब सो जाओ । सुबह जब पूजा का विधान होई , हलवाईयन का काम होई ,तब तुम्हीं का सब बाहर का काम देखे लागी । " व्हील चेयर अंदर की ओर घुमाते हुए अम्मां बोल रही थी _ " फूल , तोरण वाले भी भिनसार आ जाएंगे । बच्चे का झूला , दरवाजा सब सजाए का कहत रही शोभा ।"
अम्मां की कल की डायरी चालू ही थी कि फोन की घंटी घनघना गई।
बाबू ने तेजी से फोन की ओर चेयर का रूख किया और मन ही मन बड़बड़ करने लगे _ " ना जाने, अभी किसका क्या काम अटका है ? सबका हिसाब किताब तो तय हो गया है ।"
बाबू ने फोन उठाकर कहा _ " हैलो..। कौन बोल रहें हैं ? " फिर दूसरे ओर से कुछ बात हुई ।
बाबू ने कहा _ " हाँ , मैं उसका पिता रिटायर्ड सूबेदार मेजर सूरजभान सिंह बोल रहा हूं ।"
दूसरे ओर से कुछ बात हुई और बाबू के हाथ से फोन छूट गया .." हैलो.... मेजर साहब.. हैलो ..." आवाज फोन से गूंज रही थी ।
शाल शरीर से गिर गई और उससे भी तेजी से आंखों से सैलाब बहने लगा ।
अम्मां की ओर निरीह भाव से देखने लगे फिर दोनों हाथ जोड़कर फफक-फफक कर रो पड़े ।
अम्मां ने कुर्सी का सहारा लिया। सारा आंगन , घर और दुनिया घूमने लगी । फोन को ऐसे दूर फेंक दिया जैसे बम हो और इस भरी बस्ती को आग लगा दी हो ।
दोनों हाथ जोड़कर बहू के सामने अपराध बोध से ग्रस्त खड़े थे ।
इस नन्हीं सी जान को क्या कहेंगे ? क्यों भेजा था बाप को फौज में ? उसने तो अपने पिता को देखा भी नहीं ।
शोभा मूर्तिवत, यंत्रवत बैठी रही । दिमाग की नसें फट रही थी । अंदर सब कुछ बिखर रहा था । आंखों से आंसू नहीं आ रहे थे वो भी मस्तिष्क के आदेश का इंतजार कर रहे थे ।
आंगन में लगा लट्टू , हवा से हिल हिल कर कई छोटे बड़े काले घेरे बना रहा था और यह पूरा परिवार उसके काली परछाइयों में घिर गया था ।
सारे गांव में यह खबर जंगल के आग की तरह फैल गई । लोगों का तांता लगना शुरू हो गया ।
सुबह ग्यारह बजे वे प्रताप को लाने वाले थे ।
लोगों ने सजावट निकालना शुरू किया तो बाबू ने हाथ के इशारे से मना कर दिया ।
कुछ रिश्तेदार भी आसपास से आ गए जो बारसे के लिए आने वाले थे ।
बाबू अपने जांबाज बेटे " शहीद कैप्टन प्रतापसिंह "के सम्मान में वर्दी पहने दरवाजे पर थे ।
कश्मीर घाटी के दंगाग्रस्त क्षेत्र में नियंत्रण टीम में प्रताप गया था।
स्थानीय निवासियों को सुरक्षित रखने के लिए मुठभेड़ में प्रताप को गोली लगी थी ।
पूरे शासकीय सम्मान के साथ , तिरंगे में लिपटा प्रताप घर आ गया। उसकी वर्दी , उसकी घड़ी और सामान बाबू को दिया गया । बाबू ने उसे शोभा के हाथों में पकड़ा दिया और हाथ जोड़कर माफी की मुद्रा में फफक पड़े ।
इस परिवार ने दो जवान बेटे देश की खातिर न्यौछावर कर दिया थे। अब वो कंगाल हो गए थे । उनका गर्व , उनका राष्ट्र प्रेम , आज उन्हें तोड़कर रख दिया था ।
प्रताप को अंतिम विदाई देने और उसके बेटे से मिलवाने की जिम्मेदारी शोभा ने उठाई । वह कमरे में गई और जब बाहर आई तो शरीर पर प्रताप की वही वरदी थी जो उसे शहीद का मान दिलाई थी ।
गोद में बच्चे को लेकर चलती हुई आई । प्रताप के पास ले जाकर बोली _ " आज इसका नामकरण है । तुम्हारी पसंद का नाम " कीर्ति प्रताप सिंह " ही रखना है ।
उसने सैल्यूट किया और बच्चे को अम्मां के गोद में डाल दिया ।
आज उसने पहली बार सही हिसाब किया है । इस घर ने दो फौजी बेटे खो दिए हैं । आज शोभा ने अपने मनोबल से परिवार को और देश को फिर से दो फौजी देने का संकल्प कर लिया ।
दृढ़ संकल्प से तो बड़ी से बड़ी दुविधा की बेड़ियां कट जाती है ।
अब ना तो कोई डर , ना कोई चिंता और ना ही कोई मुश्किल है उसके सामने । क्षितिज तक सारा कुछ साफ नजर आ रहा है ।
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