शुक्रवार, 22 नवंबर 2024

2122 2122 2122 212 पर ग़ज़ल

फ़िलबदीह क्रमांक- 30
रदीफ़ - के लिए 
क़ाफ़िया - आने

मिसरा-ए-तरह
 मैं झुकूँगा गोद में बच्चा उठाने के लिए

वज़्न -
2122  2122 2122 212

यादों की गहराइयों में डूब जाने के लिए 
भूले बिसरे गीत बजते गुनगुनाने के लिए।।1।।

ले के धरती से विदा किरणें गईं जो शाम को 
भोर होते आ गईं रिश्ते निभाने के लिए।।2।।

टकटकी बाँधे था चंदा रात हरसिंगार को
वो तो आतुर थे ज़मीं पर लोट जाने के लिए।।3।।

देख‌ कमरे में तिमिर को झाँकती ठिठकी किरण 
छन्न से बिखरी उजाला घर में लाने के लिए।।4।।

वेदना सहता है प्रस्तर कटता छंटता रात दिन 
मुस्कुराती तब है मूरत दिल लुभाने के लिए।।5।।

जो मिले तैयार घर पंछी नहीं रुकते वहाँ
खुद करें दिन रात मेहनत घर बनाने के लिए।।6।।

डूबकर भक्ति में भव तो पार करते हैं सभी
तैरते पत्थर कभी प्रभु काम आने के लिए।।7।।

******

शर्मिला चौहान

तरही मिसरा-

शान शौकत और दौलत मैं कहीं झुकता नहीं 
मैं झुकूंँगा गोद में बच्चा उठाने के लिए।।


***********

शर्मिला चौहान


आदरणीय अनिल सर एवं आप सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏 (संशोधित रूप)

फ़िलबदीह 30
दूसरा चरण 
रदीफ़ - है
क़ाफ़िया - आर


2122  2122  2122  212


चल रहा दुनिया में अब हर चीज़ का व्यापार है
रोज़ गढ़ता आदमी अपना नया किरदार है।।1।।

तेज़ भागी ज़िंदगी, भौचक सी मैं देखा करी
जीतने की चाह में मिलती   रही बस हार है।।2।।

गठरी खोले आ गया सूरज सबेरे आज भी, 
धूप के सिक्कों से चमके पूरा ये संसार है।।3।।

शुष्क होती ये धरा पानी कृषक की आँखों में 
ताकता दम थामकर बादल का कब आसार है।।4।।


कौन सच्चा कौन झूठा जाँच भी कैसे करें 
इश्तिहारों से भरा देखो हरिक अखबार है।।5।।

********

शर्मिला चौहान

मंगलवार, 19 नवंबर 2024

कहानी -"दायरे"

कहानी_ "दायरे" 



नाम तो उसका रूपा रखा गया था परंतु बाबूजी उसे 'सुरसतिया' ही पुकारते थे। खुद ही बताया करते थे कि, "तुम्हारे जनम पर हम सब बहुत खुस थे बिटिया। तुम्हारी अम्माँ तो तुम्हारे गाल और माथे पर काला टीका लगाए रखती, गाँव भर को हलुआ पूड़ी खिलाया था तुम्हारे नामकरण पर।" छोटी बच्ची का कौतूहल और बढ़ जाता।
"क्या नाम रखा था बाबूजी हमारा?" उसकी हिरणी सी मासूम, भोली आँखें बाबूजी के चेहरे पर टिक जातीं।
"तुम्हारी अम्माँ ने तो तुम्हारे सुंदर रंग-रूप को देखकर, पंडित जी से इचार-बिचार करके "रूपा" नाम रख दिया था।" बाबूजी अपनी स्मृतियों के झरोखों में से, उन पलों को झाँकने लगे थे।

"फिर आप हमें 'सुरसतिया' क्यों कहते हो?" भौंहें सिकोड़ती रूपा बोल पड़ी।
"तुम्हारी अम्माँ चली गई बिटिया, अब उनके साथ उनकी सब चीज़ों को भी छोड़ना चाहता हूँ। उनकी बनाई चाय पसंद थी तो अब हमने चाय पीना ही बंद कर दिया।" शून्य में गुम हो गए थे बाबूजी।
"हमें तो आप 'सुरसतिया'  ही पुकारा करो, पर ठीक तो बोलो 'सरस्वती'।" ठठाकर हंँस पड़ी थी रूपा।
बाबूजी के प्रेमभरे चेहरे में ही कहीं अपनी अम्माँ को ढूँढती, एक छोटी बच्ची बोझिल होते पलों को खुशनुमा बनाना बख़ूबी जानने लगी थी।

आसपास के लोगों, अपनी दादी और बाबूजी से अम्माँ की सुंदरता और अच्छे स्वभाव की बहुत बातें  सुना करती थी रूपा। बहुत मन होता था उसका, अपनी अम्माँ को देखने, छूने और बातें करने का। बाबूजी की आलमारी में उनकी एक-दो फोटो रखी थीं। 

