सोमवार, 27 अगस्त 2018

" घोंसला "

सुबह से ही बड़ी वीरानी छाई है ,
रोजमर्रा की वो आवाजें , मानो काला पानी झेल रहीं हैं ।

चिक सरकाकर देखती हूँ,
नीम का फैला हुआ दरख़्त ,
जिसपर हंगामे हुआ करते थे ।

बया के घोंसले , फानूसो की तरह लटके थे ,
गरदन बाहर निकाल कर, दुनिया का मुआयना करते ,
वो मासूम चूजे-से बच्चे ।

अपनी चोंच में दबा दाना ,
मादा बड़े सलीके से खिलाती ।
आशियाने की मरम्मत ,
आनन फानन कर  डालती ।
घोंसले महफ़िल गुलज़ार किया करते थे ।

बड़ी डालियांँ , जमीन पर पड़ी छटपटा रही हैं ,
टूटे घोंसले ,बोझ तले कसमसा रहे हैं ।

कल तक रौनक थी जिनमें ,
आज अचानक बेनूर हो गए ।
परों की आहट से मैं चौक पड़ी ,
निगाहें  कमरे के रोशनदान पर अटक गई ।

बया के वो प्यारे बच्चे
मुझे देख जैसे मुस्कुरा रहे हैं ।
आज इस दुनिया को देखने के लिए ,
अपने परों को आज़मा रहे हैं ।।

" नज़्म"

कमरे में बेतरतीबी से असबाबो-सी यादें ,
घुसकर भीतर चंद को संजोने लगती हूँ ।
सुरखाब के पंख लगाकर, आसमां छूने की चाहत ,
गहराइयों में गोते लगाकर, मोती पकड़ने की कोशिश ।
अनजाने ही अल्फाजों को पिरोने लगी हूँ ;
आज किसी नई नज़्म को वजूद देने लगी हूँ ।

परदे हटाकर,साफ धूप से अठखेलियांँ ,
बरसों से बिछी गर्द , हथेलियों से पोंछना ।
टूटे-बिखरे ,बेकार के सपनों-सी चीजें ,
बटोरकर उन्हें , फिर नई दुनिया में खोने लगी हूँ ;
लगता है आज किसी नई नज़्म को वजूद देने लगी हूँ ।

चंद किस्से  कहानियांँ , परीलोक-से होते हैं ,
जहांँ अशर्फियों के पेड़ , सितारे जमीं पर सोते हैं ।
पुरानी जिल्द चढी़ , मोटी किताब को झटककर ,
फूंँक-फूँक कर पन्ने अलग करने लगी हूँ ;
लगता है आज किसी नई नज़्म को वजूद देने लगी हूँ ।