शुक्रवार, 13 सितंबर 2019

हिन्दी दिवस २०१९

आज सजी संवरी
विविध अलंकारों से अलंकृत
अपने पद का अभिमान भरे ।
चली लहकती महकती हिन्दी
'हिन्दी दिवस' का गौरवगान करे ।

सभी भाषाओं से मिलती
महाआसन पर विराजमान हुई ।
लोगों के शंखनाद, जयघोष पर
राष्ट्रभाषा मन मुदित हुई ।

चहुं ओर दृष्टिपात किया
कृतकृत्य हो रही है ।
अपने ‌लोगों के मुखारविंद से
अपने को सुन रही है ।

अपने साथ की अपनी सभी
प्रांतीय भाषाओं को देख ,
मंद-मंद मुस्कुरा रही है ।
आज के इस समारोह पर,
खूब इठला रही है ।

सारी विधाऐं साथ लिए
परिवार का सुख पा रही है ।
कितना विशाल और समृद्ध
परिपूर्णता से मुस्कुरा रही है।

क्यों दुखी होती हूँ चंद लोगों से
मेरा प्रसार तो अनंत है ।
मेरे रूप सौन्दर्य का कायल
पूरा देश तो मेरा भक्त है ।

जैसे जैसे मेरे विस्तार का
सम्मोहन बढ़ता जाएगा ।
हर नागरिक अपने हृदय में
'माँ' की तरह मुझे बिठाएगा ।

      " हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाऐं "

रविवार, 8 सितंबर 2019

सुषमा स्वराज जी के निधन पर ७ अगस्त २०१९

भारत में खुशी की लहर छाई है ,
लगता है मानो, आज ही स्वतंत्रता पाई है ।

भारत माता के मुकुट का हीरा धूमिल हो गया था ,
समय और परिस्थितियों में गुम हो गया था ।
आज वह फिर जगमगाने की चाहत रखने लगा है ,
भारत माता का सिर गर्व से उठने लगा है ।

अपने ही अंग को बीमार देख, वेदना से कसमसा रही थी ,
अपने ही बच्चों की तकलीफ़ पर आँसू बहा रही थी ।
रक्तपात मानो उसके हृदय में होता रहा ,
बाकी का पूरा देश चैन से सोता रहा ।

मुखर वाणी मुखर्जी की मौन हो गयी ,
'एक भारत' की चाह अटलजी के साथ खो गयी ।
ज्यों-ज्यों माँ पर अत्याचार बढ़ता  गया ,
एक सपूत उसका, त्यों-त्यों दृढ़ संकल्प लेता गया ।

करोड़ों भारतीयों की आवाज बनकर उसने ,
सारी दुनिया को बता दिया ।
अब ना कोई छू सकेगा, करनी से जता दिया ।

आज भारती गौरवान्वित हो, मुस्करा रही है ,
कश्मीर से कन्याकुमारी तक, एक नज़र आ रही है ।
'सुषमा' की प्रतीक्षा ने रंग दिखा दिया है ,
कश्मीर में तिरंगा फिर फहरा दिया है ।

अब घर के भेदी लंका नहीं ढा सकते ,
मनमानी कर, देश को बरगला नहीं सकते ।
बच्चों ने एकजुट हो बीड़ा उठा लिया है ,
मातृभूमि का फर्ज , सबने अदा किया है ।

शनिवार, 7 सितंबर 2019

चंद्रयान मिशन २०१९

कर्म और ज्ञान बांहों में पलते,
भारत भूमि सुंदर समन्वय है ।
राम, कृष्ण ने मार्ग दिखाया,
'गीता' सत्यम शिवम सुंदरम है ।

बालकृष्ण ने जिद थी ठानी,
चंद्रखिलौना लेने की ।
दृष्टि दिया था सकल जगत को,
चंद्र की राह पकड़ने की।

कवियों की कल्पनाओं का 'चंद्र'
शायरों की कलम ने कहा ' चाँद' ।
बच्चों का वो सुंदर मामा ,
अब दूर नहीं उसको पाना ।

लगे रहे दिन रात 'संत'
इस राह को सुगम बनाने को ।
दौड़ पड़ा था 'चंद्रयान'
चंद्रमा को गले लगाने को ।

अथक प्रयास, गूढ़ चिंतन
जो चंद्रयान यूँ दौड़ चला ।
जल है उस सुंदर गोले में ,
ये राज भी वो खोल चला ।

देश में जितने घोटाले हुए ,
उसका एक हिस्सा भी ना लगा ।
गर्व से तिरंगा साथ लिए ,
प्रेमी से मिलने आतुर हो चला ।

अथक प्रयास विज्ञान संत का ,
कभी वृथा नहीं जाएगा ।
अगली बार ' चंद्रयान' हमारा ,
चाँद पर तिरंगा फहराएगा ।

      "भारत माता की जय"

   शर्मिला चौहान