सोमवार, 24 जनवरी 2022

कहानी- गुलाब जामुन

‌ "गुलाब जामुन"


फागुन की हवा अपने साथ मस्ती भर लाती है. प्रकृति में भी विभिन्न रंग सज जाते हैं.
बालकनी में खड़ी नीमा ने सामने बौरों से लदे आम को देखा, यौवन के बोझ से मानो डालियाँ झुकी जा रहीं हैं. कोयल की मोहक आवाज़ ने, खिलते हुए टेसूओं को विचलित किया हुआ है.
अचानक पीछे से आकर शशांक ने उसे बांहों में भर लिया.
"अरे! बालकनी में खड़ें हैं हम, कुछ तो ध्यान रखो." प्यार से झिड़कते हुए नीमा ने खुद को छुड़ा लिया.
"पहली होली है परसों, शुरुआत आज से ही करतें हैं." शशांक ने मस्ती से कहा.
"चलो, पहले सामान पैक कर लेते हैं. सुबह जल्दी निकलना है." कहते हुए नीमा सूटकेस में सामान रखना शुरू किया.
"अरे बाप रे! इतना सारा सामान. होली है दीपावली नहीं जो सबके लिए कपड़े ले जा रही हो." शशांक ने आश्चर्य से पूछा.
"हम सब दीपावली के बाद अब मिलेंगे तो मम्मी-पापा और दीदी के दोनों बच्चों के लिए तो कुछ ले जाना ही था. चिंता मत करो, अपने कार्ड से मंगवाया है." जोर से हंँसती नीमा ने कहा.
दूसरे दिन सुबह चाय पीकर उन दोनों ने यात्रा शुरू कर दी. अपनी कार से करीब आठ-नौ घंटे का सफर कुछ बड़ा नहीं था.  
शहर की सीमा खत्म होते ही बगीचे, खेत और छोटे छोटे गांँवों का सिलसिला शुरू हो गया साथ ही साल भर शादी हुए इस जोड़े ने अपनी पहली होली की प्रेम भरी शुरुआत कर दी.
"मैं जब छोटा था ना तब किसी के रंग लगा देने पर खूब रोता था." शशांक ने अपना बचपन याद किया.
"और मैं..किसी ने रंग नहीं लगाया तो उसके सामने जाकर लगवाती थी, नहीं तो खुद का रंग खुद पर पोतकर खुश." ठहाका मारकर नीमा ने कहा.
"अब जाकर किसी से लगवाना रंग, देखता हूँ." तिरछी नज़रों से  घूरकर शशांक ने कहा.
"हा.हा..हा! जल गए, एकदम शादीशुदा पुरुष.. नहीं पति का डायलॉग." नीमा ने उसे गुदगुदी करते हुए कहा 
"ड्राइविंग कर रहा हूं यार." शशांक ने सड़क पर नज़र जमाते हुए कहा.
"लंच के बाद मुझे दे देना कार, दोनों मिलकर चलाएंगे तो थकेंगे नहीं." प्रेम से नीमा ने कहा.
"हम तो अपनी गृहस्थी भी मिलकर चला रहें हैं नीमू! बहुत खुशकिस्मत हूँ मैं जो तुम्हारा साथ मिला." शशांक की बातों से नीमा की आंखें झिलमिला गईं.

कार अपनी रफ़्तार से बढ़ रही थी और नीमा शादी के बाद की पहली दीपावली की स्मृतियों में खोने लगी. बहुत खुशी और उत्साह से भरे नीमा और शशांक घर आए थे. नीमा की ससुराल में सास-ससुर के अलावा बड़ी ननद शीनू दीदी भी हैं जिनकी ससुराल दूर के गांव में है. ननदोई जी, जिन्हें नीमा "भाई साहब" कहती है, वे इसी शहर में नौकरी करते हैं. उन्होंने अपने परिवार के लिए फ्लैट किराए पर ले रखा परंतु शीनू दीदी अपने दोनों बच्चों को लिए हर दूसरे दिन मायके पहुँच जातीं हैं. 
"मम्मी, ये तो दिन भर आफिस चले जाते हैं और बच्चे स्कूल. मैं अकेली बोर होती रहतीं हूँ इसलिए आ गई." शशांक ने बताया कि ऐसा कहते दीदी, दोनों बच्चों के कपड़े भी बांध लातीं और फिर आठ-दस दिनों की फुर्सत. 
"बेचारे जीजाजी! उन्हें भी बुला कर रख लेतीं दीदी. अब बच्चे इसी घर से स्कूल जाते और जीजाजी आफिस." कहते हुए थोड़ा दुखी हो गया था शशांक. जीजाजी की किसी भी बात को काटकर, उन्हें ससुराल में रहने के लिए मजबूर करना शायद शशांक को भी बुरा लगता था.

