गुरुवार, 26 नवंबर 2020

कुंडलियां

[23/11, 19:14] Sharmila Chouhan: कुंडलियां

पानी रहता सरल मन, घुले मिले सब संग।
साथ मिलता जब जिसके, ले लेता वह रंग।।
ले लेता वह रंग, गुण यही बड़ा निराला।
सब कुछ करता दान, बने बादल मतवाला।।
कीमत है अनमोल, बात जिसने यह जानी।
बचत करें सब लोग, धरा का धन है पानी ।।
[23/11, 22:18] Sharmila Chouhan: कुंडलियां

थाना सुंदर है नगर, बड़े ताल हैं शान।
चली रेलगाड़ी प्रथम, यह इसकी पहचान।।
यह इसकी पहचान, बहुत से समुद्री बंदर।
घोड़ों का व्यापार, दूर देशों के अंदर।।
वीर मराठा शान, इस नगरी में आना।
चटपटी मिसल पाव, सदा याद रहे थाना।।

शर्मिला चौहान
[25/11, 16:25] Sharmila Chouhan: कुंडलियां

लगाना पौधा तुलसी, जगविदित यही नाम।
रोगों से रक्षा करना, सुंदर इसका काम।।
सुंदर इसका काम, हरिप्रिया यह कहलाती।
विष्णु को दिया शाप, घरों में पूजी जाती।।
पवित्र कार्तिक मास, मंगल ब्याह रचाना।
अपने घर के द्वार, बिरवा तुलसी लगाना।।

शर्मिला चौहान

कुंडलियां

बेटा बेटी एक सम, कभी करें ना भेद।
अंतर इनमें जो करें, रहे हृदय में खेद।।
रहे हृदय में खेद, बेटियां बड़ी अनूठी।
मन में इनके प्यार, दिखें ऊपर से  रूठी।।
भरें नेह भंडार, बनें खुशियों की पेटी।
सुखी वही परिवार, जहाँ सम बेटा बेटी।।

शर्मिला चौहान

बुधवार, 18 नवंबर 2020

"जिंदगी" भाग १

‌      "जिंदगी"  

जिंदगी पहेली है तो उसे सुलझाना क्यों है।
गलतियां हो गईं जो तो अब दोहराना क्यों है।

जो सोए ही नहीं थे उन्हें जगाना क्यों है।
दिल में जो बसे हैं उन्हें फिर भुलाना क्यों है।

बुझ चुकें हैं जो चिराग उन्हें फिर  जलाना क्यों है।
दिल में लगे हुए जख्म  लोगों को दिखाना क्यों है।

बदले हालातों में कुछ रिश्ते निभाना क्यों है।
जो कभी साथ ना दे सका उसे आजमाना क्यों है।

गर हौसला ना हो तो गहराइयों में जाना क्यों है ‌।
जब डूब ही चुके हैं तो पार आना क्यों है।

जो राग सध ना सके वो गीत गाना क्यों है।
बिखरे सुरों से महफिल  को सजाना क्यों है।

हर शख्स को बातों का मतलब समझाना क्यों है।
दिल जिसे ना चाहे उस बात को अपनाना क्यों है।

शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)

रविवार, 1 नवंबर 2020

"शरद-चंद्र"

🌝 शरद -चंद्र 🌝

बीता पावस, अवनि मुस्काई
 फूले कास,  शुभ्रता छाई।
अंबर निहारे प्रतिपल प्रिये
 शरद की सुंदर बेला आई।।

सोलह कलाओं सहित मुस्काता
शशि, नक्षत्रों के संग आता।
धवल ज्योत्सना पाश लपेटे
धरा को सिंचित कर जाता।

नवश्रृंगार किए धरा इठलाई।
 शरद की सुंदर बेला आई।।


शशि का सौंदर्य निराला है
वह वसुधा पर मतवाला है।
प्रेम सुधा बरसाता है
कण कण माधुर्य समाता है।

चंद्र ने नेहदृष्टि घुमाई ।
शरद की सुंदर बेला आई।।

हरित वसन, कुसुमित आँचल
सुरभित पवन बहे मंदरांचल।
हल्की सी धुंध, भरती उसांस
तितलियों को सुमनों की आस।

नवांकुरों को अंक भर लाई।
शरद की सुंदर बेला आई।।

प्रेम सुधा टप टप टपके
लजाई धरा मह मह महके।
बाँकी चितवन रह रह बहके
पिया संग गोरी पल पल लहके।

अमिय पान करे जग भाई।
शरद की सुंदर बेला आई।।

शर्मिला चौहान