शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2025

2122 1212 22 पर ग़ज़ल

आदरणीय अनिल सर एवं सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा भी एक प्रयास 🙏 


फ़िलबदीह 52
दूसरा चरण 

2122  1212  22

रात से चाँद अनमना सा है।
दूर कुछ चल के वो रुका सा है।।1।।

बंद लगते हैं सारे दरवाज़े।
इक झरोखा सदा खुला सा है।।2।।

हर घड़ी रूप बदले ये मौसम
धरती का दिल ज़रा दुखा सा है।।3।।


आज जी भर के बरसा है बादल
देख धरती को खुद ठगा सा है।।4।।

है उनींदा सा सूर्य बदली में 
प्रेम का रोग भी नशा सा है।।5।।

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शर्मिला चौहान

बुधवार, 22 अक्टूबर 2025

प्रेम गली अति सांकरी (व्यंग्य)

"प्रेम गली अति सांकरी"

फेसबुक और व्हाट्स एप के ज्ञानियों की सभाओं में लगातार शामिल होने वाले मधुर के मन में, आत्मा, परमात्मा, नश्वर संसार, मोह-माया के विषय में उत्सुकता बढ़ने लगी थी। हर नई पोस्ट उसके हृदय में ज्ञान की एक और बत्ती जलाने को तैयार रहती।
इस बीच पत्नी कोकिला का छोटे भाई के शादी की तैयारी के लिए दो महीने मायके जाने के निर्णय ने, बंधनों से मुक्ति के सारे‌ रास्ते खोल दिए।

सुबह-शाम रेस्टोरेंट के चटकदार खाने ने, ईश्वर के सामीप्य का अहसास करवाया। 

"हैलो! फोन क्यों नहीं उठाते, तीन-चार बार कर चुकी?" नाम के विपरीत स्वरों की मलिका, पत्नी कोकिला दूसरी ओर थी।

"मैंने जीवन के भौतिक सुखों का उपयोग कम कर दिया है।" मधुर का संयमित स्वर था।
"अच्छा, जब देखो ऑनलाइन दिखते हो, बातें बना रहे हो। ये कहो मेरे बिना मन नहीं लगता, घर नहीं संभलता।" आवाज़ में कुछ मीठापन परोसा कोकिला ने।

अचानक मधुर की आँख फड़कने लगी। चुनाव परिणामों की सुगबुगाहट की तरह, उसके मन में आने वाले समय के लिए आकुलता होने लगी।

"मैंने जीवन की यथार्थता को समझ लिया है। मन की चंचलता को बाँधकर, संयम से जीना ही अब मेरा ध्येय है।" गुफा के अंदर से मधुर की गंभीर आवाज़ आई।
"अच्छा, किस नौटंकी में काम कर रहे हो आजकल? सब छोड़ो, जब हमारे छोटके के तिलक में आओगे तो हेमा भाभी से हमारा ब्लाउज़ ले आना। गली के आखिरी वाला घर, छोटा बोर्ड लगा है।" कोकिला के आवाज़ की मिठास का अर्थ अब साफ़ हो गया था।

"ग़लती से राजनीति में कुशल यह स्त्री उसकी पत्नी बन गई, वरना दो-चार मंत्रालय तो अकेले संभाल लेती।" सिलाई वाली हेमा भाभी के घर का नक्शा मस्तिष्क में, बेनाप वाली टोपी की तरह फिट कर लिया मधुर ने।

पत्नी की राजाज्ञा के वशीभूत अगली सुबह ऑफिस के पहले ही मधुर ब्लाउज़ का पता लगाने चला गया।
"इस गली में साइकिल न घुसे, तुम मोटरसाइकिल ले चढ़ आए।" अपने घर की अतिरिक्त फैली सीढ़ियों पर बैठकर समाचार पढ़ते एक महाशय ने कहा।

"गली तो संकरी है ही, आपके देहरी फैल कर आधी गली में पसर भी गई है ना।" मधुर ने उनको उत्तर दिया।

सात-आठ फीट की संकरी सी गली के दोनों ओर नल के बर्तन की लाइनें, लोगों के बढ़ाए चबूतरे, सीढियांँ और ऊपर लटकाए गमले कुकुरमुत्ते की तरह पनपे दिखे।

"कहाँ हैं ये "दिव्य भव्य सिलाई सेंटर"? हर घर में लटकते विविध बोर्डों को देख मधुर चकरा ही गया।

अचानक दो बोर्डों की टकराहट से, बारीक कद-काठी  का बोर्ड सहम कर, निर्दलीय उम्मीदवार की तरह अलग हो गया।

