मंगलवार, 3 मार्च 2026

1222v1222 1222 1222 होली विशेष हज़ल (गज़ल)

1222 1222 1222 1222

कभी साली कभी सरहज, ये रिश्ता ही लुभाता है 
रहे भाभी जो होली में, मज़ा दुगुना हो जाता है।।1।।


नगाड़े ढोल बाजे ले, है टोली फाग की आई
दुपट्टा ओढ़ कर बांके, कमर मोटी हिलाता हैं।।2।।

करे चालू वो गाड़ी को, जो रूठी प्रेमिका सी थी
बिना चाबी लगाए ही, वो  अब गाड़ी चलाता है।।3।।

बनी गुझिया बने पूरन, धरी प्लेटों में सब सज के
हुए मधुमेह रोगी सब, करेला रास आता है।।4।।

चढ़ा है रंग फगुआ का, उमर की बात मत छेड़ो 
चचा सत्तर का नाचे तो, जवां छोरा लजाता है।।5।।

तरही मिसरा:

कभी बचपन कभी यौवन, बुढ़ापा तो लगा हरदम
मगर जो है जवां दिल वो, सदा होली मनाता है।


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शर्मिला चौहान 
ठाणे (महाराष्ट्र)

सोमवार, 2 मार्च 2026

कहानी - ज़िंदगी धुआँ सी

कहानी - ज़िंदगी धुआँ सी 


मैंने अपनी पारिवारिक ज़िम्मेदारियाँ समाप्त करके, सेवानिवृत्ति के बाद इस छोटे शहर में बस जाने का फैसला किया। एक तो छोटे शहर के बड़े होने की उम्मीद हर समय रहती है और दूसरे जीवन उपयोगी वस्तुओं का उचित मूल्य या कभी-कभी सस्ते में मिल जाना सेवानिवृत्त व्यक्ति के लिए फायदे का सौदा होता है। तीसरी बात इस शहर में कोई ऐसी प्रसिद्ध इमारत, स्थल नहीं है जिसके दर्शनार्थ आकर मेहमान घर को लॉज बनाकर रहने लगें। इसका ऐसा अर्थ नहीं कि मैं अतिथि-सत्कार नहीं जानता परंतु बड़े शहर में रहकर, वक्त-बेवक्त बिना पूर्व सूचना के आकर कई दिनों रूकने वालों से अब इस उम्र में परहेज करने को मजबूत था।
मैं, संजीव दयाल और मेरी पत्नी सुलभा हम दोनों ने कई मुद्दों पर एकमत रखते हुए इस स्थान को चुना था। मेरे चुनावी मुद्दे तो मैंने कह दिए, सुलभा ने यहां की शांति और कामकाजी सहायिकाओं की उपलब्धि को पसंद किया। पास ही बाजार दुकान, सर्राफा, मेडिकल स्टोर्स और जनरल फिजिशियन के क्लीनिक इस उम्र में उसे आकर्षित कर रहे थे। खैर, मुद्दे जो भी थे उसमें हमारी इकलौती बेटी उत्तरा और दामाद जी की भी सहमति थी। उनके महानगर से सीधी ट्रेन और बढ़िया सड़क ने इस स्थान के लिए थी, जो उनका और हमारा सम्मिलित मुद्दा था। अपने इस नए घर को अपनी जरूरत और सुविधा के अनुसार सजाने में हम दोनों पति-पत्नी फिर एक बार फिर मशगूल हो गए थे। इस बीच उत्तरा और दामाद जी, दोनों नातियों को लेकर एक बार ही आ पाए थे।
टन-टन, टन-टन, टन-टन मंदिर की घंटियों का स्वर इस गोधूलि बेला में सबके कानों में रस बरसाने लगा। अभी कुछ ही क्षणों पहले सूर्यास्त हुआ है और सूरज ने अपने पीछे कुछ लाल मोती अंबर में बिखेर दिए हैं। बस, अब वही लाल मोती, नीले रंग के साथ मिलकर कुछ श्यामल हुए जा रहे हैं। मैंने अपने के भगवान घर  की ओर कदम बढ़ाए। सुलभा प्रतिदिन दीपक में बाती-तेल डालकर तैयार कर जाती है।
"जब मंदिर से आरती की आवाज आए तो दीपक जला देना। मैं आकर तुलसी में दीपक रख दूंगी।" यह उसके रोज का काम था। मेरी सेवानिवृत्ति के बाद, थोड़ी निवृत्त वह भी हुई थी। घर के पास मंदिर होना, उसकी आकांक्षाओं को साकार कर रहा था।
माचिस की तीली जलाकर, तेल में डूबी बाती के दूसरे सिरे को स्पर्श कराया। शनै-शनै मध्यम पीत प्रकाश फैलने लगा। उसके आलोक में सर्वशक्तिमान ईश्वर की मूर्ति का मुख मंडल दैदीप्यमान हो गया। एक आनंद, एक आकर्षण उनके चेहरे में कि दृष्टि हटती नहीं थी। जगत बनाने वाले इस अप्रतिम कलाकार को मूर्त रूप देने वाले कलाकार की प्रतिभा मानने में मुझे कोई संकोच नहीं था। एक लय, एक समर्पण से जलती बाती अपने जीवन को सार्थक होते देख, बीच-बीच में मुस्कुराती भी थी।
डिंग-डोंग, डिंग-डोंग, डिंग-डोंग, डिंग-डोंग दरवाजे की घंटी बजी। 
 "अरे आज आरती चल ही रही है और सुलभा आ गई।" मन ही मन सोचते हुए मैं दरवाजा खोलने गया। दरवाजा खुला तो सामने करीब ग्यारह-बारह साल का एक लड़का खड़ा था। उसके हाथ में एक थैली थी और उसने तुरंत झुककर थैली से सामान बाहर निकालना शुरू किया। कुछ चार-पांच पैकेट थे जो उसने देहरी पर रख दिए। खड़ा होकर मुझे एकटक देखने लगा जैसे पहचानने की कोशिश कर रहा हो कि सामान सही घर, सही आदमी को दिया है या नहीं। 
 मैंने ध्यान से उसकी ओर देखा गेहुँआं रंग, रुखे-उलझे बाल, टी-शर्ट जिसमें कोई कार्टून बना था, घुटने तक की फिट पैंट, पैरों में चप्पल जो एक दृष्टि में लड़कियों की चप्पल लगती थी। गुलाबी रंग की तितली बनी चप्पल मैंने तो किसी लड़के को कभी पहना नहीं देखा था। 
"चप्पल तुम्हारी है?" कैसा बेतुका सवाल पूछा मैंने। 
क्षण भर वो मुझे घूरता रहा फिर बोला, "मानस सोसाइटी वाली मैडम ने अपनी छोकरी की चप्पल दी है गर्मी में मेरे पैर जलते थे इसीलिए।"
"ओह! अच्छा-अच्छा।" मैंने कहा और वह पलट कर जाते हुए बोला,"आंटी ने सामान खरीदा और बोला घर पहुंचा देना, वह मंदिर गई है।" उसने अपनी जेब से एक चॉकलेट निकाली और मुँह में डालता हुआ बेफिक्री से सीढ़ी से उतर गया।
सामान उठाकर मैंने रसोई के प्लेटफार्म पर रख दिया। मेरा मन कहीं उड़ जाने को बेचैन हो रहा था। सांसें कुछ बेकाबू होने लगीं और मैं बालकनी में रखी कुर्सी पर बैठ गया। वह लड़का सामने के गेट को पार करके, सड़क के दूसरी ओर चला गया था। कुछ हल्का सा लंगड़ा रहा था वह शायद उसकी चप्पल बेसाइज़ थी और उसके लिए आरामदायक नहीं थी। 
