कहानी _ "बचा पानी"
बड़के और छोटके सोनपुर में कुछ ही दिनों पहले आए थे। उनके गाँव से काफी बड़ा और समृद्ध है सोनपुर। यहाँ प्राथमिक विद्यालय के साथ हाईस्कूल, सरकारी जच्चा-बच्चा केंद्र के अलावा यहाँ अस्पताल भी है। घरेलू जरुरत का सामान हर दिन बाजार में बिकता है। इन्हीं कारणों से दोनों भाइयों ने अपने परिवारों के साथ, इस कस्बे में शरण ली। गाँव में माई के साथ मंझले और उसके परिवार को छोड़ आए थे।
कुल आठ लोगों के लिए कच्चा घर किराए पर लिया था।
"परिवार वाले हो सोच समझकर किराया दे देना भाई। खाली पड़ा घर श्मशान हो जाता है, आदमी रहेंगे तो इज्जत आ जाएगी घर की।" सहृदय मकान मालिक ने अपने अतिरिक्त पड़े घर का ताला खोलते हुए कहा।
"भैय्या, कुछ काम-धाम मिल जाए तो बिना बोले घर किराया समय पर दे देंगे। हम लोग भी घर-द्वार वाले लोग हैं नागा नहीं करेंगे।" माधो ने उसे आश्वस्त किया।
खाने-पकाने के बर्तन, ओढ़ने-बिछाने की दरी-गुदडियाँ और पहनने के कपड़े संदूक, थैलों और कुछ गठरियों में बाँधकर साथ ले आए थे वो।
वर्षा की विदाई और शरद के आगमन की सुंदर ड्योढ़ी पर खड़ी प्रकृति का रूप अनुपम था। ताल, कुओं का जल अपनी सीमा में सिमटा, टुकुर-टुकुर देख रहा था। आसपास खिले कांस के श्वेत फूलों की हिलती-डुलती प्रतिच्छाया में चाँद का आभास उसे विचलित कर देता। इन दिनों सोलह कलाओं से परिपूर्ण चंदा अपने तारागणों के साथ पूरी रात मुस्कुराता दिखाई दे जाता था।
वैसे तो इन दोनों भाइयों का नाम माधो और साधो था परन्तु माई के दिए उनके घरेलू नाम बड़के और छोटके से ही गाँव भर उनको बुलाया करता था।
परिवार में लड़के-लड़कियों की संख्या भी बराबर थी कहीं कोई ऊंँच-नीच नहीं। बड़के को दो बेटियांँ तो छोटके को दो बेटे। मंझले भाई की एक बेटी एक बेटा अर्थात अनुपात एकदम सही था।
गाँव में भी बाप-दादाओं की कोई पुश्तैनी खेती जमीन तो थी नहीं, रोज़ कमाना रोज खाना। माई-बाबा ने बच्चों को स्कूली शिक्षा तो बहुत नहीं दिलवाई परंतु पेट भरने का हुनर, जीवन जीने की कला भरपूर दी थी। घरों के खपरैल छाना, कुएँ साफ करना, कुओं की खुदाई करना, खान से मिट्टी लाना, गोबर बीनकर उपले बनाना, फसलों की कटाई, निराई-गुड़ाई इन सब कामों में तीनों भाई निपुण थे।
अब गाँव में ये काम बहुत लोगों को आता है इसीलिए रोजी देकर कम ही लोग बुलाते थे। गर्मियों में काम की बहुतायत हो जाती, सबके घरों के छप्पर छाने लगते, सभी कुँओं की सफाई, कचरा निकालने का यही उचित समय होता था। वर्षा ऋतु में खेती बाड़ी वालों का काम आ जाता तो इस परिवार की रोटी खेतों में बुवाई, निराई से चल जाती थी।
"माई, इस गाँव में कितना काम मिलेगा। परिवार बढ़ रहा है मेहनताने में अनाज, सब्जी और मछली देते हैं लोग। तीन साल पहले बिसनू बाहर गया था, अब साल छह महीने में आता है तो नकद पैसे लाता है कमाई के।" माई के साथ सभी भाइयों ने सलाह मशविरा किया और बड़के, छोटके अपना परिवार लेकर गाँव छोड़ने के लिए आगे आए। मंझले की प्रकृति ज़रा नाजुक थी इसीलिए माई ने उसे परिवार सहित अपने पास रहने के लिए मना लिया।
सोनपुर आकर चार-पाँच दिन हो गए और आज दोनों भाइयों को, तालाब के किनारे पार बाँधने का काम मिला।
