गुरुवार, 28 जुलाई 2022

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2122  2122  2122  212
दूसरा प्रयास समाक्षार्थ 🙏

आस की बूँदें बरस कर लोक पर छाने लगीं
शाख पत्तों से फिसलती गीत नव गाने लगीं।।1।।

दीप्त सूरज यूँ अचानक लुप्त सा कुछ हो गया
आज ये काली घटाएँ फिर उसे भाने लगीं।।2।।

ताल पोखर हैं लबालब चाल नदियों की जुदा
तोड़ कर अपने किनारे गाँव तक आने लगीं।।3।।

जब समुंदर ने उलीचा प्रेम की अंजुरी भरी
प्रेम दीवानी वो लहरें खूब इठलाने लगीं।।4।।

रात भर खपरैल से रोता रहा था आसमां
आस की कथरी भिगोकर बूँदें सुस्तानें लगीं।।5।।


था उनींदा सूर्य भी कंबल लपेटे सुब्ह से
शाम को किरणें उसे बाँहों में लिपटानें लगीं।।6।।


भीग कर बारिश में तेरा साथ छतरी में मेरे
तेज साँसें घुल हवा में दिल को बहकाने लगीं।।7।।


शर्मिला चौहान
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इस बहर पर प्रस्तुत है मेरी प्रिय ग़ज़ल, जिसे निदा फ़ाज़ली जी ने अपने खूबसूरत अशआरों से पिरोया है। सरल शब्दों में, दिल तक उतर जाती है।


होश‌ वालों को ख़बर क्या बेखुदी क्या चीज़ है 
इश्क कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है।।१।।

उनसे नज़रें क्या मिलीं रौशन फ़जा़एँ हो गईं
आज जाना प्यार की जादूगरी क्या चीज़ है।।२।।

बिखरी जुल्फ़ों ने सिखाई मौसमों को शाइ'री
झुकती आँखों ने बताया मय-कशी क्या चीज़ है।।३।।

हम लबों से कह ना पाए उनसे हाल-ए-दिल कभी
और वो समझे नहीं ये खा़मोशी क्या चीज़ है।।४।।


निदा फ़ाज़ली


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इसी बहर पर मेरी एक और ग़ज़ल आप सभी के समीक्षार्थ 🙏

2122  2122  2122  212

रोक दे जो नाव को उस धार को तू मोड़ दे
हौसला गर है ज़रा तूफान को भी होड़ दे।।1।।

हैं मिली जीने की घड़ियांँ चार पल खुल कर तो जी
जो बने पाँवों की बेड़ी पैंजनी वो तोड़ दे।।2।।

तन मिला ये कीमती तो प्यार से कर ले जतन
हो बुरी आदत जो कोई आज से तू छोड़ दे।।3।।

काम करते नेक वो बंदे जहां में कम मिलें
जग बनाने वाले अब कुछ आदमी बेजोड़ दे।।4।।

दिल हुआ जाता है पत्थर आँखें भी अब शून्य हैं
कोई भी मंज़र नहीं है दिल को जो झिंझोड़ दे।।5।।

टूट जाए दर्प से टकरा के रिश्ता जो कभी
बोलकर मीठे वचन दो प्यार से फिर जोड़ दे।।6।।

झूठ लालच दंभ के सिक्कों से जो गुल्लक भरी
अब समय पहचान कर इंसान गुल्लक फोड़ दे।।7।।


शर्मिला चौहान

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आप सभी के समीक्षार्थ मेरा प्रयास सादर है।🙏 सुझाव एवं मार्गदर्शन का हृदय से स्वागत है।(संशोधित)


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जब जली थी जमीं दर्या बादल हुआ
आसमाँ रो पड़ा नीर निर्मल हुआ।।1।।


नेह भीगी धरा खूब प्यारी लगे
अंक में वृंद भर धानी आँचल हुआ।।2।।


देखकर सामने अजनबी सा उसे
नैन भर क्यों गए, मन भी घायल हुआ।।3।।


वाहवाही करें बात सब ऊपरी
बैन मिसरी डली दिल तो काजल हुआ।।4।।


होड़ में इस तरह से लगा आदमी
नोट की दौड़ में बस वो पागल हुआ।।5।।


गाँठ ऐसी पड़ी रस बचा ही नहीं
भावना कैद है गर्व सांकल हुआ।।6।।


चैन मिलता नहीं इक घड़ी भी कहीं
सोम जीवन नहीं बस हलाहल हुआ।।7।।

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शर्मिला चौहान
ठाणे

शनिवार, 9 जुलाई 2022

ग़ज़लें मेरी

 तीसरे तरही मिसरा पर प्रथम प्रयास 🙏
2122  2122  2122  212

बंद महलों में हुआ जो वो हसीं मंज़र नहीं
पद्मिनी ने जो किया था सिर्फ वो जौहर नहीं।।१।।

