शुक्रवार, 13 सितंबर 2019

हिन्दी दिवस २०१९

आज सजी संवरी
विविध अलंकारों से अलंकृत
अपने पद का अभिमान भरे ।
चली लहकती महकती हिन्दी
'हिन्दी दिवस' का गौरवगान करे ।

सभी भाषाओं से मिलती
महाआसन पर विराजमान हुई ।
लोगों के शंखनाद, जयघोष पर
राष्ट्रभाषा मन मुदित हुई ।

चहुं ओर दृष्टिपात किया
कृतकृत्य हो रही है ।
अपने ‌लोगों के मुखारविंद से
अपने को सुन रही है ।

अपने साथ की अपनी सभी
प्रांतीय भाषाओं को देख ,
मंद-मंद मुस्कुरा रही है ।
आज के इस समारोह पर,
खूब इठला रही है ।

सारी विधाऐं साथ लिए
परिवार का सुख पा रही है ।
कितना विशाल और समृद्ध
परिपूर्णता से मुस्कुरा रही है।

क्यों दुखी होती हूँ चंद लोगों से
मेरा प्रसार तो अनंत है ।
मेरे रूप सौन्दर्य का कायल
पूरा देश तो मेरा भक्त है ।

जैसे जैसे मेरे विस्तार का
सम्मोहन बढ़ता जाएगा ।
हर नागरिक अपने हृदय में
'माँ' की तरह मुझे बिठाएगा ।

      " हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाऐं "

रविवार, 8 सितंबर 2019

सुषमा स्वराज जी के निधन पर ७ अगस्त २०१९

भारत में खुशी की लहर छाई है ,
लगता है मानो, आज ही स्वतंत्रता पाई है ।

भारत माता के मुकुट का हीरा धूमिल हो गया था ,
समय और परिस्थितियों में गुम हो गया था ।
आज वह फिर जगमगाने की चाहत रखने लगा है ,
भारत माता का सिर गर्व से उठने लगा है ।

अपने ही अंग को बीमार देख, वेदना से कसमसा रही थी ,
अपने ही बच्चों की तकलीफ़ पर आँसू बहा रही थी ।
रक्तपात मानो उसके हृदय में होता रहा ,
बाकी का पूरा देश चैन से सोता रहा ।

मुखर वाणी मुखर्जी की मौन हो गयी ,
'एक भारत' की चाह अटलजी के साथ खो गयी ।
ज्यों-ज्यों माँ पर अत्याचार बढ़ता  गया ,
एक सपूत उसका, त्यों-त्यों दृढ़ संकल्प लेता गया ।

करोड़ों भारतीयों की आवाज बनकर उसने ,
सारी दुनिया को बता दिया ।
अब ना कोई छू सकेगा, करनी से जता दिया ।

आज भारती गौरवान्वित हो, मुस्करा रही है ,
कश्मीर से कन्याकुमारी तक, एक नज़र आ रही है ।
'सुषमा' की प्रतीक्षा ने रंग दिखा दिया है ,
कश्मीर में तिरंगा फिर फहरा दिया है ।

अब घर के भेदी लंका नहीं ढा सकते ,
मनमानी कर, देश को बरगला नहीं सकते ।
बच्चों ने एकजुट हो बीड़ा उठा लिया है ,
मातृभूमि का फर्ज , सबने अदा किया है ।

शनिवार, 7 सितंबर 2019

चंद्रयान मिशन २०१९

कर्म और ज्ञान बांहों में पलते,
भारत भूमि सुंदर समन्वय है ।
राम, कृष्ण ने मार्ग दिखाया,
'गीता' सत्यम शिवम सुंदरम है ।

बालकृष्ण ने जिद थी ठानी,
चंद्रखिलौना लेने की ।
दृष्टि दिया था सकल जगत को,
चंद्र की राह पकड़ने की।

कवियों की कल्पनाओं का 'चंद्र'
शायरों की कलम ने कहा ' चाँद' ।
बच्चों का वो सुंदर मामा ,
अब दूर नहीं उसको पाना ।

लगे रहे दिन रात 'संत'
इस राह को सुगम बनाने को ।
दौड़ पड़ा था 'चंद्रयान'
चंद्रमा को गले लगाने को ।

