"प्रेम गली अति सांकरी"
फेसबुक और व्हाट्स एप के ज्ञानियों की सभाओं में लगातार शामिल होने वाले मधुर के मन में, आत्मा, परमात्मा, नश्वर संसार, मोह-माया के विषय में उत्सुकता बढ़ने लगी थी। हर नई पोस्ट उसके हृदय में ज्ञान की एक और बत्ती जलाने को तैयार रहती।
इस बीच पत्नी कोकिला का छोटे भाई के शादी की तैयारी के लिए दो महीने मायके जाने के निर्णय ने, बंधनों से मुक्ति के सारे रास्ते खोल दिए।
सुबह-शाम रेस्टोरेंट के चटकदार खाने ने, ईश्वर के सामीप्य का अहसास करवाया।
"हैलो! फोन क्यों नहीं उठाते, तीन-चार बार कर चुकी?" नाम के विपरीत स्वरों की मलिका, पत्नी कोकिला दूसरी ओर थी।
"मैंने जीवन के भौतिक सुखों का उपयोग कम कर दिया है।" मधुर का संयमित स्वर था।
"अच्छा, जब देखो ऑनलाइन दिखते हो, बातें बना रहे हो। ये कहो मेरे बिना मन नहीं लगता, घर नहीं संभलता।" आवाज़ में कुछ मीठापन परोसा कोकिला ने।
अचानक मधुर की आँख फड़कने लगी। चुनाव परिणामों की सुगबुगाहट की तरह, उसके मन में आने वाले समय के लिए आकुलता होने लगी।
"मैंने जीवन की यथार्थता को समझ लिया है। मन की चंचलता को बाँधकर, संयम से जीना ही अब मेरा ध्येय है।" गुफा के अंदर से मधुर की गंभीर आवाज़ आई।
"अच्छा, किस नौटंकी में काम कर रहे हो आजकल? सब छोड़ो, जब हमारे छोटके के तिलक में आओगे तो हेमा भाभी से हमारा ब्लाउज़ ले आना। गली के आखिरी वाला घर, छोटा बोर्ड लगा है।" कोकिला के आवाज़ की मिठास का अर्थ अब साफ़ हो गया था।
"ग़लती से राजनीति में कुशल यह स्त्री उसकी पत्नी बन गई, वरना दो-चार मंत्रालय तो अकेले संभाल लेती।" सिलाई वाली हेमा भाभी के घर का नक्शा मस्तिष्क में, बेनाप वाली टोपी की तरह फिट कर लिया मधुर ने।
पत्नी की राजाज्ञा के वशीभूत अगली सुबह ऑफिस के पहले ही मधुर ब्लाउज़ का पता लगाने चला गया।
"इस गली में साइकिल न घुसे, तुम मोटरसाइकिल ले चढ़ आए।" अपने घर की अतिरिक्त फैली सीढ़ियों पर बैठकर समाचार पढ़ते एक महाशय ने कहा।
"गली तो संकरी है ही, आपके देहरी फैल कर आधी गली में पसर भी गई है ना।" मधुर ने उनको उत्तर दिया।
सात-आठ फीट की संकरी सी गली के दोनों ओर नल के बर्तन की लाइनें, लोगों के बढ़ाए चबूतरे, सीढियांँ और ऊपर लटकाए गमले कुकुरमुत्ते की तरह पनपे दिखे।
"कहाँ हैं ये "दिव्य भव्य सिलाई सेंटर"? हर घर में लटकते विविध बोर्डों को देख मधुर चकरा ही गया।
अचानक दो बोर्डों की टकराहट से, बारीक कद-काठी का बोर्ड सहम कर, निर्दलीय उम्मीदवार की तरह अलग हो गया।
