मंगलवार, 19 मार्च 2019

20/02, 11:20] कविता की पाठशाला नीरज सर: आपको पता है कि:

1 - सभी व्यंजन (बिना स्वर के) एक मात्रिक होते हैं।

जैसे – क, ख, ग, घ, च, छ, ज, झ, ट ... आदि 1 मात्रिक हैं


2 - अ, इ, उ स्वर व अनुस्वर चन्द्रबिंदी तथा इनके साथ प्रयुक्त व्यंजन एक मात्रिक होते हैं

जैसे = अ, इ, उ, कि, सि, पु, सु हँ  आदि एक मात्रिक हैं 


3 - आ, ई, ऊ ए ऐ ओ औ अं स्वर तथा इनके साथ प्रयुक्त व्यंजन दो मात्रिक होते हैं

जैसे = आ, सो, पा, जू, सी, ने, पै, सौ, सं आदि 2 मात्रिक हैं

इनमें से केवल आ ई ऊ ए ओ स्वर को गिरा कर 1 मात्रिक कर सकते है तथा 

:: ऐसे दीर्घ मात्रिक अक्षर को गिरा कर 1 मात्रिक कर सकते हैं जो "आ, ई, ऊ, ए, ओ" स्वर के योग से दीर्घ हुआ हो 

:: अन्य स्वर को लघु नहीं गिन सकते न ही ऐसे अक्षर को लघु गिन सकते हैं जो ऐ, औ, अं के योग से दीर्घ हुए हों


उदाहरण =

मुझको :22 को मुझकु 2 1 कर सकते हैं 

आ, ई, ऊ, ए, ओ, सा, की, हू, पे, दो आदि को दीर्घ से गिरा कर लघु कर सकते हैं परन्तु ऐ, औ, अं, पै, कौ, रं आदि को दीर्घ से लघु नहीं कर सकते हैं


स्पष्ट है कि आ, ई, ऊ, ए, ओ स्वर तथा आ, ई, ऊ, ए, ओ तथा व्यंजन के योग से बने दीर्घ अक्षर को गिरा कर लघु कर सकते हैं


5 - यदि किसी शब्द में दो 'एक मात्रिक' व्यंजन हैं तो उच्चारण अनुसार दोनों जुड कर शाश्वत दो मात्रिक अर्थात दीर्घ बन जाते हैं जैसे ह1+म1 = हम = 2  ऐसे दो मात्रिक शाश्वत दीर्घ होते हैं जिनको जरूरत के अनुसार 11 अथवा 1 नहीं किया जा सकता है

जैसे – सम, दम, चल, घर, पल, कल आदि शाश्वत दो मात्रिक हैं,

ऐसे किसी दीर्घ को लघु नहीं कर सकते हैं|  

दो व्यंजन मिल कर दीर्घ मात्रिक होते हैं तो ऐसे दो मात्रिक को गिरा कर लघु नहीं कर सकते हैं ।


उदहारण = कमल की मात्रा 12 है इसे क1 + मल2 = 12 गिनेंगे तथा इसमें हम मल को गिरा कर 1 नहीं कर सकते अर्थात कमाल को 11 अथवा 111 कदापि नहीं गिन सकते।

[20/02, 11:20] कविता की पाठशाला नीरज सर: ग़ज़ल सीखने की और चलिए अब अगला कदम बढ़ाते हैं। आज हम बात करते हैं मात्रा गिराने की। अब आप कहेंगे कि, अभी तक आप मात्र भार सिखा रहे थे अब गिराने की बात कर रहे हैं । ग़ज़ल लेखन की तकनीक ये सुविधा या छूट आपको देती है कि आप कुछ अक्षरों की जो की दीर्घ हैं मात्रा गिरा कर उन्हें लघु कर सकते हैं ।याने जिनका मात्रा भार 2 है उस को 1 माना जा सकता है ।अब सवाल यह उठता है कि वो दीर्घ कौन से हैं जिन्हें हम गिराकर एक कर सकते हैं ।

इस बात को एक आप कहीं नोट करलें ताकि ग़ज़ल कहते वक्त जरूरत पड़ने पर चाहें तो इस छूट का लाभ ले सकें...

[20/02, 11:40] कविता की पाठशाला नीरज सर: जैसा कि मैंने बताया:


आ, ई, ऊ, ए, ओ के संयोग से बनी दीर्घ मात्रा को गिरा कर लघु किया जा सकता है किन्तु ऐ, औ, अं को किसी भी स्थिति में गिराया नहीं जा सकता हालाँकि अपवाद स्वरूप कुछ को इससे छूट भी प्राप्त है। इन अपवाद में - है, हैं, मैं, और शामिल हैं। 

सबसे अधिक जो गिराए जाते हैं वे हैं - तो, को, जो, ये, में आदि। 


साथ ही यह ध्यान रखना भी आवश्यक है कि किसी भी शब्द के अंत का ही दीर्घ गिरता है आरंभ का नहीं। 