अचानक कार को ब्रेक लगा और  नीमा की स्मृतियों को भी.
"अरे ! क्या हुआ?" कहते हुए हड़बड़ा कर नीमा जैसे जाग गई.
"सामने की सीट पर बैठकर सो रही हो! ऐसा कैसे चलेगा नीमा मेमसाब." घबराई नीमा को देखकर शशांक मुस्कुराया.
"सोई नहीं थी, बस दीपावली की बातें याद आ गई थीं." कहती नीमा ने अपने चेहरे पर झूमती लटों को समेट लिया.

शशांक ने गाड़ी एक ढाबे पर रोक दी और दोनों खाना खाने लगे. सामने खड़ा वेटर मुस्कुरा रहा था क्योंकि दोनों पति-पत्नी एक-दूसरे की पसंद की चीजें आर्डर कर रहे थे.

जब शशांक ने दो गुलाब जामुन मंगवाए तब नीमा को फिर दीपावली की बातें याद आ गईं.
"बहू, तुम्हारी पहली दीपावली है इस बार पकवान तुम्हारी पसंद के बनेंगे." सास की आवाज से नीमा ने फौरन कहा था, "मम्मी, मुझे गुलाब जामुन बहुत पसंद हैं. हम खूब सारे बनाएंगे." बच्चों की सी खुशी थी नीमा की आवाज़ में.
"नीमा भाभी, मुझे भी बहुत पसंद हैं गुलाब जामुन. बड़े दिनों से खाए भी नहीं." अखबार पढ़ते हुए "भाई साहब" ने कहा.
बस..! शीनू दीदी का पारा गरम हो गया। आव देखा ना ताव.. अपने पति के सामने खड़ी हो गईं.
"अब मेरी चुगली इस कल की आई से करोगे. कब से इतने पसंद हो गए ग़ुलाब जामुन आपको?  जामुन नहीं खाए.. मना किया है किसी ने, खा लेते आते-जाते हजार होटल तो हैं रास्ते में." त्यौहार के समय दीदी की आक्रामक मुद्रा से नीमा सहम गई. माता-पिता की असामयिक मृत्यु से, नीमा बुआ-फूफाजी के पास पली बढ़ी थी. उनके बच्चों के साथ हर बात में समझौता कर लेना, आदत बन गई थी उसकी. आफिस में साथ काम करने वाले शशांक ने शादी का प्रस्ताव रखकर, नीमा को जैसे एक नई जिंदगी दी थी.
"नहीं दीदी, भाई साहब ने मेरा मन रखने के लिए कह दिया होगा." नीमा ने अपने ननदोई का बचाव करने की कोशिश की.
"अच्छा! बढ़िया है, वो तुम्हारा मन रखें और तुम उनका. बाकी तो घर में कोई है नहीं. इस परिवार में बाहर से जुड़े लोगों की मर्ज़ी ही चलेगी अब तो." दीदी के कठोर शब्द सभी के कानों में गरम शीशे की तरह घुसने लगे.
"शीनू! कैसी बातें कर रही हो. साल भर का बड़ा त्यौहार और तुम दामाद जी से कैसे बोल रही हो? नीमा और दामाद जी, क्या इस घर के नहीं हैं?" शशांक के पापा ने गुस्से से कहा.
भाई साहब तो चुपचाप उठकर बाहर चले गए और फिर शाम को शशांक ही उन्हें घर वापस लेकर आया था.
दीपावली पर पूजा हुई, सबने नए कपड़े पहने, पकवान भी परोसे परंतु एक चुप्पी, अनमनापन वातावरण में पसरा रहा.
"अपने लाए कपड़े वापस ले जाना, मुझे और बच्चों को जरुरत नहीं है इनकी. तुम्हारी कमाई तुम्हें ही मुबारक हो." वापसी में शीनू दीदी ने नीमा के लाए कपड़े वापस करते हुए कहा था.
कपड़े वापस लेते हुए छलछला आईं थीं नीमा की आंखें.
"बहू, इतनी सुंदर साड़ी है ला दे मुझे. अभी रिश्तेदारों में बहुत शादियां हैं, मुझे जरूरत है इसकी." मम्मी ने साड़ी और सब कपड़े वापस ले लिए और गले लगाकर बहू बेटे को विदा किया.

