मंगलवार, 29 अप्रैल 2025

2122 2122 2122 212

आदरणीय अनिल सर एवं सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏(संशोधित रूप)


फ़िलबदीह -40

2122 2122 2122 212

दिल ही दिल में अपने शब्दों को ज़रा तुम मापना
हो बराबर  जब तुला तब शब्द मुख से बोलना।।1।।

पाहुने बन उमड़े बादल लिपटी आँधी धूल की
मन ही मन सोचे धरा मनमौजी है यह मोहना।।2।।

खुद उठो तैयार हो मुश्किल नहीं फिर कुछ यहाँ
चारपाई पर पसर औरों को कब तक कोसना।।3।।

 कौन चौराहा हो अंतिम ज़िंदगी के नक्शे पर
जान सकता कौन यह लाखों बना ले योजना।।4।।

 बाँध ली थीं बेड़ियांँ खुद ही बनाकर दायरे 
देख दुनिया का फलक अब बेड़ियों को तोड़ना।।5।।


रात निर्मोही हवा नाची थी ऐसे झूम के
टूटती शाखों का दुख था घोंसलों को भोगना।।6।।

चाँदनी छिटकी पड़ी थी चाँद पर ख़ामोश था
चाहता वो इक सितारा झोपड़ी में छोड़ना।।7।।

***********

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें