चश्में पर आए धुँधलके को , साड़ी के नरम पल्लू से साफ करते हुए मनोरमा सोचने लगी _" ये धुंधली नज़र का कमाल है कि सारे एक समान दिखते हैं । जब दृष्टिकोण वाला चश्मा चढ़ा लो , सब में अंतर दिखाई देता है । अभी तो समाचार पत्र के अक्षर भी लीपा-पोती से लग रहें हैं । काश..! ऐसा सबकी नजरों में हो जाए तो सारी दुनिया एक समान लगने लगे , ना कोई झगड़ा ना कोई टंटा ।" साफ की हुई ऐनक को नाक पर सवार कराते ही मनोरमा अपनी बेतुकी सोच पर मुस्करा पड़ी क्योंकि अब समाचार के हर एक चित्र और शब्दों की विविधता उसको अपनी ओर खींच रही है ।
वही खबरें , जिनसे मन विरक्त हो गया है । बस ने बच्चों को कुचला , युवती के साथ सामूहिक बलात्कार किया , बूढ़े दंपति की दिनदहाड़े हत्या और ना जाने क्या क्या...?
अखबार से आंखें हटाकर सामने मैदान में देखने लगी । कुछ प्राणायाम करते लोग , कुछ चलते- दौड़ते लोग और कुछ गप्पें लगाते हुए दिख रहें हैं ।
विनोद को घर आते देख उसने रवि को आवाज दी _" रवि , साहब आ रहें हैं तुम चाय ले आओ ।"
" लगता है आज अखबार पूरा चाट गई हो । क्या समाचार हैं ? " विनोद ,जो नाम के अनुरूप विनोदी स्वभाव के हैं , प्रश्न किया ।
" जैसे मैं समाचार बता दूंगी तो तुम अखबार पकड़ोगे ही नहीं ।" मनोरमा ने अपने अखबार प्रेमी पति पर व्यंग्य किया ।
आदतन विनोद ठठाकर हंसने लगे _" भई , हमारी बीबी हमारी नब्ज जानती है ।"
रवि ने चाय बिस्किट छोटे टेबल पर रख दिया ।
" और रवि बाबू , कामकाज में मन लग गया । यहां अच्छा तो लगता है ना तुमको ? " रवि से पूछा ।
" जी सर , सब अच्छा है । काम भी करता हूं और पढ़ाई भी चल रही है ।" रवि ने आदर से कहा ।
" तुम्हारे साहब को पढ़ाई की कहां फ़िक्र है ? काम की चिंता मत करो , शांता मौसी और मैं देख लेंगे । तुम जी लगाकर पढ़ो ।" मनोरमा का रवैया पढाई के प्रति कितना सख्त है , विनोद मुस्कुराने लगा ।
" कल ट्यूशन कक्षा में जांच परीक्षा थी , मुझे बहुत अच्छे अंक मिले । मेरे लिए तालियां बजाई गई ।" खुशी से रवि ने बताया तो पति-पत्नी ने उसकी पीठ थपथपाई ।
रवि , बीस-बाईस का , ऊंचा-पूरा लड़का है जो विनोद एवं मनोरमा के पास रहकर बारहवीं की परीक्षा के लिए व्यक्तिगत रूप से फार्म भरा है । कठिन विषयों के लिए उसे कोचिंग सेंटर में भर्ती करवाया था ।
" याद है ना तुम्हें , आज विनीता और मिनी आ रहें हैं शाम की फ्लाईट से ? " मनोरमा ने कहा ।
" अरे..हाँ ... आज तो २३ तारीख है । कल सुबह तक याद था , आज तो भूल ही गया था मैं । " हड़बड़ाकर विनोद ने सफाई दी ।
" अखबार , टेलीविजन के समाचार , दोस्तों से चर्चा ... इसके अलावा कुछ याद नहीं रहता तुमको ।" नाराजगी दिखाते हुए मनोरमा ने कहा और नहाने के लिए चली गई ।
दस बजे अपने केन्द्र में हाजिरी लगाकर बारह -एक तक वापस घर आ जाएगी । विनीता और नातिन मिनी , दोनों को ही उसके हाथ का बना बेसन का लड्डू बहुत पसंद है , तो घर आकर लड्डू बना लेगी ।
मिनी की ठंड की छुट्टियां लग गई हैं और पांच-छह दिनों के लिए दोनों आ रहें हैं । दामाद अपनी कंपनी के काम से १५-२० दिनों के लिए विदेश गए हैं । ये दिन बच्चों के साथ बड़े मजे से कटेंगे ।