"ओ..नीमा मैडम, कहां खो जाती हो यार. गुलाब जामुन तो खत्म हो गए. अब चलें." शशांक की आवाज से चौंककर नीमा ने हांँ में सिर हिलाया और उठ खड़ी हुई.

"इस बार मैंने कपड़े सिर्फ बच्चों के लिए खरीदें हैं. शीनू दीदी और भाई साहब के लिए हिम्मत नहीं हुई."  ड्राइविंग सीट पर बैठती नीमा ने कुछ बुझे स्वर में कहा.
बचपन से विपरीत परिस्थितियों में पलने-बढ़ने के बावजूद नीमा, बहुत खुशमिजाज और मिलनसार लड़की है, शशांक को  पता था. शीनू दीदी के व्यवहार से वह विचलित हो गई थी और फोन पर भी दीदी से सिर्फ़ प्रणाम और औपचारिक बातें ही होती थी.

"ठीक है भाई! दीदी को वैसे भी किसी की पसंद रास नहीं आती, उन्हें तो तुम इसलिए पसंद नहीं क्योंकि तुम मेरी पसंद हो. जीजाजी, मम्मी पापा की पसंद हैं इसलिए पसंद नहीं." जोर से हँसकर शशांक ने वातावरण को हलका किया और दोनों फिर हँसते मुस्कुराते अपने घर की ओर बढ़ चले.
दरवाजे पर पहुँचकर, शशांक के कहने पर नीमा ने कार का हार्न बजाया. वे दोनों उतरे ही थे कि मम्मी पापा स्वागत के लिए दौड़े आए. नीमा ने मम्मी के चरण स्पर्श किए और उन्होंने आशीर्वाद देते हुए उसे गले से लगा लिया. घर के अंदर आती नीमा को बच्चों की आवाज नहीं आई ना ही वे दिखाई दिए. पानी पीते हुए उसकी नज़रें, शीनू दीदी के परिवार को खोज रहीं थीं.
"मम्मी, दीदी और बच्चे कहाँ हैं? दिखाई नहीं दे रहें हैं." थोड़ी दबी हुई आवाज़ में नीमा ने पूछा.

मम्मी ने शशांक की ओर देखा और कहा, "तुम्हारे जीजाजी की कंपनी से कुछ लोगों को निकाला गया, उसमें दामाद जी भी थे. पिछले महीने ही एक नई जॉब ऑफर मिली जो यहाँ से तीन-चार घंटे की दूरी पर है. कंपनी के लोगों की कालोनी है वही पंद्रह दिनों पहले शिफ्ट हो गए हैं." मम्मी के बताने पर शशांक और नीमा मौन‌ हो गए.

"आपसे हमेशा ही बात होती है, हमें बताया क्यों नहीं?" दोनों एक साथ पूछ बैठे.
"दामाद जी ने मना किया था. बोले होली पर तो‌ आ ही रहें हैं तभी बता देना वरना दोनों परेशान हो जाएंगे." पापा ने उत्तर दिया.

दीदी गुस्सैल स्वभाव की थीं परंतु उनके रहने से घर भरा भरा लगता था. शशांक और नीमा समझ गए कि दीपावली की घटना के बाद मम्मी पापा भी ऐसा ही सोचने लगे थे कि दामाद जी का आगे भी अपमान ठीक नहीं होगा.

