गुरुवार, 22 सितंबर 2022

1212 1212 1212 1212 पर ग़ज़ल

दी हुई बहर पर जितेंदर पाल सिंह जी की ग़ज़ल साझा कर रहीं हूँ। साथ ही मेरा प्रयास आप सभी के समीक्षार्थ प्रस्तुत है।🙏(आदरणीय सर के सुझावों से संशोधित)


1212 1212 1212 1212

छपे सवाल दर सवाल ज़ीस्त वो किताब है
समय तलाश दे जो हल वो सबसे लाज़वाब है।।1।।


ज़रूरतों को मापने को हर सफ़े में है सबक
बिना पढ़े ही कह गए किताब ही खराब है।।2।।

बिना सबब ही भागते जवान बूढ़े आजकल
नशा लगा दे दौड़ का ये ज़िंदगी शराब है।।3।।

सुने जो दिल की बात को चले सफ़र में मस्त हो
मिले जिसे दिली खुशी वही तो बस नवाब है।।4।।

है लेन देन कर्म का मिले असल पे ब्याज भी 
निरख परख ले बुद्धि से बड़ा सही हिसाब है।।5।।

हज़ार दुख सहा करे जो दूसरों के वास्ते
महक रहा जो शूल में खुशी भरा गुलाब है।।6।।

निहारते वो चाँद को जवान रात ढल गई
पलक पलक जो पल रहा हसीं सुबह का ख़्वाब है।।7।।


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शर्मिला चौहान
ठाणे ( महाराष्ट्र)

सोमवार, 12 सितंबर 2022

212 1222 212 1222(आइने के सौ टुकड़े करके हमने देखें हैं)

आदरणीय सर के मार्गदर्शन से ग़ज़ल का संशोधित रुप सादर है।🙏


212  1222  212  1222


द्रौपदी को खुद अपनी  लाज अब बचानी है
कृष्ण जी के आने की बात तो पुरानी है।।1।।


मूक बैठ कर देखें चीर के हरण वाला
अब दिखे न वो मंज़र याद फिर दिलानी है।।2।।


औरतें रहीं दुश्मन औरतों की सदियों से
लोक लाज के बंधन दर्द की कहानी है।।3।।


धुंँध थी दिशाओं में भेद की प्रथाओं में
गाँठ जो पड़ी अंतस अब वही छुड़ानी है।।4।।


सोच तंग दुनिया की वंशबेल बेटों से
बेटियांँ नहीं कमतर बात यह बतानी है।।5।।


बाग की सभी कलियांँ हृष्ट पुष्ट हों उन्नत
ज्ञान पुष्प विकसित हों वो फसल उगानी है।।6।।


मुश्किलों से वो लड़ती  विघ्न हर बड़े सहती
छू रही गगन सारा जीत की निशानी है।।7।।


शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)

शनिवार, 10 सितंबर 2022

गंगा दर्शन

"गंगा दर्शन"


तेजस्विता भाव, शुचिता परिपूर्ण, भव निर्मल करती हो।
माँ गंगे, कल-कल स्वर गूंँजे,अंतर मम  बसती हो।।

भगीरथ अथक प्रयास सफल,
हुआ धरा पर अवतरण।
शिव जटा बीच सिमटी,
था प्रबल वेग मात्र कारण।
शुभ्र उफनती गौमुख उद्गम,
चपला सी वेग गति।
संतृप्त हृदय, आत्म अनहद ,
स्थिर करती चंचल मति।

आवेग, उत्साह, हर्ष , परिपूर्णता, जन-जन में भरती हो।
माँ गंगे, कल-कल स्वर गूंँजे, अंतर मम बहती हो।।

वेद, पुराण, इतिहास, वंदित,
जप-तप ध्यान योग स्थान।
निर्मल नीर प्रवाह निरंतर,
आदिकाल से धरा की शान।
हरिद्वार की पुण्य भूमि को,
करती जब स्पर्श।
तपोभूमि ऋषियों-मुनियों की ,
रम्य मनोहर तीर्थ।

श्रृद्धा भाव, मन शुचिता, आस्था विश्वास भरती हो।
माँ गंगे, कल-कल स्वर गूंँजे, अंतर मम बहती हो।।

सुरसरि, देवनदी, माँ गंगा,
जाह्नवी, अलकनंदा, मंदाकिनी।
पुण्यदायिनी,मोक्षप्रदायिनी,
पापनाशिनी, कर्म प्रकाशिनी।
सिंचन करती निज नीर से, 
समस्त धरा का पोषण करे।
आलिंगन कर वसुधा का फिर,
जन -जन का कल्याण करे।

बूंद बूंद निर्मल गंगाजल,
आध्यात्म भाव भरती हो।
माँ गंगे, कल-कल स्वर गूंँजे, अंतर मम बहती हो।।

घंटा, ढोल, नगाड़े बाजें, 
शंखनाद की गूंँज रहें।
बहते दीपक जलधारा में
जीवन सातत्य की सीख धरें।
आकाश दीप सा जीवन हो
ध्येय उच्चतम सदा रहे।
आत्मज्ञान की ज्योति से 
हृदय आलोकित रहे।

जीवन दर्शन की सुंदरता, लहर लहर भरती हो।
माँ गंगे, कल-कल स्वर गूंँजे, अंतर मम बहती हो।।

राम, कृष्ण ने वंदन किया,
तुलसीदास गुणगान करे।
तट पर स्थित पवित्र भूमि पर,
शिव साक्षात निवास करे।
आदि शंकराचार्य, विवेकानंद के
दर्शन का आधार हो तुम।
सनातन वैदिक संस्कृति का 
एक प्रबल विश्वास हो तुम।

आदिकाल से अनंत तक, जनमानस में भाव भरती हो।
माँ गंगे, कल-कल स्वर गूंँजे , अंतर मम बहती हो।
अंतर मम बहती हो।।

शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
9968674585
sharmilachouhan.27@gmail.com