रविवार, 22 जून 2025

कहानी - बचा पानी 'विश्वगाथा' हेतु भेजी

कहानी _ "बचा पानी"  

बड़के और छोटके सोनपुर में कुछ ही दिनों पहले आए थे। उनके गाँव से काफी बड़ा और समृद्ध है सोनपुर। यहाँ प्राथमिक विद्यालय के साथ हाईस्कूल, सरकारी जच्चा-बच्चा केंद्र के अलावा यहाँ अस्पताल भी है। घरेलू जरुरत का सामान हर दिन बाजार में बिकता है। इन्हीं कारणों से दोनों भाइयों ने अपने परिवारों के साथ, इस कस्बे में शरण ली। गाँव में माई के साथ मंझले और उसके परिवार को छोड़ आए थे।

कुल आठ लोगों के लिए कच्चा घर किराए पर लिया था। 
"परिवार वाले हो सोच समझकर किराया दे देना भाई। खाली पड़ा घर श्मशान हो जाता है, आदमी रहेंगे तो इज्जत आ जाएगी घर की।" सहृदय मकान मालिक ने अपने अतिरिक्त पड़े घर का ताला खोलते हुए कहा।
"भैय्या, कुछ काम-धाम मिल जाए तो बिना बोले घर किराया समय पर दे देंगे। हम लोग भी घर-द्वार वाले लोग हैं नागा नहीं करेंगे।" माधो ने उसे आश्वस्त किया।

खाने-पकाने के बर्तन, ओढ़ने-बिछाने की दरी-गुदडियाँ और पहनने के कपड़े संदूक, थैलों और कुछ गठरियों में बाँधकर साथ ले आए थे‌ वो।

वर्षा की विदाई और शरद के आगमन की सुंदर ड्योढ़ी पर खड़ी प्रकृति का रूप अनुपम था। ताल, कुओं का जल अपनी सीमा में सिमटा, टुकुर-टुकुर देख रहा था। आसपास खिले कांस के श्वेत फूलों की हिलती-डुलती प्रतिच्छाया में चाँद का आभास उसे विचलित कर देता। इन दिनों सोलह कलाओं से परिपूर्ण चंदा अपने तारागणों के साथ पूरी रात मुस्कुराता दिखाई दे जाता था।

वैसे तो इन दोनों भाइयों का नाम माधो और साधो था परन्तु माई के दिए उनके घरेलू नाम बड़के और छोटके से ही गाँव भर उनको बुलाया करता था।
परिवार में लड़के-लड़कियों की संख्या भी बराबर थी‌ कहीं कोई ऊंँच-नीच नहीं। बड़के को दो बेटियांँ तो छोटके को दो बेटे। मंझले भाई की एक बेटी एक बेटा अर्थात अनुपात एकदम सही था।

गाँव में भी बाप-दादाओं की कोई पुश्तैनी खेती जमीन तो थी नहीं, रोज़ कमाना रोज खाना। माई-बाबा ने बच्चों को स्कूली शिक्षा तो बहुत नहीं दिलवाई परंतु पेट भरने का हुनर, जीवन जीने की कला भरपूर दी थी। घरों के खपरैल छाना, कुएँ साफ करना, कुओं की खुदाई करना, खान से मिट्टी लाना, गोबर बीनकर उपले बनाना, फसलों की कटाई, निराई-गुड़ाई इन सब कामों में तीनों भाई निपुण थे।

अब गाँव में ये काम बहुत लोगों को आता है इसीलिए रोजी देकर कम ही लोग बुलाते थे। गर्मियों में काम की बहुतायत हो जाती, सबके घरों के छप्पर छाने लगते, सभी कुँओं की सफाई, कचरा निकालने का यही उचित समय होता था।‌ वर्षा ऋतु में खेती बाड़ी वालों का काम आ जाता तो इस परिवार की रोटी खेतों में बुवाई, निराई से चल जाती थी।

"माई, इस गाँव‌ में कितना काम मिलेगा। परिवार बढ़ रहा है मेहनताने में अनाज, सब्जी और मछली देते हैं लोग।‌ तीन साल पहले बिसनू बाहर गया था, अब साल छह महीने में आता है तो नकद पैसे लाता है कमाई के।‌" माई के साथ सभी भाइयों ने सलाह मशविरा किया और बड़के, छोटके अपना परिवार लेकर गाँव छोड़ने के लिए आगे आए। मंझले की प्रकृति ज़रा नाजुक थी इसीलिए माई ने उसे परिवार सहित अपने पास रहने के लिए मना लिया।

सोनपुर आकर चार-पाँच दिन हो गए और आज दोनों भाइयों को, तालाब के किनारे पार बाँधने का काम मिला।‌

छोटकी बहू घर की रसोई संभालती और बड़की आसपास के लोगों के छुटपुट कामों में सहायता करके, घर की सब्जी भाजी का इंतज़ाम कर‌ने लगी।

"घर की माटी उधड़ गई है। बाहर से लोग आएंगे तो बखत बेबखत घर में काम करेंगे। तुम दोनों देवरानी जेठानी मिलकर कर दो घर की छपाई लिपाई, आगे त्यौहार आ रहें हैं।" मकान मालिक की पत्नी ने बड़की बहू से पूछा।

परगाँव में सिर छुपाने की छत, खाने सोने की जगह देने वाले लोगों को नकारना, बड़की को उचित नहीं लगा। काम करके किराये की भरपाई भी हो जाएगी, यही सोचकर उसने हामी भर दी।

अपने घर का काम जल्दी जल्दी ख़त्म करके, दोनों मकान मालिक के घर पहुँच गईं। माटी छानना, सानना, मजबूती के लिए उसमें धान की भूसी मिलाकर और सुघड़ हाथों से ईंट पत्थरों पर चढ़ाते हुए, दोनों ने करीब सप्ताह भर में दीवारों को नया रूप-रंग दे दिया।
पूरे घर को माटी और फिर गोबर से सारकर, सूखने के लिए छोड़ दिया।

पराए गाँव में लोगों का विश्वास जीतकर, अपनी ईमानदारी और अच्छे काम की छाप छोड़ दी दोनों ने।  मकान मालिक ने दो महीने का किराया उनके मेहनताने से ले लिया।

सोनपुर बड़ी जगह थी तो जनसंख्या भी अधिक थी। रोड़-रास्ते, बिजली के खंबे सब बढ़िया थे। गाँव से आए इस परिवार ने महसूस किया कि यहाँ ठंड के दिनों में भी, कुएँ तालाबों का पानी नीचे चला गया था।
"पता नहीं, अभी से यहाँ के कुएँ में कितना नीचे पानी है खींचते-खींचते दम निकल जाता है।" छोटकी बहू ने बताया।
"अच्छा, हाँ सूरज का ताप सीधा धरती में समा जाता है। पेड़ों की कमी भी तो है पता नहीं पेड़ों की कमी से पानी कम है कि पानी की कमी से पेड़।" माधो ने अपना विचार रखा।

