मंगलवार, 26 सितंबर 2023

२१२२ १२१२ २२

आप सभी के समीक्षार्थ, मेरा दूसरे चरण का प्रयास सादर है।


फ़िलबदीह क्रमांक 2
दूसरा चरण 

2122  1212  22

क़ाफिया - आओं
रदीफ़ - में


हाथ उठने लगे दुआओं में
तब हुआ कुछ असर दवाओं में।।1।।

बाँसुरी बज रही कन्हैया की
राधिका नाचती लताओं में।।2।।

सांँस भारी पता नहीं क्यूँ है
कौन सा विष घुला हवाओं में।।3।।


मोम बन कर पिघल गया पत्थर
है असर तेज़ कुछ सदाओं में।।4।।


तोड़ लातीं फलक से तारे भी
ये हुनर है तो सिर्फ़ मांँओं में।।5।।


शर्मिला चौहान

बुधवार, 20 सितंबर 2023

गणपति छप्पन भोग 2022

"छप्पन भोग स्तुति"

नेह प्रेम से परसा भोजन, हम मिल तुम्हें खिलाते हैं।
रुचि रुचि भोजन करना गणपति, छप्पन भोग लगाते हैं।।


सेवा भाव से पूजें निश दिन,
अर्पण जीवन के हैं पल छिन।
प्रथम पूज्य देवा हैं गणपति,
दे दो सबको सुंदर सी मति।।

सारे जग के बुद्धि विधाता, आप ही कहलाते हैं।
रुचि रुचि भोजन करना गणपति, छप्पन भोग लगाते हैं।।१।।

प्राण प्रतिष्ठा करके गणपति,
धूप दीप नैवेद्य आरती।
भावभक्ति से ध्यावै तुमको,
दे दो अभय हस्त हम सबको।

मंगलमूर्ति हर वर्ष आपको, प्रेम भाव से लाते हैं।
रुचि रुचि भोजन करना गणपति छप्पन भोग लगाते हैं।।२।‌।

शुभ मंगल कारज में देवा,
ध्यान प्रथम करते नित सेवा।
दूर्वा, जसवन, पान , सुपारी
लड्डू, मोदक की छवि न्यारी।

आपके दर्शन से बप्पा, काम सफल हो जाते हैं।
रुचि रुचि भोजन करना गणपति छप्पन भोग लगाते हैं।।३।।

बालरुप है सबसे न्यारा 
मात पिता संग गणपति प्यारा।
सिद्धिविनायक उमापुत्र तुम
सुमुख गजानन हो चतुर्भुज।।

दुष्टों का संहार करे जो, महागणपति कहाते हैं।
रुचि रुचि भोजन करना गणपति छप्पन भोग लगाते हैं।।४।।

दाल भात चटनी अचार घी,
विविध लड्डू पकवान मिठाई।
खीर पूरी और सब्जियांँ,
बड़े पकौड़े विविध रोटियाँ।।

चूरमा शीरा अप्पम छोले,
खिचड़ी, ढोकला और दही भल्ले।
हैं पुलाव, चावल के व्यंजन,
खाना गणपति बैठ के आसन।।

पापड सलाद रंग बिरंगे
गुलाब जामुन चाशनी भीगे।
दूध दही नींबू और नारियल,
मुख में रखना मीठा तांबूल।।

निहारिका के सारे निवासी, श्रद्धा से शीश झुकाते हैं।
रुचि रुचि भोजन करना गणपति छप्पन भोग लगाते हैं।।५।।


नेह प्रेम से परसा भोजन हम सब मिल खिलाते हैं।
रुचि रुचि भोजन करना गणपति छप्पन भोग लगाते हैं।
छप्पन भोग लगाते हैं।।


🙏गणेश भगवान की जय हो 🙏


 समस्त निहारिका निवासी

मंगलवार, 12 सितंबर 2023

हिंदी भावभूमि के ई-पत्रिका संकलन में प्रकाशित

"त्रिपदा छंद"


मोह लोभ के पाश।
जितने कसते छोर
प्रेम शांति हो नाश।।

नदियाँ उगलें रोष।
हुई मलिन कृशकाय
पूछें किसका दोष।।

पर्वत तो हैं मौन।
कल कल उतरी धार
सुर लय भरता कौन।।

गगन धरा का साथ।
बरसे बरखा नेह
मिले क्षितिज में हाथ।।


सच्चे हैं मनमीत।
ग़ज़ल विविध सब छंद
कविता दोहा गीत ।।


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शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)