तैयार होकर मनोरमा ने विनोद को बताया कि वो अपने केंद्र में जा रही है । दोपहर तक आएगी फिर शाम को बच्चों को लेने जाएंगे ।
अखबार में व्यस्त विनोद ने सिर हिला दिया ।
कार में बैठ कर मनोरमा सोचने लगी कि समय कितनी तेज गति से चलता है ।
विवाह से पहले मनोरमा ने समाजशास्त्र में एम.ए. किया था । वो अच्छी वक्ता और कालेज गर्ल्स एसोसिएशन की निष्ठ कार्यकर्त्ता थी ।
न्याय , समानता , अधिकारों के लिए लड़ना , जैसे खून में ही था ।
विनोद एक बड़ी कंपनी में चार्टेड एकाउंटेंट थे । मनोरमा ने अपने सामाजिक दायित्व को निभाने के लिए शहर की नामी संस्था के साथ जुड़ गई ।
कार के रूकते ही मनोरमा की सोच भी झटके से थम गई । सामने उसका अपना " सखी सहायता केंद्र " है जो उसने खुद शुरू किया था । कुछ अनुभव और अच्छी जान-पहचान के बाद जब ये केंद्र शुरू किया तो कुछ वकील मित्र , अखबार और पत्रिकाएं , टेलीविजन के लोगों ने भी सहयोग किया ।
भोली ने साफ-सफाई कर रखी थी । मेज पर रखी चीजों पर भी कपड़ा फेरा गया था ।
" दीदी , आज आप जल्दी आ गई हो ? " भोली ने पानी का गिलास देते हुए कहा ।
" हां , आज जाऊंगी भी जल्दी ही । विनीता और मिनी आ रहें हैं शाम को । " मनोरमा ने खुशी से कहा ।
" अरे वाह ! घर भरा रहेगा कुछ दिन ।" भोली ने खुशी जाहिर की ।
मनोरमा फाइल के पृष्ठ पलटने लगी । करीब तीस-पैंतीस सालों का अनुभव है । जिंदगी के हर पहलू को देखा है करीब से ।
एक -एक पन्ना मानो एक एक किरदार को बयां कर रहा है ।
हर एक चरित्र , दूसरे से भिन्न ।
अलग समस्या , अलग समाधान ।
अलग सोच , वैसे ही समीकरण ।
मनोरमा ने पन्ने पर से अपना हाथ घुमाया मानो उस समय को प्रत्यक्ष देखना चाहती हो ।
आज का समय , कब और कैसे बीते हुए कल में तब्दील हो जाएगा , कोई समझ ही नहीं सकता । इस फाइल में कैद एक एक पन्ना , बीते हुए कल को लेकर खड़ा है ।
एक पन्ने ने मानो हाथ ही रोक दिए ।
'अलबेली' , हाँ ... यही था उसका नाम । शायद अपने मिजाज और वेशभूषा से मिला था उसे , लेकिन था बिल्कुल सटीक । सचमुच ही वह अलबेली थी ।
खूबसूरत , गोरी, चंचल और बहुत ही दबंग औरत । पहनावा ऐसा की जो कल्पना से परे ।
कभी पैंट-शर्ट , धूप का चश्मा और उसके साथ गूंथकर बनाई लंबी चोटी । कभी एकदम चुस्त , शरीर से चिपकी सलवार कमीज और बड़े बड़े झुमके , तो कभी पतली सी साड़ी और फैशनेबल ब्लाउज़ , जो कम से कम कपड़े में बन जाता होगा ।
एक बार जो देखे वह पलटकर दुबारा उस नमूने को देखने पर मजबूर हो जाता था ।
मनोरमा ने दिमाग पर जोर दिया कि वह इस अलबेली से उन्नीस-बीस साल पहले मिली थी ।
" मैडम , आप औरतों की वकील हो ना । सब बोलते हैं कि तुम्हारा काम बराबर है ।" कहते हुए एक चौदह -पंद्रह साल की लड़की को हाथ से पकड़कर सामने ले आई ।
" यह देखो मैडम , इस छोकरी के बाप ने दो दोस्तों को घर बुलाया , दारू पिलाया और इसको उनके आगे धकेल दिया । " जमीन पर उकडू बैठ गई वह ।