माधो और साधो को धरती के अंदर पानी की लहरों को सुनने, समझने की दैवीय शक्ति प्राप्त थी। माटी में पले-बढ़े ये लोग, माटी के जीवन उसकी भाषा और भावनाओं को करीब से महसूस करते थे। उनके गाँव में भी उनकी सलाह के बिना किसी भी जलस्रोत का निर्माण नहीं किया जाता था।

माई कहती थी, "तुम्हारे बाबा का यह गुण, तुमने पाया है। वो आसपास की जमीन, पेड़-पौधे देखकर पानी का अंदाजा लगाया करते थे।"

बड़के के स्मृति पटल पर बाबा की छबि और भाइयों से ज़्यादा स्पष्ट थी। उसे अक्सर साथ लेकर जाते थे बाबा।

"दिनभर माई के पीछे-पीछे माटी लाएगा, गोबर उठाएगा, चल जरा मेरे साथ। जमीन के अंदर भी बड़ी दुनिया है बेटा, उसको जानना, समझना अपनी धरती माता की बातें सुनना, यही तो हमें अपनी जमीन से जोड़ता है।"  बाबा उसको साथ ले जाते समय समझाते थे।

किसी स्थान के जलस्रोत को परखने से पहले, बाबा एक गगरी पानी से उस जमीन को शांत करते।‌ हाथ जोड़कर विनती करते, "हे धरती माता, तेरे बच्चे पानी की आस लगाए हैं। तू तो माँ है हमारी,  हमें प्यासा कैसे रख सकती है माँ।" कुदाल चलाने से पहले सैकड़ों बार क्षमा मांगते थे।

दो-तीन फीट गहरा खोदकर, वहाँ से एक मुट्ठी माटी हथेली पर रखकर, उसे माथे से लगाते, सूँघते, निहारते और वापस छोड़ देते। अपने कानों को धरती से चिपकाकर, लंबे समय तक कुछ टोह लेते थे बाबा। बाबा जहाँ पानी की हलचल महसूस करते, वहीं निशान बना देते‌ थे। उनके तय किए स्थान पर धरती माता अपना आँचल सरकाती और अमृतधारा छोड़ देती। बाबा की निश्छलता, उनका प्रेम कैसे ठुकरा देती माता?

बाबा के साथ जा-जाकर, माधो ने भी प्रकृति पेड़-पौधों, पानी, मिट्टी से संवाद स्थापित करना सीख लिया। 
"बाबा, मेरी शाला के पीछे हम लुकाछिपी खेल रहे थे तब मुझे वहाँ की जमीन बड़ी सोंधी महक दे रही थी। मैंने हथेली में उठाकर देखा, उसकी भुरभुरी माटी में नमी है, वहाँ नीचे जरुर अच्छा पानी मिलेगा।" अपने बेटे की बातों से पिता खुश हो गया।
गाँववालों के साथ जाकर बाबा ने स्वयं उस जगह को देखा परखा और सबसे यह बात बताई, "जब कभी पानी की जरुरत पड़े तो इस जगह में अपार जीवन है।" 

खैर, बाबा का खाना पानी इस दुनिया में कम समय था या तो भगवान को उनकी ज्यादा जरूरत थी, वो इस दुनिया से चले गए ।
अब माधो पूरी तरह से बड़के बन गया। माई के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खदान के पास से छुही माटी, लाल माटी,  कनस्तर और बोरे में भर भरकर लाता, आँगन में एक तरफ़ ढेर लगा देता। आसपास के लोग लीपने के लिए, घर छाबने के लिए माई से मिट्टी खरीद ले जाते। शाला तो कक्षा पाँच के बाद बंद हो गई थी, दिनभर गाय-भैंसों के पीछे सिर पर टोकरी लिए बड़के और मंझले घूमते फिरते। चूल्हा जलाने के लिए कंडे हो जाते और जब ज्यादा जमा हो जाता तो माई बेच आती।जीवन का हर क्षण प्रकृति से जुड़ा, बँधा था उनका।
 
दूसरे दिन सुबह, छोटकी बहू की कुएँ में कम पानी वाली बात की जाँच करने के लिए दोनों भाई चले गए। मुआयना करके  बड़के ने आसपास के लोगों को बताया कि, "जब चैत बैसाख में पानी और नीचे जाएगा, कुआं साफ करके चार फीट और गहरा कर लेंगे। अंदर से बाँई ओर ढलान वाली जगह पर थोड़ा आगे खोद लेंगे। धरती माता की कृपा रही तो कुएं में बहुत पानी रहा करेगा।" 
माधो के इस गुण को जानकर गाँववालों ने एक नया कुआँ खोदने की बात कही।
अगले सप्ताह चौपाल पर पूरे लोग जमा हुए।‌ इस गाँव के पुश्तैनी अधिपति, मुखिया जी भी अपने लाव-लश्कर के साथ उपस्थित थे।‌ सबकी सहमति से मंदिर के आसपास की जगह कुएँ के लिए तय की गई।

अगले दिन पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए, दोनों भाई मंदिर के सामने पहुंँच गए। हाथों में पानी, नारियल, फूल लिए मंदिर के पास की धरती को शांत किया। 
"माँ, हम सब तेरी ही संतान हैं। तूने पैदा किया, तू ही पालती है, तेरी गोद में ही जीवन का अंत है। तेरे बच्चे प्यासे हैं, अपनी अमृतधार से प्यास बुझाना माँ, दया करना।" कहते हुए माधो ने उस जगह की मिट्टी उठाई, हथेली में भरकर निहारता रहा, माथे से लगाया और सूँघकर वापस उसी जगह छोड़ दिया। दो-तीन जगहों पर परीक्षण करके उसने, लकड़ी  से एक बड़ा गोला खींच दिया। इसी गोले के मध्य में मुखिया जी ने पहली कुदाल चलाई।

यह गाँव का कुआंँ था, सबके लिए समान तो सब मिलकर श्रमदान करते। जिसको जब समय मिलता दो-तीन घंटे खुदाई करने आ जाता। मंदिर के प्रांगण में बड़े दो ट्यूब लाइट थे और सभी लोग अपने साथ लालटेन, टॉर्च लेकर आते थे।

औरतें भी पीछे नहीं रहीं, उन्होंने निकली मिट्टी को तसलों में भरकर, रास्ते को बराबर करने का बीड़ा उठा लिया।
पानी की आशा ने सभी के चेहरों पर पानी ला दिया था। करीब तीस फीट पर ही सभी को  मिट्टी की नमी और सोंधापन‌ का अनुभव होने लगा। पैंतीस तक तो पानी घुटनों तक आ गया।

"भाइयों, हमें अभी आठ-दस फीट और खोदना चाहिए, गर्मी में तो यहाँ पानी सूख जाएगा।" घुटने तक पानी में आगे की खुदाई कठिन हो गई थी परंतु पानी का स्पर्श मात्र लोगों का  उत्साह बढ़ा रहा था।
एक पत्थर फावड़े से टकराया और माधो ने खुशी से कहा, "इस पत्थर को तोड़कर धरती माँ के सीने से हटा देते हैं भाइयों, अथाह पानी फेंक देगी माँ।" 
पत्थर फोड़ने के लिए कई
जवान पुरुष आगे आए। छैनी, हथोड़े, सब्बल और लोगों के उत्साह से आखिरकार पत्थर में दरार पड़ गई। पत्थर हटा और धरती ने अपने में प्रवाहित निर्मल आवेग की एक धार को बच्चों के लिए ऊपर उछाल दिया। उस स्नेहसिक्त पहली धार में भीगकर लोग अपने जीवन को अभिसिंचित कर रहे थे।
कीचड़ माटी से लथपथ माधो गा रहा था।

रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून..!
पानी गए ना उबरै मोती मानुष चून..!!