अथक प्रयास, गूढ़ चिंतन
जो चंद्रयान यूँ दौड़ चला ।
जल है उस सुंदर गोले में ,
ये राज भी वो खोल चला ।

देश में जितने घोटाले हुए ,
उसका एक हिस्सा भी ना लगा ।
गर्व से तिरंगा साथ लिए ,
प्रेमी से मिलने आतुर हो चला ।

अथक प्रयास विज्ञान संत का ,
कभी वृथा नहीं जाएगा ।
अगली बार ' चंद्रयान' हमारा ,
चाँद पर तिरंगा फहराएगा ।

      "भारत माता की जय"

   शर्मिला चौहान

शुक्रवार, 21 जून 2019

औरतें

राधेश्याम ने आज छुट्टी का मन बना रखा है । कल बहुत रात तक टैक्सी चलाया था । आराम से सो कर उठा , फिर दोनों बच्चों के साथ मस्ती करते हुए समय निकाल रहा था ।

आशा की आवाज से वह बिस्तर पर से उठ बैठा ।
"आज टैक्सी निकालना नहीं है क्या ? चलो उठो , बिस्तर छोड़ो । नहाओ , खाओ और गाड़ी लेकर जाओ । एक दिन थोड़ा ज्यादा काम किया तो दूसरे दिन आराम करोगे क्या ? ऐसे में पैसे कैसे जमा करेंगे ? " चिल्लाकर आशा ने कहा ।

"हाँ -हाँ  , तेरे को ही फिक्र है सब । इतनी फिक्र है तो क्यों जाती है हर साल मायके ? एक बार में दस-बारह हजार का खर्चा । रेल टिकट कितनी मंहगी‌ है , ऊपर से मेमसाब को वातानुकूलित डिब्बा चाहिए  । यहाँ आदमी दिन भर कमा कमा कर परेशान....।" राधेश्याम ने बड़बड़ाते हुए कहा ।
" अरे ऽऽ.. पिछले साल भतीजे की शादी पड़ी थी , नहीं तो क्या हर बार इतना खर्च होता है । वो भी , शादी में बहू को जो दिया सो दिया , मेरे लिए तो रो-रोकर एक साड़ी ही लिए । कानों में झुमके पहनने का शौक मन में रखे जिंदगी बीत जाएगी । माँ-बाप को बोझ थी जो तुम्हारे गले बाँध दिया ।" रुआंसी हो कर आशा ने कहा ।

  "ठीक है बाबा , मैं चला गाड़ी लेकर । काम करके मरुँ , तो तुम झुमके पहनकर नाचना ।" गमछा उठाकर राधे ने चिल्लाते हुए कहा ।

पूरे समय आशा बड़-बड़ करके अपनी किस्मत को कोस रही थी ।
राधे तैयार होकर बिना कुछ खाए पीए घर से निकल गया । रास्ते में सोचा कि दादर स्टेशन से जरा इलाहाबाद की रेल टिकट की जानकारी कर लूंँ । मुंबई से उत्तरप्रदेश जाने वाली सभी रेलें बहुत जल्दी आरक्षित हो जाती हैं।

  आजकल काली-पीली टैक्सी का धंधा भी कम हो गया है । लोग  ओला-उबर गाडियाँ ले लेते हैं । वह भी अपनी इस टैक्सी को बेचना चाहता है , परंतु उससे लगाव के कारण फिर रूक जाता है  ।
  इस मुंबई शहर में दो समय की रोटी और  सिर छिपाने के लिए छत, इसी की बदौलत नसीब हो रही है ।

स्टेशन के सामने वाले चौक पर ही गाड़ी रोक दी । आज गुस्से से निकला था घर से , चाय नाश्ता भी नहीं किया । बारह बज रहे और पेट में कुछ गया नहीं । चाय की छोटी सी टपरी में जाकर , एक कप चाय और वड़ा पाव का बोलकर बैंच पर बैठ गया ।

अपने गाँव की याद में वो डूबने लगा । अम्माँ , बाबू और तीन बेटों का परिवार । बड़े भैया पढ़ लिखकर गाँव की शाला में शिक्षक हो गए । छोटा भाई दयाशंकर इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है । राधेश्याम दूसरे नंबर का बेटा है ।