किन्तु कुछ अपवाद वाले शब्द यहाँ भी हैं जिनमें सुविधानुसार आदि या अंत किसी की भी मात्रा गिराई जा सकती है जैसे - कोई, मेरी, तेरी। आपने शायद देखा होगा कि शायर इन के लिए कुई, मिरी या तिरी का प्रयोग करते हैं जबकि ऐसा करने की जरूरत नहीं होती। खैर।

सबसे अधिक ध्यान देने योग्य बात यह कि किसी भी संज्ञावाचक शब्द और हिंदी के तत्सम शब्दों की मात्रा नहीं गिराई जा सकती। हालाँकि अब कई लोग तत्सम शब्दों की मात्रा भी गिराने लगे हैं और इसे स्वीकार भी किया जाने लगा है।


जिसकी लाठी उसकी भैंस का चलन हर क्षेत्र में है...बड़े शायर अक्सर नियमों की धज्जियाँ उड़ाते देखे गये हैं ...हम लोग क्योंकि कि अभी नौसीखिए हैं इसलिए नियमों का यथासंभव पालन करेंगे।😊 

"मेरा बक्सा "

सफाई करते हुए, आज मुझे एक बक्सा मिला ।
बक्सा जो ना जाने किस धातु से बना है,
सिर्फ उसके ऊपर फूल बने हैं,
जो अब आधे अधूरे दिखाई देतें हैं
गर्द काफी जमी हुई है ,
बहुत दिनों से किसी ने छुआ नहीं है ।

अब खोलने पर चिचियाने भी लगा है ,
शायद कहता हो ,मेरी जरूरत ही क्या है ?
एक जमाने में यह राजा हुआ करता था ,
आलमारी के सारे असबाबों में बेशकीमती ।
सोने, मोतियों को अपने में समेटे हुए ।

आज भी मैंने उसे उतने ही प्यार से खोला ,
पुराने समय में झांकने लगी थी मैं ।
मेरे बच्चों की कुछ खास चीजें ,
मुझे उनके बचपन में ले जा रही थी ।
रंगीन कलमें, कुछ सूखी पत्तियां
सितारे ,बटनें और चिकने पत्थर ।

तमाम नदियों, झीलों के किनारों से उठाये पत्थर ,
उन्हें सहलाकर मैं वापस वहीं जा रही हूं ।

बक्से को प्यार से गोद में लेकर मैंने कहा_
"बेशकीमती हो तुम आज भी ,
जब जब तुमको झांकती हूं ,
बीता समय, याद बन महकने लगता है ।"

मेरा बक्सा अब मुस्कुराने लगा है।

" जिंदगानी "

कोई कहता है तो कहानी है
सुनता है कोई
हर जुबां से निकली
अपने हिस्से में आए,
तजुर्बे की जुबानी...

अच्छी-खासी बन जाती है ,
कभी बनते बनते
बिगड़-सी जाती है ।
बिगड़ी बनाने की ही
अनगढ़ अनूठी किसकी
किसको सुनानी...

फलसफा किसी के लिए
कहकशां हैं कहीं ,
कायदे कभी बन जाती
कहीं वायदे ,
जहांँ जैसी है बस्स
हरदम है निभानी ...

नजर नहीं
नज़रिया ही है जिंदगानी ।।

" मेरी हड़ताल "

सुबह अखबार देखा ,
हर तरफ हड़ताल, धरना ।
अपने अधिकारों के लिए ,
लोग कह रहे "बंद करना" ।

मुझे भी अपने "गृहिणी अधिकार" याद आ गए ।
बस्स ..मेरे दिलो-दिमाग पर
विद्रोह के बादल छा गए ।

दिन भर काम ना करने की जैसे ही मैंने "भीष्म प्रतिज्ञा ली ,
वैसे ही महरी ने अपने आपातकाल की सूचना दी ।

ऐसे बड़े संकल्प के सामने
कैसे बाई ने रोड़ा किया ।
आनन फानन में मैंने ,
सारा काम निपटा लिया ।

गुनगुनी धूप ,चाय की प्याली
अपने को आराम के लिए तैयार किया ,
फोन पर आए मैसेज ने ,
मेरी प्रतिज्ञा को तार तार किया

बीस की मटर दस के भाव,
मैंने आराम की बात छोड़ दी
महाभारत में भगवान ने खुद
प्रतिज्ञा तोड़ दी ।

आधे कीमत की खूबसूरत मटर
मेरे मन को भा गई ।
पाँच किलो का झोला उठाए
मैं वापस घर को आ गई ।।

मटर के साथ मटरगश्ती में
सारा दिन आराम से बीत गया
घंटी बजी, द्वार खोला तो..
सपरिवार मेहमान पे मन रीझ गया ।।

वो अचानक आ जाने के ,
बीसियों कारण बतला रहे थे
"भीष्म प्रतिज्ञा"के इस हश्र पर
हम सौ-सौ आँसू बहा रहे थे ।।