छोटकी बहू घर की रसोई संभालती और बड़की आसपास के लोगों के छुटपुट कामों में सहायता करके, घर की सब्जी भाजी का इंतज़ाम करने लगी।
"घर की माटी उधड़ गई है। बाहर से लोग आएंगे तो बखत बेबखत घर में काम करेंगे। तुम दोनों देवरानी जेठानी मिलकर कर दो घर की छपाई लिपाई, आगे त्यौहार आ रहें हैं।" मकान मालिक की पत्नी ने बड़की बहू से पूछा।
परगाँव में सिर छुपाने की छत, खाने सोने की जगह देने वाले लोगों को नकारना, बड़की को उचित नहीं लगा। काम करके किराये की भरपाई भी हो जाएगी, यही सोचकर उसने हामी भर दी।
अपने घर का काम जल्दी जल्दी ख़त्म करके, दोनों मकान मालिक के घर पहुँच गईं। माटी छानना, सानना, मजबूती के लिए उसमें धान की भूसी मिलाकर और सुघड़ हाथों से ईंट पत्थरों पर चढ़ाते हुए, दोनों ने करीब सप्ताह भर में दीवारों को नया रूप-रंग दे दिया।
पूरे घर को माटी और फिर गोबर से सारकर, सूखने के लिए छोड़ दिया।
पराए गाँव में लोगों का विश्वास जीतकर, अपनी ईमानदारी और अच्छे काम की छाप छोड़ दी दोनों ने। मकान मालिक ने दो महीने का किराया उनके मेहनताने से ले लिया।
सोनपुर बड़ी जगह थी तो जनसंख्या भी अधिक थी। रोड़-रास्ते, बिजली के खंबे सब बढ़िया थे। गाँव से आए इस परिवार ने महसूस किया कि यहाँ ठंड के दिनों में भी, कुएँ तालाबों का पानी नीचे चला गया था।
"पता नहीं, अभी से यहाँ के कुएँ में कितना नीचे पानी है खींचते-खींचते दम निकल जाता है।" छोटकी बहू ने बताया।
"अच्छा, हाँ सूरज का ताप सीधा धरती में समा जाता है। पेड़ों की कमी भी तो है पता नहीं पेड़ों की कमी से पानी कम है कि पानी की कमी से पेड़।" माधो ने अपना विचार रखा।
माधो और साधो को धरती के अंदर पानी की लहरों को सुनने, समझने की दैवीय शक्ति प्राप्त थी। माटी में पले-बढ़े ये लोग, माटी के जीवन उसकी भाषा और भावनाओं को करीब से महसूस करते थे। उनके गाँव में भी उनकी सलाह के बिना किसी भी जलस्रोत का निर्माण नहीं किया जाता था।
माई कहती थी, "तुम्हारे बाबा का यह गुण, तुमने पाया है। वो आसपास की जमीन, पेड़-पौधे देखकर पानी का अंदाजा लगाया करते थे।"
बड़के के स्मृति पटल पर बाबा की छबि और भाइयों से ज़्यादा स्पष्ट थी। उसे अक्सर साथ लेकर जाते थे बाबा।
"दिनभर माई के पीछे-पीछे माटी लाएगा, गोबर उठाएगा, चल जरा मेरे साथ। जमीन के अंदर भी बड़ी दुनिया है बेटा, उसको जानना, समझना अपनी धरती माता की बातें सुनना, यही तो हमें अपनी जमीन से जोड़ता है।" बाबा उसको साथ ले जाते समय समझाते थे।
किसी स्थान के जलस्रोत को परखने से पहले, बाबा एक गगरी पानी से उस जमीन को शांत करते। हाथ जोड़कर विनती करते, "हे धरती माता, तेरे बच्चे पानी की आस लगाए हैं। तू तो माँ है हमारी, हमें प्यासा कैसे रख सकती है माँ।" कुदाल चलाने से पहले सैकड़ों बार क्षमा मांगते थे।
दो-तीन फीट गहरा खोदकर, वहाँ से एक मुट्ठी माटी हथेली पर रखकर, उसे माथे से लगाते, सूँघते, निहारते और वापस छोड़ देते। अपने कानों को धरती से चिपकाकर, लंबे समय तक कुछ टोह लेते थे बाबा। बाबा जहाँ पानी की हलचल महसूस करते, वहीं निशान बना देते थे। उनके तय किए स्थान पर धरती माता अपना आँचल सरकाती और अमृतधारा छोड़ देती। बाबा की निश्छलता, उनका प्रेम कैसे ठुकरा देती माता?