" साला ऽऽऽ...हरामी का पिल्ला ..। बाप है कि कसाई । छोकरी छोटी है मैडम । बहुत रोती थी , अपुन तुम्हारे पास लेकर आई । इसके बाप को फांसी दिलवा दो , मैं पूरा फीस देगी । उसको चौक में जूते मारी मैं ।" आसपास खड़े लोग स्तब्ध मुँह बाये उसको देखते रह गए ।
" बैठो पहले आराम से । हम सब कोशिश करेंगे कि बच्ची को न्याय मिले ।" मनोरमा को साथी वकीलों ने कहा ।
" ये एडवांस रखो , अपुन को मालूम है कि बिना हरी झंडी के गाड़ी नहीं चलती । " कुर्ते की जेब से सौ-सौ के कुछ नोट निकाल कर सामने टेबल पर रख दिए ।
आगे कार्यवाही की गई , जाँच , सुबूत जमा किए गए और आठ महीने के भीतर ही उसके पिता और उन दो आदमियों को सजा हो गई ।
मनोरमा ने उस लड़की को बालिका सुधार केंद्र में भेजने की बात कही तो अलबेली बिगड़ पड़ी ।
" इसके बाप को सजा हो गई बस्स्... । सब रफा दफा । छोकरी कोई बिगड़ैल है जो सुधार घर जाएगी । मैडम .. दुश्मन की छोकरी को भी मत भेजना उधर। सब हरामी हैं साले.. ।" और वह उस लड़की का हाथ खींचते हुए बाहर चली गई ।
मनोरमा हाथ में फाइल पकड़े , स्मृतियों में डूबते चली जा रही थी। यादों के अथाह सागर में गोते लगाने से मानो आत्मिक सुख मिल रहा है । काश ! यादों की दुनिया से मिलने वाला यह सुख , हकीकत में बदले जा सकते ।
एक दिन जब मनोरमा की कार सिग्नल पर रूकी , तो देखा कि वही लड़की फूल की दूकान में फूल बेच रही थी । उसने नम्रता से अभिवादन किया और बताया कि _ " बेला मौसी ने यह दूकान लगवा दिया । उनकी बहुत पहचान है मार्केट में । उधार में सब दिलवा दिया और अब मैं कमाकर चुकता कर रही हूँ ।" आत्मसम्मान उसके चेहरे पर था।
मनोरमा ने कुछ फूल खरीदे और उसको शुभकामना देकर कार में बैठ गई ।
" मैडम , कुछ औरतें आपसे मिलने आई हैं । किसी फिटनेस सेंटर के उदघाटन के लिए आमंत्रित करने की बात कह रहीं हैं ।" मनोरमा की सहायक अपर्णा की आवाज से मनोरमा वर्तमान में वापस आ गई ।
हाथ की फाइल बंद किया और अपर्णा को बताया_ " ठीक है , उनको बुलाओ ।"
उन औरतों से बातचीत करते समय अनजाने में ही मनोरमा अलबेली से उनकी तुलना करने लगी ।
कहां ये अंग्रेजी बोलने वाली , कहां वो तू-तडा़क की बोली , कहां इनके मंहगे कपड़े और इत्र , कहां उसकी बेढ़ंगी वेशभूषा । बहुत अंतर है , ये मुंह देखी बातें करतीं हैं और वो दिल की बात ।
उनके जाने के बाद मनोरमा ने अपर्णा को बोला _ " आज मैं जल्दी घर जाउंगी । विनीता और मिनी आ रहें हैं , पांच-छह दिनों के लिए ।"
" ठीक है मैडम , बहुत अच्छा लगेगा आप लोगों को भी । दोपहर बाद कचहरी का काम निपटाकर उज्जवला और भारती मैडम भी आ ही जाएंगे ।" अपर्णा ने कहा ।
" हां , उनसे मेरी बात हो गई है । इन छुट्टियों में सबका कोई ना कोई कार्यक्रम बना ही है । यदि जरूरी हुआ तो मैं बीच-बीच में आ जाऊंगी ।" मनोरमा ने अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए कहा ।
अपर्णा बाहर गई और मनोरमा ने अपना पर्स उठाकर बाजू के छोटे टेबल पर रख दिया । एक अंगड़ाई लेकर , शरीर को सीधा किया ।
मेज पर रखा पेपरवेट , उसको हमेशा आकर्षित करता था । उसके कांच के अंदर एक नृत्य करने वाला जोड़ा बना था , आदतन वह उसे अंगुलियों से घुमाने लगी और वह नृत्य करता हुआ जोड़ा तेजी से घूमने लगा ।