  शुरू से ही उसका मन किताबों से ज्यादा कंचे , गुल्ली -डंडा और पतंगों में लगता था । कितनी ही बार बाबू ने इसी कारण उसे मारा -पीटा भी था । अनुत्तीर्ण होने का रिकॉर्ड बनाया था राधे ने ।
मैट्रिक की परीक्षा जब तीसरी बार में भी उत्तीर्ण नहीं कर पाया , तब बाबू का धैर्य सीमा पार कर गया ।

मेज़ पर लड़के ने चाय और वड़ा-पाव रख दिया ।चाय की प्याली मुँह में लगाकर सुड़कते  हुए वह आगे सोचने लगा ।

   अम्माँ , स्वर्ग सिधार गई और बाबू चिड़चिड़े हो गए थे । उसके साथ हाथापाई की ना ही उनकी उम्र रही थी और ना ही शक्ति ।

"अब तू अपनी रोजी-रोटी का देख । जा , अब मेरी छाती पर मूँग मत दल ।" उन्होंने हुक्म सुना दिया ।

फ़िल्मों के शौकीन राधेश्याम को अपना भविष्य मुंबई में ही दिख रहा था । एक छोटी सी पेटी और कुछ सपने लिए , बिना टिकट  राधे एक दिन मुंबई पहुँच गया ।

अपने चाय नाश्ते का पैसा देकर राधे वापस टैक्सी में आ बैठा । स्टेशन दूर से दिखाई दे रहा था लेकिन जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी । अभी तक हाथ में पूरे पैसे जमा नहीं हुए हैं और परिवार के साथ जाने में बहुत खर्च हो जाता है ।
आशा और बच्चों को राधे छोड़ आता है ससुराल जाकर , वापस वह हमेशा अपने भाई के साथ ही आती है ।

एकाएक , टैक्सी की खिड़की पर ठक-ठक हुई और वह चौंक गया। एक बूढ़ी अम्माँ थी । दक्षिण भारतीय वेशभूषा , एक बैग कंधे पर लटकाए चिल्लाई _ " अजी ऽऽ...ओ ऽऽ...। खोलो ना । गाड़ी चलाना नहीं है क्या तुमको ? गाड़ी खड़ा कर के सोने को आया इधर .. ।"

राधे ने दरवाजा खोल दिया । वो धड़ाके से टैक्सी में घुस गई । उसके बैग से मोगरे की खुशबू आ रही थी ।

" कहाँ जाना है अम्माँ ? " राधे ने पूछा ।

" हम तुम्हारा अम्माँ नहीं । हम किसी का अम्माँ नहीं है । महालक्ष्मी को जाता । तुमको मालूम , आज शुक्रवार , आज लक्ष्मी का दिन.....। " वो ना जाने क्या क्या बड़ बड़ कर रही थी ।

" ठीक है बाबा , गुस्सा मत करो।"
राधे ने गाड़ी स्टार्ट करके कहा ।

" मैं गुस्सा करती , मैं बड़ बड़ करती । मेरा हसबैंड भी येईच बोलता। पागल है वो ।" जरा सांँस लेकर उसने बात पूरी की _" मैं एवरी शुक्रवार महालक्ष्मी को जाके बोलती कि उसको  अभी लेके जा । दिनभर चिड़चिड़ करेगा  , सब जिंदगी खराब । मरेगा तो शांति मिलेगा ।" उसने इतनी आसानी से कहा कि राधे डर गया ।
"क्या तेज -तर्रार बूढ़ी है ये । " मन में सोचा कि आज दिन ही खराब है मेरा तो ।

  पिछली सीट पर आवाज हुई तो उसने देखा कि उस बूढ़ी अम्माँ ने कपड़े के थैले में से छोटा सा थरमस निकाला । उसमें से काॅफी निकालकर पीने लगी ।

अब मोगरे की भीनी खुशबू को काॅफी की तीव्र गंध ने ढंकने की कोशिश की । काॅफी पीकर अम्माँ कुछ शांत नजर आईं ।