रूपा की बालबुद्धि समझ नहीं पाती थी कि बाबूजी कभी-कभी देर रात घर आते और बिना कोई बात किए चुपचाप सो जाते। कभी-कभी आसमान की ओर देखकर बड़बड़ करते थे। उनसे एक अजीब सी बू आती थी।
सुबह उठकर उन्हें अपनी सुरसतिया याद आ जाती।‌
"सुरसतिया, बेटा रात खाना खाया था तूने?" सुबह बाबूजी  रात से एकदम अलग हो जाते थे।
"हाँ हाँ बाबूजी, हमने तो शाम को ही भरपेट भात सब्जी खा लिया था।" सुनकर उनके चेहरे पर पश्चात्ताप की जगह, सुकून की उठती लहर को, सहज ही अनुभूत कर लेती छोटी बच्ची।

बाबूजी का काम सबसे अलग सा था। दादी ने बताया था उसे कि उसके बाबूजी कम उम्र से ही, गाँव की भजन मंडली में चले जाते थे। पाँचवी कक्षा के बाद तो उन्होंने आगे शाला ना जाने का ऐलान कर दिया।
"तोहरे बाबूजी, सकूल से भाग-भाग भजन मंडली मा जाइथ रहै री बिटिया। कितना समुझावा करत रहै हम पंचन, मुला सुनिबै नाइ किए। अब तोहरे टैम कहत है, "पढ़ लिख सुरसतिया, तोहरा नाम बिद्या की देबी रखे हैं।"  चार-पांँच साल की बच्ची यह समझ जाती कि उसके बाबूजी कम पढ़े हैं परंतु उसे पढ़ाना चाहते हैं।

दादी से अपने बालों में तेल लगवाती, चोटी गुथवाती रूपा अक्सर उनसे अपनी अम्माँ -बाबूजी की बातें पूछा करती।‌ बालमन को और किसी कथा कहानी, बातों में वो स्नेह आनंद नहीं मिलता था जो अपने माता-पिता की बातों में मिलता। 

"दादी, फिर बाबूजी बड़े होकर क्या काम करते थे?" आँगन में बिछी चारपाई पर बैठ, भाजी साफ़ करती दादी से, चकर बिल्लस पर पैरों से उछलती रूपा ने पूछा।
अपना मोटा ऐनक आँखों से उतारकर, पल्लू से साफ़ करती दादी कुछ बोलती, उससे पहले ही बाबूजी ने अपनी वकालत शुरू कर दी।

"बड़े होकर क्या, हम तो बचपन से ही कमाने लगे गए थे। भजन मंडली साथ जागरण, अखंड रामायण पाठ, महाशिवरात्रि रतजगा सब में हम जाते थे। सुर भी लगा लेते थे और मंजीरा भी बजाते थे।‌ सही कह रहे ना अम्माँ हम, बारह-चौदह की उमर में तो अनाज, पैसा घर लाने लगे थे।" अपने बचपन को मखमल के डिब्बे से खोल, सुरसतिया के आगे रख दिए बाबूजी।

"अब सीखे पढ़े नहीं तो शिवजी ही बेड़ा पार करेंगे ना माधो।" दादी जब चिड़ती तो बाबूजी 'माधव' से 'माधो'  हो जाते थे।
"हमें तो अभी भी आपका काम बहुत अच्छा लगता है बाबूजी। अलग-अलग रूप धरकर, स्वांग रचाते हो तो बड़ा मज़ा आता है।" ताली बजाकर रूपा अपने बाबूजी का मन जीत लेती।

"अच्छा, कौन सा रूप स्वांग पसंद है हमारी सुरसतिया को?" प्रेम से बाबूजी ने पूछा।
"कान्हा की गोपी, नटनी बहुत अच्छा लगता है हमें।"  फिर बड़ी बड़ी आँखें मटका कर पूछने लगी, "नटनी बन कर नाचते हुए करतब कैसे कर लेते हो आप, हमें तो देखकर डर लगता है।" 
"आप हमेशा सखी, गोपी क्यों बनते हो? कान्हा, लखनलाल क्यों नहीं बनते?"  बिटिया के इस सरल, शुद्ध और सीधे प्रश्न के उत्तर में माधव मौन हो गया। पाँच मिनट इधर उधर करके, बाहर अपने मित्रों से मिलने चला गया।

गाँव में दस दिनों रामलीला का आयोजन हुआ और माधव के घर लक्ष्मी आगमन का शुभ समय प्रारंभ हुआ। उसकी दुबली काया, चेहरे पर कोमलता, लंबी गर्दन और तोते की सी नाक ने, उसे दस दिनों विविध स्त्री किरदार निभाने के लिए उसकी रोजी पक्की कर दी।

रूपा दादी और आस पड़ोसियों के साथ प्रतिदिन रामलीला देखने जाया करती। बैठने के लिए दरी या बोरी का टुकड़ा और कागज़ के पूड़े में बंधा चना चबैना लेकर सब रामलीला का आनंद लेते।