बाबा के साथ जा-जाकर, माधो ने भी प्रकृति पेड़-पौधों, पानी, मिट्टी से संवाद स्थापित करना सीख लिया।
"बाबा, मेरी शाला के पीछे हम लुकाछिपी खेल रहे थे तब मुझे वहाँ की जमीन बड़ी सोंधी महक दे रही थी। मैंने हथेली में उठाकर देखा, उसकी भुरभुरी माटी में नमी है, वहाँ नीचे जरुर अच्छा पानी मिलेगा।" अपने बेटे की बातों से पिता खुश हो गया।
गाँववालों के साथ जाकर बाबा ने स्वयं उस जगह को देखा परखा और सबसे यह बात बताई, "जब कभी पानी की जरुरत पड़े तो इस जगह में अपार जीवन है।"
खैर, बाबा का खाना पानी इस दुनिया में कम समय था या तो भगवान को उनकी ज्यादा जरूरत थी, वो इस दुनिया से चले गए ।
अब माधो पूरी तरह से बड़के बन गया। माई के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खदान के पास से छुही माटी, लाल माटी, कनस्तर और बोरे में भर भरकर लाता, आँगन में एक तरफ़ ढेर लगा देता। आसपास के लोग लीपने के लिए, घर छाबने के लिए माई से मिट्टी खरीद ले जाते। शाला तो कक्षा पाँच के बाद बंद हो गई थी, दिनभर गाय-भैंसों के पीछे सिर पर टोकरी लिए बड़के और मंझले घूमते फिरते। चूल्हा जलाने के लिए कंडे हो जाते और जब ज्यादा जमा हो जाता तो माई बेच आती।जीवन का हर क्षण प्रकृति से जुड़ा, बँधा था उनका।
दूसरे दिन सुबह, छोटकी बहू की कुएँ में कम पानी वाली बात की जाँच करने के लिए दोनों भाई चले गए। मुआयना करके बड़के ने आसपास के लोगों को बताया कि, "जब चैत बैसाख में पानी और नीचे जाएगा, कुआं साफ करके चार फीट और गहरा कर लेंगे। अंदर से बाँई ओर ढलान वाली जगह पर थोड़ा आगे खोद लेंगे। धरती माता की कृपा रही तो कुएं में बहुत पानी रहा करेगा।"
माधो के इस गुण को जानकर गाँववालों ने एक नया कुआँ खोदने की बात कही।
अगले सप्ताह चौपाल पर पूरे लोग जमा हुए। इस गाँव के पुश्तैनी अधिपति, मुखिया जी भी अपने लाव-लश्कर के साथ उपस्थित थे। सबकी सहमति से मंदिर के आसपास की जगह कुएँ के लिए तय की गई।
अगले दिन पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए, दोनों भाई मंदिर के सामने पहुंँच गए। हाथों में पानी, नारियल, फूल लिए मंदिर के पास की धरती को शांत किया।