एक-दो दिनों से मानसूनी बादलों ने मुँह दिखाई शुरू कर दी थी। शाम से ही हवा तेज़ चलती, कुछ धूल के गुबार आसमान की ओर उठते और बचपन वाले की "भूत" का अस्तित्व साकार कर देते। बालकनी से सटा सोसाइटी का आम का पेड़ जिसकी एक बड़ी शाखा हमारी बालकनी पर नत थी। हवा से खिलवाड़ करते आम की शाखों और पत्तों में सरसराना शुरू किया मेरे हृदय की धड़कनों ने भी उस बेचैनी को महसूस किया।
आज उस लड़के के हावभाव, वेशभूषा, उम्र और काम ने मुझे कई सालों पुराने वाक़ये की ओर धकेल दिया। पहली पोस्टिंग थी मेरी। विवाह करके सुलभा को साथ लेकर गया था वहाँ। दूर-दूर बने घर, बीच में बड़े बगीचे और संकरे लंबे मकान। बरामदा, बैठक, बीच का एक कमरा,रसोई, पीछे आँगन, साइड में पानी की टंकी, स्नान घर, बर्तन साफ करने की जगह और पिछला दरवाजा। ग्रामीण बैंक में नौकरी लगी थी मेरी और बैंक के बाबू का मान था उस कस्बे में । पाठशाला के अध्यापकों, सरकारी अस्पताल के डॉक्टर और बैंक के कर्मचारियों को पूरा गांव पहचानता था।
मैं तो बैंक के कामकाज, स्टाफ के सहयोग से अपने काम को ठीक से करने में लग गया परंतु सुलभा अपने समय का उपयोग मकान को घर बनाने में करती रही। कामकाज में सहायता के लिए उसे हमउम्र उर्मिला मिल गई थी। एक दिन उसके साथ बाजार जाकर सुलभा ने सिलबट्टा खरीद लिया।
"मिक्सी मिली है ना शादी में उसका क्या करोगी?" मैंने पूछा था।
 "मिक्सर में पिसी चटनी बिल्कुल अच्छी नहीं लगती, तो कभी-कभी चटनी और मसाला सिल पर ही पीस लिया करूंगी। अरे, एक्सरसाइज भी हो जाएगी और स्वादिष्ट खाना भी मिलेगा" सुलभा पक्की गृहिणी बनने के राह पर निकल पड़ी थी। 
खैर, सात-आठ महीने हो गए थे और आसपास के लोगों से हमारी जान पहचान भी हो गई।  मैंने लोन पर एक स्कूटर ले ली थी तो पंचर वाला, पेट्रोल पंप, किराने की दुकान, दर्जी सबसे राम-राम हो जाती थी। घर से कुछ दूरी पर एक पुराना होटल और उसी के सामने गन्ना रस बेचने वाला बैठता था। होटल पुरानी इतनी की दीवारों का असली रंग अब अपनी अस्मिता खो चुका था। बेंच और टेबल भी जगह-जगह छिल गए थे परंतु सेवा भाव से डटे थे। काउंटर पर जो बैठता उसके बाल और दाढ़ी का मेल चेहरे पर हो रहा था। आँखों में रंगीन चश्मा लगाए, अपनी तोंद को कमीज़ से छुपाए रखने का भरसक प्रयास करता हुआ वह आदमी हमेशा पान चबाते रहता था। उसके सामने काँच की शो केस में लड्डू, बर्फी, मैसूर पाक, पेड़े और पेठे सदियों से सजे दिखते थे।
ऐसा वर्णन पढ़कर आप यह ना समझना कि वहाँ सिर्फ मक्खियांँ भिनभिनाती थीं, वहाँ ग्राहकों की भी भीड़ हुआ करती थी। हलवाई सुबह-शाम गरम समोसे, कचौड़ी, जलेबी बनाता तो कद्रदान तीन-तीन, चार-चार दोने खा जाते। उसके होटल में साफ-सफाई, बर्तन उठाना, टेबल पर कपड़ा मारने के लिए कुछ तीन-चार लड़के दिखते थे। मैं तो बैंक से आते-जाते कभी-कभी सुलभा के लिए गरम समोसे, जलेबी बँधवा कर ले जाता था। मैं खुद बैठकर कभी नहीं खाता था इसलिए इन काम वालों से मेरा कोई सरोकार नहीं था।
कुछ दिनों से सुलभा की तबीयत ठीक नहीं लग रही थी। चक्कर आने, उल्टी होने से कमजोरी आ गई थी उसे।
"सुलभा, तुम अगर खुद अपना ध्यान नहीं रखोगी तो मैं तुम्हें माँ के पास छोड़ आऊंगा। क्या जरूरत है दिनभर काम करने की और इस सिलबट्टा को तो मैं रख ही देता हूंँ उठाकर।" तीसरा महीना लगने पर मैंने सुलभा को खूब डांटा-समझाया कि वह अपना खुद से ध्यान रखे। 
सहायिका उर्मिला बहुत मदद करती थी। सब्जी-भाजी साफ कर देती, गेहूँ पिसवा लाती और दुनिया जमाने की बातें सुलभा के साथ करके उसको बहलाये रखती थी।  एक दिन सुबह देर तक सुलभा उठी नहीं, मैंने उसे लेटे रहने की सलाह दी और चाय बना कर दिया। बैंक जाते-जाते खुद भी दो समोसे खा लिए और सुलभा के लिए गन्ना रस, कचौड़ी ले जाने की सोचने लगा। 
"कचौड़ी को आधे घंटे और लगेंगे बाबू, आपका घर नंबर बता दो छोकरा दे आएगा।" हलवाई ने कहा। 
मैंने सोचा रुक तो बैंक में देर हो जाएगी और सुलभा ने कुछ खाया भी नहीं है। वह आजकल कचौड़ी बहुत पसंद कर रही है। एक शीशी दिया था उसने कि गन्ना रस ले आना तो शीशी हलवाई के पास छोड़ कर, पैसे देकर मैं बैंक चला गया।
शाम को घर आया तो सुलभा तरो-ताजा लग रही थी।
 बोली, "सुबह की गरम कचौड़ी और गन्ना रस बेहद स्वादिष्ट थे। खाने के बाद मैं सब पचा गई और शाम के लिए कढ़ी-चावल भी बना कर रखें हैं।" मुझे बहुत अच्छा लगा, मैंने कहा, "गन्ना रस पसंद हो तो रोज ही शीशी दे दिया करो मैं शाम को आते हुए ले आया करूंगा।
"भोला ला देगा ना, बहुत अच्छा बच्चा है।"  उसने मुझसे कहा।
 "कौन भोला?" मैंने आश्चर्य से पूछा।
"वही जो कचौड़ी गन्ना रस दे गया था।" उसने बताया।
"तुमने नाम पता भी जान लिया, मैं तो पहचानता भी नहीं।" मैं आश्चर्य से कहा ।
"ग्यारह-बारह साल का बच्चा खाना लेकर आएगा तो क्या उसका नाम नहीं पूछूंगी?  मैंने तो उसे केला भी दिया था पर उसने लिया नहीं।" कहते हुए सुलभा उदास हो गई।
अब कभी गन्ना रस, कभी गरम जलेबी, पोहा जो सुलभा का मन होता, मैं बैंक जाते वक्त पैसे दे जाता और होटल वाला घर पहुँचा देता। सुलभा खुश तो रहती परंतु उस बच्चे के कुछ नहीं लेने से उदास हो जाती थी। "उस लड़के के लिए एक जोड़ी चप्पल या सैंडल ला दोगे, बेचारा नंगे पैर आता जाता है।" एक दिन सुलभा ने कहा। बस वह पीछे ही पड़ गई तो मैं सैंडल की जोड़ी खरीद लाया।