  राधे टैक्सी चला रहा था और उसके कान अम्माँ की बड़ बड़ सुन रहे थे ।
"मेरा हसबैंड चल नहीं सकता ‌ पोलियो का असर था फिर लकवा भी मारा । बिस्तर पर पड़ा  सालों से । सरकारी नौकरी थी तो पेंशन मिलता है । मैईच लाती बैंक जाके । मैईच खुशामत करती , मेरे को गाली देता ।" अम्माँ न भड़ास निकाली ।

"आपके बच्चे नहीं हैं क्या साथ में ? " अनायास राधे पूछ बैठा ।

" नाम नहीं लेने का , मर गया सब बच्चा । दो बेटा है , दोनों अमेरिका में रहता । इंडिया आने को डरता है । " चेहरे पर मातृत्व की जगह नफरत ने ले ली ।
" पहले फोन करता , अभी साल में तीन-चार बार करता है । डरता है कि माँ बाप पैसा माँगेगा ।" स्वर में दुःख का आभास हुआ ।

रास्ते में टैक्सी रोककर वो नारियल खरीद लाई ।
" मंदिर के सामने तो लूटता है  सबको । दस का नारियल बीस में देता है । " कुछ देर रुककर बोली _ " आज  हसबैंड की काॅफी में नींद का गोली दिया । सोएगा , शांति मिलेगा । बाहर से ताला भी मारा  । अभी कोई टेंशन नहीं ।"

अचानक राधे को घूरते हुए अपना बैग कसकर बगल में दबा ली और जोर से बोली _" तू सब क्यों पूछता है । पैसा लेगा मेरा , मारेगा मेरे को । ठहर , पुलिस को बुलाती है मैं । बूढ़ी औरत देखकर लूट करेगा , बदमाश ऽऽ...। " और वह हाॅफने लगी ।

  राधे के हाथ पाँव फूल गए ।
" हे महालक्ष्मी माता , मैंने क्या किया ? इस बूढ़ी बला से मुझे बचा लो ।"
वह बोला _  " आप उतर जाओ । आगे ही मंदिर है । आगे गाड़ी नहीं ले जाता मैं । " घूरते हुए वह उतर गई ।
बैग बगल में दबाकर , बड़-बड़ करती तेजी से लोगों के बीच गायब हो गई ।
उसकी आवाज राधे के कानों में गूंज रही थी _ " बूढ़ी को मारकर पैसा लेगा , मैं मेरा पैसा नहीं देगी  ....। " और राधे की हिम्मत नहीं हुई कि वो भाड़े के पैसे माँग ले ।
मंदिर की ओर देखकर राधे ने हाथ  जोड़ा और फिर गाड़ी आगे बढ़ा दी ।

  थोड़ी दूर बाद ही एक लड़की, हाथ से टैक्सी रोकने का इशारा करते हुए सड़क पार कर रही थी । एक हाथ से फोन कान पर लगाए  , बात कर रही थी और दूसरे से टैक्सी रोकने की कोशिश कर रही थी ।

    किनारे पर टैक्सी रोकते हुए राधे ने देखा कि लड़की सुंदर थी ‌करीब तीस के आसपास की होगी।
गाड़ी का दरवाजा खोलकर , पिछली सीट पर आकर बैठ गई ।
  " कोलाबा " उसने बताया और फिर फोन पर व्यस्त हो गई ।

  राधे ने देखा , उसने पतला सा , छोटा-सा फ्राॅक जैसा पहना था । चेहरे पर मेकअप और गाढ़ी रंग की लिपस्टिक लगाए हुए थी ।

  " हाँऽऽ.. आज मुझे देर हो जायेगी । तुम खाना गरम करके खा लेना डार्लिंग । मुझे आने में दस तो बज ही जाएँगे । थोड़ी देर बाद फोन करूँगी । अभी दस मिनट के बाद मीटिंग शुरू हो जाएगी। मेरा फ़ोन बंद रहेगा । तुम घर जाते समय ब्रेड और दूध लेकर जाना । ओ.के. बाय....। " कहकर फोन बंद कर दिया ।