"दादी, बाबूजी कितना गोल गोल घूमकर नाचते हैं। सब लोग ताली बजा रहें हैं आप नहीं बजाती। ना बजाओ, हम तो खूब बजाएंगे।" माधव पर बरसते सिक्के, रुपयों को देखकर रूपा दुगुने उत्साह से तालियांँ बजाने लगती।
कभी-कभी रात ज़्यादा हो जाने पर दादी उसे आधे में ही घर ले आती जिससे सुबह शाला समय पर जा सके।
दादी ने अम्माँ की जगह संभालने की पुरजोर कोशिश की लेकिन रूपा के मासूम सवालों के आगे उनकी हिम्मत टूट जाया करती।
"दादी, हम  बहुत छोटे थे ना जब अम्माँ मर गई थी।" तुलसी के आगे दीया जलाती दादी से प्रश्न किया रूपा ने।
दीया तुलसी चौरे पर रख, हाथ जोड़े, कुछ बुदबुदाती दादी आगे-आगे और रूपा पीछे पीछे, तुलसी माता की परिक्रमा करने लगे।

साँझ के पसरते आँचल में एक दीपक की रोशनी जगमगाने लगी। अँधेरे से लड़ने का हौंसला लिए, उस रोशनी ने अपना दायरा फैलाना शुरू किया। अब एक बड़े से वृत्त को रौशन कर, तिल तिल कर जलती बाती आनंदित होने लगी।  हवा का एक झोंका आया और दादी ने अपनी अंगुलियों की दीवारें, बाती के चारों ओर खड़ी कर लीं। अपने शरीर को कण-कण जलाकर, चारों ओर उजियारा देने वाली बाती पुनः मुस्कुराने लगी थी।

"बताओ ना दादी, हमारे छुटपन में हमारी अम्माँ मर गई थीं ना।" दादी का पल्ला खींचती रूपा ने फिर पूछा।
"ऐसा नहीं बोलते बिटिया, तुम्हारी अम्माँ तो पुण्यात्मा थी सुहागन गई भगवान के घर। हमारी तरह जिनगी भर सफेद साड़ी का बोझ नहीं ढोना पड़ा उसे।" आँगन में बिछी चारपाई पर बैठकर वो रूपा को आसमान के तारे दिखाने लगी।

"तुम्हारी अम्माँ, वो देखो तारा बनी चमचमा रही है। बड़ी अच्छी थी सो भगवान ले गए उसे अपने पास, उनको भी अच्छे लोग पसंद आया करे हैं बिटिया।" गहरी साँस भरकर दादी शाम के रोटी पानी के लिए रसोई में चली गई।

दिन, महीने अपनी चाल से चलते, बदलते रहे और एक साल बाद दादी ने भी अपनी बहू के साथ, आसमान के तारों बीच जगह बना ली।

छह-सात साल की बच्ची को, घर में बिना किसी स्त्री के पालना माधव को भारी लगने लगा।‌ अब गाँव के भजन कीर्तन, भागवत, रामायण में जाता था वह, बाहर गाँव का काम बंद सा हो गया था।
कई बार रात नशा कर आता माधव और फिर भगवान से अपना कसूर पूछता। अम्माँ की फोटो आलमारी से निकाल कर, देख देखकर आँसू बहाते कि इस फूल सी बच्ची को क्यों छोड़ गई वो।

बाबूजी और रूपा अनजाने ही काल की चाल से कदम मिलाते हुए, अज्ञात भविष्य की ओर बढ़ रहे थे। 
"सुरसतिया बेटा, बाहर गांँव में दो दिनों का काम आया है। पैसे जियादा भी मिलेंगे, बड़ी मंडली है।" बहुत दिनों से थोड़े पैसों पर काम करने वाले कलाकार ने अपनी बेटी से सलाह ली।
"हम रात को अकेले कैसे रहेंगे बाबूजी, डर लगता है।" रूपा ने बाबूजी की आँखों में आँखें डालकर कहा।
"तुम्हारी सखी है ना पुष्पा, उसकी अम्माँ को कह जाऊंँगा कि उसे रात तुम्हारे साथ सोने भेज दे।  अंदर से दरवाजा बंद कर लेना पक्का और अपनी अम्माँ की शॉल ओढ़कर सो जाना, फिर डर‌ ना लगेगा।" बाबूजी की बातों से सुरसतिया सहमत हो गई। 
दस साल की दो हमउम्र बच्चियांँ, पहली बार साथ-साथ रात बिता रही थीं। एक टिमटिमाते पीले बल्ब के सहारे, दुनिया जहान की बातें करतीं  दो किशोर होती लड़कियों की आँखें पहेट ही लगी थींं।
बाबूजी को ज़्यादा पैसे मिले और रूपा को हमउम्र के साथ बातें करने वाली रात, बस फिर तो बाबूजी जब भी बाहर गाँव का काम लेते रूपा खुशी से तैयार हो जाती।