 छठवां महीना था और गांँव में मांँ ने सुलभा के सातवें महीने की गोद भराई का कार्यक्रम रखा था। उनकी चिट्ठी आई थी कि बहू को ले आओ सातवें महीने में बस ट्रेन से यात्रा करना ठीक नहीं होता। हमने सोचा शनिवार-रविवार को गांँव चले जाएंगे और घर में पहले अतिरिक्त सामान को सुलभा व्यवस्थित करने लगी। कुछ बचे हुए मिर्च-मसाले अच्छी तरह से धूप में रखकर वह पैक करने लगी।
सब तैयारी हो गई तब उर्मिला को घर के साफ-सफाई की हिदायत देकर, सभी निर्देश मुझे सुनाकर ही सुलभा ने घर के बाहर कदम बढ़ाया। 
"ओहहो! भोला के लिए सैंडल लाए थे मैं तो देना भूल ही गई और इस सप्ताह हमने होटल से कुछ मंगवाया भी नहीं।" उसके चेहरे पर उदासी और माथे पर बल पड़ गए थे। 
"अब चलो भी ट्रेन का समय हो रहा है वापस आकर मैं दे दूंगा उसे।" मैंने बात संभाली।
आसपास की महिलाओं ने उर्मिला के साथ सुलभा को बाहर तक विदाई दी। उसके मुंँह में दही शक्कर खिलाकर, शुभ समाचार भेजने की बात कही। 
कैसी नियति है ईश्वर की रक्त संबंध तो नहीं होता परंतु रक्त बनाने वाले की सब संतान है यही नाता हमारी संस्कृति का पोषक है। अपनापन, प्रेम भाव की नींव पर ही समाज का सुंदर ढांचा खड़ा है जहां स्वार्थ की रेत आ जाती है तो कंपन जन्म लेता है। सुलभा को छोड़कर दो-तीन दिन में ही मैं वापस आ गया था। उसके बिना घर सिर्फ मकान था, उसकी उपस्थिति का एहसास मुझे हर वक्त होता रहता। मन को समझा लेता कि सुलभा गांँव में परिवार के बीच रहेगी तो उसे अच्छा लगेगा फिर अगले महीने गोद भराई में तो मैं कुछ दिनों के लिए जाऊंगा ही। कुछ ही महीने बाद इस घर में बच्चों की किलकारियां गूंजेंगी। 
दो-तीन दिनों में मुझे आदत पड़ने लगी। सुबह उर्मिला झाड़ू पोंछा कर जाती, चाय के बर्तन धो जाती। मैं कभी चाय के साथ डबल रोटी खा लेता तो कभी बिस्किट का पैकेट खत्म कर देता। कुछ और बनाने का समय ही नहीं रहता था। शाम को दाल-भात या खिचड़ी बनाने में मुझे बहुत मशक्कत करनी पड़ती है। इस बीच मैंने कई प्रकार की खिचड़ियां बनाईं।
सप्ताह भर बाद मुझे अचानक उसे सैंडल का ध्यान आया। दूसरे दिन बैंक जाते समय मैंने होटल में नाश्ता किया और पैसे देने के समय उस रंगीन चश्मे वाले से पूछा, "वह लड़का है ना जो मेरे घर सामान दे जाता था, क्या नाम है उसका… भोला, उसे आज शाम को घर भेज देना।" रंगीन चश्मे वाले ने मुंँह से कुछ कहा नहीं उसकी तोंड थरथराई तो पता चला वह हंँस रहा है। शाम को मैं घर पहुंचा तो देखा रसोई के फर्श में सारा दूध फैला था। मैंने शायद खिड़की खुली छोड़ दी थी और दूध का पतीला जाली वाली अलमारी में रखना भूल गया था।
"अरे यार! यह तो बड़ा काम हो गया अब इसे साफ करना पड़ेगा फिर खिचड़ी बनाई जाएगी।" ऑफिस के कपड़े बदलकर मैंने लूंगी लपेट ली और पोंछा लगाने लगा। दरवाजे की सांकल खड़खड़ाई।
"अब कौन है भाई इस समय!" मैं लुंगी ठीक करता हुआ बाहर निकला।
सामने वही होटल वाला बच्चा खड़ा था। दुबला-पतला, गोरा परंतु मैला, उलझे रुखे-सूखे बाल जो माथे से लटक कर आंँखों में घुसे जा रहे थे। लाल-धूसर सी कमीज़ जिसके बटन कुछ टूटे, कुछ खुले थे। पेंट तो इतनी चौड़ी कि उसमें उस जैसे दो समा जाएं। मैंने होटल में उसे देखा था परंतु इतने गौर से कभी नहीं। उसकी नज़रें नीचे थीं। मैंने उसे अंदर बुलाते हुए कहा, "तुम्हारे लिए कुछ लाया हूंँ देना था इसीलिए बुलवाया है। अंदर आ जाओ और दरवाजा टिका दो नहीं तो बिल्ली आ जाएगी।" कहता हुआ उसे बैठक में छोड़कर मैं अंदर वाले कमरे में चला गया।
करीब तीन-चार मिनटों बाद मैं वापस बैठक में पहुंचा। वहां का दृश्य देखकर मेरे हाथों से सैंडल का डिब्बा नीचे गिर गया। वह लड़का अपने कपड़े उतार कर, नंगा,  दीवार की तरफ मुंँह करके खड़ा था। मेरे हाथ पैर सुन्न  पड़ गए और शरीर पसीने से नहा गया। मैं उस पसीने के बहाव से बाहर आने के लिए छटपटाने लगा और जितना छटपटाता उतना ही मस्तिष्क विचारों के दलदल में फँसता चला जा रहा था। कुछ मिनटों तक शून्य में विचरते मस्तिष्क को अपनी मास्टरी का ख्याल आया। संवेदनाओं के तार झनझनाए और आदेश जिह्वा पर आ गया।
"क्या कर रहे हो पागल हो गए हो क्या? किसने यह सिखाया तुमको? तुम्हारा नाम भोला ही है ना! उठाओ अपने कपड़े पहनो!"  मैं गुस्से, अनजाने भय और दुख से उस लड़के पर चिल्लाया।
दो मिनट तक सब कुछ शांत रहा। मैं सिर पर हाथ रखकर सोफे पर बैठ गया। वह धीरे-धीरे मेरे करीब आया और उसने पैंट पहन ली। उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था, दृष्टि ऊपर की ही नहीं थी उसने। पूरे कपड़े पहनकर सर झुकाए खड़ा था।
" तुमने ऐसा क्यों किया? पहले भी ऐसा किया है कभी?"  मैंने दूसरा प्रश्न क्यों पूछा पता नहीं। उसके यंत्रवत व्यवहार से एक वयस्क आदमी कैसे पूछ सकता था यह प्रश्न।
"हांँ।" पहली बार उसने मुंँह खोला। नज़रें अभी भी नीचे जमीन पर थी।
"क्यों? कौन बोलता है करो, मैंने तो कुछ बोला ही नहीं और तुमने कपड़े उतार लिए। ऐसा कौन करता है?" मैंने कुछ आवेश से कहा।
"जो मुझे कुछ देता है वह सब लोग ऐसा करते हैं।" उसका स्वर सपाट था।
 "ऐसा कौन बोलता है बताओ मुझे।" मैं सब कुछ जान लेना चाहता था। 
वह चुप था। मैंने उसे पास बुलाया और सोफे पर बिठाया। मेरी उंगलियांँ उसके बालों पर फिरने लगीं। मेरी आंँखों से आंसू टपक कर उसके रूखे बालों को नम कर रहे थे।
"हे ईश्वर! इतने छोटे बच्चे पर इतना अत्याचार! कैसे और कब तक सहेगा यह?" मेरे दिल ने भी आँसू बहाना शुरू कर दिया था।
वह खड़ा हो गया। 