"अरे बाप रे, इस घर‌ में दो-दो बिजनेस चालू हैं।" सिलाई सेंटर और साथ ही लैला ब्यूटी पार्लर के बोर्ड एक दूसरे से उठा पटक खेल रहे थे।

"कोई है क्या घर में?" बाहर से मधुर ने आवाज़ लगाई।
अंदर शांति थी।

"अरे कोई रहता है क्या यहाँ या सिर्फ बोर्ड लटका रखे हो?" जरा जोर से आवाज़ लगाई मधुर ने।

तीसरी बार मुँह खोला तो खुला ही रह गया जैसे चलती टीवी के बीच जब इंटरनेट मंद हो जाता है तो परदे पर के सभी, जहाँ के तहाँ स्थिर हो जाते हैं।
"दरवाजे पर लगे बटन को जरा टच कर देते तो इतना माथा न फोड़ना पड़ता सुबेरे सुबेरे।" लाल चमकता सलवार सूट, मेकप की परतों के बीच उभरती लाल बड़ी बिंदी, लाल लिपस्टिक और लाल परांदे लगी चोटी को   अँगुलियों पर तीन सौ साठ डिग्री घुमाती लाल परी सामने खड़ी थी।

"मुझे ब्लाउज चाहिए था।" कुछ हकलाते हुए मधुर भुनभुनाया।
"मैं मुंबई क्या चली गई कुछ सालों के लिए, अक्खे शहर की हवाइच बदल गई। मर्द भी ब्लाउज़ पहनने लगे, अइसा तो मुंबई में भी नहीं देखा।" उसकी आँखें महंगाई की तरह बढ़ती जा रही थी।
"नहीं-नहीं, मेरी पत्नी का ब्लाउज है। उसने भेजा है मुझे, वो मायके गई है।" एक ही साँस में उगल गया मधुर।

उसने मधुर को ऊपर से नीचे तक मापा, ताका और कहने लगी, "लैला ये सिलाई विलाई नहीं करती। अपुन थोबड़ा बदल कर देती है। काले को गोरा, गिरगिट की तरह बालों का बदलता रंग, बॉडी मसाज, मैनीक्योर, पैडीक्योर सब करती है मैं। अपनी बीबी को भेज देना, चुनाव में जीते नेता की तरह एकदम बदल जाएगी।" उसने ज़रा विशेष अंदाज में कहा, "मर्दों का भी बॉडी मसाज करती है मैं। स्पेशल रेट रहता है, आ जाना। अभी तो बीबी भी नहीं है।" उसकी आँखें कंचों की तरह घूम रही थीं।

मधुर कुछ बोलता इसके पहले अपने परांदे का हल्का स्पर्श कराती वह, सपने की तरह गुम हो गई। एक अजीब सी सरसरी मधुर के शरीर में दौड़ गई।

"क्या चाहिए आपको?" एक शांत और वर्तमान सरकार सी स्थिर, धीर-गंभीर आवाज़ से चौंक कर मधुर ने पीछे मुड़कर देखा‌ और महंगाई की तरह उसका मुँह बढ़ता चला गया।

"आपपप.!" सामने रूपरेखा, कपड़े बदले लैला खड़ी थी। 
"आपने इतनी जल्दी सब बदल कैसे लिया?" मधुर हड़बड़ा गया।
 सफेद साड़ी पहनी, माथे पर चंदन का टीका लगाई, बालों को कसकर लपेटी एक सौम्य स्त्री।

"आप तो अभी लाल परी बनी घूम रही थीं अब एकदम साध्वी का रूप।" मधुर का मुँह सुरसा की तरह खुलता ही गया।
"लगता है आप मेरी जुड़वां बहन लैला से मिल चुके हैं।" शांत, संयत स्वर में उसने आगे कहा, "मैं हेमा हूँ, कपड़ों की सिलाई करती हूँ। बताइए क्या काम है?" 

मधुर के दिमाग को संकरी गली में सीता और गीता, चालबाज फिल्मों की नायिकाओं ने प्रवेश कर लिया। मंथन प्रारंभ हुआ और उसमें से लैला और हेमा रुपी मक्खन बाहर आने लगा।

"मेरी पत्नी कोकिला ने अपना ब्लाउज लाने को कहा है।" मधुर ने बताया।
"अच्छा-अच्छा, कोकिला जी के ब्लाउज़ नहीं बने। पाँच हैं तो अगले सप्ताह ही बताया था मैंने।" हेमा का स्वर मधुर के कानों से हृदय में घुलने लगा।