इस साल बस अड्डे के चौक पर बड़ा पंडाल लगा था। आसपास के गाँवों से भी लोक कलाकार, कारीगर आने वाले थे। समिति ने प्रतियोगिता रखी थी। बाबूजी की मंडली ने सीता स्वयंवर तैयार किया था।

उस दिन पंडाल खचाखच भरा था, आसपास के गाँवों के भी लोग दर्शक थे। दरियाँ बिछी थीं तिल रखने की जगह नहीं बची थी। 
माता सीता सखियों संग मंदिर जा रही थीं। राम लखन बाग में घूम रहे थे। सीता की सखी बने बाबूजी आगे आगे नाचते चल रहे थे। दो सखियों का मोहक नृत्य, सीता जी के पूजन तक भाव भंगिमाओं संग चल रहा था। समय सीमा हो गई परंतु रूपा के बाबूजी नृत्य में तल्लीन रहे। 

अपने नृत्य में कलाकार अनहद पार करने चला, जहाँ बस वह स्वयं को स्पर्श कर रहा था। घेरदार लहंगा घूम रहा था, नाक की नथ गिर गई थी और चुनरी सरक कर कमर पर लटक गई थी। कलाकार को आनंद के उस क्षितिज से वापस लाने के लिए, श्याम चाचा ने उसका हाथ पकड़ लिया। खूब तालियांँ बजीं और बाबूजी को विशेष पुरस्कार भी दिया गया परन्तु आज रूपा के हाथ नहीं जुड़े। अनमनी सी वह पड़ोसियों के साथ घर वापस आ गई।

"बाबूजी, आप कोई दूसरा काम क्यों नहीं करते?" अप्रत्याशित प्रश्न माधव को झिंझोड़ गया।
"बचपन से यही कर रहा हूँ बिटिया, अब कौन‌ नया काम कर सकूँगा?" प्रश्न के उत्तर में एक प्रश्न ही था उनके पास।

किशोर होता शरीर और स्वछंदता के पीछे भागते बावले मन ने रूपा में कई बदलाव ला दिए। घंटों दर्पण में खुद को निहारना, भाभी से चुहल बाजी, बनाव श्रृंगार में कई घंटे बीता देना, सीख लिया था उसने।
स्कूल की पोशाक कसने लगी थी उसको। बालों की चोटी अब खुलने लगी थी, गालों पर लटकते बाल मनभाने लगे थे रूपा को। अब अपने अलग प्रकार के कपड़ों की जरूरतों को पूरी करने के लिए उसने बाबूजी से पैसे माँगे।

"सब सामान लिख दो बिटिया, हम हाट से लेते आएंगे।" किशोर मन की बात समझ ना पाया पिता।

"क्या लिख दें बाबूजी, लड़कियों का सामान है आप कैसे लाएंगे? हम खुद ले आएंगे पुष्पा साथ जाकर।" ज्वालामुखी सा धधकता तेवर देख, माधव सहम गया था।
"ठीक है, तुम्हीं ले आना जाकर।" कहते हुए रूपा के हाथों में रुपए पकड़ा दिए थे बाबूजी। 
रूपये पकड़ाते समय, माधव की अँगुलियाँ रूपा की हथेलियों को स्पर्श कर गईं और झटके से उसने हाथ पीछे खींच लिया।

दो दिनों बाद अपने लिए सारा सामान ले आई रूपा ने, देहरी पर खड़े होकर आलमारी में अपना घेरदार लहंगा, चोली, नकली बाल और गहने जमाते बाबूजी को घूर रही थी।
छोटी समीज़, सलवार कुर्ता, बालियांँ, बिंदिया और एक लाल लिपस्टिक ले आई थी रूपा। अपनी रूप-राशि, अंग सौंदर्य, लंबे बालों और चिकने होते शरीर पर रीझ जाती थी वह। कल्पनाओं के पँख लगाकर, हल्की हो उन्मुक्त आकाश में उड़ने लगी थी वह। चारपाई पर पड़ी, आसमान के तारों में अब कल्पना के चित्र साकार करती। इस किशोरी को बाबूजी का रोकना-टोकना, श्रृंगार करके नृत्य करना नापसंद होने लगा था। 

बदलाव की हवा शहरों से गाँवों तक आने लगी थी। बैलगाड़ियों की जगह ट्रैक्टर और साइकिलों की जगह मोटरसाइकिलों ने ले ली थी।‌ चंद बड़े किसानों, आढ़तियों के घरों में टेलीविजन लग गए और परदे पर नाचते-गाते हीरो-हीरोइनों ने, नृत्य मंडलियों और कलाकारों के कामों पर असर डालना शुरू कर दिया।