  उसने एक क्षण इधर उधर का जायजा लिया और फोन पर देखकर अपना मेकअप ठीक करने लगी ।

राधे को यह लड़की कुछ अजीब सी लगी । रोज सवारियांँ बिठाकर उसे शक्ल पहचानना आ गया था ।
दो मिनट रुक कर उसने फिर फोन लगाया । इस बार बहुत ही अदा और नखरे वाली आवाज में बोली _ " बस्स ..., पहुँच ही रही हूँ  , दस पंद्रह मिनट में । आज आॅफिस से हाफ डे लिया है सिर्फ तुम्हारे लिए । प्लीज़ सैंड मी द होटल्स नेम एंड रूम नंबर । "
 
दूसरी ओर से किसी ने कुछ पूछा और वह जोर से ठहाका मारकर हंस पड़ी _ " वो मेरा पति है ना बेचारा , सोचता है कि मैं दिन रात काम करती हूँ  । अपना घर खरीदने का भूत सवार है सिर पर । बोलता है  "अपना घर " लेंगे ।  हा हा हा..., मैंने दस बजे तक आने का बोला है । तब तक मीटिंग का बहाना ..हा हा...। " कुटिलता से हंस रही थी वो ।

  गाड़ी के स्टीयरिंग पर राधे का हाथ जम सा गया । उसका मन कड़ुवा हो गया।
उस लड़की के शरीर से आती इत्र की खुशबू उसको असहनीय लगने लगी ‌ वह गुनगुनाती हुई फोन पर मैसेज देख रही थी ।

  उसने जो पता बताया राधे ने उसे पहुँचा दिया । एक बड़ा और महंगा होटल था । टैक्सी रूकने पर वह उतरी और राधे के हाथ में एक बड़ा नोट पकड़ा दिया ।

वह तेजी से होटल के दरवाजे की ओर बढ़ गई । मुट्ठी में रखे रूपए , भाड़े से करीब दुगुने थे , परंतु उसे पैसे वापस लेने का फालतू समय नहीं था ।

   "कैसी औरत है ये ? घरवाला इतना प्यार और विश्वास करके काम पर भेजता है और ये है कि ..छी ऽऽ...। "  रूपये जेब में रख कर राधे ने गाड़ी आगे बढ़ा दी ।

   मुंबई का दिल है ये जगह । गेटवे ऑफ इंडिया , ताज होटल , एक से बढ़कर एक कैफे और फोर्ट में लगी दूकानें  , लोगों को आकर्षित करती हैं ।

  राधे ने याद किया कि जब वह शादी के बाद आशा को गाँव से पहली बार मुंबई लाया था । दोनों बहुत घूमे और मजा किए थे । फोटो भी खिंचवाई थी ।
  अब तो दो बच्चों के साथ निकलना ही नहीं होता । कितनी सवारियों को घुमाता है वो परंतु अपने परिवार के लिए ना समय और ना पैसा ही हो पाता है । किराया , किराना , बच्चों के खाने पीने और दवाईयों का ही खर्च भारी पड़ जाता है ।

   " ऐ... गाड़ी जरा किनारे पर लगा ना । पूरी सड़क खरीद कर लिया है क्या ? " बाजू से निकलते हुए कार वाले ने गुस्से से कहा ।
   " हाँ बाबा , लगा ही रहा हूँ , जगह तो मिले । " कहते हुए उसने एक किनारे टैक्सी खड़ी कर दी ।
सामने ही झुनका भाकर केंद्र है , सस्ता , स्वादिष्ट और ताजा खाना । राधे जब भी इधर की कोई सवारी मारता , इस जगह पर ही खाना खाता था ।

पेट भर खाना खाने के बाद टैक्सी लेकर राधे मेरीन ड्राइव की तरफ निकल गया । गाड़ी खड़ी करके खुद घूमने लगा ।

  शाम के पाँच बज रहे हैं, घूमने , चलने वालों का समय हो गया है।
वैसे तो मुंबई दिन रात चलती है , समय का ज्यादा असर नहीं पड़ता ।

  समुद्र की लहरों को देखते रहना , राधे को बहुत पसंद है ‌। उफनती लहरें तेजी से आकर , किनारों से टकराकर लौट जाती हैं । उनकी टकराहट का एक शोर हमेशा होता है । दूर दूर तक अथाह जलराशि , जो अंत में आकाश से मिलकर एकाकार हो जाती है ।
  जितनी हलचल सागर के सीने में रहती है , उतनी ही उसके किनारे पर लोगों में भी । शोर -शराबा और जिंदगी की तमाम हलचलें हमेशा नजर आती हैं ।