"पाँच ब्लाउज़, मुझे तो बताया नहीं। कब इतनी साड़ियांँ खरीद लाई पता नहीं।" स्त्री हाथों में बजट सौंपने के भारी नुकसान का अनुभव करके उसने लंबी साँस ली। अपनी बनियान का छेद अब रह-रहकर, उसकी आँखों के सामने अट्टहास लगा रहा था।

"ठीक है, बाद में आ जाऊंँगा।" कहता हुआ वह तेज़ी से बाहर आ गया। 
"कभी फेशियल, मैनीक्योर पैडीक्योर के लिए अपनी कोकिला को भेज देना, चमका देगी एकदम झकास हाँ।" दरवाजे पर खड़ी लाल परी अब सिग्नल बनी हाथ पसारे उसे रोक रही थी।
जल्दी-जल्दी गली पार करने लगा कि पीछे से एक अधेड़ आदमी ने आवाज़ दी।
"मोटरसाइकिल क्या हमारे लिए लाए थे बाबू, जो संकरी गली में खड़ी करके हवा खाने जा रहे हो।" लुंगी ऊपर कसते हुए वह टेढ़े मुँह से मुस्कुराया।

नई-नवेली दुल्हन सा झेंप गया मधुर, अपनी प्रियतमा को कैसे भूल गया था वह, पता नहीं।‌

ऑफिस में भी दिनभर‌ भी उस संकरी गली में भटकता रहा वह। ओरिजिनल और डुप्लीकेट चेहरा पहचानने की कोशिश कर रहा।

कोकिला की अनुपस्थिति में, किसी सुंदरी से इतनी बातचीत के पहले अवसर का आनंद लेने, मधुर दूसरे दिन फिर उस संकरी गली में घुस गया।
आज तो घंटी का बटन दबाते ही दोनों सुंदरियांँ सामने थीं। लाल परी ने वासंती रंग पहना था और हेमा जी ने शुभ्र धवल। 

"जी, ब्लाउज़ तैयार हो गए क्या?" मधुर में आज ज्यादा आत्मविश्वास आ गया था।

"एक दिन में फिर आ गए...इस गली में आने-जाने का बहाना सही ढूँढा है।" पीली परी ने अपनी ज़ुबान चला ही दी। सथ ही उसकी बाईं आँख भी चल गई।
"ब्लाउज में समय लगेगा, मैं तैयार करके कोकिला जी को मैसेज कर दूंगी, तब आप आइएगा।" हेमा जी ने मानो निबौली चबा ली थी।
आज ऑफिस में किसी काम में मन ही नहीं लग रहा था उसका। 
फोन पर आए आध्यात्मिक समूहों, प्रवचन कर्ताओं और मोह माया से परे रहने का संदेश देने वाले सारे नोटिफिकेशन को, उसने ब्लॉक कर दिया।

फोन बजा।
"क्या कर रहे हो?" कोकिला का स्वर था।
"ऑफिस में क्या करते हैं, काम ना।" ऐंठें स्वर में मधुर ने उत्तर दिया।
"परसों ब्लाउज़ तैयार हो जाएंगे, साथ में कुछ क्रीम, हेयर सोल्यूशन भी मंगा लिए हैं लैला से, दोनों का पेमेंट कर देना।" अतिरिक्त मिठास का आभास मधुर को हो रहा था।

"कितना बिल होगा? पहले बताया नहीं कि पाँच ब्लाउज़ हैं फिर अब चेहरे के लीपापोती का सामान उस लाल परी से मंगा लिया। भला है जो साथ में दिव्य, सुशील हेमा जी रहती हैं वरना तो..!" मधुर अपनी रौ में बह जाता कि कोकिला ने  बाँध बना दिया।
"बहुत जान गए एक बार जाकर। बालों का रंग, हेयर स्टाइल, परांदे का झटकना.. वाह-वाह। परसों चुपचाप सामान कलेक्ट करके निकल जाना। हमारी उस गली में इज्ज़त है, बिल वाट्स एप कर दूंगी।" कोकिला के फोन बंद करने के बाद मधुर को अपने ज़्यादा गोते लगा लेने का अहसास हुआ। संकरी गली के दोनों ओर लैला और हेमा पर सामने से आती कोकिला का पलड़ा भारी था।

अपनी जेब पर हाथ फिराते हुए मधुर संत वाणी गुनगुनाने लगा।

"प्रेम गली अति सांकरी जामै दो न समाहीं।"

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बुधवार, 15 अक्टूबर 2025

"हंस" पत्रिका हेतु भेजी लघुकथाएं १५/१०/२०२५

 1. लघुकथा "तिल का ताड़"


सप्ताह भर से टेलीविजन पर बवाल मचा था। जितना पाकिस्तान-भारत की सीमाओं पर भारतीय सैनिकों ने साहस दिखाया, उससे कहीं ज़्यादा टेलीविजन के वातानुकूलित कमरों में बैठे समाचार वाचक दिखा रहे थे।