अब रात भर के जागरण में वी.सी.आर. पर तीन चार पिक्चरें चला देते थे।  चुनाव, नवरात्रि, गणेश पूजा, महाशिवरात्रि सभी में लोक कलाकारों की जगह, इन आधुनिक साधनों ने ले ली थी।
"अब तो भजन एक-दो घंटों में खत्म कर, बाकी समय पिक्चरें चलाते हैं श्याम भैया। कैसे चलेगा आगे जीवन?" अपने मित्रों के सामने माधव बोल रहा था।
"सही कह रहे हो माधव, परिवार चलाना कठिन हो गया है।" मंडली का एक और मित्र बोल पड़ा।
"गाँव में दसवीं कक्षा तक पढ़ाई है फिर बाहर इक्का-दुक्का बच्चे ही जाया करे हैं पढ़ने। हमारी सुरसतिया को कैसे पढ़ा सकेंगे?" अपनी होशियार बेटी के भविष्य के प्रति पिता चैतन्य था।

"कैसे पढ़ाओगे माधव भैया, रहने खाने का खरचा सुना बहुतई जादा है।" श्याम लाल ने चिंता जताई।
"अब ईश्वर के हाथों सब है भाई।" भविष्य के धुँधलके में अपनी सुरसतिया का स्पष्ट चित्र देखने की कोशिश कर रहा था माधव।
"सुरसतिया, बेटी खूब मन लगा कर पढ़ना लिखना। अच्छे से पास कर जाओगी तो सोनपुर के बड़े सकूल में भर्ती मिल जाएगी।" दर्पण के सामने इठलाती, बाल संवारती किशोरी से पिता ने कहा।
"लहंगा पहनकर, नाच- गाकर आप हमारी फीस दे सकेंगे क्या?" आज 'बाबूजी' का संबोधन में भी रूपा ने कटौती कर दी।

दो मिनट तक मौन छाया रहा। स्वर अपनी जगहों पर जम गए थे। माधव सिर झुकाए बाहर चला गया। देर रात जब वह घर वापस नहीं आया तो रूपा ने भुने बैंगन में नमक-मिर्च मिलाकर, सुबह की रोटी के साथ गले से उतार लिया। किताब खोलकर पढ़ते हुए बाबूजी का इंतज़ार कर  रही थी।
नाम अनुरूप काम, सुरसतिया पर माँ सरस्वती की कृपा बरसती थी, कोई भी विषय, पाठ सबसे जल्दी समझ लेती थी वह। आज किताब के अक्षरों में सखियों की बातचीत, नृत्य करते बाबूजी के लहंगे का घेर, टेलीविजन के गानों पर इतराते लड़का-लड़की और बाबूजी का बुझा चेहरा सब गड्ड-मड्ड होने लगा और पुस्तक बंद करके वह सोने की कोशिश करने लगी।
"ऐसा क्यों बोल गए हम, बाबूजी शुरू से ही हमें पढ़ाने लिखाने के लिए काम करते रहें हैं।" अपने ही अंतर्द्वंदों में उलझती हुई कब नींद की बाँहों में समां गई, उसे पता नहीं चला।
सुबह आवाज़ों से आँखें खुलीं तो देखा बाबूजी तैयार खड़े थे।
"हाट से कुछ सामान लाए दे रहा हूँ, फल-सब्जी, बिस्कुट सब। मैं सोनपुर जा आता हूँ, आगे का कुछ समझ आएगा देखकर।"आज बाबूजी ने एक बार भी रूपा के चेहरे की ओर नहीं देखा।
"एक-दो दिन नहीं आऊँ तो घबराना नहीं, पुष्पा को बुला लेना।" कहते हुए बाबूजी बाहर निकल गए और रूपा स्कूल चली गई।

स्कूल से वापस आकर उसने देखा भात, आलू की तरकारी बना गए थे बाबूजी। भात पूरा था एक चम्मच भी नहीं निकला था।
"बाबूजी भूखे चले गए आज, कुछ खाया भी नहीं।" हर कौर में बाबूजी का चेहरा सामने आ जाता।

"ऐ रूपा, कल लखनी में बड़ा मेला भरने वाला है। सब मिलकर  जा रहें हैं, तू भी चल।" पुष्पा गाँव भर की ख़बर लिए आ गई।
"बाबूजी हैं नहीं, उनसे पूछे बिना कैसे जा सकते हैं हम?" रूपा ने कहा।
"दीदी कह रही थी कि तेरे बाबूजी परसों आने कह गए हैं। हम सब तो सुबह जाकर शाम वापस आ जाएंँगी।" पुष्पा ने समझाया।
मेले की चकाचौंध, सखियों का साथ, नए सलवार कुर्ते को पहनने की ललक से कुछ ही देर बाद रूपा ने हामी भर दी।
आने जाने का जीप खर्च पचास प्रति व्यक्ति था परंतु रूपा और पुष्पा को कम-उम्र जान, उनके लिए गाड़ी वाला पच्चीस में राजी हो गया।
रात में कितनी देर दोनों बालियांँ, चूड़ियांँ, बिंदियाँ जमाते रहे। एक कपड़ा पहन कर और एक थैली में ले जाएंगे, ऐसा तय किया।
जब पुष्पा की नींद पड़ गई तब रूपा को बाबूजी के पैसों वाले बक्से का ध्यान आया। उनकी आलमारी आज खुली रह गई थी और रूपा ने बक्सा निकाल लिया। एक, दो, पाँच, दस-बीस के कई नोट, उसके सामने मुस्कुराने लगे। 
"पच्चीस तो गाड़ी वाला लेगा, दस-बीस हमें भी तो चाहिए खर्चें के लिए।" पचास रुपए लेकर बक्सा वापस रखने गई तो अम्माँ बाबूजी की श्वेत-श्याम तस्वीर देखकर रूक गई।
पुरानी तस्वीर, किनारे खराब हो गए थे परंतु अम्माँ का मुखड़ा चाँद सा दमक रहा था।

