ये बारिश और वो बचपन , दोनों में बड़ा दोस्ताना है
बारिश के मौसम में अक्सर ,बचपन का आना-जाना है ।
कंधों पर बस्ते उठाए , चेहरों पर आशा सजाए
मौज से चप्पल चटकाते, भीगते हुए घर आ जाते ।
किताबों के भीगने का कोई ग़म नहीं होता,
कागज की नाव के साथ चलना कम नहीं होता ।
छतरी लेकर गरम चने बेचती थकी उम्र ,
उम्मीद से निहारता , मासूम-सा बचपन ।
चार मिलकर दस पैसों का इंतजाम कर पाते
चने हाथ में पकड़ने की होड़ में लग जाते ।
एक एक चने का सच्चा हिसाब होता था ,
कम ज्यादा होने पर बचपन रोता था ।
वह हिसाब दिमाग आज तक समझता नहीं
किसी किताब में कोई सूत्र मिलता नहीं ।
घटाऐं आज भी इठलाती हुई बरस जाती हैं
पानी से सबकुछ सराबोर कर जाती है ।
दिल का वो कोना रीता रह जाता है ,
अपने आप को जब सूखा ही पाता है ।
इस मासूम से कोने को थोड़ा मचलने दो।
इस बारिश में बचपन को पूरा भीगने दो ।