बुधवार, 27 अप्रैल 2022

गीत (22 22 22 22)

"गीत" 

(22  22  22  22 )




ईश्वर की लीला न्यारी है
यह दुनिया कितनी प्यारी है!

नीली छतरी सिर पर डोले
       बगियों में कोयलिया बोले।
योगी बन मौन खड़े पर्वत
     धरती पर खूब  सजे मरकत।
हिममय गिरि के चरणों में
      केसर की सुंदर क्यारी है।
यह दुनिया कितनी प्यारी है!।१।

सागर जब धरता रूप विकट
     लहरें बन जातीं तब संकट।
नदियों की गाथा प्रेममयी
    सदियों से बहतीं कालजयी।।
लहरों की चंचलता पल भर
   ‌‌ पर त्याग नदी का भारी है।
यह दुनिया कितनी प्यारी है!।२।

अग्नि सम मरुथल तप्त रहें
     लिपियाँ गढ़ अपनी बात कहें।
काँटों में फूल खिलाते जो
     मौसम से ही बन जाते वो।
सर्द गरम बरसें बन जीवन
   अद्भुत प्रभु रचना सारी है।
यह दुनिया कितनी प्यारी है!।३।

हैं रंग बिरंगे फूल खिले
    पक्षी बोलों की तान मिले।
तितली के रूप अनूठे से
      धरती पर सजते बूटों से।
देख धरा की यह सुंदरता
  खुद ईश्वर भी बलिहारी है।
यह दुनिया कितनी प्यारी है!।४।

शर्मिला चौहान

मंगलवार, 26 अप्रैल 2022

गीत (२१२२×४)

"गीत"

(2122  2122  2122  2122)



हौसला तेरा गिरा दे भीड़ ऐसी जोड़ना मत।
तू अकेला ही सही पर राह अपनी छोड़ना मत।।

पाँव में कंकर चुभें जो
       दर्द सहना ही सिखाते।
चमचमाती धूप में कुछ
         फूल देखो खिलखिलाते।
छोड़ कस्तूरी गुणों को
             तू वनों में दौड़ना मत।
 तू अकेला ही सही पर
         राह अपनी छोड़ना मत।।१।।

हो प्रवाहित पर्वतों से
      फिर नदी रुकती कहाँ है!
श्वास लेती है वहीं प्रियतम
            मिले सागर जहाँ है।
बाँध अपने धैर्य का तू
           भूलकर भी तोड़ना मत।
तू अकेला ही सही पर
           राह अपनी छोड़ना मत।।२।।


जो निरंतर तू चले तो
         मिल सकेंगी मंज़िलें भी।
रोक लेगा चाल अपनी
         बीत जाएगा समय ही।
ठान कर आगे बढ़ा तो
           पैर पीछे मोड़ना मत।
तू अकेला ही सही पर
       राह अपनी छोड़ना मत।।३।।


शर्मिला चौहान

गीत (१२२२×४)

"गीत" समीक्षार्थ

(-1222 1222 1222 1222)



जगत में गूँजता नित, द्वेष का ही शोर जब है।
मनुज को जोड़ती बस प्रेम की इक डोर तब है।

रही बढ़ती दनुजता विश्व में
                   हर बार जब जब।
विजय पाती मनुजता मात दे,
                    हर बार तब तब।
हृदय को बींधकर भीगी मिले,
               ‌     इक कोर जब है।
मनुज को जोड़ती बस प्रेम की
                इक डोर तब है।।१।।


पनपती शाख पर कोंपल,
         सहमती खूब हर पल।
किलकती मौन हों कलियाँ
           बुरा है सोच के कल।
बिखरती आस जीवन की,
             निराशा जोर जब है।
मनुज को जोड़ती बस,
          प्रेम की इक डोर तब है।।२।। 


महाभारत कथा से सीख 
         ‌ ‌‌       भी  लेते नहीं जो
भटकते मोह में फिर ठौर
                  पाते ना कहीं वो।
हृदय की वेदना का रूप
                  होता घोर जब है
मनुज को जोड़ती बस प्रेम
       की इक डोर तब है।।३।।

तमस अवसाद का जितना 
         सघन छाया हुआ हो।
भरम का जाल नैनों से
          हृदय आया हुआ हो।
निशा को मात देती रश्मियों
                   का भोर जब है।
मनुज को जोड़ती बस प्रेम
          की इक डोर तब है।।४।।


शर्मिला चौहान