मीठे, स्वच्छ पानी का छलछलाता खजाना पाकर गाँववालों ने, परदेसी दोनों भाइयों का सम्मान किया। उनकी सूक्ष्म संवेदना की सराहना की। मंदिर प्रांगण में बना, ईश्वर की कृपा बरसाता यह जल संसाधन गाँववालों के जीवन में खुशियांँ भर लाया था।

कुएंँ में पानी का अथाह स्रोत और दो अनजाने लोगों को वाहवाही मिलना, इस गाँव के अधिपति को रास नहीं आया। जब तक समस्या, दुःख रहता है तब तक कुर्सी का महत्व रहता है वरना तो सबकी एक जमीन हो जाए। अमीर -गरीब, लेनदार-देनदार, मालिक-नौकर इन सब को एक स्तर पर ला दिए तो कैसी सत्ता, कैसा मुखिया!

 मुखिया जी के बड़े मकान के पिछवाड़े के भाग में, एक बहुत बड़ा, गहरा, पक्का पार वाला पुराना कुआँ था।‌ दो पीढ़ियों पहले तक वह जन सामान्य का कुआँ था, गाँव का कुआँ था, कब और कैसे उसे इन अधिपतियों के पूर्वजों ने, अपने घेरे में ले लिया, पता नहीं। अब वो सत्ता के साथ, पानी के भी देवता बन गए।‌ छलछलाते पानी को एक परिवार ही उपयोग करता और जब सारा गाँव गर्मियों में बूँद-बूँद की आस से, गाँव के अन्य दो कुँओं को खंगालता, मुखिया जी का परिवार जी भर पानी उलीचता। 

"गाँव वालों का दुःख देखा नहीं जाता हमसे, बारी-बारी से एक-एक गगरी पानी ले जाएं सब, जब हमारा काम निपट जाए।" अहसान करने वाले भाव, आधिपत्य का गर्व आवाज़ में रहता था। 
गाँव वाले अपना क्रम आने पर, कुएँ से एक गगरी पानी खुद के लिए निकालते तो मुखिया के परिवार के लिए एक गगरी। साथ ही कुछ छुटपुट काम भी करवा लेता परिवार।

"अरे भीखम, उन दोनों भाइयों को बुलाकर लाओ जरा, बात करना है उनसे।" अगले दिन सुबह मुखिया जी ने अपने दरवाजे पर डंडा लिए बैठे मुस्टंडे से कहा।

कुछ ही देर बाद माधो और साधो उनके सामने थे। इतना बड़ा घर-द्वार, बढ़िया बैठक, आराम कुर्सी आसपास काम करने वाले लोग, इतना ठाठ-बाट दोनों ने पहली बार देखा था।
"जमीन में पानी कहाँ मिलेगा, तुम बता सकते हो ना?" प्रश्न सकारात्मक उत्तर के लिए पूछा गया था।
"जी मालिक, कोशिश करते हैं। धरती तो माँ है और माँ के मन को कौन पढ़ जान सकता है। बस, उसकी धड़कन को सुनकर बताता हूँ।" माधो, धरती की तरह शांत और विनम्र स्वर में बोला।
"हमारे खेतों में कुआँ खोदना है, कल सुबह देख आएंगे।" नपे-तुले शब्दों में आज्ञा थी।
दूसरे दिन दो जीपों में सवार काफ़िला, खेतों की ओर निकल पड़ा। मुखिया और उनके दोनों बेटे, दो-चार पहलवान नुमा आदमी और माधो-साधो।

रास्ते भर उनकी बातों से दोनों भाइयों ने यह तो अंदाजा लगा लिया कि कभी बलपूर्वक, कभी लोगों की मजबूरी का फ़ायदा उठाकर खेतों का विस्तार किया गया था। कर्ज़ के ब्याज में, टुकड़े भर जमीन ले ली। लड़की के विवाह में मदद करके किसी के खेत का हिस्सा अपने में कर लिया। चापलूस नौकर-चाकर सीना तानकर उस एक-एक घटना की विरदावली गा रहे थे।

खेत क्या थे, भावविहीन शून्य माँ का खाली आँचल था जिसका हर एक धागा साथ छोड़ने को मजबूर था।
"देख रहे हो, कैसी बंजर जमीन है पानी के बिना। कई बार खोद खोदकर देखा पर अंदर तक सूखी पड़ी है बाँझ जैसी।" मुखिया ने जैसे गाँव वाले कुएंँ के छलछलाते पानी को याद कर लिया था।

माधो और साधो ने एक-दूसरे को देखा। मूँछ पर ताव चढ़ाते उन पहलवानों को देखकर ऐसा लग रहा था कि अपनी मूँछों से ही जमीन खोदने वाले हैं।
 
जीप से कुर्सी, पानी का छागल, खाना निकाला गया। मुखिया जी ने अपना आसन संभाल लिया और बाकी सब इन दोनों भाइयों के पीछे पीछे खेतों का मुआयना करने चले। सारा दिन बीत गया, धरती की कोई हलचल महसूस नहीं कर पाए दोनों।‌ प्रकृति की संवेदनशीलता को मौन करके, उसे जगह-जगह से खोदते रहे। कभी प्यार, मान नहीं दिया, हथेली में भरकर हृदय से लगाया नहीं न‌ माथे तक चढ़ाया। संज्ञा शून्य सी धरती, अपने पुराने लोगों का प्रेम तलाश रही थी जिनके परिवारों से छीन ली गई थी।

बाजू में लगा हुआ एक छोटा सा खेत था। किसान की झोपड़ी, कुआंँ बने थे। बुजुर्ग माता-पिता खटिया पर बैठे थे, बच्चे मिट्टी में खेल रहे थे। शाम होते होते झोपड़ी की खपरैल से उठने वाला धुआं, किसानी जीवन की खुशियों की सोंधी महक दूर तक फैला रहा था।
उनके कुएंँ से पानी खींचने की आवाज़, मुखिया के माथे पर कई आड़ी-तिरछी रेखाएं बना रही थीं। 

