सुबह से ही बड़ी वीरानी छाई है ,
रोजमर्रा की वो आवाजें , मानो काला पानी झेल रहीं हैं ।
चिक सरकाकर देखती हूँ,
नीम का फैला हुआ दरख़्त ,
जिसपर हंगामे हुआ करते थे ।
बया के घोंसले , फानूसो की तरह लटके थे ,
गरदन बाहर निकाल कर, दुनिया का मुआयना करते ,
वो मासूम चूजे-से बच्चे ।
अपनी चोंच में दबा दाना ,
मादा बड़े सलीके से खिलाती ।
आशियाने की मरम्मत ,
आनन फानन कर डालती ।
घोंसले महफ़िल गुलज़ार किया करते थे ।
बड़ी डालियांँ , जमीन पर पड़ी छटपटा रही हैं ,
टूटे घोंसले ,बोझ तले कसमसा रहे हैं ।
कल तक रौनक थी जिनमें ,
आज अचानक बेनूर हो गए ।
परों की आहट से मैं चौक पड़ी ,
निगाहें कमरे के रोशनदान पर अटक गई ।
बया के वो प्यारे बच्चे
मुझे देख जैसे मुस्कुरा रहे हैं ।
आज इस दुनिया को देखने के लिए ,
अपने परों को आज़मा रहे हैं ।।
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