रूपा, टकटकी बाँधें अम्माँ को देखती रही। अँगुलियों से उनके चेहरे को स्पर्श करती रही।
"क्यों छोड़ गई हमको अम्माँ, क्यों?" अँगुलियाँ बाबूजी के चेहरे पर लग गईं तो झटके से फोटो वापस रखने लगी रूपा।
एक मोटा, मुड़ा-तुड़ा‌ कागज़ ‌जमीन पर गिर पड़ा।‌
आलमारी में बाबूजी की स्त्री किरदार की विविध पोशाकें लटक रही थीं। नथ, बालियाँ, झुमके, नकली बालों के जूडे, चोटी सब पड़े थे। ये गहने कपड़े मानो रूपा के  इर्द-गिर्द लिपटते लगे और उसने हिकारत से आलमारी बंद कर दी। जमीन पर पड़ा कागज़ उठाकर, पचास रुपयों के साथ अपनी थैली में भर लिया।

सुबह मेले जाने की उत्कंठा और बाबूजी की अनुपस्थिति में, उनसे बिना बताए जाने की अपनी हिम्मत को थपकी देती हुई, वह आधी रात तक करवटें बदलती रही।

कार्तिक पूर्णिमा की अगवानी में प्रकृति निमग्न थी। दिन दिन बढ़ते चाँद की ज्योत्सना, सारी सृष्टि को शुभ्रता देने के लिए प्रतिबद्ध थी।  शीतलता से शुभ्रता का सौंदर्य द्विगुणित हो रहा था। प्रकृति का पोर पोर आल्हादित हो रहा था। झाँकते चंद्र की छवि, ताल-तलैयों, बावड़ियों में हिचकोले लेते डोल रही थी। मुस्कुराते चाँद के साथ तारों की टोलियांँ लुका छिपी खेल रही थीं।

"खट् खटाक..!" आवाज़  हुई और रूपा चौंक पड़ी।  लेटे लेटे ही टोह लिया।  शायद पीपल की लकड़ी टूट कर गिरी थी। उठकर देखने की हिम्मत नहीं हुई।  बाजू में देखा तो पुष्पा, गहरी नींद में थी। उसके थोड़े खुले मुँह से भी हल्की घुर्र की आवाज़ें आ रहीं थीं। अपनी बाल सखी को देख, रूपा का हौंसला बढ़ा। उसने उठकर जलते पीले बल्ब को बुझा दिया और रौशन दान, खिड़कियों से आती चाँदनी को  देखती देखती सो गई। 

सुबह अपने तय समय से कुछ देर ही उनकी यात्रा शुरू हुई। जीप में ठूँसे हुए, गाने गाते, तालियाँ बजाते हुए सुबह की सुंदरता का आनंद लेते वे सब चल पड़े थे। सुबह की शीतल,अल्हड़, मंद बयार मनमोह रही थी। खेतों में किसानों के गूँजते गीत, तालाब के किनारों पर अर्ध्य देते लोग, मंदिरों में आरतियों की घंटियांँ, वातावरण को शुद्ध कर रही थीं।‌

मेले के बड़े झूले, दूर से दिखाई देने लगे थे। सबकी ख़ुशी दोगुनी हो गई। एक बड़े पीपल के पेड़ के पास गाड़ी रूक गई। सबने अपने साथ लाया खाना निकाल लिया। पीपल की घनी छाँव में, पूड़ियाँ, आलू की सब्जी, अचार, सूजी का हलवा और मीठी खुरमियाँ कागज़ के टुकड़ों पर परोसी जाने लगीं। सुबह-सुबह घर से भूखे निकले सभी ने जमकर खाया। 

अब मेले में साथ रहने, कैसे और कितनी खरीदी करने पर, एक कच्ची पक्की योजना भी बनाई गई।‌
मेले में लोगों की आवक बढ़ गई थी। 

"ना ना दीदी, हमें नहीं बैठना इसमें, बहुत डर लगता है।"  ऊँचे झूले पर बैठकर रूपा वापस उतर गई।
सहेली के ना बैठने पर पुष्पा ने भी अपना धर्म निभाया। अब वो दोनों निशानेबाजी लगाने चली गईं। अपने समूह में मौज-मस्ती करते हुए दो-तीन घंटे पलक झपकते बीत गए। 