"कल फिर बुलाया है छोटके, समझ नहीं आता कि क्या करें?" रात को रोटी खाते हुए माधो चिंतित था।
"भैया, इनके खेतों पर तो प्रकृति का कोप है परंतु बाजू वाले लगे खेत के किनारे पर पानी मिल सकता है।" साधो ने बताया।
"हाँ, मैंने भी देखा था छोटके। उस किनारे की जमीन नम, सोंधी है‌ बिल्कुल उस किसान परिवार की तरह निश्छल ।" कौर निगलते हुए माधो बोलने लगा, "मगर यह बात बताएंगे तो मुखिया उस किनारे की उसकी जमीन हथिया लेगा। छोटा सा खेत है उनका, क्या करेंगे बेचारे?" जमीन से जुड़े आदमी की संवेदना, जमीन से जुड़ी हर बात पर मुखर हो जाती।

"अरे नहीं, पहलवान बोल रहा था कि मालिक ने इन हरामखोरों को कितनी बार खेत बेचने के लिए पूछा।‌ वो बुड्ढा-बुढ़िया आगे आ जाते हैं, कहते हैं जमीन तो हमारी बिटिया है, कैसे बेच देंगे। मर जाएंगे पर खेत नहीं बेचेंगे, मार डालो फिर खेत लेना।" छोटके ने यह जानकारी दी।

दोनों भाइयों की रात जागते हुए बीती। कैसी विपदा थी कि आज उनका गुण ही उनका दुश्मन बन गया था। 

आज मुखिया ने दबाव डालते हुए कहा, "उस दिन मंदिर के सामने वाले कुएंँ के लिए जो खुशी, उत्साह था कल नहीं दिखा तुम दोनों में। काम में भेदभाव करना सही नहीं है।"
आज तीन जीपें तैयार थीं और छह-सात लठैत। दोनों भाइयों का खून सूख रहा था। 
सारा दिन जाँच-पड़ताल, धरती के अनुनय-विनय में बीतता जा रहा था। बगल वाले  खेत के किनारे से सटी जमीन की मिट्टी में, जीवन का संकेत, सोंधापन था। छोटे खेत के किसान परिवार का स्नेह, उसमें बह रहा था। उसकी भुरभुरी माटी को माथे से लगाकर माधो बड़बड़ाया, "हमें क्षमा करना माँ, तुम जननी हो तुम बांझ, बंजर नहीं होती। हम पाप कर रहें हैं।" उसका करुण भाव वापस फेंकी मिट्टी से, धरती के पोर-पोर में समाने लगा।

"मालिक, दो दिनों से सारा खेत देख लिए, कहीं पानी नहीं है।" सिर झुकाकर माधो ने कहा।
"दूसरे गाँव से आकर, हमारे गाँव‌वालों के सामने नाटक करते हो, कुआँ साफ करना, गहरा करना, नया कुआंँ खोदने की सलाह, पानी का स्तर  बहाव सब बताते हो, हमारे खेतों में तुमको लकवा मार गया बे।" मुखिया गुर्रा रहा था।
"कल सुबह अपना बोरिया-बिस्तर बांध कर निकल जाना, दुबारा दिखाई दिए गाँव में तो हाथ-पैर तोड़ देना सालों के। बड़ा कल्याण करने चले हैं गाँव का।" 

जीप पर सवार होते हुए वो फिर दहाड़ा, "सुबह तड़के निकल जाना, कानों-कान किसी को खबर नहीं हो। मेरे लठैत घर की निगरानी करेंगे। गाँव बाहर करके ही आएंगे।" 

सब लोग जीप पर सवार होकर चले गए। माधो और साधो को गाँव तक पैदल ही जाना था।‌ उन्होंने बाजू वाले खेत की ओर देखा, जीवन की खुशियों का पैगाम लिए खपरैलों के बीच से धुआं, आसमान की ओर उठ रहा था।
दोनों ने मुस्कुराते हुए एक-दूसरे को देखा और घर की तरफ चलने लगे।
संदूक, थैली और चंद गठरियों में जीवन बाँधे, अपना बचा पानी सम्हालते हुए तड़के ही उन लोगों ने अनजानी डगर पर कदम बढ़ा लिए। कहीं कोई और प्यासा गाँव‌ उनकी प्रतीक्षा कर रहा था।

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शर्मिला चौहान

बुधवार, 11 जून 2025

जस करनी तस भोगहू ताता ( व्यंग्य)

जस करनी तस भोगहू ताता..(व्यंग्य)

कोई गाँव कस्बे में बदलता है तो उसके पहले गाँववाले कस्बेरियन बन जाते हैं। बालों की स्टाइल, कपड़ों, जूतों में जिहाद आ जाता है। आसपास के शहरों से आने-जाने वालों से, नए फैशन का सामान मंगवाना, गर्व की बात हो जाती है।

अच्छेलाल के ही घर लक्ष्मी का आगमन नहीं हुआ था बल्कि शहर से आने वाले मुख्य मार्ग से आती पैसों की हवा ने हर खिड़की, रौशनदान से घुसपैठ मचा दी थी। जो रही-सही कसर थी वो मोबाइल फोन ने पूरी कर दी।

"अम्माँ, हम सोचते हैं कि मर्दाना कपड़ों की एक दुकान खोल लें।" अच्छे ने, अच्छे समय पर,  अपना अच्छा विचार अपनी अच्छी अम्माँ को बताया।
"चलो, हमारे जीते जी यह सुभ काम भी हो गया बेटा।" अम्माँ ने अपने इकलौते बेटे को घूरते हुए देखा फिर बात पूरी की, "कि आधी उमर पार कर तुम अब सोचने भी लगे हो।" अम्माँ के हृदय भेदी बाण, मुँह से निकल गए थे।
"विपक्ष की तरह हमारी बातों में हमेशा मीन-मेख निकालती हो अम्माँ, इसी कारण तुमसे बात करने का जी नहीं होता हमारा।" अच्छेलाल का मुँह उतर गया।

"अरे, क्यों नहीं! जब हम ब्यूटी पार्लर चला सकते हैं तो तुम मर्दाना बुटीक क्यों नहीं।" चहकती हुई उमा को अपने पति की बात भा गई।
"ये बुटीक का बला है, हम तो कपड़े की दुकान कह रहे थे।" अच्छेलाल पल में होने वाले इस परिवर्तन को समझने में उस मतदाता की तरह नाकाम थे, जिसे मतदान केंद्र पर जाते तक अपने क्षेत्र के उम्मीदवार का नाम समझ नहीं आता।

"अब तो तुम शहर आते-जाते हो और बुटीक हमसे पूछ रहे हो? अरे कपड़े की दुकान को जरा तामझाम सजा के, काँच लगवाकर, दो-चार कपड़े लटका दो, बस.. कपड़ों की कीमत, देश के जीडीपी की तरह जूमम्म बढ़ जाती है।" अच्छे मुँह बाये इस औरत के गणित और अर्थशास्त्र की समझ को समझ रहा था।
अब वित्त मंत्री ने प्रपोजल को हरी झंडी दिखा दी, तो विदेश मंत्री अपनी सीट छोड़कर बाहर निकल गईं। 

