कमरे में बेतरतीबी से असबाबो-सी यादें ,
घुसकर भीतर चंद को संजोने लगती हूँ ।
सुरखाब के पंख लगाकर, आसमां छूने की चाहत ,
गहराइयों में गोते लगाकर, मोती पकड़ने की कोशिश ।
अनजाने ही अल्फाजों को पिरोने लगी हूँ ;
आज किसी नई नज़्म को वजूद देने लगी हूँ ।
परदे हटाकर,साफ धूप से अठखेलियांँ ,
बरसों से बिछी गर्द , हथेलियों से पोंछना ।
टूटे-बिखरे ,बेकार के सपनों-सी चीजें ,
बटोरकर उन्हें , फिर नई दुनिया में खोने लगी हूँ ;
लगता है आज किसी नई नज़्म को वजूद देने लगी हूँ ।
चंद किस्से कहानियांँ , परीलोक-से होते हैं ,
जहांँ अशर्फियों के पेड़ , सितारे जमीं पर सोते हैं ।
पुरानी जिल्द चढी़ , मोटी किताब को झटककर ,
फूंँक-फूँक कर पन्ने अलग करने लगी हूँ ;
लगता है आज किसी नई नज़्म को वजूद देने लगी हूँ ।
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