"मालिक को क्या बोलूं?" उसका कातर स्वर मेरे दिल में कतरा-कतरा कर टपकने लगा। 
"तेरे मालिक को सब पता है? वह रंगीन चश्मे वाला आदमी ना?" मैंने उससे पूछा।
"हाँ। वह मेरी सौतेली मांँ का यार है।  वही गांँव से लाया मेरे को। तीन-चार और लड़के हैं उसके पास। आपसे कल रुपया मांगेगा नहीं तो मेरे को खूब मारेगा। होटल में आपने ही मुझे शाम को भेजने कहा था ना।" पहली बार उसने नज़रें उठाईं।
सफेद आँखें लगता था पानी जमकर बर्फ बन गया है और कुछ समय बाद पुतलियांँ भी हिमखंडों में धंस जाएंगी।
 "क्या करूं, यह कैसी विडंबना आ गई भगवान!"  मैंने दिमाग पर जोर दिया और उस बच्चे से कहा, "तुम्हें तुम्हारा नाम, गांँव, पता सब मालूम है ना,  हम पुलिस के पास जाएंगे।"  एक आशा की किरण थी।
"हम तीन-चार लड़के हैं तो पुलिस वालों के पास रोज एक जाता है। वह मालिक फोकट में मिठाई-नमकीन हमारे से भेजता है पुलिस के पास।" उसकी आवाज ने सारे रास्ते बंद कर दिए।
अब मुझे अपनी नौकरी, अपनी इज्जत, इस कस्बे में अपने परिवार को रखने की सोच कर ही निर्णय लेना था। आखिरकार, मैं भी साफ-सुथरी छवि बनाए रखने वाला, पारिवारिक, संस्कारी आदमी होने में ही भलाई समझता था।
 "अपने मालिक से कहना कि मैं घर पर नहीं था। भाग जा, यह सैंडल ले जा मैडम ने तेरे लिए मंगवाए थे और दोबारा कभी इस घर में मत आना।" मैंने सैंडल उसके हाथों में पकड़ाया और उसकी ओर पीठ करके खड़ा हो गया। कुछ देर बाद दरवाजा खुलने और फिर बंद होने की आवाज आई। गेट की हल्की सी चरमराहट भी मुझे सुनाई दी।
मैं थोड़ा सा दरवाजा खोला और बाहर देखा। सड़क की बत्ती में उसे एक नियंत्रित मशीनी-चाल से चलते हुए अंधेरे में विलीन होते देखा। मेरे जीवन में भूकंप आया था इसके झटके शायद कई सालों तक मुझे हिलाते रहेंगे। उस रात मैंने छटपटाते हुए बिताई। मन में डर भी था कि वह मोटे रंगीन चश्मे वाला मुझ पर कोई आरोप ना लगा दे। सुबह-सुबह जब नींद लगी तो दूधवाले ने सांकल खटखटाई। 
नींद में  ऊंघता, बर्तन लिए मैं दूध लेने लगा।
"कल से दूध मत लाना। आज तक का पैसा ले जाओ, गांव जा रहा हूंँ। आने के बाद उर्मिला से खबर भेज दूंगा।" मेरे मुंह से निकलता गया। पैसे लेकर डिब्बा उठाए वह चला गया।
बैंक में मैंने सुलभा की तबीयत खराब होने की बात कहकर, गांँव जाने की तैयारी कर ली। शाम को सब पैक करके उर्मिला को बाहर आंँगन की सफाई करने की बात समझा कर मैं बस से निकलने के लिए तैयार ही था कि आंँगन में वह लड़का खड़ा था। उसकी नज़रें मुझ पर टिकी थीं। मैं एक क्षण के लिए घबरा गया था। उस एक क्षण में कई विचार मेरे मन में तूफान उठने लगे थे। 
"मैंने मालिक से बताया कि मैडम ने मुझे यह सैंडल दी है आप घर पर नहीं थे। मालिक ने मुझे चैक किया और आपको गंदी गालियां दी कि आपने उसकी कमाई खराब कर दी।" उसने वह सैंडल अपनी छाती से लगा लिया जैसे कोई नायाब हीरा मिल गया हो। उसके आंँखों की बर्फ पिघलने लगी थी। पुतलियांँ नमी में नहाकर चमकने लगी थीं। वह चला गया। मैं भी बस में बैठकर गांँव आ गया। मेरे अनमने रंग-ढंग को देखकर भाभी और चाचियांँ मुझे ताने मारने लगीं। सुलभा ने भी गुस्सा किया,  "इतनी जल्दी क्यों आ गए? यहां सब क्या बोलेंगे?"
किसी को क्या समझाता, कैसे बताता मेरी मानसिक स्थिति मुझे परेशान कर रही थी। गांव में ही रहते हुए मैंने स्थानांतरण की अर्जी भेज दी। सुलभा की अवस्था, पारिवारिक ज़िम्मेदारियों का हवाला देकर तीन-चार महीने बाद मुझे दूसरी जगह का आदेश मिल गया। इस बीच में बैंक के किसी बैचलर मित्र के यहां रहकर समय निकलता और बैंक के कुछ जरूरी काम निपटा कर वापस गांँव आ जाता था।
उत्तरा के जन्म के बाद मांँ को साथ लेकर हम पोस्टिंग वाली नयी जगह चले गए। सुलभा बच्ची के पालन-पोषण में व्यस्त होती गई और मैं अपने बैंक के कार्यभार में। समय ने उस घटना को धुंधलाना शुरू कर दिया था। 
"उत्तू के लिए चींचीं बजने वाली सैंडल लाना है, चलेगी तो खूब मजा आएगा।" सुलभा ने कहा और अचानक उसे कुछ याद आया। 
 "भोला के लिए सैंडल लाए थे, दिया था उसको? बेचारे के नंगे पैरों को देखकर बहुत बुरा लगता था तुमने?" वह भोला और उर्मिला को याद करने लगी। 
 "दे दिया था, बहुत खुश था वह।" मैंने कह तो  दिया परंतु उस घटना का जिक्र मैंने सुलभा से कभी नहीं किया। जो भोला के पैरों के जलन, उसके दुख से दुखी हो जाती थी, उसके अंग-अंग के दोहन का सुनकर शायद दिमागी संतुलन ही खो देती।
 "डिंग-डोंग, डिंग-डोंग!" डोर बेल बजी और मैं आज की दुनिया में वापस आ गया। 
दरवाजे से घुसती सुलभा बड़बड़ाई , "पाँच-छह बार घंटी बजाई पर तुम्हें सुनाई ही नहीं देता।" वह बाथरूम की ओर बढ़ गई।
 "बालकनी में बैठा था, यहां आवाज कम ही आती है ना।"  मैंने उत्तर दिया।
तुलसी के पास दीपक जलाती हुई वह बोली, "मंदिर जाते समय कुछ किराना सामान लेकर भेज दिया था जीतू से, लाया था ना?" उसने पूछा।
 "दे  गया था और अब किसी से घर तक सामान मंगवाने की जरूरत नहीं है। मैं रिटायर हो गया हूंँ खुद ले आऊंगा।  महीने भर के लिए सामानों की सूची बना लिया करो, सब ले आएंगे एक साथ यदि कुछ कम पड़ता है तो मैं ला सकता हूंँ।"  मैंने अपना निर्णय रख दिया।
 मेरे सेवानिवृत्त जीवन में काम की जरूरत को समझ कर, दीपक के आलोक में सुलभा के हल्के झुर्री पड़े गाल अनायास ही फैल गए।
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रविवार, 22 फ़रवरी 2026