पार्लर के बाजू का कबाड़खाना साफ होने लगा। पुराने टूटे फ़ूटे पीतल के बर्तन, फावड़ा, कुदाल, तसले, तीन पैर वाली दो कुर्सियांँ, भविष्य के लिए सहेजे बिजली के पुराने तार, कुछ प्लास्टिक पाइप और कई ऐसे सामान जिनके उपयोग करने का मुहूर्त निश्चित नहीं था, सब आँगन में इठलाने लगे।

सीतलू बढ़ई, अपना अस्त्र-शस्त्र, औजार की टीन वाली पेटी लिए पधारे।
"भौजी, हम दरवाजा, पल्ला, खिड़की, पीढ़ा पटा बनाना जानते हैं कहो तो ये बुटीक का बला है?" बाईं हथेली में खैनी धरे, दाहिने अँगूठा से उस पर जोर आजमाता सीतलू बोला।

"कुछ नहीं भैया, कुर्सी मेज और लकड़ी के फ्रेम में काँच लगाकर स्टाइल वाली दुकान बनाना है।" कहते हुए उमा अपने स्मार्टफोन से बुटीक की तस्वीरें दिखाने लगी।
चाय पीकर, बातचीत करके सीतलू अपनी पेटी उठाकर कल आने का वादा करके गधे के सींग की तरह नदारद हो गए।

दो दिन उसको जगह-जगह तलाशते अच्छे का पारा चढ़ने लगा।
"हम दुकान कह रहे थे तो तुमको बुटीक बनाना था, अब लो कौन बनाएगा इस गाँव में बुटीक?" उमा की ओर भृकुटी तनी थी।
"करो जो जी में आए, कोई स्टैंडर्ड की बात तुमको कभी अच्छी ही नहीं लगती।" कहते हुए उमा ने घर में घुसकर दरवाजा बंद कर लिया।
अम्माँ की गाँठ से कुछ इंतजाम करके, किराएदारों से नकदी वसूल कर और उमा से मनुहार करके उसकी जमा-पूंजी लेकर दूसरे दिन अच्छेलाल मोटरसाइकिल पर सवार, शहर की ओर निकल गए।
एक थान कपड़े से पूरे परिवार की कमीज़ें, ब्लाउज़, पर्दे और बचा तो थैलियां सिलते देखा था अच्छे ने।

"वही ज़माना है वापस, दो अलग-अलग बचे टुकड़े को जोड़कर कमीज़, कुर्ता बन जाता है।‌ पैंट में छेद कर दो, कीमत दुगुनी..वाह भाई। रंग चोखा।" मन ही ही मन विचार करता अच्छेलाल ने शहर के मुख्य बाजार की सड़कों पर बिकने वाले, तैयार कपड़े की खुली दुकानों के पास मोटरसाइकिल खड़ी कर दी।
"अबे, अनपढ़ है या अंधा! देख नहीं रहा नो एंट्री का बोर्ड, बस घुसा दी मोटरसाइकिल। चल, कागज दिखा सब, लाइसेंस बनाया क्या?" डंडा पटकते हवलदार ने डाँट लगाई।
"अँग्रेजी जानते तो बुटीक ही खोलते साहब, दुकान नहीं।" अच्छे फुसफुसाया।
"रख इधर गाड़ी, चल मेरे साथ।" अच्छे समझ गए कि हवलदार बोहनी किए सिवा मानेगा नहीं आखिर पूरे दिन की शुभ शुरूआत थी उसकी।

आधे घंटे की हील हुज्जत के बाद, हवलदार की जेब भारी हुई और अच्छे हल्के होकर खरीदी करने चले। फैशन के दरिया में डूबते-उतराते आखिर कार, एक गट्ठर कपड़े लिए, कल्पनाओं के पँख लगाए अच्छेलाल ने अपने घर का रास्ता पकड़ लिया।
"चीज जैसी भी हो उसका विज्ञापन बढ़िया होना चाहिए। हमारे ब्यूटी पार्लर का उद्घाटन मीरा बहन जी से करवाया और छुटपुट छूट दी थी, वो दिन है और आज का दिन सरकारी आश्वासनों की तरह औरतों की लाइन लंबी होती जा रही है।" अपने कमाई का श्रेय अपनी कुशलता को देते हुए उमा ने सलाह दी।

"अब तुम पिंकी के मायके की कौन सी दुकान से पुराने क्रीम, पाउडर मंगवा लेती हो, कम कीमत में पुराना माल लेकर सबको पोत देती हो। ऐसी छूट हम कहाँ से देंगे?" अच्छे बड़बड़ाए।
"तुमको तो धंधे का कोई ज्ञान नहीं है, समझना भी नहीं है बस। अरे..दो सौ की खरीदी पर बीस-पच्चीस की छूट रख दो, धंधा जमते तक।" किसी बिजनेस स्कूल के प्रोफेसर जैसी गर्दन तान कर, वह अपने पार्लर की साफ-सफाई करने चली गई।

विज्ञापन वाली बात अच्छे के दिमाग में, सही नाप के जूतों की तरह फिट हो गई थी सो लाए कपड़े पहनकर, आइने में खुद को निहारने लगे।
"बताओ, लग रहा कि हैंगर का विज्ञापन हो रहा है। सब प्रकार के कपड़ों को लटकाने वाला एकमात्र हैंगर।" आँखों से हँसती उमा ने टोक दिया।
"लो तुम ही पहन‌ लो पैंट कमीज़, तब खुश होगी।" भिनभिनाते हुए अच्छेलाल ने तुरंत नए कपड़े उतार दिए।
"सही कह रहे हो, मर्दों की चीजें, औरतें ही तो बेचती हैं। टेलीविजन पर देखते नहीं, मर्दाने क्रीम, बनियान सब में औरतें रहतीं हैं।" उमा के मन की बात अच्छे ने कह दी थी।

दूसरे दिन, ब्यूटी पार्लर में उमा, जमुनिया और पिंकी ने मर्दों के कपड़े पहनकर, मोबाइल की गैलरी भरते तक तस्वीरें खींची।

"चुनाव पोस्टर वाले से कहो ना कि एक-दो पोस्टर बना दे। छत पर लटका देंगे, देखना सबकी नज़र जाएगी और कपड़े हाथों-हाथ बिकेंगे।" अच्छे को यह समझ गया कि उमा अब कदम पीछे नहीं लेगी आखिर कार अपने पैसे भी तो दिए थे उसने।

पोस्टर कैसे बना, क्या क्या पापड़ बेलकर शहर से पोस्टर वाले ने, तड़कते-भड़कते रंगों से सजा पोस्टर, अच्छेलाल के घर की छत पर चढ़ा दिया और दुसरा मुन्ना के रेस्टोरेंट के सामने खड़ा कर दिया।