"माँ, हम सब तेरी ही संतान हैं। तूने पैदा किया, तू ही पालती है, तेरी गोद में ही जीवन का अंत है। तेरे बच्चे प्यासे हैं, अपनी अमृतधार से प्यास बुझाना माँ, दया करना।" कहते हुए माधो ने उस जगह की मिट्टी उठाई, हथेली में भरकर निहारता रहा, माथे से लगाया और सूँघकर वापस उसी जगह छोड़ दिया। दो-तीन जगहों पर परीक्षण करके उसने, लकड़ी से एक बड़ा गोला खींच दिया। इसी गोले के मध्य में मुखिया जी ने पहली कुदाल चलाई।
यह गाँव का कुआंँ था, सबके लिए समान तो सब मिलकर श्रमदान करते। जिसको जब समय मिलता दो-तीन घंटे खुदाई करने आ जाता। मंदिर के प्रांगण में बड़े दो ट्यूब लाइट थे और सभी लोग अपने साथ लालटेन, टॉर्च लेकर आते थे।
औरतें भी पीछे नहीं रहीं, उन्होंने निकली मिट्टी को तसलों में भरकर, रास्ते को बराबर करने का बीड़ा उठा लिया।
पानी की आशा ने सभी के चेहरों पर पानी ला दिया था। करीब तीस फीट पर ही सभी को मिट्टी की नमी और सोंधापन का अनुभव होने लगा। पैंतीस तक तो पानी घुटनों तक आ गया।
"भाइयों, हमें अभी आठ-दस फीट और खोदना चाहिए, गर्मी में तो यहाँ पानी सूख जाएगा।" घुटने तक पानी में आगे की खुदाई कठिन हो गई थी परंतु पानी का स्पर्श मात्र लोगों का उत्साह बढ़ा रहा था।
एक पत्थर फावड़े से टकराया और माधो ने खुशी से कहा, "इस पत्थर को तोड़कर धरती माँ के सीने से हटा देते हैं भाइयों, अथाह पानी फेंक देगी माँ।"
पत्थर फोड़ने के लिए कई
जवान पुरुष आगे आए। छैनी, हथोड़े, सब्बल और लोगों के उत्साह से आखिरकार पत्थर में दरार पड़ गई। पत्थर हटा और धरती ने अपने में प्रवाहित निर्मल आवेग की एक धार को बच्चों के लिए ऊपर उछाल दिया। उस स्नेहसिक्त पहली धार में भीगकर लोग अपने जीवन को अभिसिंचित कर रहे थे।
कीचड़ माटी से लथपथ माधो गा रहा था।
रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून..!
पानी गए ना उबरै मोती मानुष चून..!!
मीठे, स्वच्छ पानी का छलछलाता खजाना पाकर गाँववालों ने, परदेसी दोनों भाइयों का सम्मान किया। उनकी सूक्ष्म संवेदना की सराहना की। मंदिर प्रांगण में बना, ईश्वर की कृपा बरसाता यह जल संसाधन गाँववालों के जीवन में खुशियांँ भर लाया था।
कुएंँ में पानी का अथाह स्रोत और दो अनजाने लोगों को वाहवाही मिलना, इस गाँव के अधिपति को रास नहीं आया। जब तक समस्या, दुःख रहता है तब तक कुर्सी का महत्व रहता है वरना तो सबकी एक जमीन हो जाए। अमीर -गरीब, लेनदार-देनदार, मालिक-नौकर इन सब को एक स्तर पर ला दिए तो कैसी सत्ता, कैसा मुखिया!