काॅलेज के कुछ लड़के-लडकियों का झुंड मस्ती का माहौल बनाए हुए हैं । फोटो खींचने और खिंचवाने की होड़ लगी हुई है । कुछ बुजुर्ग बैठकर मूँगफलियाँ और भूनें चने चबाने की कोशिश कर रहे हैं । साथ ही अपने हमउम्र साथियों का इंतजार कर रहे हैं ।

   कुछ लोग अपने परिवारों के साथ आए हैं । खाने पीने की चीजें , पानी की बोतलें रखें हैं ।
बच्चे किनारों पर दौड़ रहें हैं , कुछ गुब्बारों के लिए रोना धोना मचा रहे हैं ।

थोड़ी देर वहांँ बैठने के बाद राधे ने अपनी टैक्सी की ओर कदम बढ़ाए । सामने एक तीस-बत्तीस साल की औरत , बच्ची के साथ टैक्सी की तलाश में खड़ी थी । साधारण सी साड़ी पहने , चोटी बनाए , गले में मंगलसूत्र और हाथों में हरी चूड़ियां पहने वह हाथ से टैक्सी को रूकने का इशारा कर रही थी ।

बच्ची दस-बारह साल की होगी , सुंदर फ्राक पहने हुए थी । हाथों में गुब्बारे का गुच्छा लिए , बहुत खुश नजर आ रही थी ।

जैसे ही राधे को टैक्सी का दरवाजा खोलते हुए देखा , दौड़कर आई _ " भाऊ , सवारी घेता का ?  आम्हाला परेळ ला जायचं आहे । "

  " बैठिए " कहकर राधे ने गाड़ी स्टार्ट कर दी ।

उसने बच्ची को संभालकर बिठाया , फिर खुद बैठी । टैक्सी आगे बढ़ गई । बच्ची  थकी सी , कमजोर आवाज में बोली _ " आई , खूप दमले ग मी । तुझ्या मांडीवर झोपू का ? "
उसने पैर सिकोड़ कर, बच्ची का सिर अपने गोद में रख लिया और पैर  सीट पर सीधे करने लगी ।बच्ची के हाथ के गुब्बारे गाड़ी में इधर-उधर उड़ रहे थे ।

बच्ची के माथे पर हाथ फेरते हुए उसने अपनी आंखें बंद कर ली ।
  " आई आज माझं वाढदिवस , किती छान साजरा केला । खूपच मजा आली मला । पुढच्या वर्षी पुन्हा आपण असाच मजा करणार आहोत ना ।" बच्ची खुशी से बोली ।

उत्तर में उसने भरी आंखों से सिर हिलाया । गरम बूँदें बच्ची के चेहरे पर टपक पड़ी और वह उठ बैठी।

"  आई , कशाला रडते तू ? काय झालं , सांग ना मला पन ।" वह अपनी मांँ के आँसू पोंछ रही थी ।
" काही नाही बाळं , झोप तू  ।" उसने बच्ची को वापस लिटा दिया।

थोड़ी देर बाद बच्ची सो  गई शायद , क्योंकि अब उसकी आवाज नहीं आ रही थी । सिग्नल पर गाड़ी रूकी तो राधे ने सहज बोला _ " आप क्यों रो रही हो बहनजी ?  बच्ची को दुःख होगा , आज उसका जन्मदिन है लगता। "

  उसने राधे को एकटक देखते हुए कहा _ " रोना तो जन्म भर का है भाऊ  । बेटी है मेरी , बहुत बीमार है , टाटा अस्पताल में इलाज चल रहा है । आज वाढदिवस है तो स्पेशल मांग कर इसे बाहर घुमाने लाई थी । " उसकी आवाज भरभरा रही थी ।

" हे भगवान , दया करो । इतनी छोटी , फूल सी बच्ची को ऐसी बीमारी ? बहुत बुरा लग रहा है मुझे सुनकर । भगवान आप दोनों को शक्ति प्रदान करें , ताकि आप इस बीमारी से लड़ सको ।" आगे बात करते हुए कहा _ " इसके पापा साथ नहीं आए आज ? काम पर गए होंगे ।"