लुंगियाँ, कमीज़-पैंट, कटी-फटी जीन्स पहनी उमा, पिंकी बहुरिया और जमुनिया के पोस्टर देखकर बूढ़ी जीभों में जवानी आ गई।

"घोर कलयुग आ गया, अच्छेलाल की बहुरिया तो गाँव का नाम डुबा रही है।" पोपले मुँह से हवा के साथ शब्द फेंक रही थी दीनू की अजिया।

"सास काहे नहीं रोकती? गांव भर की मेहरारून को बिगाड़ रही है उसकी बहुरिया।" पंडाइन काकी ने अँगुलियाँ तोड़ते हुए कहा।
बूढ़ों का अलग हाल था।
"बहुतई नीक कपड़ा लाए हैं अच्छन, चला देख आई।" टेलीविजन पर देखें रहे मर्दाने कपड़ों में औरतें, अपने गाँव की मेहरियाँ  पोस्टर में पहने दिखीं तो बूढ़ों ने अच्छेलाल के घर की राह पकड़ ली।

सरकारी मुफ़्त अनाज दुकान की कतार से एकाध मीटर ज़्यादा ही लंबी कतार, अच्छेलाल के घर के सामने लग गई।
कपड़े सुखाने वाली रस्सियों में अलग-अलग सूरत-शक्ल के कपड़े अकड़ रहे थे। अधेड़ भोला ने पूछा " ये कमीज़, कितने की है अच्छे?"

"ई कमीज़ तुम पहनोगे भोले भैया? कौन मेहरिया का मुँह बना है उसको छाती में चिपकाए घूमोगे? राम-राम, हमारी देवरानी का करेगी बेचारी।" अम्माँ के प्रलाप से घबराकर भोला काका ने, हाथ में पकड़ी कमीज़ को ऐसे फेंक दिया जैसे साँप हो।
 शहर के फैशन, पहनावे से परिचित, एक जवान लड़के ने कहा, "ए बुआ, कोई मेहरारू नहीं है। अमरीका का बड़ा रुतबे वाला गायक मनई है।"
"ऐ दैया...! तू रामसरन भैया का बेटा है ना। का हालत बनी है, बेटवा तू बिटिया कब बन गया ?" लड़के ने लंबे बालों को हेयर बैंड से बांध रखा था, कानों में छोटी बालियाँ, कलाई पर रंग-बिरंगे धागों से बने बंद और ढीला-ढाला प्लाजो पहना था।
सिटपिटा गया और उसी रास्ते बाहर आ गया जहाँ से भोला काका निकले थे।

"अम्माँ, पहले दिन की ग्राहकी क्यों खराब करती हो, मुँह बंद करके बैठ जाओ तो भला हो।" उमा के तल्ख़ स्वर से अम्माँ ने मुँह दूसरी दिशा में फेर लिया।
अब कबाड़खाना पूरे आँगन में फैल गया था। जवान, बूढ़े सब फैशन वाले शहरी कपड़े पहन पहनकर देख रहे थे। अम्माँ की सूखती हुई साड़ी से पर्दा बना लिया गया था जिसे अम्मांँखींच ले गईं। 
कोई हाफ पैंट, कोई सौ छेदों वाली जीन्स की पैंट तो कोई लुंगी बांधे आँगन आँगन भर घूम रहा था। बाहर भैंस आवाजें लगा रही थी जिसआंगन में उसका अधिकार था, आज पूरी बारात खड़ी है। 
"अच्छे भैया, जरा देखो तो यह कपड़ा तुम्हारे फूफा को फिट पड़ गया है का?" मायके आईं बिजया बुआ अपने पति को कुर्ते में फंसे देख अच्छेलाल को बुला लाई।
"ऐ बुआ, यह तो फंस गए। घुसाया कैसे इनको, अब वैसे ही निकालो।" अच्छे ने देखा गणेश भक्त फूफा ने गणेश जी से बुद्धि की जगह तोंद ही मांग ही थी शायद।
"कैसे दुकानदार हो, ऐसा कपड़ा क्यों बेचते हो कि आदमी फंस जाए। हम अपनी ससुराल में क्या मुंह दिखाएंगे।" बुआ का करूण विलाप सुन सब चारों ओर जमा हो गए।
"उनका मुंह तो निकाल पहले फिर अपना मुंँह दिखाना ससुराल में।" औरतें चिल्लाने लगीं।
चार आदमियों ने फूफाजी को पकड़ा, दो उनकी बाँहों को कुर्ता मुक्त करने में लगे थे, दो सिर से ऊपर खींचने में।

चर्ररर.. कुर्ते की सिलाई खुलती गई, बादल हटते ही फूफाजी का शरीर चाँद की तरह बाहर आ गया। 
"काम करना जाए तो जरा सोच-समझकर वरना बेकारी ही भली।" अपने पति का हाथ खींचकर फटे कुर्ते को अच्छे के हाथों फेंकती बिजमा बुआ निकल गईं।
फटे कुर्ते से ज़्यादा टुकड़े अच्छे के दिल के हो गए।

"इस पर का फरी दोगे बेटवा?" बिरजू काका एक कमीज़ को अपने शरीर से सटाते हुए पूछे।
"काका, दो कमीज़ पर एक बनियान फ्रीईई.. है।" मुफ्त की महिमा अपरम्पार है सो अच्छे ने फ्रीईई..पर लंबा जोर डाला।
"जो हमको एक ही कमीज़ लेना है तो?" सीधा प्रश्न ग्राहक का।

"ताऊ, आपका गणित बहुत कच्चा है। दो पर एक तो एक पर आधी बनियान। हमारे पापा की पुरानी बनियान फाड़कर हमारी मम्मी पोंछा, झटकन सब बना लेती हैं, आप नई बनियान का पोंछा ले जाना।" सब लोग हँसने लगे और निष्क्रिय सांसद की तरह काका इस चलते सदन से गायब हो गए।

"ऐ बबुआ, जरा टिकाऊ मजबूत सरकार की तरह कोई टिकाऊ लुंगी दिखाओ।"

"ये कैसी चिंदी फटी पैंट उठा लाए बेचने अच्छन बेटवा, हम लोगों को भिखारी समझते हो क्या?"
"कमीज़ कैसी है भाई, आगे से एक बित्ता छोटी, सामने का कपड़ा काटकर रूमाल बना लिए क्या अच्छेलाल? हे भगवान, कैसा जमाना आ गया है।"

सारा आँगन युद्धक्षेत्र में तब्दील हो गया था। स्वनिर्मित शब्दों की मिसाइलें लगातार आघात कर रहीं थीं और कुछ दिल तक घुस जातीं तो कुछ उमा और  अच्छे द्वारा रोक ली जाती। बेमौसम बरसात की तरह सुझाव बरस रहे थे।
चाय बनाकर पिलाती उमा और उसकी टीम थक गई हर आनेवाले कड़ी मीठी बढ़िया दूधवाली चाय का लुत्फ़ कम से कम दो-तीन बार उठा ही रहा था।