"अरे बाप रे, इस घर में दो-दो बिजनेस चालू हैं।" सिलाई सेंटर और साथ ही लैला ब्यूटी पार्लर के बोर्ड एक दूसरे से उठा पटक खेल रहे थे।
"कोई है क्या घर में?" बाहर से मधुर ने आवाज़ लगाई।
अंदर शांति थी।
"अरे कोई रहता है क्या यहाँ या सिर्फ बोर्ड लटका रखे हो?" जरा जोर से आवाज़ लगाई मधुर ने।
तीसरी बार मुँह खोला तो खुला ही रह गया जैसे चलती टीवी के बीच जब इंटरनेट मंद हो जाता है तो परदे पर के सभी, जहाँ के तहाँ स्थिर हो जाते हैं।
"दरवाजे पर लगे बटन को जरा टच कर देते तो इतना माथा न फोड़ना पड़ता सुबेरे सुबेरे।" लाल चमकता सलवार सूट, मेकप की परतों के बीच उभरती लाल बड़ी बिंदी, लाल लिपस्टिक और लाल परांदे लगी चोटी को अँगुलियों पर तीन सौ साठ डिग्री घुमाती लाल परी सामने खड़ी थी।
"मुझे ब्लाउज चाहिए था।" कुछ हकलाते हुए मधुर भुनभुनाया।
"मैं मुंबई क्या चली गई कुछ सालों के लिए, अक्खे शहर की हवाइच बदल गई। मर्द भी ब्लाउज़ पहनने लगे, अइसा तो मुंबई में भी नहीं देखा।" उसकी आँखें महंगाई की तरह बढ़ती जा रही थी।
"नहीं-नहीं, मेरी पत्नी का ब्लाउज है। उसने भेजा है मुझे, वो मायके गई है।" एक ही साँस में उगल गया मधुर।
उसने मधुर को ऊपर से नीचे तक मापा, ताका और कहने लगी, "लैला ये सिलाई विलाई नहीं करती। अपुन थोबड़ा बदल कर देती है। काले को गोरा, गिरगिट की तरह बालों का बदलता रंग, बॉडी मसाज, मैनीक्योर, पैडीक्योर सब करती है मैं। अपनी बीबी को भेज देना, चुनाव में जीते नेता की तरह एकदम बदल जाएगी।" उसने ज़रा विशेष अंदाज में कहा, "मर्दों का भी बॉडी मसाज करती है मैं। स्पेशल रेट रहता है, आ जाना। अभी तो बीबी भी नहीं है।" उसकी आँखें कंचों की तरह घूम रही थीं।
मधुर कुछ बोलता इसके पहले अपने परांदे का हल्का स्पर्श कराती वह, सपने की तरह गुम हो गई। एक अजीब सी सरसरी मधुर के शरीर में दौड़ गई।
"क्या चाहिए आपको?" एक शांत और वर्तमान सरकार सी स्थिर, धीर-गंभीर आवाज़ से चौंक कर मधुर ने पीछे मुड़कर देखा और महंगाई की तरह उसका मुँह बढ़ता चला गया।
"आपपप.!" सामने रूपरेखा, कपड़े बदले लैला खड़ी थी।
"आपने इतनी जल्दी सब बदल कैसे लिया?" मधुर हड़बड़ा गया।
सफेद साड़ी पहनी, माथे पर चंदन का टीका लगाई, बालों को कसकर लपेटी एक सौम्य स्त्री।
"आप तो अभी लाल परी बनी घूम रही थीं अब एकदम साध्वी का रूप।" मधुर का मुँह सुरसा की तरह खुलता ही गया।
"लगता है आप मेरी जुड़वां बहन लैला से मिल चुके हैं।" शांत, संयत स्वर में उसने आगे कहा, "मैं हेमा हूँ, कपड़ों की सिलाई करती हूँ। बताइए क्या काम है?"