"शशांक हम एक-दो दिन छुट्टी ले लेते हैं, होली के दूसरे दिन शीनू दीदी और बच्चों से मिल आएंगे. मम्मी पापा को भी दीदी का घर देखने जाने का मन होगा." नीमा ने कहा.

"बिल्कुल नीमा मैडम, हम सब जाकर दीदी जीजाजी को सरप्राइज देंगे, ठीक है ना पापा मम्मी!" शशांक ने खुशी से कहा.

नीमा और शशांक ने मम्मी पापा की ओर देखा. ‌
"मैं तो अपने दामाद जी की पसंद के गुलाब जामुन बनाकर ले जाऊंगी, मेरी मदद करेगी ना नीमा?" मम्मी की बात पर सब मुस्कुराने लगे. होली पर एक खूबसूरत पहल परिवार खुशियाँ मना रहा था. 


**************

मौलिक, स्वरचित एवं अप्रकाशित रचना है।

शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)400610

Add- Sharmila chouhan
C-1401, Niharika kankia Spaces
Opposite Lokpuram Temple
Thane(west)400610
Maharashtra
M.no. 9967674585
Email sharmilachouhan.27@gmail.com

मंगलवार, 4 जनवरी 2022

रुबाईयाँ

रुबाई पर प्रथम प्रयास सादर 🙏

222 222 222 2

मौन झुकी पलकें थिरकें साज अलग
आँखें खोल रहीं हैं कुछ राज अलग
मिल न सके जो हाथ ज़माने से डर
आँखें जोड़ चुकीं रिश्ते आज अलग।

******************

222  222  222  21

ओस मचलकर पत्तों पर झूली है आज
सरसों संग चने के फूली है आज
मेघों में सिमटी है श्यामल सी भोर
मंद पवन भी रस्ता भूली है आज

शर्मिला चौहान 
********************

221 1222 221 12

हासिल हो गई खुशियाँ  माना करिए
गैरों के दुखों को भी जाना करिए
रोना बेवजह का यूँ  ही ठीक नहीं
हँसने की कभी मन में ठाना करिए

शर्मिला चौहान

******************

*रुबाई - एक परिचय*रुबाई की शुरूआत फ़ारसी से हुई और उसके बाद उर्दू में आई. इसमें चार मिसरे होते हैं जिनमें से पहला, दूसरा और चौथा मिसरा हमक़ाफ़िया होता है. दूसरे शब्दों मे कहें तो रुबाई में दो शेर होते हैं.मुख्य बात यह है ग़ज़ल की तरह रुबाई को किसी भी बहर में नहीं कहा जा सकता बल्कि इसके लिए कुल 24 बहरें निर्धारित हैं. सिर्फ़ इन 24 बहरों में ही रुबाई कही जा सकती है. रुबाई की निर्धारित बहरों के अलावा अगर किसी अन्य बहर में चार मिसरे कहे जाते हैं तो उसे क़ित्‌आ यानी मुक्तक कहा जा सकता है पर रुबाई नहीं. 2. एक मज़ेदार बात यह है कि रुबाई के चारों मिसरे अलग अलग बहर में कहे जा सकते हैं पर वो बहरें उन्ही 24 बहरों में से होनी चाहिये जो रुबाई के लिये निर्धारित हैं.यह भी कहा जाता है कि रुबाई का हर मिसरा पिछले मिसरे से बेहतर होना चाहिये और चौथा मिसरा सबसे शानदार हो. रुबाई के लिये निर्धारित बहरें: 1. 221 1212 1222 21 2. 221 1221 1222 21 3. 221 1221 1221 12 4. 221 1222 222 21 5. 221 1212 1222 2 6. 221 1221 1222 2 7. 221 1222 222 121 8. 221 1222 221 12 9. 221 1222 222 2 10. 221 1221 1221 121 11. 221 1212 1221 121 12. 221 1212 1221 12 13. 222 1212 1222 21 14. 222 221 1222 21 15. 222 212 1221 12 16. 222 222 222 21 17. 222 222 222 2 18. 222 212 1222 2 19. 222 221 1221 121 20. 222 221 1222 2 21. 222 222 221 12 22. 222 221 1221 12 23. 222 212 1221 121 24. 222 222 221 121