नृत्य करते हुए उस उस जोड़े के गोल गोल घुमाव की तरह मनोरमा भी तेजी से अतीत में चक्कर मारने लगी ।
उसके जहन में एक घटना कौंध गई जब वह अपनी सहेलियों के साथ एक पार्टी से वापस लौट रही थी ।
चौराहे पर भीड़ इकट्ठी थी और पता चला कि एक औरत किसी आदमी को गालियां दे रही थी । कुछ हाथापाई भी हुई थी शायद ।
ड्राइवर को पता करने के लिए भेजा तो उसने बताया _" एक पागल औरत है मैडम जी , किसी आदमी को बीच सड़क गाली दे रही है । अपने को हिरोइन समझ रही है सालीऽऽ...।" और उसके बोलने का अंदाज मनोरमा को नागवार गुजरा ।
कार में से बाहर झांककर देखा तो अलबेली उस आदमी को काॅलर पकड़कर खींच रही थी ।
उसने उसे रोकने का प्रयास किया तो कहने लगी _" ये आदमी की जात ही हरामी है साली । ये साला , हरामी अपने घर की कामवाली की बच्ची को आइसक्रीम, चाकलेट देता था , वो छोटी बच्ची खुशी खुशी इसको मनमानी करने देती थी । कल रात से बच्ची के पेट में दरद हो रहा , अस्पताल ले जाने पर बताया सब उसने ।" बिफरते हुए अलबेली ने कहा ।
" तुम्हें कैसे पता चला सब ?" मनोरमा का मूर्खतापूर्ण प्रश्न था ।
एकटक घूरते हुए उसने कहा _" यहींच रहने का है अपुन को मैडम जी । अपने लोगों का दुख तकलीफ जानना पड़ता है । " और वह भीड़ को साथ लिए पुलिस थाने की ओर निकल गई ।
" तुम भी कैसी फालतू सड़कछाप औरत को मुंह लगाती हो , बिना किसी सलीके और शऊर की है वह ।" घृणा से स्वीटी ने मुंह बिचकाते हुए कहा , जो अभी नई नई समाजसेविका बनी थी ।
मनोरमा ने स्वीटी को घूरकर देखा और वह सिटपिटा गई । अभी-अभी पार्टी में मनोरमा ने उसको बेतकल्लुफी से मर्दों को रिझाते और जबरन उनसे सटकर खड़े रहते हुए देखा था ।
समाजसेवा के नाम पर अपना स्टेटस बनाने , बड़े लोगों से पहचान का मौका ढूंढने वालों को वह अच्छी तरह से जानती है ।
हाथ से घूमते हुए पेपरवेट को मनोरमा ने रोका और वर्तमान के समय के लिए घड़ी की ओर नजर घुमाई । बारह बज रहे थे और उसने साढ़े बारह तक निकल जाने की सोची ।
अभी तो विनीता भी तैयारी में लगी होगी । उसे अपनी बेटी पर आश्चर्य होता है कि वह आज के इस नए दौर में रहकर भी सबसे अलग है ।
इंजीनियरिंग के बाद अच्छी कंपनी में काम करती थी विनीता । दामाद भी उसी कंपनी में थे दोनों की पहचान को , घरवालों की अनुमति से विवाह में परिणित किया था । दोनों पक्षों ने सहर्ष स्वीकार किया था ।
शादी के दो साल बाद मिनी का जन्म हुआ , हुबहू विनीता की शक्ल सूरत । पहली बार जब मिनी को गोद में उठाया तो लगा विनीता ही चिपकी है ।
कंपनी की छुट्टियों के दौरान ही विनीता ने ऐलान कर दिया कि वह अब काम नहीं करेगी ।
सभी को आश्चर्य हुआ कि कोई इतनी अच्छी नौकरी कैसे छोड़ सकता है ।
विपिन (दामाद) ने भी समझाया पर वह टस से मस नहीं हुई ।
" बेटा , अच्छी तरह से सोच लो । मिनी की देखभाल के लिए कभी मैं आ जाऊंगी , कभी उसकी दादी । साल दो साल की बात है फिर बच्ची संभल जाएगी ।" मनोरमा ने समझाते हुए कहा ।