मुखिया जी के बड़े मकान के पिछवाड़े के भाग में, एक बहुत बड़ा, गहरा, पक्का पार वाला पुराना कुआँ था। दो पीढ़ियों पहले तक वह जन सामान्य का कुआँ था, गाँव का कुआँ था, कब और कैसे उसे इन अधिपतियों के पूर्वजों ने, अपने घेरे में ले लिया, पता नहीं। अब वो सत्ता के साथ, पानी के भी देवता बन गए। छलछलाते पानी को एक परिवार ही उपयोग करता और जब सारा गाँव गर्मियों में बूँद-बूँद की आस से, गाँव के अन्य दो कुँओं को खंगालता, मुखिया जी का परिवार जी भर पानी उलीचता।
"गाँव वालों का दुःख देखा नहीं जाता हमसे, बारी-बारी से एक-एक गगरी पानी ले जाएं सब, जब हमारा काम निपट जाए।" अहसान करने वाले भाव, आधिपत्य का गर्व आवाज़ में रहता था।
गाँव वाले अपना क्रम आने पर, कुएँ से एक गगरी पानी खुद के लिए निकालते तो मुखिया के परिवार के लिए एक गगरी। साथ ही कुछ छुटपुट काम भी करवा लेता परिवार।
"अरे भीखम, उन दोनों भाइयों को बुलाकर लाओ जरा, बात करना है उनसे।" अगले दिन सुबह मुखिया जी ने अपने दरवाजे पर डंडा लिए बैठे मुस्टंडे से कहा।
कुछ ही देर बाद माधो और साधो उनके सामने थे। इतना बड़ा घर-द्वार, बढ़िया बैठक, आराम कुर्सी आसपास काम करने वाले लोग, इतना ठाठ-बाट दोनों ने पहली बार देखा था।
"जमीन में पानी कहाँ मिलेगा, तुम बता सकते हो ना?" प्रश्न सकारात्मक उत्तर के लिए पूछा गया था।
"जी मालिक, कोशिश करते हैं। धरती तो माँ है और माँ के मन को कौन पढ़ जान सकता है। बस, उसकी धड़कन को सुनकर बताता हूँ।" माधो, धरती की तरह शांत और विनम्र स्वर में बोला।
"हमारे खेतों में कुआँ खोदना है, कल सुबह देख आएंगे।" नपे-तुले शब्दों में आज्ञा थी।
दूसरे दिन दो जीपों में सवार काफ़िला, खेतों की ओर निकल पड़ा। मुखिया और उनके दोनों बेटे, दो-चार पहलवान नुमा आदमी और माधो-साधो।
रास्ते भर उनकी बातों से दोनों भाइयों ने यह तो अंदाजा लगा लिया कि कभी बलपूर्वक, कभी लोगों की मजबूरी का फ़ायदा उठाकर खेतों का विस्तार किया गया था। कर्ज़ के ब्याज में, टुकड़े भर जमीन ले ली। लड़की के विवाह में मदद करके किसी के खेत का हिस्सा अपने में कर लिया। चापलूस नौकर-चाकर सीना तानकर उस एक-एक घटना की विरदावली गा रहे थे।
खेत क्या थे, भावविहीन शून्य माँ का खाली आँचल था जिसका हर एक धागा साथ छोड़ने को मजबूर था।
"देख रहे हो, कैसी बंजर जमीन है पानी के बिना। कई बार खोद खोदकर देखा पर अंदर तक सूखी पड़ी है बाँझ जैसी।" मुखिया ने जैसे गाँव वाले कुएंँ के छलछलाते पानी को याद कर लिया था।
माधो और साधो ने एक-दूसरे को देखा। मूँछ पर ताव चढ़ाते उन पहलवानों को देखकर ऐसा लग रहा था कि अपनी मूँछों से ही जमीन खोदने वाले हैं।
जीप से कुर्सी, पानी का छागल, खाना निकाला गया। मुखिया जी ने अपना आसन संभाल लिया और बाकी सब इन दोनों भाइयों के पीछे पीछे खेतों का मुआयना करने चले। सारा दिन बीत गया, धरती की कोई हलचल महसूस नहीं कर पाए दोनों। प्रकृति की संवेदनशीलता को मौन करके, उसे जगह-जगह से खोदते रहे। कभी प्यार, मान नहीं दिया, हथेली में भरकर हृदय से लगाया नहीं न माथे तक चढ़ाया। संज्ञा शून्य सी धरती, अपने पुराने लोगों का प्रेम तलाश रही थी जिनके परिवारों से छीन ली गई थी।