मीत बन कर पास आते राज दिल के भेदते
देख मौका घात करते बैर सा खंजर नहीं।।२।।

घूम कर सारा ज़माना लौट घर को आ गया
और कोई भी ठिकाना है कहीं सुंदर नहीं।।३।।

हाथ में कंगन चमकते ‌पैर में पायल सजे
मौन लब पलकें झुकीं थीं शर्म सा जेवर नहीं ।।४।।

गर्व का जो बोझ कम हो पार भव से हो सकें
दर्प की जो नाव थामे है कोई सागर नहीं ‌‌।।५।।

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शर्मिला चौहान


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 तीसरे तरही मिसरे पर द्वितीय प्रयास 🙏
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हैं पिता जब तक जहाँ में मुश्किलों से डर नहीं
हाथ सिर पर रख दिया तो बाप सा अंबर नहीं।।1।।

टूट जातीं जब उमींदें टूट जाता आदमी
जोड़ दे जो चीज़ वो मिलती यहाँ अक्सर नहीं।।2।।

बात का था मान रखना छोड़ सब सुख चल दिए
जो पिता की बात पाले आज वो रघुबर नहीं।।3।।

पंख हैं मज़बूत पंछी खूब नापे आसमाँ
हो शिथिल बैठा पुकारे आज वो तेवर नहीं।।4।।

दाँव नारी का लगाकर खेल मर्दों ने रचा
द्रौपदी का चीर हर ले अब कोई चौसर नहीं।।5।।


शर्मिला चौहान 
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 सप्ताह के गृहकार्य पर प्रथम प्रयास सादर समीक्षार्थ 🙏(संशोधित)

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खुशी से हो भरा दिल तो लगे त्यौहार फूलों से
उदासी से गुज़रते को मिले आधार फूलों से।।1।।

बड़ी सौगात मिलतीं थीं नहीं था पर वो अपनापन
हुई हासिल कई खुशियांँ मिले उन चार फूलों से।।2।।

बिखेरें रंग दुनिया में हवाओं में महक भर दें
जहां में है कोई ऐसा रहे बेजा़र फूलों से।।3।।

खुली जुल्फ़ों पे इठलाते किताबों में वो शरमाते
बहुत किस्से सुना जाते मिलो जब यार फूलों से।।4।।

लुभाएँ मन सभी का वो भले ही क़ीमती ज़ेवर 
मगर नारी दिखे सुंदर करे शृंगार फूलों से।।5।।

चले आते कहीं से गुनगुनाते सिरफिरे भौंरे
जताते इस तरह जैसे हो सचमुच प्यार फूलों से।।6।।

कभी शाखों पे मुस्काते कभी मंदिर में सज जाते
निभाते साथ अर्थी तक है जीवन सार फूलों से।।7।।


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शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
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 दूसरा प्रयास सादर समीक्षार्थ 🙏(संशोधित)
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खिलीं कलियाँ हवा बहकी बदलता हर नज़ारा है
किसी के पास आने का लगे जैसे इशारा है।।1।।

समुंदर बीच में कश्ती लड़े तूफान से हरदम
निगाहों में समाया दूर बैठा बस किनारा है।।2।।

मिलन की चाह में काँटे  घड़ी में घूम थक जाते
बजे बारह लिपट जाते समय भी दिल का मारा है।।3।।

ग़ज़ल हो गीत हो या नज़्म या कोई कहानी हो
छुए दिल को तभी जब भाव भरता दिल हमारा है।।4।।

बजाते ढ़ोल आए मेघ बिन बरसे मगर लौटे
किसानों ने लिखी अर्जी हमें तेरा सहारा है।।5।।

मिले जो साथ छोटा या बड़ा संबल बढ़ा देता
अमावस रात में जुगनू लगे चंदा से  प्यारा है।।6।।

जु़बां मीठी रहे प्यारे तो हो हासिल सभी खुशियांँ
इसी हथियार ने अक्सर जहां जीता ये सारा है।।7।।


शर्मिला चौहान