"सचमुच युद्ध शुरू हो रहा है क्या?" अपने कमरे से बाहर आते दादाजी ने हॉल में समाचार देखते अपने बेटे से पूछा।
"शायद, हमारी सेना ने लाहौर को घेर लिया है। काफी नुकसान पहुँचाया पाकिस्तानी सेना और उनके ठिकानो को।" टेलीविजन को मंत्रमुग्ध होकर देखते बेटे ने कहा।

"पापा, कल से यह समाचार वाचक लगातार यही अपडेट दे रहा है। चैनल की टी.आर.पी. बढ़ाना ही आज मीडिया का प्रथम उद्देश्य है।" अपने लैपटॉप पर काम करते पोते ने कहा।

कुछ ही देर बाद छोटे सी सूचना के साथ लाहौर समाचारों का खंडन करते हुए, समाचार वाचक अब अपना ध्यान अमेरिका के समाचारों की अतिश्योक्ति करने में लगा रहा था।

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शर्मिला चौहान 
ठाणे (महाराष्ट्र)
मो.नं. 9967674585
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2. लघुकथा - "हरफनमौला"


दलित उत्थान सरकारी समिति का वार्षिक अधिवेशन कल ही संपन्न हुआ था। अपने भाषण में समिति अध्यक्ष ने, जातिगत भिन्नता हटाने के, समिति के प्रयासों का सविस्तार उल्लेख किया था।

आज उनके बंगले पर मीडिया और समाजसेवी संस्थाओं के लोगों का तांता बँधा था।
"हमने पिछड़े वर्ग के लोगों को अपने हृदय में, अपने घर में स्थान दिया।" एक नवयुवक को अपने बगल में बिठाकर वो गर्व से बोल रहे थे।
नवयुवक पढ़ा-लिखा था परंतु कुछ सकुचाया सा कसमसा रहा था। 
"हमने इस वर्ग के कुछ बच्चों को अपने घर में जगह दी, काम दिया। अपने बच्चों जैसा प्रेम दिया।" अब उनके आसपास तीन-चार और  गृह सहयोगी नवयुवक-युवती आ गए।

हाथों में ट्रे पकड़े वो सभी दलित युवान, लोगों को  चाय-नाश्ता वितरित कर रहे थे। नेताजी का चाय-नाश्ता, उनका स्वजातीय बंधु उन्हें पकड़ा गया।


शर्मिला चौहान 
ठाणे (महाराष्ट्र)
मो.नं. 9967674585
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3. लघुकथा - सरकारी फंडा


 नई सरकार ने आते ही वादे के मुताबिक जनता का ध्यान रखना शुरू कर दिया।‌ 
लोगों की समस्याओं को सुनने के लिए, हर शहर, गाँव, कस्बे में केंद्रों की स्थापना हुई। समितियांँ बनीं और पदाधिकारियों को लोगों की समस्याओं को सुनने के लिए नियुक्त किया गया।‌

लोग जाते, घंटों लाइन में खड़े रहते, अपनी समस्या बताकर छाती ठंडी कर आते। महीनों के इस क्रम में, समस्याएं सुना-सुना कर लोग ठंडे होने लगे।

आज सभी केंद्रों को बंद कर दिया गया क्योंकि अब देश की जनता के पास सुनाने के लिए कोई समस्या ही नहीं बची थी।

शर्मिला चौहान 
ठाणे (पश्चिम)
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4. लघुकथा- रंगा सियार 


हर मंच से नेताओं का चुनावी शंखनाद  गूंज रहा था।  नकद रुपयों, साइकिल, लैपटॉप, मोबाइल का चारा चुग चुकी जनता, अब किसी बड़े स्वादिष्ट चारे की अपेक्षा लगाए बैठी थी।‌

"सुना है इस क्षेत्र से फिर रमन बाबू ही चुनाव जीतेंगे।" अवधेश ने अपने मित्र धीरेन से कहा।

"पिछली बार कहे थे जीतने पर हर परिवार को पंद्रह हजार का दीपावली बोनस बैंक एकाउंट में भेज देंगे, कहाँ दिए? अब कौन वोट देगा उनको?" सांसद से असंतुष्ट धीरेन बड़बड़ा रहा था।

सामने चौक पर मंच सजा था। कुछ देर बाद रमन बाबू आए, बिना किसी लाग-लपेट के अपना वादा पूरा ना कर पाने की व्यथा-गाथा सुनाए। 

