2122 2122 2122 212
दूसरा प्रयास समाक्षार्थ 🙏
आस की बूँदें बरस कर लोक पर छाने लगीं
शाख पत्तों से फिसलती गीत नव गाने लगीं।।1।।
दीप्त सूरज यूँ अचानक लुप्त सा कुछ हो गया
आज ये काली घटाएँ फिर उसे भाने लगीं।।2।।
ताल पोखर हैं लबालब चाल नदियों की जुदा
तोड़ कर अपने किनारे गाँव तक आने लगीं।।3।।
जब समुंदर ने उलीचा प्रेम की अंजुरी भरी
प्रेम दीवानी वो लहरें खूब इठलाने लगीं।।4।।
रात भर खपरैल से रोता रहा था आसमां
आस की कथरी भिगोकर बूँदें सुस्तानें लगीं।।5।।
था उनींदा सूर्य भी कंबल लपेटे सुब्ह से
शाम को किरणें उसे बाँहों में लिपटानें लगीं।।6।।
भीग कर बारिश में तेरा साथ छतरी में मेरे
तेज साँसें घुल हवा में दिल को बहकाने लगीं।।7।।
शर्मिला चौहान
*************************
इस बहर पर प्रस्तुत है मेरी प्रिय ग़ज़ल, जिसे निदा फ़ाज़ली जी ने अपने खूबसूरत अशआरों से पिरोया है। सरल शब्दों में, दिल तक उतर जाती है।
होश वालों को ख़बर क्या बेखुदी क्या चीज़ है
इश्क कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है।।१।।
उनसे नज़रें क्या मिलीं रौशन फ़जा़एँ हो गईं
आज जाना प्यार की जादूगरी क्या चीज़ है।।२।।
बिखरी जुल्फ़ों ने सिखाई मौसमों को शाइ'री
झुकती आँखों ने बताया मय-कशी क्या चीज़ है।।३।।
हम लबों से कह ना पाए उनसे हाल-ए-दिल कभी
और वो समझे नहीं ये खा़मोशी क्या चीज़ है।।४।।
निदा फ़ाज़ली
********************
इसी बहर पर मेरी एक और ग़ज़ल आप सभी के समीक्षार्थ 🙏
2122 2122 2122 212
रोक दे जो नाव को उस धार को तू मोड़ दे
हौसला गर है ज़रा तूफान को भी होड़ दे।।1।।
हैं मिली जीने की घड़ियांँ चार पल खुल कर तो जी
जो बने पाँवों की बेड़ी पैंजनी वो तोड़ दे।।2।।
तन मिला ये कीमती तो प्यार से कर ले जतन
हो बुरी आदत जो कोई आज से तू छोड़ दे।।3।।
काम करते नेक वो बंदे जहां में कम मिलें
जग बनाने वाले अब कुछ आदमी बेजोड़ दे।।4।।
दिल हुआ जाता है पत्थर आँखें भी अब शून्य हैं
कोई भी मंज़र नहीं है दिल को जो झिंझोड़ दे।।5।।
टूट जाए दर्प से टकरा के रिश्ता जो कभी
बोलकर मीठे वचन दो प्यार से फिर जोड़ दे।।6।।
झूठ लालच दंभ के सिक्कों से जो गुल्लक भरी
अब समय पहचान कर इंसान गुल्लक फोड़ दे।।7।।
शर्मिला चौहान