सामने हलवाई अपनी कला से, ग्राहकों को रिझाने की तैयारी में था। छन्न.. की मधुर ध्वनि और चकरी के आकार की जलेबियांँ, कड़ाही में तैरने लगीं और घी की महक, चाशनी की मिठास वातावरण में। बाहरी शोर से अप्रभावित हलवाई अपना सारा ध्यान, अपनी कला में लगाए हुए था। 

सामने लगे पंडाल के बाहरी पर्दे पर, हीरो हीरोइनों की तस्वीरें, रामायण महाभारत के दृश्य सजे थे।
उस खेल का टिकट दर पता करने सब उधर ही चले गए। अपनी धुन में मग्न रूपा ठिठक गई। आँखों को खुद पर भरोसा नहीं हुआ। पंडाल के एक छोटे तंबू का परदा हटाकर, दो पुरुष बाहर आए। दरवाजे से पर्दा हटा और आँखों के सामने पड़ गया। सामने का सब कुछ रूपा को धुँधला नज़र आने लगा। 
बाबूजी, मंडली के कुछ लोगों के साथ श्रृंगार में मग्न थे। घेरदार लहंगा, छाती से चिपकी चोली, जिसपर अभी चुनरी नहीं चढ़ी थी, नकली बालों की फूल लगी चोटी लगाए, दर्पण में देख अपनी छोटी विरली मूँछों को साफ़ करते बाबूजी।

रूपा के पैर जम गए। आँखों देखी को मस्तिष्क नकार रहा था। उसने आज तक स्वांग करते, नाचते-गाते कलाकार बाबूजी को मंच पर देखा था, स्त्री श्रृंगार करते पुरूष ने, जवान लड़की के स्त्रीत्व पर चोट की थी। लिपस्टिक लगाकर‌ वे चूनर ओढ़ते उससे पहले रूपा चैतन्य हो गई।

समूह की परवाह किए बिना वह मेले में एक ओर दौड़ती चली गई। लोगों के सैलाब में, उसके हृदय की लहरों को कौन महसूस करता। एक कोने में उकडू बैठ गई, दोनों हाथों से सिर को थाम लिया।‌ कंधे की थैली से पानी पीकर, कुछ शांत हुई। पानी की शीशी के साथ, वो मोटा कागज़ भी हाथ को स्पर्श कर गया।

दिमाग ने हड़ताल कर दिया परंतु दिल ने हाथों को कागज़ खोलकर आँखों को अक्षर पढ़ने का हुक्म दे दिया।

माधव,

आप सचमुच हमारे अच्छे साथी, सखा बनकर रहे। पहली बार हम मंडली में मिले थे, हमारी आवाज़ पर आपका नृत्य लोगों ने पसंद किया और आपने हमें।
हमने तुरंत इंकार कर दिया। आप जैसे अर्ध पुरूष, स्त्रैण से विवाह कैसे कर सकते थे हम। आपने ना जाने बुरा माना भी या नहीं परंतु हमसे कभी कभार बात करते थे।
जिस पुरुष पर हमने विश्वास किया, उसने हमें धोखा दिया।
निराश होकर हमने आपसे सहायता माँगी और पुरुष के अत्याचार से क्षुब्ध स्त्री को आपने थाम लिया। हमें मान-सम्मान, पत्नी पद दिया, अपने घर ले आए।
माँ जी अपने बेटे की सारी कमियों को भूलकर हमें घर और दिल में जगह दी। आपने हमसे कभी रूपा के पिता का नाम तक नहीं पूछा।
हमें कितनी बार क्षमा कर पाएंगे, पता नहीं। हम जीना ही नहीं चाहते अब, रूपा को आप दोनों के पास छोड़कर, ईश्वर के  पास जा रहें हैं। 
आपके जैसा सखा, मित्र मिलना हमारा सौभाग्य रहा।

क्षमा कर दीजिएगा।

माया।
********

रूपा, जैसे किसी ने सारा खून निचोड़ लिया हो। अम्माँ का लिखा पत्र, उसकी अपनी अम्माँ का, जिसने जीवन के दुःख पर उसे न्यौछावर कर दिया।‌ आँखों में से हृदय की लहरों ने रास्ता बनाना शुरू कर दिया।

आगे भी कुछ दो-चार पंक्तियांँ हैं, रूपा ने आँखें पोंछ कर पढ़ना शुरू किया।

माया,
ना जाने क्यों तुम हमारे परिवार में रम नहीं पाईं और अपनी फूल सी बच्ची को छोड़कर चली गईं। मैंने तुम्हारी हर बात मानी सिर्फ़ बच्ची को 'रूपा' नहीं पुकारा, उसे सरस्वती का नाम दिया। अपनी सुरसतिया का विद्या, ज्ञान की रोशनी से श्रृंगार करना है।

माधव
**********
रूपा की दुनिया में भूचाल आ गया था। आगे की पंक्तियों को पढ़ने की शक्ति नहीं थी उसमें। चंद पंक्तियों ने उसे उसका स्थान  दिखा दिया था।
आगे की पंक्तियों में स्याही का रंग बदल गया था।