"अब इस पाँच साल में हमने अपनी जमीन पक्की कर ली है। आपकी कृपा रही तो आगामी पाँच सालों में, हर घर में सरकारी नौकरी और महिलाओं को मासिक भत्ता देने का पक्का वादा है।" तीर चलते रहे और कुछ देर बाद निशाने अचूक लगने लगे। 

भाषण के दो घंटे बाद, पंडाल के नीचे कुर्सी टेबल लगाए सांसद जी के अनुयायी गण बैठ गए।‌ अपने घरों की जानकारी और सरकारी नौकरी के लिए उम्मीदवारों का बायोडाटा देने के लिए, दो किलोमीटर लंबी लाइन लगी थी।

धीरेन और अवधेश को इस लाइन में खड़ा देखकर, मुख्य द्वार पर लगी सासंद जी की तस्वीर, मंद-मंद मुस्कुरा रही थी।

शर्मिला चौहान 
ठाणे (महाराष्ट्र)

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5. लघुकथा - बोल री मछली 

शीनू- "बोल री मछली कितना पानी.. घुटने तक पानी।"
मम्मी - "टीचर ने नयी कविता सिखाई क्या शीनू को?"

शीनू- नहीं-नहीं, ड्राइवर अंकल ने सिखाया वो भी सिर्फ मुझे सिखाया है।"

मम्मी - "मुझे भी सिखाओ ना प्लीज..!"
शीनू- आप उत्तर देना हाँ..
बोल री मछली कितना पानी?
मम्मी - कमर तक पानी।
शीनू ने मम्मी का कुर्ता उठाया और कमर को चूमने लगी।
शीनू - बोल री मछली कितना पानी?

मम्मी -(चुप)
शीनू - बोलो मम्मा, आपको तो कुछ नहीं आता। बोलो छाती तक पानी, होंठ तक पानी.. तभी तो मैं आपको चूमुंगी जैसे ड्राइवर अंकल मुझे चूमते हैं।

मम्मी की आँखों में पानी ही पानी था।

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शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)

गुरुवार, 9 अक्टूबर 2025

यात्रा वृत्तांत

"सपनों का सच: स्विट्जरलैंड"

कश्मीर और लेह देखने के बाद, बर्फ़ से ढंकी उन पहाड़ियों को पास से देखने की इच्छा और तीव्र हो गई जिन्हें फिल्मों में कई बार देख चुकी थी। स्विट्जरलैंड जाने का यह योग 2025 के अप्रैल महीने में बना, फलीभूत हुआ।

सोलह दोस्तों को साथ चौदह दिनों की योजना बनी और मुंबई से ट्रेवल एजेंसी के मार्गदर्शक ‌श्री विनायक जी साथ थे। यहाँ सूरज के तेवरों को झेलने के बाद, ठंडी और बर्फ़ से परिपूर्ण जगह पर जाने की कल्पना मात्र से दिल बल्लियों उछल रहा था।

गर्म कपड़े, रेनकोट, पोंचू, अच्छे जूते (जो बारिश और स्नो में पैरों की पकड़ बनाए रखें), कैमरा, खाने के लिए भारतीय नाश्ता, जरूरी दवाइयांँ और खूब सारा उत्साह भरकर, हम सब मुंबई एयरपोर्ट पर मिले।

मुंबई से ज्यूरिख की आठ घंटे की फ्लाइट में, अच्छे भारतीय भोजन के बाद भी नींद आँखों से रूठी रही मानो अब तो उन्हें सपने में नहीं सच में ही स्विट्जरलैंड देखने का आभास हो गया था।

सुबह आठ बजे हमारा ग्रुप, सारी अंतरराष्ट्रीय जाँच प्रक्रिया पूरी करके ज्यूरिख एयरपोर्ट से निकल गया था। हमने एक पच्चीस सीटर बस की थी जिसे लेकर बस चालक (यूरोपीय देशों में कोच कैप्टन कहते हैं) उपस्थित थे। सामान व्यवस्थित कर, हम सबने उस कंपकंपाती ठंड का सामना करने के लिए अपने जैकेट, मफलर कस लिए। स्विट्जरलैंड में हमारे रूकने की व्यवस्था Zug शहर के होटल में थी।

सपनों के सच होने का पहला दिन, एयरपोर्ट से 134 किलोमीटर पर स्थित इंटरलेकन शहर देखना। बस कैप्टन और हमारे गाइड विनायक ने रास्ते की दर्शनीय स्थलों की जानकारी दी। हमें पता चला कि यहाँ बस कैप्टन का काम, बहुत महत्व रखता है। उनको एक बढ़िया तनख्वाह के साथ मान-सम्मान भी खूब मिलता है। जिस होटल में हमारे रूकने की व्यवस्था थी उसी में वैसा ही कमरा उनके लिए भी बुक था। होटल के भोजन में भी वो शामिल रहते।‌ उनका अपनी बस और यात्रियों के प्रति जिम्मेदारी यह थी कि यदि रास्ते में बस खराब हो जाती है तो वो स्वयं ही उसे सुधारते हैं अर्थात मैकेनिक नहीं बुलाते और ना ही किसी यात्री से सहायता लेते हैं।( हमने यात्रा के दौरान इस सच्चाई का अनुभव किया) 