अब तक प्रकाशित एकल एवं साझा साहित्य, प्राप्त पुरस्कारों का विवरण।

जीवनवृत्त (सहपत्र)

९ . अब तक प्राप्त पुरस्कारों का विवरण -

2020-21 "मुट्ठी भर क्षितिज" कहानी संग्रह को अखिल भारतीय लेखिका संघ म.प्र. द्वारा गिरजावती देवी पुरस्कार।

2023-24 "मुट्ठी भर क्षितिज" कहानी संग्रह को स्व. सिद्धार्थ वाटवे स्मृति विद्योत्तमा साहित्य शिरोमणि सम्मान नासिक महाराष्ट्र में प्राप्त।

2025 कथा समवेत अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता सुल्तानपुर में कहानी "गंध" को प्रथम पुरस्कार।

2025 शब्द निष्ठा लघु कहानी प्रतियोगिता में पुरस्कृत।

2024 विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान दिल्ली द्वारा आयोजित अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता में कहानी "दायरे" पुरस्कृत।

2024 "रोशनी की अमरबेल" कहानी संग्रह को क्षितिज कृति सम्मान।

2024 सुरेश शर्मा स्मृति सम्मान क्षितिज साहित्य संस्था इंदौर द्वारा प्रदत्त।

2023 निरंजन जमींदार स्मृति लघुकथा सम्मान क्षितिज साहित्य संस्था इंदौर द्वारा प्रदत्त।

2023 सिरसा हरियाणा द्वारा सुगनचंद मुक्तेश स्मृति लघुकथा सम्मान में लघुकथा "किरायेदार" को प्रथम स्थान प्राप्त।

2023 अहिल्यानगर महाराष्ट्र में लघुकथा "बदलते ज़ायके" को आचार्य जगदीश चंद्र स्मृति लघुकथा पुरस्कार प्राप्त।

2022- साहित्य समीर दस्तक पुरस्कार भोपाल प्राप्त।

"हकीकत" को श्रीमती कृष्णा देवी सारस्वत लघुकथा सम्मान भोपाल प्राप्त।

अंतरा समूह लेखन स्पर्धा में पुरस्कृत।

2021 कथा दर्पण साहित्य लघुकथा में लघुकथा "शक्ति" को प्रथम पुरस्कार।

2020 अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता में "सोंधी महक" को प्रथम पुरस्कार प्राप्त।

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 जीवनवृत्त (सहपत्र)

८ . प्रकाशित साहित्य - 

एकल संग्रह -

2019-  मुट्ठी भर क्षितिज (कहानी संग्रह)

2024- रोशनी की अमरबेल (कहानी संग्रह)

2024- सोंधी महक (लघुकथा संग्रह)

प्रकाशनाधीन -

 काके लागूं पाय (व्यंग्य संग्रह)
गंध (कहानी संग्रह)

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साझा संकलन -

2025- "आरथ अमित अति" 100शबदों की लघुकथाओं का संकलन।
लेखनी महोत्सव 25 में लघुकथाओं का साझा ई-संकलन।

2023- "काम जु आवै कामरी‌" मुहावरों की लघुकथाओं का संकलन।

 लघुकथाएं: इक्कीसवीं सदी के दो दशक।

"बोझ हम उठाते हैं" ( कुली जीवन पर संकलन)

