बुधवार, 12 जुलाई 2017

"बारिश और बचपन"

ये बारिश और वो बचपन , दोनों में बड़ा दोस्ताना है
बारिश के मौसम में अक्सर ,बचपन का आना-जाना है ।

कंधों पर बस्ते उठाए , चेहरों पर आशा सजाए
मौज से चप्पल चटकाते, भीगते हुए घर आ जाते ।
किताबों के भीगने का कोई ग़म नहीं होता,
कागज की नाव के साथ चलना कम नहीं होता ।

छतरी लेकर गरम चने बेचती थकी उम्र ,
उम्मीद से निहारता , मासूम-सा बचपन ।
चार मिलकर दस पैसों का इंतजाम कर पाते
चने हाथ में पकड़ने की होड़ में लग जाते ।

एक एक चने का सच्चा हिसाब होता था ,
कम ज्यादा होने पर बचपन रोता था ।
वह हिसाब दिमाग आज तक समझता नहीं
किसी किताब में कोई सूत्र मिलता नहीं ।

घटाऐं आज भी इठलाती हुई बरस जाती हैं
पानी से सबकुछ सराबोर कर जाती है ।
दिल का वो कोना रीता रह जाता है ,
अपने आप को जब सूखा ही पाता है ।

इस मासूम से कोने को थोड़ा मचलने दो।
इस बारिश में बचपन को पूरा भीगने दो ।

"बात क्या है ?"

हर शख्स परेशान है कि बात क्या है ?

बात को जानना , बात की तह तक जाना ,
बातों ही बातों में , बात का बढ़ जाना ।
पता नहीं , आखिर ये बात क्या है ?

बातें अधूरी रह जाती हैं , बातें अनकही कहलाती हैं
बात का उलझ जाना, बातों में गुम हो जाना
बातों में बहल जाना,मन में ही बतियाना ।
पता नहीं, आखिर ये बात क्या है ?

बात निकलती है तो दूर तक जाती है ,
बात बढ़ाओ तो बतंगड़ बन जाती है ।
बात  में दम होना, बातों का बेबाक होना ।
बात का अंदाजा लगाना, बातों को भूल जाना
पता नहीं, आखिर ये बात क्या है ?

बना लो वक्त रहते तो बात बन जाती है ,
बिगड़ते हालात में बात ही सांँझा कराती है ।
बात ही बात में ये बात निकल आई है ,
जज़्बात ही तो बात हैं, ये बात समझ आई है ।