इंटरलेकन, दो झीलों (Thun और Brienz) के बीच स्थित एक छोटा सा, बेहद खूबसूरत शहर।  झीलों का हल्का नीला हरा पानी, अपने चारों तरफ बर्फ़ से ढके पहाड़, खुला नीला आसमान और जितने रंगों को पहचान सकते हैं उनसे कई गुना ज्यादा संख्या में रंग-बिरंगे फूलों से भरा यह शहर, पल भर के लिए भी पलकें मींचने की अनुमति नहीं देता।

झील के किनारे किनारे पैदल चलकर, पास ही स्थित Casino Kursaal बगीचे में आ गए।‌ इस बगीचे के मध्य में भारत के प्रसिद्ध दिग्दर्शक स्व. यशराज चोपड़ा की एक प्रतिमा लगी है, जो सभी भारतीय यात्रियों को आकर्षित करती है।

इंटरलेकन, प्रकृति की गोद में बसा बेहद सुंदर शहर है, जहाँ भारतीय रेस्टोरेंट भी हैं। हमने भारतीय भोजन का आनंद लिया और वहाँ होटल मैनेजमेंट के दो भारतीय छात्रों से मुलाकात हुई। महाराष्ट्र से यूरोप पढ़ने गए ये बच्चे, अपनी इंटर्नशिप कर रहे थे।‌ अब वो मराठी, हिंदी, अँग्रेजी के अलावा फ्रेंच और जर्मन भी सीख रहे थे। अपनी देशी भाषा में बात करके, वे बड़े उत्साहित हो गए।

स्विट्जरलैंड की प्रसिद्ध ट्रेन से, पहाड़ियों, स्टेशनों, झीलों को अपने कैमरे और हृदय में कैद करने हेतु, हमारा समूह इंटरलेकन के रेल्वे स्टेशन पर ट्रेन का इंतज़ार कर रहा था।

इतने बड़े समूह को महिला टिकट कलेक्टर ने, बड़ी ही कुशलता से एक डिब्बे में स्थान दिया।  उन्हें मालूम था कि ये पर्यटक हैं और सब साथ में आनंद लेना पसंद करेंगे।

काँच की बड़ी खिड़कियों में आँखें मानो चिपक गईं थीं। दो घंटे की इस यात्रा में गर्दन 180 डिग्री पर दाएं-बाएं घूमती रही जिससे दोनों साइड के नैसर्गिक सौंदर्य में से किसी एक को भी देखने से आँखें वंचित न रह जाए।‌ पहाड़ियों में उगाई फसलों से हरे खेत, दूसरी ओर स्वच्छ बड़ी-बड़ी, नीली झीलें, किनारों पर फूलों की बाड़ों से आँख मिचौली करते छोटे-छोटे प्यारे घरों की छबि हृदय में उतारते, हम सारनेन स्टेशन पर उतर गए। हमारी बस इंतजार कर रही थी और हम जुग स्थित अपने होटल की ओर चल पड़े। सुबह एयरपोर्ट पर उतरने के बाद,‌ आज के पहले दिन को दिलो-दिमाग पर और पुख्ता करते, हमने रात बिताई।

दूसरे दिन सुबह नाश्ते के बाद, बर्फीले पहाड़ पर जाने की पूरी तैयारी से लैस हमारी टीम निकल पड़ी। होटल से 47 किलोमीटर दूर एंजलबर्ग शहर के पास माउंट टिटलिस है। माउंट टिटलिस के बर्फीले पहाड़ों को हिंदी फिल्मों में देखा था और आज उसकी सुंदरता को अनुभूत करने की लालसा सभी को थी। मार्गदर्शक ने बार-बार अच्छे जूते पहनने की सलाह दी क्योंकि बर्फबारी लगातार जारी थी।

3020 मीटर की ऊंचाई पर दो केबल कारों से पहुँचना बहुत रोमांचक रहा। पहली केबल कार, दुनिया की सबसे प्रथम रोटेटिंग कार थी, जो ऊपर ले जाते तक अपने अक्ष पर 360 डिग्री घूम गई। श्वेत शॉल लपेटे माउंट टिटलिस को हर कोण से देखने पर भी, आँखों को कहीं कोई रंग नजर नहीं आ रहा था। 
माउंट टिटलिस के टेबल टॉप (समतल स्थान) पर पहुँचकर, स्नो फाल और तेज ठंडी हवाओं से मुठभेड़ हुई। अब बारी थी यूरोप के सबसे बड़े झूला पुल (suspension bridge) पर चलने की। _4 डिग्री पर, हवा और बर्फ़ के थपेडों से घबराकर कुछ मित्रों ने दस-बारह कदम चलकर, वापसी कर ली और कुछ अंत तक चलते गए।  उफ्फ... कितना भयावह, नीचे देखने की हिम्मत नहीं और ऊपर से महीन-महीन बर्फ़ हमें ढंक लेने को तैयार थी। 3020 मीटर से अब आगे 3040 मीटर तक की ऊंचाई से, flyer ride (एक साथ चार लोग) करके बेहद खूबसूरत, खतरनाक और दिलचस्प दृश्यों को कैद करने के लिए, फोन या कैमरा उठाने से अँगुलियाँ इंकार कर रही थीं। इस बर्फानी हवा में, दूर दूर देशों से आए कुछ दक्ष खिलाड़ी स्केटिंग एवं स्कीइंग कर रहे थे। अपना व्यक्तिगत  प्रदर्शन और अच्छा करने का उनके लिए यह अच्छा समय था। 

जब इतना दुस्साहस लोग कर रहे थे तो हमारे समूह की सभी महिलाओं ने भी भारतीय परिधान साड़ी पहनने की हिम्मत कर ही डाली। हाथों के दस्ताने, जैकेट और टोपी उतारकर साड़ी लपेटना कितना बड़ा काम था, अभी सोचकर मुस्कुराने लगती हूँ। इतने में ही अँगुलियाँ खुद बर्फ़ बनने की फ़िराक में थीं।

काँपते ठिठुरते हम लोगों ने  इसी शिखर पर स्थित भारतीय रेस्टोरेंट में शरण ली। यहाँ एक अच्छा तापमान बनाकर रखा था। वहीं भोजन करके हम पुनः उन दो केबल कारों पर विराजमान माउंट टिटलिस से नीचे उतर गए।
इन केबल कारों में विभिन्न देशों के नाम और ध्वज लगे थे। पूछने पर पता चला कि तकरीबन अस्सी कारें हैं और जिस देश की सहभागिता यहाँ के पर्यटन में जैसी है वैसी ही केबल कारों को उस देश के नाम से दर्शाया जाता है। हमने आते-जाते वक्त भारत का तिरंगा फहराते, चार केबल कारें दिखीं जिससे भारतीय पर्यटकों की भारी संख्या का अनुमान लगा सकते हैं। 

बस से होटल वापसी के वक्त हमने , घर से साथ लाए चकली, चिवड़ा और लड्डू का भरपूर आनंद उठाया। 

भारतीयों का‌ विश्व पर्यटन में बहुत बड़ा योगदान होता जा रहा है। कई भारतीय समूह मिले और आपस में  बातचीत करने पर पता चला कि हमारे देश के सभी भागों से बड़ी संख्या में लोग अब विश्व घूमने का मन बनाने लगे हैं। 
हमारी संस्कृति ही 'वसुधैव कुटुंबकम्' और 'चरावेति चरावेति प्रचलाम निरंतरम्' की है।


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शर्मिला चौहान 
ठाणे महाराष्ट्र


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मंगलवार, 7 अक्टूबर 2025

कान बिगारो आपनो, कछु सुना न जाय (व्यंग्य)

कान बिगारो आपनो, कछु सुना न जाय (व्यंग्य)

बहरापन इतना भयानक होगा, कल्पना से बाहर था बिल्लू के। बस गलती यही थी कि वह मनुष्य सामाजिक प्राणी को चरितार्थ करने में लगा रहा। समाज के सामाजिक, सांस्कृतिक आयोजनों का एक अहम् हिस्सा बनने की भूल का परिणाम उसका बहरापन है।

"अरे बिल्लू जी, गणतंत्र दिवस समारोह के आयोजन की तैयारियाँ चालू हैं आपके बिना कैसे हो पाएगा?" युवा नेता बनने की पहली सीढ़ी पर खड़े मदन ने, नववर्ष की शुरुआत की।
भावी नेता के कामों और विचारों को जनता तक बताने के लिए, लाउडस्पीकर पर लाउड स्वरों में चमचे लग गए। मरता क्या न करता, बिल्लू महाराज के कान भी उस विरदावली को सुनते-सुनते भारी हो गए। देश और देशभक्ति पर तो कुछ मिनट ही दिए भावी युवा नेता ने, अपनी स्तुति और यशोगान से पूरा जग हिला दिया।