"मम्मी , क्या दो साल की बच्ची संभल जाती है ? मिनी की जिम्मेदारी आप लोगों पर डालकर मैं चैन से नौकरी नहीं कर सती हूं ।" उसकी आवाज में बिल्कुल दुविधा नहीं थी ।
उसने घर पर से ही "आनलाइन साल्यूशन " की शुरुआत की ।अपना ग्रुप बनाया और तकनीकी , कानूनी और संपत्ति , पारिवारिक जीवन की समस्याओं पर वे सुझाव देने लगे । अब तो उसका काम बढ़ गया है परंतु मिनी के लिए हमेशा समय रहता है ।
मिनी को हमारे साथ रहने का मौका जब भी मिलता है वह जरूर लेकर आती है । दादा -दादी के पास भी जाती रहती है ।
मनोरमा ने उठकर किनारे पर रखा फोन उठाया और विनीता को काॅल लगाने लगी । घंटी बजती रही पर किसी ने नहीं उठाया ।
पाँच मिनट बाद मनोरमा ने फिर से डायल किया । इस बार मिनी की आवाज आई_ " हैलो ।"
" मिनी , नानी बोल रहीं हूँ बेटा । नाना-नानी , अपनी मिनी का इंतजार कर रहे हैं । जल्दी आ जाओ ।" मनोरमा ने बेहद प्यार से कहा ।
अब विनीता ने फोन ले लिया_ " हैलो , मम्मी आप आओगी ना एयरपोर्ट । छह बजे हम पहुंच रहें हैं ।"
" मैं और तुम्हारे पापा , दोनों ही आएंगे । चलो आराम से आ जाओ दोनों । बाय....।" कहते हुए मनोरमा ने फोन रख दिया ।
साढ़े बारह बज रहे थे और वह आफिस से निकल गई ।आज गाड़ी रोक रखी थी क्योंकि घर जाते समय कुछ खरीदारी भी करनी थी । आइसक्रीम, चाकलेट, दूध और कुछ फल लेते हुए घर पहुंची ।
खाना खाकर विनोद टेलीविजन पर कोई फिल्म देखने लगे और मनोरमा बेसन भूनने लगी ।
घी में भूने बेसन की बात ही निराली है , नासिका के माध्यम से यह भीनी-भीनी महक हृदय को तृप्त कर देती है । यह सौंधी खुशबू उसे इतनी प्रिय है कि उसकी बेटी और अब नातिन भी बेसन के लड्डू बड़े चाव से खाते हैं ।
" रवि क्या कर रहे हो ?" मनोरमा ने जोर से आवाज लगाई ।
" मैडम जी , मैं पिछले साल का गणित का प्रश्नपत्र हल कर रहा हूं । आपकी कुछ मदद कर दूं ? " रवि ने रसोई में आकर कहा ।
" नहीं नहीं , तुम हल करो । हां.. विनीता दीदी आ रही है यदि तुम्हें किसी भी विषय में कोई कठिनाई हो तो उनसे पूछ लेना । वह अच्छी तरह समझा देगी । " मनोरमा ने कहा ।
" जी अच्छा " । कहकर रवि वापस प्रश्नपत्र हल करने चला गया ।
रवि को एक अच्छे वातावरण में रखकर पढ़ाना और सभ्य समाज में उसकी जगह बनाना , मानो मनोरमा ने अपना कर्त्तव्य बना लिया है ।
अपने ही घर के सर्वेंट क्वार्टर में रखा है उसे , उसकी फीस भी देते हैं और खान-पान की व्यवस्था भी करते हैं ।
वैसे तो उसने कई बच्चों की हमेशा सहायता की है परन्तु रवि उसके लिए सबसे अलग केस है ।
बेसन जब चाशनी में अच्छी तरह से भीग गया तब कड़ाही लेकर नीचे फर्श पर ही बैठ गई मनोरमा । पहले तो आंखें बंद करके , एक लंबी सांस लेकर , भूने बेसन की सोंधी महक को आत्मसात कर लिया फिर घी लगी हथेलियों में छोटे छोटे गोल घुमाने लगी ।
समय कैसे उड़ता जाता है ? बचपन में अम्मां लड्डू बनाती थी और वह खुद साथ में नन्हें हाथों से एक गोला बनाती बैठी रहती और अंत में उसी पिचके गोले को सबसे सुंदर लड्डू की उपाधि दिलवाकर खा लेती थी ।
