बुधवार, 16 मार्च 2016

होरी खेलें रघुराई ।।

होरी की धूम मची है ,अवध में होरी खेलें रघुराई ।।

श्याम वर्ण रघुबीर सुहाए ,गौर वर्ण सब भाई ,
रंग-रंगीली भई री अयोध्या ,कौतुक करें सब माई ।
सरयू में केसर घुल गई ऐसे ,ह्रदय में साँसें समाई ,
कंगन-नग से निरखे जानकी ,नवधा भक्ति समाई ।।
अवध में होरी खेलें रघुराई ....।।

पिचकारी बड़ी कारीगरी की ,पंचधातु से बनाई ,
हीरा, पन्ना, मोती , माणिक ; नवरत्नों से सजाई ।
काया जो रघुबीर ने गढ़  दई ,पाँच तत्व है समाई ,
लोभ, मोह, सत ,रज गुण डाला ; प्रेम-सुधा बरसाई ।।
अवध में होरी खेलें रघुराई .....।।

जिसके रंग सारा जग रंगता ,रंग खेलें रघुराई ,
मुक्ति,  ज्ञान ,भक्ति के सागर , कर रहे ठुकुरसुहाई ।
खेल रे मनवा जी भर होरी, ऐसी होरी ना आई ,
राम साथ जो खेलें होरी ,धन्य वो लोग-लुगाई ।।
अवध में होरी खेलें रघुराई ...।।

होरी की धूम मची है ,अवध में होरी खेलें रघुराई ।
राम-सिया की फाग गा रहे ,चरण-कमल चित लाई ।।
            ।   "होरी है भई होरी है ।"

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