महाशिवरात्रि का आयोजन हो और बिल्लू शामिल ना हो तो भगवान शिव से ज्यादा पंडित जी बुरा मान जाते।
"जजमान, इस बार ट्रस्ट ने तीन दिनों का कार्यक्रम रखा है, अरे भाई हमारी मंडली का भजन है, बड़ा स्पीकर चारों दिशाओं में रखवाना बचवा।" 
स्पीकरों की घरघराहट ठीक करते करते बिल्लू के कान और दिल घरघरा  गए।

कैलेंडर ने वसंत की अदा दिखाई और फगुनाई बरसाने होली आ गई। ढोल, नगाड़े, होली के बॉलीवुड सांग्स की तर्जों ने, कानों के मर्ज पर नमक छिड़क दिया। 

बिल्लू के कान सुकून की तलाश में थे कि आंदोलन और धरनों का आमंत्रण आ गया। अब गला फाड़कर चीखे बिना सरकार और मीडिया सुनते हैं क्या? सरकार ने कितना सुना पता नहीं, बिल्लू जी के खुद के कानों ने नार्मल आवाज़ को सुनने से इंकार कर दिया।

गणपति उत्सव में बप्पा को हर नए, सुपरहिट फिल्मी गाने भी तो सुनाना था। बड़े कानों के बप्पा ने तो इन गानों को झेल ढपेल लिया परंतु बिल्लू के कानों ने हड़ताल कर दी।

"क्या करते हो, कान के परदों पर सूजन आ गई है। सावधानी नहीं रखें तो परिणाम ठीक नहीं होगा।" बिल्लू की किस्मत भी ऐसी है कि डॉक्टर भी बॉलीवुड विलेन जैसा धमका कर बात कर रहा था।  
"बेचारा, सरकारी अस्पताल में हैं अपना क्लीनिक खोल लेगा तब वाणी भी बदल जाएगी।" मन में सोचता बिल्लू घर की ओर चल पड़ा।

"पाँच-छह बार आवाजें लगा चुका बिल्लू भाई, अनसुना करके निकल रहे हो। क्या बात है नाराज हो क्या?" पीछे से सामने आकर एरिया के इकलौते मंड़प डेकोरेशन वाले, मुरली ने कहा।

"अरे नहीं मुरली, बस किसी सोच में चला जा रहा था। बताओ क्या बात है?"
"सोच-विचार का समय नहीं बिल्लू भाई, इस साल नवरात्रि में गरबा के बहुत पंडालों काम मिला है। मैं अकेला तो भाड़ नहीं फोड़ सकता, तुम्हारे सिवा इस सामाजिक, सांस्कृतिक काम में कौन मदद करेगा भला।" मुरली की तान से बिल्लू का मनोबल पारे की तरह चढ़ने लगा।
"मुरली, मुझे आवाज़ से एलर्जी हो गई है भाई, अब तुम किसी और को ढूँढ लो।" कहते हुए बिल्लू आगे निकलने की कोशिश करने लगा।

"तुमको कौन गाना-नाचना है भाई, सिर्फ पंडाल लगाने में देखरेख कर लेना, पैसे भी तो मिलेंगे ना।" बिल्लू पैसों से थोड़ा डगमगा गए। 
"पैसे किसको मिलेंगे?" बिल्लू ने हवा में प्रश्न उछाला।
"तुम्हें भी हिस्सा दूंगा, पक्का इस बार काम बहुत मिला है। लगता है गरबे के प्रति लोगों का प्रेम चरम सीमा पर पहुंच गया है।" चारों तरफ गरबे के पोस्टरों को देख मुरली बुदबुदाया।

पंडालों की देखभाल में, स्पीकरों, स्टेज की व्यवस्था देखते-देखते, जवान बिल्लू गरबा की शामों का इंतजार करने लगा। 
कानफोडू डीजे, लोगों के शोर-शराबे से नवरात्रि के अंतिम दिन, बिल्लू को सब कुछ शांत लगने लगा। सारी सृष्टि सुंदर, रंग भरी थी, कहीं कोई आवाज नहीं, वह आज बेहद संतुष्ट था।

"आपके कान हमेशा-हमेशा के लिए  शांत हो गए बिल्लू जी। अब आप बुरा तो क्या अच्छा भी सुनने के काबिल नहीं रहे।" डॉक्टर की बात बिल्लू के कानों में घुसी पर अब वह इन आवाजों से कहीं दूर, शून्य में विचरण कर रहा था।


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शर्मिला चौहान 
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