सिग्नल से आगे निकल कर टैक्सी सड़क पर तेज़ी से फिसलती जा रही थी और उस स्त्री की कहानी भी ।

" जब मेरी बेटी सिर्फ छ: महीने की थी , तभी मेरे पति ने मुझे छोड़ दिया था । उनको बेटा चाहिए था और हुई बेटी । बस इसी बात को लेकर रोज़ लड़ाई झगड़ा होता रहता था । छः महीने में उन्होंने मुझे छोड़ दिया और तुरंत दूसरी शादी कर ली । " एक लंबी सांस लेकर वह खिड़की से बाहर झांकने लगी । " तब से अपनी बेटी को माँ -बाप  दोनों बनकर पाला है मैंने ।"  उसने बात पूरी की ।

" डाक्टर क्या कहते हैं , बच्ची की बीमारी के बारे में ?"  राधे ने सहानुभूति से पूछा ।

  "  जब तक साँस है उम्मीद है भाउ । कपड़ों की सिलाई करती हूंँ  । उस अस्पताल में  बहुत से मरीज़ हैं , कोई अच्छा होता है , कोई नहीं । दिन रात मेहनत करूँगी , कोई कसर नहीं छोडूँगी  । " आत्मविश्वास से भरी माँ बोल रही थी ।

टैक्सी को अस्पताल से कुछ पहले ही रोकते हुए उसनेे कहा _ " बस बस  , यहीं रोक दो । इसको मौसंबी का रस पिलाकर ले जाऊँगी अस्पताल । "

" उठ बेटा , ताई ..। तुला मौसंबी रस आवडते ना । उठ मग , चल आपण रस पिऊन मग  जाऊया ।"
बच्ची ने सुना और उठ बैठी । वो दोनों उतर गए । पर्स निकाल कर भाड़ा देने लगी ।

  "  रहने दो बहनजी । आज बच्ची का जन्मदिन है । टैक्सी की एक छोटी सी सैर मामा की तरफ से तोहफा समझ लो । भगवान आप दोनों को हिम्मत दें , जिससे आप इस बीमारी को हरा सकें । " बच्ची की ओर देखकर राधे ने हाथ हिलाया और टैक्सी आगे बढ़ा दी।

" शक्ति का रुप है यह औरत ।" मन ही मन प्रणाम करते हुए वह सड़क पर देखने लगा ।

अभी अपनी सोच में डूबा , कुछ ही दूर चला था कि दो औरतें एकदम  सड़क के बीच में आ गयी , टैक्सी की ओर हाथ दिखाते हुए । राधे ने अचानक  , जोर से ब्रेक मारा ।

  गाड़ी से गरदन बाहर निकाल कर बोला _ " ये क्या कर रही हो ? कुछ हो जाएगा तो फिर टैक्सीवाले की आफत । ऐसे कैसे सड़क के बीच में आकर टैक्सी रोक रही हो आप ? "

  " आओ माई ..। " उसने राधे  के बातों की परवाह किए बिना ही साथ की बूढ़ी स्त्री को हाथ पकड़कर पिछली सीट पर बिठाने लगी ।

    " अरे बहनजी ... मुझे कोई सवारी नहीं लेनी है ‌ घर जा रहा हूँ  मैं । आप दूसरी टैक्सी देख लो । " राधे ने इंकार करते हुए कहा ।

" बस थोड़ी ही दूर जाना है भैया।माई की  तबियत ठीक नहीं है , जरा पहुँचा दो ना ।" उसने आवाज में विनम्रता लाकर कहा ।

माई को देखा तो राधे को अपनी अम्माँ की याद आ गई । करीब वैसा ही पहनावा , वैसी ही कद-काठी । सिर्फ अम्माँ के माथे पर लाल टीका और माँग में सिंदूर रहता था , ये माई नहीं लगाई है , शायद विधवा स्त्री हैं ।

उनके पास सामान भी था । एक पेटी , एक थैली और एक दो गठरियाँ ।

"  तबियत खराब है और इतना सामान लेकर अस्पताल जा रहे हैं ।" मन ही मन राधे ने सोचा और उस औरत को देखा जो डिक्की में सामान रख रही है ‌। उसके बैठ जाने पर राधे ने गाड़ी शुरू करते हुए पूछा _ " कहाँ जाना है ? "
"चलो , सीधे ही चलो । मैं रास्ता बता दूँगी । " उसने "कहाँ " का इस प्रकार उत्तर दिया ‌