मधुर के दिमाग को संकरी गली में सीता और गीता, चालबाज फिल्मों की नायिकाओं ने प्रवेश कर लिया। मंथन प्रारंभ हुआ और उसमें से लैला और हेमा रुपी मक्खन बाहर आने लगा।
"मेरी पत्नी कोकिला ने अपना ब्लाउज लाने को कहा है।" मधुर ने बताया।
"अच्छा-अच्छा, कोकिला जी के ब्लाउज़ नहीं बने। पाँच हैं तो अगले सप्ताह ही बताया था मैंने।" हेमा का स्वर मधुर के कानों से हृदय में घुलने लगा।
"पाँच ब्लाउज़, मुझे तो बताया नहीं। कब इतनी साड़ियांँ खरीद लाई पता नहीं।" स्त्री हाथों में बजट सौंपने के भारी नुकसान का अनुभव करके उसने लंबी साँस ली। अपनी बनियान का छेद अब रह-रहकर, उसकी आँखों के सामने अट्टहास लगा रहा था।
"ठीक है, बाद में आ जाऊंँगा।" कहता हुआ वह तेज़ी से बाहर आ गया।
"कभी फेशियल, मैनीक्योर पैडीक्योर के लिए अपनी कोकिला को भेज देना, चमका देगी एकदम झकास हाँ।" दरवाजे पर खड़ी लाल परी अब सिग्नल बनी हाथ पसारे उसे रोक रही थी।
जल्दी-जल्दी गली पार करने लगा कि पीछे से एक अधेड़ आदमी ने आवाज़ दी।
"मोटरसाइकिल क्या हमारे लिए लाए थे बाबू, जो संकरी गली में खड़ी करके हवा खाने जा रहे हो।" लुंगी ऊपर कसते हुए वह टेढ़े मुँह से मुस्कुराया।
नई-नवेली दुल्हन सा झेंप गया मधुर, अपनी प्रियतमा को कैसे भूल गया था वह, पता नहीं।
ऑफिस में भी दिनभर भी उस संकरी गली में भटकता रहा वह। ओरिजिनल और डुप्लीकेट चेहरा पहचानने की कोशिश कर रहा।
कोकिला की अनुपस्थिति में, किसी सुंदरी से इतनी बातचीत के पहले अवसर का आनंद लेने, मधुर दूसरे दिन फिर उस संकरी गली में घुस गया।
आज तो घंटी का बटन दबाते ही दोनों सुंदरियांँ सामने थीं। लाल परी ने वासंती रंग पहना था और हेमा जी ने शुभ्र धवल।
"जी, ब्लाउज़ तैयार हो गए क्या?" मधुर में आज ज्यादा आत्मविश्वास आ गया था।
"एक दिन में फिर आ गए...इस गली में आने-जाने का बहाना सही ढूँढा है।" पीली परी ने अपनी ज़ुबान चला ही दी। सथ ही उसकी बाईं आँख भी चल गई।
"ब्लाउज में समय लगेगा, मैं तैयार करके कोकिला जी को मैसेज कर दूंगी, तब आप आइएगा।" हेमा जी ने मानो निबौली चबा ली थी।
आज ऑफिस में किसी काम में मन ही नहीं लग रहा था उसका।
फोन पर आए आध्यात्मिक समूहों, प्रवचन कर्ताओं और मोह माया से परे रहने का संदेश देने वाले सारे नोटिफिकेशन को, उसने ब्लॉक कर दिया।
फोन बजा।
"क्या कर रहे हो?" कोकिला का स्वर था।
"ऑफिस में क्या करते हैं, काम ना।" ऐंठें स्वर में मधुर ने उत्तर दिया।
"परसों ब्लाउज़ तैयार हो जाएंगे, साथ में कुछ क्रीम, हेयर सोल्यूशन भी मंगा लिए हैं लैला से, दोनों का पेमेंट कर देना।" अतिरिक्त मिठास का आभास मधुर को हो रहा था।
"कितना बिल होगा? पहले बताया नहीं कि पाँच ब्लाउज़ हैं फिर अब चेहरे के लीपापोती का सामान उस लाल परी से मंगा लिया। भला है जो साथ में दिव्य, सुशील हेमा जी रहती हैं वरना तो..!" मधुर अपनी रौ में बह जाता कि कोकिला ने बाँध बना दिया।
"बहुत जान गए एक बार जाकर। बालों का रंग, हेयर स्टाइल, परांदे का झटकना.. वाह-वाह। परसों चुपचाप सामान कलेक्ट करके निकल जाना। हमारी उस गली में इज्ज़त है, बिल वाट्स एप कर दूंगी।" कोकिला के फोन बंद करने के बाद मधुर को अपने ज़्यादा गोते लगा लेने का अहसास हुआ। संकरी गली के दोनों ओर लैला और हेमा पर सामने से आती कोकिला का पलड़ा भारी था।
अपनी जेब पर हाथ फिराते हुए मधुर संत वाणी गुनगुनाने लगा।
"प्रेम गली अति सांकरी जामै दो न समाहीं।"
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