जब उसने स्वादिष्ट, गोल लड्डूओं को बनाने में महारत हासिल की तब विनीता उसके बाजू में बैठी पिचके गोले के साथ परिश्रम करती बैठी रहती । अब मिनी उसी उम्र में है जब कटे -फटे , टूटे और पिचके को सही आकार और दिशा दी जाती है । मां के सानिध्य में बच्चा , जीवन के हर पहलू को विविध रंगों से रंगता है ।
गरम चटका लगा और मनोरमा ने अपने हाथों को फूंक मारकर ठंडा किया ।
लड्डूओं को गोलाकार करती हुई मनोरमा का मन अलबेली की बस्ती की तंग गलियों में भटकने लगा ।
अलबेली के प्रति अपनी जिज्ञासा के कारण एक दिन वह अपनी एक साथिन के साथ , उसके घर की ओर चल पड़ी । सड़क पर गाड़ी खड़ी कर के वे दोनों पैदल ही गलियों में पता पूछते बढ़ रहीं थीं ।
एक औरत ने बताया _ " बेला के घर जाना है मैडम जी , ये अक्खा मोहल्ला ही उसका घर है ।"
" मुझे उससे मिलना है , कहां है वो ?" मनोरमा ने आतुरता दिखाई।
एक छोटे-से बच्चे को उसने बुलाया _" जा रे बबलू , इनको बेला मावशी से मिलने का है । ले जा ।" और वह बच्चा आगे आगे चलने लगा ।
तंग गलियां , बहुत ही छोटे छोटे घर , घरों के द्वार पर लटकते चादरों के परदे और खुली नालियों की बदबू नथुनों में भर रही थी ।
" रमा , तुम ही घूमों इन गंदी गालियों में , मैं तो चली वापस , कार में ही तुम्हारा इंतज़ार करुंगी ।" कहते हुए साथ में आई मित्र नाक में रुमाल लगाकर चली गई ।
वह यंत्रवत बबलू के पीछे चलती रही ।
आगे एक थोड़ा खुला और खाली क्षेत्र में बेला तीन-चार नवयुवतियों को , अपनी ही स्टाइल से कुछ मारा-मारी सिखा रही थी ।
" अरेऽऽ... मैडमजी आप यहां कैसे ? अपुन को बुला लिया होता ।" बेला ने अपने ही अंदाज में कहा ।
"काम तो कुछ नहीं है , बस तुमसे मिलने आई हूं ।" मनोरमा ने झिझकते हुए कहा ।
"क्या बात है । इतनी बड़ी मैडमजी अपुन को मिलने को आई है ।" उसने आंखें फैलाते हुए कहा ।
"सचमुच तुमसे ही मिलने आई हूं , देखने आई हूं कि तुम कहां रहती हो ।" मनोरमा ने मुस्कुराते हुए कहा ।
" मैडमजी , ये अक्खी बस्ती ही अपुन का घर है । ये सबीच लोग अपुन का फैमिली है । इनका दुख -तकलीफ अपुन का दुख है मैडमजी ।" उसने अंगुली के इशारे से बस्ती की ओर दिखाते हुए कहा ।
"ऐ झुंपा , जा .. मैडम जी के लिए एक खुर्ची तो ला ।" उसके कहते ही एक युवती स्टील की कुर्सी ले आई ।
" बबलू , मैडमजी के लिए पानी लेकर आ । बाटली वाला लाना , जा सड़क की दूकान में' अपुन ने मंगाया बोलने का' । " और वह बच्चा भी तेजी से भाग गया ।
मनोरमा समझ गई कि इस बस्ती के लोग अलबेली को बहुत पसंद करते हैं और मान भी देते हैं ।
ऐसा तभी होता है जब सामने वाला भी उतना ही प्रेम करता हो।
" दस बरस की थी तभीच बाप ने मेरे को बेच दिया , यहींच आई थी मैं । खुद का बाप ही जल्लाद था तो क्या करती । एक एक दिन सौ-सौ बरस के समान था मैडमजी ।" उसने गहरी सांस ली।
" चौदह बरस की थी तो बेटी पैदा हो गई मेरी ।सालाऽऽ. बाप का पता नहीं कि वो किसकी थी । इसी बस्ती ने संभाला था अपुन को ।" अपनी आंखें नीची कर के उसने कहा_ " आगे अपुन ने किसी को फायदा नहीं लेने दिया मैडमजी । चमड़े की फैक्ट्री में काम किया , रात को दरजी के दूकान पर काज-बटन करती थी , गटर की सफाई करती थी परंतु अपुन ने फिर शरीर नहीं बेचा ।" वह चुप हो गई ।