बाजू में लगा हुआ एक छोटा सा खेत था। किसान की झोपड़ी, कुआंँ बने थे। बुजुर्ग माता-पिता खटिया पर बैठे थे, बच्चे मिट्टी में खेल रहे थे। शाम होते होते झोपड़ी की खपरैल से उठने वाला धुआं, किसानी जीवन की खुशियों की सोंधी महक दूर तक फैला रहा था।
उनके कुएंँ से पानी खींचने की आवाज़, मुखिया के माथे पर कई आड़ी-तिरछी रेखाएं बना रही थीं।
"कल फिर बुलाया है छोटके, समझ नहीं आता कि क्या करें?" रात को रोटी खाते हुए माधो चिंतित था।
"भैया, इनके खेतों पर तो प्रकृति का कोप है परंतु बाजू वाले लगे खेत के किनारे पर पानी मिल सकता है।" साधो ने बताया।
"हाँ, मैंने भी देखा था छोटके। उस किनारे की जमीन नम, सोंधी है बिल्कुल उस किसान परिवार की तरह निश्छल ।" कौर निगलते हुए माधो बोलने लगा, "मगर यह बात बताएंगे तो मुखिया उस किनारे की उसकी जमीन हथिया लेगा। छोटा सा खेत है उनका, क्या करेंगे बेचारे?" जमीन से जुड़े आदमी की संवेदना, जमीन से जुड़ी हर बात पर मुखर हो जाती।
"अरे नहीं, पहलवान बोल रहा था कि मालिक ने इन हरामखोरों को कितनी बार खेत बेचने के लिए पूछा। वो बुड्ढा-बुढ़िया आगे आ जाते हैं, कहते हैं जमीन तो हमारी बिटिया है, कैसे बेच देंगे। मर जाएंगे पर खेत नहीं बेचेंगे, मार डालो फिर खेत लेना।" छोटके ने यह जानकारी दी।
दोनों भाइयों की रात जागते हुए बीती। कैसी विपदा थी कि आज उनका गुण ही उनका दुश्मन बन गया था।
आज मुखिया ने दबाव डालते हुए कहा, "उस दिन मंदिर के सामने वाले कुएंँ के लिए जो खुशी, उत्साह था कल नहीं दिखा तुम दोनों में। काम में भेदभाव करना सही नहीं है।"
आज तीन जीपें तैयार थीं और छह-सात लठैत। दोनों भाइयों का खून सूख रहा था।
सारा दिन जाँच-पड़ताल, धरती के अनुनय-विनय में बीतता जा रहा था। बगल वाले खेत के किनारे से सटी जमीन की मिट्टी में, जीवन का संकेत, सोंधापन था। छोटे खेत के किसान परिवार का स्नेह, उसमें बह रहा था। उसकी भुरभुरी माटी को माथे से लगाकर माधो बड़बड़ाया, "हमें क्षमा करना माँ, तुम जननी हो तुम बांझ, बंजर नहीं होती। हम पाप कर रहें हैं।" उसका करुण भाव वापस फेंकी मिट्टी से, धरती के पोर-पोर में समाने लगा।
"मालिक, दो दिनों से सारा खेत देख लिए, कहीं पानी नहीं है।" सिर झुकाकर माधो ने कहा।
"दूसरे गाँव से आकर, हमारे गाँववालों के सामने नाटक करते हो, कुआँ साफ करना, गहरा करना, नया कुआंँ खोदने की सलाह, पानी का स्तर बहाव सब बताते हो, हमारे खेतों में तुमको लकवा मार गया बे।" मुखिया गुर्रा रहा था।
"कल सुबह अपना बोरिया-बिस्तर बांध कर निकल जाना, दुबारा दिखाई दिए गाँव में तो हाथ-पैर तोड़ देना सालों के। बड़ा कल्याण करने चले हैं गाँव का।"
जीप पर सवार होते हुए वो फिर दहाड़ा, "सुबह तड़के निकल जाना, कानों-कान किसी को खबर नहीं हो। मेरे लठैत घर की निगरानी करेंगे। गाँव बाहर करके ही आएंगे।"
सब लोग जीप पर सवार होकर चले गए। माधो और साधो को गाँव तक पैदल ही जाना था। उन्होंने बाजू वाले खेत की ओर देखा, जीवन की खुशियों का पैगाम लिए खपरैलों के बीच से धुआं, आसमान की ओर उठ रहा था।
दोनों ने मुस्कुराते हुए एक-दूसरे को देखा और घर की तरफ चलने लगे।
संदूक, थैली और चंद गठरियों में जीवन बाँधे, अपना बचा पानी सम्हालते हुए तड़के ही उन लोगों ने अनजानी डगर पर कदम बढ़ा लिए। कहीं कोई और प्यासा गाँव उनकी प्रतीक्षा कर रहा था।
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शर्मिला चौहान