"अच्छे बेटा, सौ रूपए वाली लुंगी लिए जाते हैं। अभी पचास रखो, फसल कटाई पर बचा पचास दे जाएंगे।" लुंगी सीने से चिपकाए, पचास रुपए पकड़ाकर सुंदर चाचा निकल गए।
सुशीला भाभी कब पीछे रहतीं।
" अच्छे भैया, तनिक ये कमीज़ पहन के दिखावा तो। तोहार भैया हैं नहीं उनके लिए हमें लेना है।" अगले मिनट अच्छे के इकहरे बदन पर नीली, बड़े बड़े फूलों वाली ढीली कमीज़ झूल रही थी।

"अरे भैया..जरा अच्छी फिटिंग का पहन दिखाओ।" अखाड़े में पहलवानी करने वाले, इस गाँव के सबसे हट्टे-कट्टे पहलवान के लिए भाभी, अच्छे के शरीर पर कमीज़ पहना रही थीं।

"दीदी, भैयाजी को ही भेज देना, अपनी पसंद की कमीज़ खुद देखभाल कर लें लेंगे।" उमा झट मैदान में कूद पड़ी और अच्छे हैंगर बनने से बच गए।
"उमा बहन, अब पहलवान आदमी का क्या ठिकाना, कब आएंगे कब पसंद करेंगे। तब तक तो यहाँ लूट खत्म हो जाएगी। ऐसा करती हूँ चार कमीज़ लिए जाती हूँ जो पसंद आएगी रख लेंगे नहीं तो वापस कर जाऊंगी।" बिना उत्तर की प्रतीक्षा करे सुशीला भाभी ने चार कमीजों का गट्ठा बनाया और तीर की तरह निकल गई।

चार घंटों में कपड़ों की अफरातफरी मच गई और हाथ आए चार सौ रुपए। चार-छह कपड़े खींचातानी में, अपने हिस्से गवां चुके थे, कराहते हुए टुकुर-टुकुर देख रहे थे।

दुधारू भैंस कब तक रंभाती, अम्माँ गेरवा बाँधकर उसे लड़ियाती आँगन में बाँध गई। 

"हम जो कहे रहे बेटा कि तुम सोचा न करो, सोच-विचार तुम्हारे बस का नहीं।‌ दूध की चंदी का पैसा, घर किराया सब देखो फटा बिखरा पड़ा है इहाँ से उहाँ तक।"  अम्माँ ने गर्व से दुधारू भैंस के गर्दन को सहलाते हुए कहा।
"अम्माँ, हमारी भी ब्यूटी पार्लर की कमाई का पैसा सब डूब गया। सही कहती हो अम्माँ, धंधा बिजनेस तुम्हारे बेटे के बस का काम नहीं।" सात फेरे में ली, सुख-दुख में साथ निभाने की कसम हमेशा की तरह उमा ने फिर तोड़ दी और अम्माँ के साथ खड़ी होकर भैंस को पुचकारने लगी।


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गुरुवार, 5 जून 2025

यूरोप यात्रा: स्विट्जरलैंड के दो स्थानों का वृत्तांत

"सपनों का सच: स्विट्जरलैंड" (इंटरलेकन एवं माउंट टिटलिस)

कश्मीर और लेह देखने के बाद, बर्फ़ से ढंकी उन पहाड़ियों को पास से देखने की इच्छा और तीव्र हो गई जिन्हें फिल्मों में कई बार देख चुकी थी। स्विट्जरलैंड जाने का यह योग 2025 के अप्रैल महीने में बना, फलीभूत हुआ।

सोलह दोस्तों को साथ चौदह दिनों की योजना बनी और मुंबई से ट्रेवल एजेंसी के मार्गदर्शक ‌श्री विनायक जी साथ थे। यहाँ सूरज के तेवरों को झेलने के बाद, ठंडी और बर्फ़ से परिपूर्ण जगह पर जाने की कल्पना मात्र से दिल बल्लियों उछल रहा था।

गर्म कपड़े, रेनकोट, पोंचू, अच्छे जूते (जो बारिश और स्नो में पैरों की पकड़ बनाए रखें), कैमरा, खाने के लिए भारतीय नाश्ता, जरूरी दवाइयांँ और खूब सारा उत्साह भरकर, हम सब मुंबई एयरपोर्ट पर मिले।

मुंबई से ज्यूरिख की आठ घंटे की फ्लाइट में, अच्छे भारतीय भोजन के बाद भी नींद आँखों से रूठी रही मानो अब तो उन्हें सपने में नहीं सच में ही स्विट्जरलैंड देखने का आभास हो गया था।

सुबह आठ बजे हमारा ग्रुप, सारी अंतरराष्ट्रीय जाँच प्रक्रिया पूरी करके ज्यूरिख एयरपोर्ट से निकल गया था। हमने एक पच्चीस सीटर बस की थी जिसे लेकर बस चालक (यूरोपीय देशों में कोच कैप्टन कहते हैं) उपस्थित थे। सामान व्यवस्थित कर, हम सबने उस कंपकंपाती ठंड का सामना करने के लिए अपने जैकेट, मफलर कस लिए। स्विट्जरलैंड में हमारे रूकने की व्यवस्था Zug शहर के होटल में थी।

सपनों के सच होने का पहला दिन, एयरपोर्ट से 134 किलोमीटर पर स्थित इंटरलेकन शहर देखना। बस कैप्टन और हमारे गाइड विनायक ने रास्ते की दर्शनीय स्थलों की जानकारी दी। हमें पता चला कि यहाँ बस कैप्टन का काम, बहुत महत्व रखता है। उनको एक बढ़िया तनख्वाह के साथ मान-सम्मान भी खूब मिलता है। जिस होटल में हमारे रूकने की व्यवस्था थी उसी में वैसा ही कमरा उनके लिए भी बुक था। होटल के भोजन में भी वो शामिल रहते।‌ उनका अपनी बस और यात्रियों के प्रति जिम्मेदारी यह थी कि यदि रास्ते में बस खराब हो जाती है तो वो स्वयं ही उसे सुधारते हैं अर्थात मैकेनिक नहीं बुलाते और ना ही किसी यात्री से सहायता लेते हैं।( हमने यात्रा के दौरान इस सच्चाई का अनुभव किया) 

इंटरलेकन, दो झीलों (Thun और Brienz) के बीच स्थित एक छोटा सा, बेहद खूबसूरत शहर।  झीलों का हल्का नीला हरा पानी, अपने चारों तरफ बर्फ़ से ढके पहाड़, खुला नीला आसमान और जितने रंगों को पहचान सकते हैं उनसे कई गुना ज्यादा संख्या में रंग-बिरंगे फूलों से भरा यह शहर, पल भर के लिए भी पलकें मींचने की अनुमति नहीं देता।