मनोरमा इतने वर्षों से नारी सुधार केन्द्र में काम कर रही थी परन्तु ऐसा रोंगटे खड़े कर देने वाले तथ्य पहली बार सुन रही थी ।
" फिर क्या हुआ अलबेली ? " मनोरमा ने उत्सुकता और सहानुभूति के साथ पूछा ।
" हा हा हा... आपने तो अपुन का नामच बदल डाला मैडमजी । " उसने हंसते हुए आगे कहा _ " फिर कुछ और औरतें भी अपुन के साथ आ गई उनको भी शरीर का धंधा नहीं करना था । सब मिलकर नया धंधा करने लगे मैडमजी । धीरे धीरे काम होने लगा और अपुन की बेटी भी बड़ी होने लगी ।" कहकर वह कुछ सोचने लगी ।
" आज अपुन के पास पैसा है , मान भी देते हैं बस्ती के लोग पर अपुन की बेटी नहीं रही । सुंदर थी , अपुन ने उसको संभाला नहीं मैडम जी । सत्रह साल की उमर में ही एक बेटे को जनम देकर मर गई वो । " उसकी आंखें नम हो गई ।
" मैडम जी , सबसे ज्यादा गुनाह घर के भीतर ही होता है , सब बाहर ढूंढ़ते हैं । अपुन ने समझ लिया मैडम जी कि घर संभालना जरूरी है । घर का सब गुनाह दबा देते हैं , छोकरी है तो घर क्या बाहर क्या , सब सरीखा है मैडम जी ।" उसने मानोे अपने अनुभवों का निचोड़ दे दिया ।
तभी ' रवि ' से पहली बार मिली थी मनोरमा । दो-तीन साल का छोटा , प्यारा सा बच्चा , अपनी नानी का हाथ पकड़े आया था ।
उस दिन घर वापसी तक मनोरमा सिर्फ अलबेली के बारे में सोच रही थी कि पैंतीस-छत्तीस साल की उम्र में उसने कितना कुछ सहा और देखा है ।
इसके बाद उनकी मुलाकात होती रही । रवि को एक अच्छे स्कूल में दाखिल करवाया था , उसकी फीस और ट्यूशन के लिए भी व्यवस्था की गई थी। चैरिटी के माध्यम से आए हुए पैसों से वो ऐसे बच्चों की शिक्षा में मदद करते थे ।
एक दिन मनोरमा ने किसी काम से अलबेली को घर बुलाया और वह आकर सामने की बैठक में बैठी थी ।
तभी उसने विनीता को पहली बार देखा था । छोटी विनीता बाहर से ड्राइवर के साथ घर पर आई । मनोरमा जब चाय लेकर आई तब तक तो अलबेली चली भी गई थी।
करीब चार-पांच दिनों बाद वो आफिस में आई ।
" क्यों , उस दिन बिना कुछ कहे घर से आ गई?" मनोरमा ने उलाहना दिया ।
" मैडम जी कुछ काम याद आ गया था । अब अपुन आपसे आफिस में ही मिल लेगी । घर आने को अपुन को अच्छा नहीं लगता मैडम जी । " और बात आई गई हो गई ।
समय की तीव्र गति , से कदम मिलाती हुई विनीता बड़ी हो गई । पढ़ने में होशियार , शांत और सुंदर विनीता ने जब कंपनी में नौकरी शुरू की तो उसमें भी अच्छी तरह रम गई ।
उधर रवि भी पास होता हुआ अच्छी तरह से बढ़ रहा था । मनोरमा भी अपनी बेटी की शादी और फिर मिनी के जन्म तक व्यस्त रही । इस बीच अलबेली का आना जाना भी कम हो गया क्योंकि वह थोड़ी बीमार सी रहने लगी थी ।
समय की मार , मानसिक चिंताओं और जिंदगी के रूखेपन ने उस दबंग औरत को खोखली कर दिया था ।
पिछले साल उसनेे एक लड़के को भेजकर मनोरमा को बस्ती में बुलवाया था ।
मिलने पर बोली _ " मैडम जी , अपुन ने एक बार फिर आपको इस बस्ती में बुलाया है । अक्खी जिंदगी बीत गई मैडम जी , आप जैसे औरत कभीच दूसरी देखा नहीं ।" उसने जवान रवि को पास लाकर , मेरे हाथ में उसका हाथ पकड़ा दिया _ " दसवीं पढ़कर काम पे जाने लगा है । आप इसको आगे पढ़वा देना । कुछ अच्छे काम में लगा देना । ये घर के कागज हैं , बेचकर उसको कहीं भी छोटा घर ले देना । " उसकी आंखों से निरंतर आंसू बह रहे थे ।