माया,
'सुरसतिया' बड़ी हो गई है।  उसे मेरा नाचना-गाना बिल्कुल पसंद नहीं है। मैं सोनपुर जाकर पता लगा आया हूँ, फीस माफ़ भी हो गई तो रहने खाने-पीने का बड़ा खरचा है। अब मैं दूसरे गांँवों में जाकर नाचता गाता, स्वांग करता हूँ ताकि सुरसतिया को बुरा ना लगे, बहुत पैसे जमा करना है उसके लिए।

माधव
*************

अब सब कुछ शांत था, ना मेले की आवाज़ें ना चकाचौंध। हृदय की उठती तरंगों ने, दिमाग के ज्वालामुखी को शांत कर दिया था। बचा पानी पी गई रूपा। कागज़ को मोड़कर वापस थैली में रख, वह शांत कदमों से मेले की भीड़ में गुम हो गई।
"कहाँ चली गई थी रूपा, हम सब कितना ढूँढ रहे थे।" सामने उसके समूह के लोगों में से पुष्पा ने आवाज़ दी।

"बता कर तो भटकती लल्ली, का जवाब देते तुम्हारे बाबूजी को।" आँखें तरेरती भाभी बोली।
अब सब पंडाल के अंदर ‌बिछी दरियों में बैठ गए। सामने सरस्वती पूजा हुई और कलाकारों ने अपने गायन, नृत्य का प्रदर्शन शुरू कर दिया। 
पिक्चरों के खूब चलने वाले गाने, गाए जा रहे थे और कलाकार अपनी कला दिखा रहे थे। दर्शक भी गानों से स्वर मिलाने, थाप मारने में पीछे नहीं थे।‌ रूपा का दिमाग कुछ और सोच रहा था, दादी की बातें, आसमान पर चमकते तारे, नाचते हुए बाबूजी का खुशी से भरा चेहरा, पिछले कुछ दिनों से उनका मुर्झाया उदास चेहरा। अम्माँ-बाबूजी की साथ फोटो, बाबूजी का घेरदार लहंगा, नथ, बिंदिया... और फिर सब एक दूसरे में गड्ड-मड्ड होने लगे। 
लोगों की जोरदार आवाज़ों, सिक्कों की खनक से रूपा चौंक पड़ी। मंच पर बाबूजी अपने नृत्य में तल्लीन थे।
 
"चलत मुसाफिर मोह लियो रे, पिंजरे वाली मुनिया।" 

गानों की स्वर लहरियों, ढोलक पेटी की थाप पर बिजली की गति से कदम थिरकाते बाबूजी। उनको दीन दुनिया का होश नहीं था, कलाकार अपने जीवन के लक्ष्य पूर्ति के लिए, अपनी कला को जीवंत बना रहा था।
अचानक कदम थम गए, कल्पनाओं की दुनिया ढह गई, कलाकार जड़ हो गया, चैतन्य हुए बाबूजी।
"सुरसतिया, बिटिया तुम यहाँ, कैसे आई..?" आवाज़ खरखराने लगी, मानो गले में घुट जाना चाहती हो।

"बाबूजी, सिर्फ़ हमारे बाबूजी। हम खूब पढ़ेंगे, और हाँ हमारा नाम 'सुरसतिया' है केवल सुरसतिया।" मंच के गायक, वाद्य सब मौन थे बोल रहे थे तो पिता-पुत्री के हृदय। 
दुनिया के इस मेले में, अपना विशाल कद लिए, सबकी सोच से परे थे सुरसतिया के बाबूजी।


***********

मंगलवार, 5 नवंबर 2024

221 2122 221 2122 पर ग़ज़लें

आदरणीय अनिल सर एवं आप सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏 (संशोधित रूप)


फ़िलबदीह क्रमांक -29
दिनांक - 01.11.24
क़ाफ़िया: ईर
रदीफ़: धीरे धीरे 
मिसरा-ए-तरह- आई मेरे सुखन में तासीर धीरे धीरे 
शाइर/शाइरा का नाम - राजेश रेड्डी 


221 2122 221 2122

 मेहनत से बन रही है तक़दीर धीरे धीरे
 हांडी की खीर सोंधी,  पकती है धीरे धीरे।।1।।

ऊष्मा से प्रेम की अब, पिघले न बर्फ़ मन की
इंसान की बदलती तासीर धीरे धीरे।।2।।

कब तक रखें छुपाकर, कुछ घाव हैं जो गहरे
नैनों से फिर रिसे दुख बन नीर धीरे धीरे।।3।।

 कोहरा अगर घना हो हिम्मत से पग बढ़ाना 
निकलेगा सूर्य फिर से तम चीर धीरे धीरे।।4।।

हो मौन सिर झुकाती पत्थर की नींव जब भी 
इठलाता है वहीं तब प्राचीर धीरे धीरे।।5।।

तरही मिसरा-

दोहे हों गीत ग़ज़लें, गागर में भरते सागर
आई मेरे सुखन में, तासीर धीरे धीरे।।

**********

शर्मिला चौहान