झील के किनारे किनारे पैदल चलकर, पास ही स्थित Casino Kursaal बगीचे में आ गए।‌ इस बगीचे के मध्य में भारत के प्रसिद्ध दिग्दर्शक स्व. यशराज चोपड़ा की एक प्रतिमा लगी है, जो सभी भारतीय यात्रियों को आकर्षित करती है।

इंटरलेकन, प्रकृति की गोद में बसा बेहद सुंदर शहर है, जहाँ भारतीय रेस्टोरेंट भी हैं। हमने भारतीय भोजन का आनंद लिया और वहाँ होटल मैनेजमेंट के दो भारतीय छात्रों से मुलाकात हुई। महाराष्ट्र से यूरोप पढ़ने गए ये बच्चे, अपनी इंटर्नशिप कर रहे थे।‌ अब वो मराठी, हिंदी, अँग्रेजी के अलावा फ्रेंच और जर्मन भी सीख रहे थे। अपनी देशी भाषा में बात करके, वे बड़े उत्साहित हो गए।

स्विट्जरलैंड की प्रसिद्ध ट्रेन से, पहाड़ियों, स्टेशनों, झीलों को अपने कैमरे और हृदय में कैद करने हेतु, हमारा समूह इंटरलेकन के रेल्वे स्टेशन पर ट्रेन का इंतज़ार कर रहा था।

इतने बड़े समूह को महिला टिकट कलेक्टर ने, बड़ी ही कुशलता से एक डिब्बे में स्थान दिया।  उन्हें मालूम था कि ये पर्यटक हैं और सब साथ में आनंद लेना पसंद करेंगे।

काँच की बड़ी खिड़कियों में आँखें मानो चिपक गईं थीं। दो घंटे की इस यात्रा में गर्दन 180 डिग्री पर दाएं-बाएं घूमती रही जिससे दोनों साइड के नैसर्गिक सौंदर्य में से किसी एक को भी देखने से आँखें वंचित न रह जाए।‌ पहाड़ियों में उगाई फसलों से हरे खेत, दूसरी ओर स्वच्छ बड़ी-बड़ी, नीली झीलें, किनारों पर फूलों की बाड़ों से आँख मिचौली करते छोटे-छोटे प्यारे घरों की छबि हृदय में उतारते, हम सारनेन स्टेशन पर उतर गए। हमारी बस इंतजार कर रही थी और हम जुग स्थित अपने होटल की ओर चल पड़े। सुबह एयरपोर्ट पर उतरने के बाद,‌ आज के पहले दिन को दिलो-दिमाग पर और पुख्ता करते, हमने रात बिताई।

दूसरे दिन सुबह नाश्ते के बाद, बर्फीले पहाड़ पर जाने की पूरी तैयारी से लैस हमारी टीम निकल पड़ी। होटल से 47 किलोमीटर दूर एंजलबर्ग शहर के पास माउंट टिटलिस है। माउंट टिटलिस के बर्फीले पहाड़ों को हिंदी फिल्मों में देखा था और आज उसकी सुंदरता को अनुभूत करने की लालसा सभी को थी। मार्गदर्शक ने बार-बार अच्छे जूते पहनने की सलाह दी क्योंकि बर्फबारी लगातार जारी थी।

3020 मीटर की ऊंचाई पर दो केबल कारों से पहुँचना बहुत रोमांचक रहा। पहली केबल कार, दुनिया की सबसे प्रथम रोटेटिंग कार थी, जो ऊपर ले जाते तक अपने अक्ष पर 360 डिग्री घूम गई। श्वेत शॉल लपेटे माउंट टिटलिस को हर कोण से देखने पर भी, आँखों को कहीं कोई रंग नजर नहीं आ रहा था। 
माउंट टिटलिस के टेबल टॉप (समतल स्थान) पर पहुँचकर, स्नो फाल और तेज ठंडी हवाओं से मुठभेड़ हुई। अब बारी थी यूरोप के सबसे बड़े झूला पुल (suspension bridge) पर चलने की। _4 डिग्री पर, हवा और बर्फ़ के थपेडों से घबराकर कुछ मित्रों ने दस-बारह कदम चलकर, वापसी कर ली और कुछ अंत तक चलते गए।  उफ्फ... कितना भयावह, नीचे देखने की हिम्मत नहीं और ऊपर से महीन-महीन बर्फ़ हमें ढंक लेने को तैयार थी। 3020 मीटर से अब आगे 3040 मीटर तक की ऊंचाई से, flyer ride (एक साथ चार लोग) करके बेहद खूबसूरत, खतरनाक और दिलचस्प दृश्यों को कैद करने के लिए, फोन या कैमरा उठाने से अँगुलियाँ इंकार कर रही थीं। इस बर्फानी हवा में, दूर दूर देशों से आए कुछ दक्ष खिलाड़ी स्केटिंग एवं स्कीइंग कर रहे थे। अपना व्यक्तिगत  प्रदर्शन और अच्छा करने का उनके लिए यह अच्छा समय था। 

जब इतना दुस्साहस लोग कर रहे थे तो हमारे समूह की सभी महिलाओं ने भी भारतीय परिधान साड़ी पहनने की हिम्मत कर ही डाली। हाथों के दस्ताने, जैकेट और टोपी उतारकर साड़ी लपेटना कितना बड़ा काम था, अभी सोचकर मुस्कुराने लगती हूँ। इतने में ही अँगुलियाँ खुद बर्फ़ बनने की फ़िराक में थीं।

काँपते ठिठुरते हम लोगों ने  इसी शिखर पर स्थित भारतीय रेस्टोरेंट में शरण ली। यहाँ एक अच्छा तापमान बनाकर रखा था। वहीं भोजन करके हम पुनः उन दो केबल कारों पर विराजमान माउंट टिटलिस से नीचे उतर गए।
इन केबल कारों में विभिन्न देशों के नाम और ध्वज लगे थे। पूछने पर पता चला कि तकरीबन अस्सी कारें हैं और जिस देश की सहभागिता यहाँ के पर्यटन में जैसी है वैसी ही केबल कारों को उस देश के नाम से दर्शाया जाता है। हमने आते-जाते वक्त भारत का तिरंगा फहराते, चार केबल कारें दिखीं जिससे भारतीय पर्यटकों की भारी संख्या का अनुमान लगा सकते हैं। 

बस से होटल वापसी के वक्त हमने , घर से साथ लाए चकली, चिवड़ा और लड्डू का भरपूर आनंद उठाया। 

भारतीयों का‌ विश्व पर्यटन में बहुत बड़ा योगदान होता जा रहा है। कई भारतीय समूह मिले और आपस में  बातचीत करने पर पता चला कि हमारे देश के सभी भागों से बड़ी संख्या में लोग अब विश्व घूमने का मन बनाने लगे हैं। 
हमारी संस्कृति ही 'वसुधैव कुटुंबकम्' और 'चरावेति चरावेति प्रचलाम निरंतरम्' की है।


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शर्मिला चौहान 
ठाणे महाराष्ट्र