कुछ दूर चलने के बाद माई की आवाज आई । कह रहीं थीं कि _ " लल्लन को आ जाने देती दुल्हन , दो चार दिन में आ जाएगा ना  । बुढ़ापे में इतना तो होता रहता है । बेटवा आ जाता , फिर ले चलती अस्पताल । आज ही क्यों लिए जा रही हो ? " धीमी और थकी आवाज थी ।

  " माई तुम समझती नहीं हो । अब गाँव गए हैं तो चार दिन लगेंगे या आठ , बता नहीं सकते । तब तक तुम्हाई तबियत और ना बिगड़ जाएगी ।" बहू ने  समझाया ।
"हमरी तबियत को कछु ना हुआ दुल्हन । अब अपनी घर -जमीन सब बेचकर तुम्हाए साथ आए । पुरानी बातें , पुराने लोगों की याद आ जाती है बस । मन उदास हो जाता है । और हमको कोई बीमारी नहीं है । लल्लनवा काहे फिर गाँव गया है ? " माई ने प्रश्न किया ।

  " भैय्या , आगे दाहिने से सीधे एक बड़ा बगीचा है , वहाँ तक चलो । आगे फिर बताऊँगी ।" बहू ने रास्ता बताया ।

  " गाँव के मकान जमीन के कुछ रुपए बचे थे , वही लाने गए हैं ‌। हिसाब -किताब सब पूरा करके ही आएँगे । यहाँ एक फ्लैट देखा है उसकी रजिस्ट्री भी करना है ।" बहू ने बताया _ " हमारी बात हो गई है उनसे । कहत रह, माई को सब आराम मिले चाही ‌। एही खातिर हम तोहके ले जा रहे माई ।" अपनी जुबान में उसनेे समझाया ।

राधे को लग  रहा था कि मानो आज उसकी गाड़ी में अम्माँ बैठी हैं । सादी सरल , प्रेम से भरी अम्माँ ।

  " यह देखिए , बगीचा आ गया । अब आगे किधर लूंँ ? राधे ने पूछा ।

  " बाएं लेकर , सीधे चलो । आखिरी गली का सबसे बड़ा मकान है ।" उसने बताया ।

" इधर अस्पताल का कोई बोर्ड भी नहीं लगाया ।" मन ही मन राधे सोचा ।

" लल्लन जबै आवेगा , हमको घर में ना पावेगा तब पूछताछ करेगा । एही खातिर कहत रहे कि  उहका आ जाए दे ।" शायद बुढ़ापे में अस्पताल जाने से डर रही थीं वो ।

जिस बड़े मकान का पता दिया वो सचमुच ही बहुत बड़ा था ।खुली जगह , बगीचा भी था । राधे ने टैक्सी रोक दी ।
  " कितना हुआ ? " उसने पैसे पूछे और बताने पर पर्स से पैसा  दे दिया ।

  वह डिक्की से सामान निकाल रही थी । ना जाने क्यों , राधे अपनी सीट से उठकर पीछे गया और माई को सहारा देकर उतारने लगा । एक बार उसको लगा कि यह अम्माँ का हाथ है ।

उस औरत ने फटाफट सामान गेट पर रखा । चौकीदार से बात की , रजिस्टर में दस्तख़त किए ‌ चौकीदार ने दरवाजा खोल दिया ।

हाथ पकड़कर वह माई को अंदर ले जाने लगा  और साथ ही कुछ सामान भी उठा लिया ।

खुले दरवाजे के अंदर का बोर्ड राधे ने पढ़ा ....
  " लक्ष्मी नारी निकेतन "
  राधे का सिर चकरा गया , दिल बेचैन हो गया । आखिर उसने इतनी पढ़ाई भी क्यों की , जिससे यह बोर्ड पढ़ गया ।

अनमने मन से , आज के दिन को कोसता हुआ राधेश्याम अब वापस अपनी संकरी गलियों की ओर बढ़ रहा था ।