2022- "हिंदी हाइकु कोश" संकलन।
 "आगाज़" साझा ग़ज़ल संकलन।
 "कतौता की कलियांँ" संकलन।

2021- "ज़िंदगी ज़िंदाबाद" कोरोना काल पर संकलन।

 "विभाजन त्रासदी की लघुकथाएं" संकलन।

 "समसामयिक लघुकथाएं"  संकलन।

2020- "सेदोका की सुगंध" संकलन।

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

खुली फाइल पड़े छींटे (अट्टहास हेतु)

खुली फाइल, पड़े छीटे 

रंग, गुलाल के साथ कीचड़ के छीटे तो आम आदमी रोज ही झेलता है और इससे ज़्यादा रंगीनी उसके क्लास में फिट नहीं बैठती। खास लोगों को खास प्रकार के छींटों से सज्जित होने की आदत होती है जब तक छींटों की बौछार ना हो वो खास किस्म की कैटेगरी में नहीं रखे जा सकते। समाचार-पत्रों, टेलीविजन और सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उनके खास जीवन के रंगों की झलकियांँ देखने वाला आम आदमी ही होता है।‌आम लोगों की तरह आम दाग, धब्बों से परहेज करने वाला खास वर्ग के दागों की महिमा भी उनकी तरह अपार होती है।

अक्सर होली के रंग-बिरंगे त्यौहार पर साफ-सफेद कपड़ों में, चुटकी भर रंग चिपकाए घूमने वाले लोगों को, बड़ी फ़ाइलों, बड़े केस के खुलने से लगने वाले छींटे पसंद आते हैं। कोई सामान्य थोड़े ही हैं कि बस पोत लिए रंग, गुलाल दस-बीस रूपयों का और बन गए रंगीला रे। रंगीलेपन के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं, तुम क्या जानो आम आदमी। 

बांकेलाल भी आम आदमी ही थे। होली के दो दिन पहले सड़क पार करते समय, पीठ पर फचाक..करता गुब्बारा फूटा। तैश में आकर हाई वाल्यूम में चिल्लाए, "अभी से रंग मार रहे हो, हिम्मत है तो सामने आओ। पीठ पर वार करते हो।" उन्होंने सारी कोशिशें कर लीं कि कमीज़ किस रंग से रंगी है देख पाएं परंतु असफल रहे। मन ही मन खुश हो रहे थे कि अभी पचास की उम्र में भी उनको रंगने वालों की कमी नहीं है। आम आदमी तो चंद रंगों से भीगकर ही, खुशी से पूरा जीवन निकालने के लिए पैदा होता है। 

घर पहुँच कर अपने रंगने के रंगीन किस्सों का रंग, पत्नी पर चढ़ाते कि सामने का दृश्य देख बांकेलाल का रंग उतर गया।
"होली पर दीवाली की सफाई क्यों कर रही हो?" आलमारी की सारी डायरियांँ, पुरानी नयी फाइलों का ढेर लगाए बैठी पत्नी से बांकेलाल ने पूछा।
"सफाई तो करनी ही पड़ेगी ना, ना जाने किस फाइल में क्या मिल जाए?" उसकी आँखों के पैनेपन‌ ने बांकेलाल को और खास बना दिया। किसी की फाइलें निकाली जाए, जाँच-पड़ताल हो, आस-पड़ोस में कुछ कानाफूसी हो, आम आदमी बैठे ठाले खास बन जाता है।
खास किस्म की दबी-छुपी फ़ाइलों के पन्ने बाद में खुलते हैं पहले उनके खुलने का संदेश, सोशल मीडिया पर वाइरस की तरह वाइरल हो जाता है।‌ हर चैनल, हर पोस्ट अपनी अपनी रंगीन कहानियों का पिटारा खोले, टी.आर.पी.और लाइक्स कमेंट्स बटोरने में लग जाते हैं। 
बांकेलाल की पत्नी ने डायरियों के पन्ने खोले और व्रत त्यौहार की कथा की तरह बांचने लगीं। पोंछा लगाती सहायिका, बच्चों के ट्यूशन टीचर खड़े होकर चटकारे लेकर, बांकेलाल जी के अतीत का स्वाद चख रहे थे।

"पुरानी बातों को क्यों पढ़ रही हो, दूसरे की डायरी पढ़ना सभ्यता नहीं है।" बांकेलाल ने डायरी छीनते हुए कहा।
"तुम आदमियों को अच्छी तरह समझती हैं औरतें, कितने दिनों दौरे में निकालते थे, भूली नहीं हूँ।" बड़बड़ाती हुई वो बिस्तर पर मुँह लपेटे सो गईं।

खास किस्म के लोगों की, खास समय, खास अवसर की विदेश में फाइल क्या खुली, छोटे बड़े सरकारी, गैर-सरकारी कार्यरत, सेवानिवृत्त सभी आम लोगों के जीवन में झांकने वालों की संख्या में अकस्मात इजाफा हो गया।

सात दिनों तक की बढ़ी टी. आर. पी. ने, टेलीविजन के समाचारों को फुल टाइम उस फाइल का कवर पेज बना दिया। उसका असर आम आदमी की जिंदगी को बदरंग कर देगा, बांकेलाल से बेहतर कौन समझ सकता है। दूसरों की खुलती फाइल ने उनकी होली में संदेह की फुलझड़ी, आरोपों के फटाके फोड़ दिए हैं।

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सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

चुनावी बिगुल पर लुढ़कते लोटे..नई दुनिया अधबीच रायपुर 17/2/2026

चुनावी बिगुल पर लुढ़कते लोटे


ताँबे, पीतल, कांँसे और स्टील के लोटों की तरह, अपनी विशिष्टता लिए बिना पेंदी के लोटे, चुनावी समर के पालों में लुढ़कते देखे जा सकते हैं। गुणवत्ता के मामले में पानी से भरते ही डोलने वाले इन लोटों से स्थिर सरकार की इच्छा रखना, जनमानस की मृगतृष्णा वृत्ति का एक बढ़िया उदाहरण है। खेतों में सुबह-सुबह फारिग होने के लिए भी बिन पेंदी के लोटे साथ लेना, आने वाली विपदा को बुलावा देना है। अपना मत देकर अपने पाँच साल इनको सौंपना, कितनी विपदाओं को  आमंत्रित करना है, समझा जा सकता है।

 इस गुणवत्ता से परिपूर्ण बांकेलाल ने पिछली पार्टी छोड़ दी और इस पार्टी की ओर लुढ़क गए। कार्यक्रमों में दरी बिछाने से लेकर नेताजी की कार का दरवाजा खोलना, रात-रात भर गाँव शहर की गलियों की धूल छानने से मंच का संचालन करना और सबके आगे-पीछे चिपककर फोटो खींचवाने वाले कर्मठ, वाकपटु बांकेलाल को जब पार्टी टिकट नहीं मिली तब उन्हें दूसरी ओर लुढ़कने में अपने भविष्य नज़र आया।