" ये खोली उसकेच नाम किया है । उसको इधर मत रहने देना , दल-दल से निकाल लेना ।" कहते हुए उसने हाथ जोड़ लिए ।
मनोरमा ने उसको आश्वस्त किया और वापस आ गई ।
अगले ही सप्ताह रवि कुछ सामान लेकर आ गया और मुझे देखकर रोने लगा ।
पता चला , अलबेली दुनिया छोड़ कर चली गई ।
विनोद की सहमति से उसे सर्वेंट क्वार्टर में रख लिया। प्रायवेट बारहवीं की परीक्षा की तैयारी में ट्यूशन लगवा दिया । एक यही कारण था कि मनोरमा और विनोद ने रवि को सही तरह से परवरिश देने का जिम्मा ले लिया था ।
" अरे.. , तुम अभी तक लड्डू बना रही हो ? चार बज गए हैं ।" विनोद की आवाज से मनोरमा मानो अतीत से वर्तमान में आई ।
" बस.. अभी हुई दो मिनट में तैयार ..।" कहते हुए मनोरमा आनन फानन में तैयार होकर आ गई।
एयरपोर्ट से वापसी के समय सारी दुनिया मानो छोटी सी कार में सिमटकर आ गई थी । मिनी इतने प्रश्न करती और विनीता बड़े ही प्यार से उसे समझा देती थी ।
" नानी के बाल सफेद क्यों हैं ? नानाजी ड्राइविंग क्यों नहीं करते ? आपके भाई-बहन कहां हैं ...... और ना जाने क्या क्या..?" बाप रे आजकल के बच्चे हैं या तूफान , मनोरमा सोच में पड़ गई ।
घर पहुंच कर मिनी को आइसक्रीम दिया तो गुस्से से मुंह फुलाकर बैठ गई _ " वनीला फ्लेवर मुझे बिल्कुल पसंद नहीं है , आपको चाकलेट वाली बोला था मैंने । मैं नहीं खाऊंगी ।"
" गुस्सा मत कर बाबा , जो तुझे खाना हो , वही आइसक्रीम ले आ । मैं पैसे देती हूं ड्राइवर अंकल के साथ जाकर ले आ ।" कहते हुए मनोरमा ने सौ का नोट उसके हाथ में थमा दिया ।
अचानक तेजी से विनीता आकर बोली _ " नहीं मम्मी , कभी नहीं । आप दुबारा ये गलती मत करो । आप अपनी बेटी को किसी भी आदमी के साथ निश्चिंत होकर भेज सकती हो , मैं नहीं । आपने कभी समझा ही नहीं कि अपराध घरों के अंदर ही होते हैं और जान-पहचान के लोगों के द्वारा ही ।" लगभग चीखते हुए उसने बात पूरी की _ " मेरी बात सुनने और समझने का समय तब भी आपके पास नहीं था , आपको लोगों को न्याय दिलाने से फुर्सत नहीं थी ।" विनीता ने एक क्षण का मौन कर लिया ।
" अपनी नौ-दस साल की बच्ची को ड्राइवर के साथ कभी भी आप स्कूल छोड़ने , प्रोजेक्ट का सामान लाने , पुस्तकें लाने कैसे भेज दिया करती थीं ? मैं आपकी तरह लापरवाह मां नहीं हूं ।" कहते हुए विनीता ने मिनी का हाथ पकड़ा और बाहर निकल गई।
उसकी हल्की सी आवाज आ रही थी कि_" मिनी बेटा , ऐसे जिद नहीं करते । वही आइसक्रीम खा सकती थीं तुम । चलो , मैं तुम्हें दूसरी लेकर देती हूं परंतु यह भी खा लेना बाद में ....। "
मनोरमा अपनी बेटी में एक सबल , सचेत मां देख रही थी जो शायद वो स्वयं ना बन पाई ।
अलबेली के शब्द कानों में गूंजने लगे _" अपराध घरों के अंदर ही ज्यादा होते हैं ।" एक अनपढ़ , गंवार में जिंदगी की समझ उससे कितनी अधिक थी ।
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