नगरपालिका के चुनावों की घोषणा हुई और नुक्कड़ की टपरी पर, चाय सुड़कते बांकेलाल ने हमें रोक लिया।

"इस बार जीत गई पार्टी तो ये कचरे का ढेर, खुला नाला, पीने के पानी की समस्या दूर हो जाएगी।" उन्होंने गर्दन लचकाई।
"आपकी पार्टी का चिन्ह घोड़ा है ना।" हमने पक्का किया।
"अजी घोड़ा अमीरों की शान है। हम तो गरीब, साधारण लोगों के आदमी हैं तो हमने वो भाई-भतीजावाद वाली पार्टी ही छोड़ दी। अब हमारी पार्टी का चिन्ह है..।" दूर चरती भैंस की ओर उन्होंने अँगुली दिखा दी।
"अच्छा।" हमारे नैन पिटारे के ढक्कन से खुल गए।

पहली पार्टी गुलाब चिन्ह को त्याग घोड़े की ओर लुढ़के अब भैंस पर रीझे बांकेलाल ने भैंस के लाभ, उसकी ग्रामीणता संग पार्टी को जोड़ने का अद्भुत प्रयास किया।

टपरी पर मजमा जमाकर उन्होंने भैंस को राष्ट्रीय प्राणी घोषित कर दिया।
चुनाव सिर पर खड़ा हुआ और गली-मोहल्लों पोस्टरों से सज गए। बेरोज़गारी इन दिनों दुम दबाए, मुँह छिपाए बैठी थी।

 समोसा, कचौड़ी और शाम को मिलने वाले सौ रूपयों ने इलाके के सभी नवजवानों की बेरोजगारी समाप्त कर दी थी।

जिसकी दीवारों, छतों पर  जिस पार्टी का बैनर, पोस्टर फड़फड़ाता, उसकी जेब में नोट भी फड़फड़ाते। कई घरों की दीवारें एक साथ दो-दो, तीन-तीन उम्मीदवारों के पोस्टर सीने से लगाए, घर मालिक की जेबें भारी कर रही थीं।

पोस्टरों के बाज़ार में, कोने की जगह में बाँकेलाल की तस्वीर नज़र आई।  चुनाव चिन्ह देखकर हमने चश्मा साफ किया। भैंस की जगह चूहा देखकर, हमें अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। 

उनके द्वारा प्रदत्त रोजगार वाले दो युवक, आटो रिक्शा पर चिल्लाते हुए घूम रहे थे।

"इस क्षेत्र के निर्दलीय प्रत्याशी बांकेलाल जी को, गणेश जी के वाहन  'चूहा' निशान पर वोट देकर विजयी बनाइए।" 

गुलाब से घोड़ा, घोड़े से भैंस और अब चूहे पर लुढ़कते इस पोस्टर पर चिपके बांकेलाल, शायद इस नये चिन्ह पर विरदावली तैयार करने में जुट गए थे।


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शर्मिला चौहान 
ठाणे (महाराष्ट्र)

शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

जोगीरा..होली

होली पर जोगीरा


1.फागुन में फगुनाता आया, छैला बांकेलाल।
कहीं निगाहें कहीं निशाना, डगमग होती चाल।
जोगीरा सा रा रा रा रा..

2 .मंद हुई है गुंडागर्दी, बढ़ता यूपी आज।
दुनिया देख रही है सारी, बुलडोजर का राज।
जोगीरा सा रा रा रा रा..

3 . जमकर ढ़ोल बजाता आता, हर मौसमी चुनाव।
जनता सब कुछ जान गई है, उल्टे पड़ते दाँव।
जोगीरा सा रा रा रा रा..

4 .पीकर भांग मस्त चुन्नू ने, कुत्ते से की बात।
 तू तो जंगल का था राजा, कबसे बदली जात।
जोगीरा सा रा रा रा रा..

5 .रासरंग में डूबे बांके, रंग लगाते लाल।
बीबी नहीं पड़ोसन थी वो, सिर पर बचे न बाल।
जोगीरा सा रा रा रा रा...

6 . भारत की इक ओल्ड पार्टी, जाती हार चुनाव।
ईवीएम को दोषी कहती, डूबी उनकी नाव।
जोगीरा सा रा रा रा रा..

7 .नया बखेड़ा रोज उठाते, बांके जी का जोश।
हाथ जेब में डाले रहते, दुनिया का ना होश।
जोगीरा सा रा रा रा रा..
8 .तंत्र बुद्धि से खींची फोटो, खूब मारते शान।
पास दिखे पहचान न आए, झूठा गढ़ते ज्ञान।
जोगीरा सा रा रा रा रा..
9 . मुँह पर रंग लगाकर आए, घर में बांकेलाल।
भैया कहती आई पत्नी, होली बड़ी कमाल।
जोगीरा सा रा रा रा रा...

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

रंग ले चुनरिया - व्यंग्य

रंग ले चुनरिया (व्यंग्य यात्रा के लिए भेजी)


फागुन का खुमार प्रकृति की हर चीज़ पर हावी था। पेड़-पौधों, मौसम ने होली का रंगीलापन शुरू किया तो बांकेलाल भी, फगुनाई की बयार से बौरा गए। टेलीविजन चालू किया तो लोकसभा में विराजमान  खास सभासदों के बीच, छींटें-बौछार का नज़ारा देखने को मिला। एक ने उठकर सामने बैठे विपक्षी के तीन-चार पीढ़ियों तक रंग डाल दिया और खुद बेदाग बैठ गए।

मेजों पर हाथ पटककर, आने वाली होली के ढोल-नगाड़ों का पूर्वाभ्यास, ललामी पर था। कुछ अपने मन की भड़ास निकाल कर, जेब में हाथ डाले घर की चाबी खोजते तुरंत निकल गए। 
पक्ष-विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप के गुब्बारे फेंके जा रहे थे जिन्हें कभी-कभी सामने बैठे स्पीकर महाशय पकड़ लेते। अक्सर तो इन गुब्बारों से बचकर वो भी बेदाग दिखने को लालायित रहते। इस भवन में कई रंगों की चूनर लहरा रही थी। भगवा, हरी, नीली के बीच तीन रंगों की वो चूनर जो माँ भारती को पसंद है, कहीं दब गई थी।

रोज-रोज की चिल्ल-पों से परेशान पत्नी ने तीखी बौछार की, "दिन-रात इनकी महाभारत में बैठे संजय की तरह कॉमेंट्री करते हो, जरा कभी कुछ अच्छा भी देख लिया करो।" बांकेलाल ने आज्ञा का पालन करते हुए चैनल बदला तो समाचार लग गया।
तूफानी गति से शब्दों की बरसात करते उस प्रवक्ता की सांसें फूल रही थीं। बांकेलाल को लगा कि उसका विकराल रूप, उनकी ही  धड़कन बंद ना कर दे, उन्होंने झट चैनल बदल दिया।

सामने मंच पर कवि जाति के चार लोग बैठे थे। प्रायोजित कार्यक्रम में श्वेत कुर्ता, गालों पर करीने से लगाया लाल, गुलाबी और पीला रंग, होली की वास्तविकता से दूर फिल्मी लग रहा था। सामने प्लेट में ए.आई. से बने सजे गुझियों को देखकर पत्नी भिनभिनाईं।

"औरों के घर बन गए गुझिया, हमारे यहाँ तो बस अकेले मरो खपो।" फिर कहने लगीं, "तुम्हारी कविताओं से कम परेशान हैं क्या हम, जरा कुछ ढ़ंग का लगाओ।" 

अच्छे चैनल, अच्छा समय, अच्छा कार्यक्रम, अच्छे दिन को तलाशते बांकेलाल ने एक चैनल पर विराम लिया।
सामने हीरो-हीरोइन बगीचे में होली की धूम मचा रहे थे। हीरो की पत्नी‌ और हीरोइन का पति, दोनों की इस मस्ती में कभी इसको देखते कभी उसको। बांकेलाल को लगा यही हाल देश की जनता का है जो कभी सरकार की बातों पर मुड़ती है तो कभी विपक्षी दल की ओर देखती है।
"ये फूहड़ गाना लगाकर क्या दिखाना है। बताओ, पत्नी सामने बैठी है और दूसरे की बीबी को रंग लगा रहा है।" बांकेलाल की पत्नी गुर्राई।

बांकेलाल कोई बहस नहीं चाहते थे। बस चैनल बदलने ही वाले थे कि बिजली बंद हो गई। आसपास सबके घर टेलीविजन चालू देख, बांकेलाल के दिमाग की बत्ती जल गई। पिछले दो महीनों से बिजली बिल भरा नहीं था उन्होंने, चप्पल पहने और तुरंत बाहर हो गए।
"अंकल, नगरपालिका के चुनाव में जीत गए तो अगले साल पूरे वार्ड के‌ लिए होली का आयोजन करवा देंगे। खाना, गाना और पीना भी फ्री..!" उस नवयुवक ने रंग-बिरंगा जाल फेंका।
उस रंग-बिरंगे जाल को अपनी झक सफेद बत्तीसी से काटते हुए बांकेलाल मंजिल की ओर बढ़ गए।

बिल भरकर बांकेलाल ने कर्मचारी से कहा, "बिल तो भर दिया, तुरंत बिजली चालू करवा दो। त्यौहार का समय है।" 
"आपने दो महीने सोचा फिर पैसे भरे, हमको दो दिन की तो मोहलत दो।"  कर्मचारी को भी तो रंगारंग होली करने का अधिकार था।
"दो दिन क्यों भाई, जैसे काटा वैसे जोड़ दो‌ अभी।" बांकेलाल अर्दली की तरह मिमियाने लगे।

"काटने और जोड़ने में फ़र्क है साहब।" उसने दार्शनिकता की चूनर ओढ़ ली थी।‌ 
"बिजली चालू करने वाला आज छुट्टी पर है।" काउंटर पर बैठे उस कर्मचारी ने बेफिक्री से कहा।
"कमाल करते हो, एक आदमी पर पूरा बिजली विभाग टिका है क्या?" बांकेलाल का रंग गुस्से से बदलने लगा।
"साहब, एक आदमी पर पूरा देश टिका है। दूसरे आदमी पर पूरा विपक्ष टिका है तो क्या बिजली विभाग इस देश से बाहर है?" अब उसकी चूनर विशुद्ध राजनैतिक थी।

"अर्जेंट हो तो पूरे हजार लगेंगे, आपके घर पहुँचने से पहले, महंगाई की तरह तेजी से दौड़ती बिजली पहुँच जाएगी।" वह जीते हुए उम्मीदवार की तरह मुस्कुरा रहा था।
पत्नी का कुपित चेहरा ध्यान आते ही बांकेलाल ने जेब से गुलाबी रंग की शॉल वाले तीन बापू, नीले रंग से सजे चार निकालकर काउंटर पर रख दिए। बापू को सफेद रुमाल में लपेटकर फौरन उसने जेब के हवाले कर लिया। 
"वाह बापू, लकड़ी टेककर, सहारा लेकर चलते थे लेकिन अब तो सरपट एक जेब से दूसरी जेब में भागते हो। लगता है मेरी जेब आपको आरामदायक नहीं लगी।" मन ही मन सोचते बांकेलाल घर की ओर वापस हुए।

रास्ते में मिठाई की दूकान देखकर जेब टटोली। एक गुलाबी बापू अभी भी पैर जमाए मिले। 
"लड्डू कैसे भाई?" बांकेलाल ने मिठाई वाले से पूछा। 
"शुद्ध घी के बारह सौ  रुपए किलो, दूसरे हजार।" उसने बताया।
"बाप रे बाप, दो महीने पहले तो दाम आधे थे।" बांकेलाल की आँखें रसगुल्लों की तरह फ़ैल गई।
"बजट देखा ना आपने, किस चीज में कमी मिली जो आपको मिठाई कम में चाहिए।" बेफिक्री से बोला, "जो चाँदी का वर्क लगा हुआ लड्डू है उसका तो आप दाम ही मत पूछो। वह आपके जेब का नहीं है।"  आम आदमी की जेब का पता उसके चेहरे से हो जाता है।

गुलाबी बापू को सीने से लगाए बांकेलाल घर आ रहे थे। सोसायटी के लोगों ने घेरकर प्रश्नों की बारिश कर दी।
"आपने होली के आयोजन का पैसा दिया?" एक बोला।
"आप तो रंग स्पांसर करने वाले थे ना, आज शाम तक दे दीजिएगा। कल सुबह से ही ड्रम में घोल देंगे।" दूसरे ने कहा।
"कौन-कौन सा रंग लाना है?" बांकेलाल पूछने लगे।
"जिस रंग में आप अपने को रंगे देखना चहते हो, वही ले आना।" पहले ने कहा। 
घर आते हुए, खूबसूरत रंगों की दुनिया में विचरते बांकेलाल, सोसायटी के फैले पानी पर फिसल गए। चेहरे का रंग धूसर, श्यामल हो गया।
घर का दरवाजा खुला तो पत्नी टेलीविजन पर चलते गाने के साथ सुर मिला रही थी।
"लाल ना रंगाऊं मैं हरी ना रंगाऊं, श्याम रंग में रंग दे चुनरिया..।" 

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शर्मिला चौहान