"परित्यक्त"
"साहब.. साहब! दरवाज़ा खोलिए।" कुछ देर घंटी बजाने के बाद भी जब घर का दरवाजा नहीं खुला तो काम सहायिका मंगली ने आवाज़ें देना शुरू किया।
"क्या हुआ साहब! इतनी देर तो कभी नहीं लगाते! अरे.. भगवान सब ठीक हो।" अनहोनी की आशंका, मंगली के चेहरे पर स्पष्ट थी।
कुछ देर बाद आमने-सामने के फ्लैट वाले, सोसायटी का वॉचमैन और सोसायटी सचिव ने पुलिस को इतला कर दिया।
पुलिस की गाड़ी सोसायटी में आते ही जितने मुँह उतनी बातें होने लगीं।
"बेचारा क्या करता, इतने दिनों से कोई ख़बर लेने वाला नहीं, अकेले ही काट रहा था ज़िंदगी।" एक ने सांत्वना भरे शब्द कहे।
"सुना है परिवार तो है परंतु कभी देखा नहीं, न कोई दोस्त न दुश्मन।" दूसरा पीछे कैसे रहता।
"अपनी पत्नी को भी छोड़ दिया था, लगता है किसी से बनती नहीं थी।" सामने फ्लैट वाली ने कुछ एक्स्ट्रा जानकारी दी।
"पीछे हटिए सब, जगह दीजिए। कुछ लोगों को छोड़ सब नीचे लॉबी में खड़े रहिए।" पुलिस अधिकारी ने सख्ती से सबको हटाया।
"कौन आता है रोज इस घर में?" पुलिस कांस्टेबल ने पूछताछ शुरू की।
"साहेब मैं मंगली, पिछले तीन सालों से काम करती। झाड़ू कटका, लादी पुसना करती। कभी-कभी साहेब के लिए दो भाकरी बना देती थी। साहेब बिना बोले उसका पैसा देते थे, बहुत अच्छा आदमी था साहेब।" मंगली ने आँखें पोंछते हुए कहा।
"था, क्या मतलब। क्या तुम्हें कुछ बोला था?" कांस्टेबल ने घूरते हुए पूछा।
"नहीं-नहीं साहेब, मेरे को कुछ नहीं बोला। साहेब बात ही नहीं करता था। कभी एक दो सबद बोलता था। वो इतने देर दरवाजा नहीं खोला तो मुझे लगा गया कि क्या।"वह सकपका गई थी।
दरवाज़ा तोड़ दिया गया और अपने पलंग पर शांत पड़े व्यक्ति की जाँच की गई। बिल्डिंग में रहने वाले एक डॉक्टर ने देखकर उन्हें मृत घोषित किया। बाद में सरकारी डॉक्टर ने भी बात की पुष्टि कर दी।
एक शांत, प्राकृतिक मृत्यु थी। अपने जीवन को साधारण रूप में जीने वाले इस व्यक्ति के आलमारी में मिली डायरी ने, लोगों के सामने उसके जीवन का एक-एक पन्ना खोल दिया।
सत्तर साल के इस व्यक्ति का नाम रोहित दिवेकर था। प्रसिद्ध शासकीय इंजीनियरिंग कॉलेज से पढ़ाई पूरी करके, दुबई में नौकरी करने लगा था।
शुरू से ही मेहनती, जिज्ञासु होने के कारण कंपनी के बेहतरीन इम्प्लॉइज में से एक बन गया।
"सर, मुझे अब भारत के किसी भी जगह में फिट कर दीजिए। दो साल हो गए हैं, माँ अकेली हैं वहाँ।" सुनील के निवेदन को स्वीकार करने में कुछ वक्त तो लगा परंतु सफल हो गया।
दिल्ली में रहकर काम करने की उत्सुकता, अपने देश वापसी का सुकून ही था जो अपेक्षाकृत कम पैसों में, उसने सहर्ष स्वीकार कर लिया।
"अच्छा हुआ बेटा, पैसे तो दो सालों में खूब कमा लिया। घर-मकान पक्का, बैंक में भी काफी जमा कर लिया है मैंने।" रोहित की वापसी पर माँ का दिल खुशी से झूम रहा था।
"पंद्रह दिनों बाद नए ऑफिस में जाना है। थोड़े पहले जाकर, घर देख लूंँगा किराए पर.. और हाँ अगली बार साथ लेकर जाऊंगा तुम्हें।" बेटे के स्नेह के आगे माँ लता का हृदय भर आया।
जीवन की हर तकलीफ़, हर दर्द झेलना, लता को सार्थक लगने लगा। सचमुच ईश्वर के घर अंधेर नहीं है। उसका विश्वास, उसकी सच्चाई और निश्छलता का फल, उसे यह बेटा दिया भगवान ने, जो सारे दुखों में उसकी लाठी बन खड़ा रहा।
अपने बेटे की खुशी के समय में भी, अपने तकलीफ़, दुःख भरे दिनों की यादें, लता को उस दिन भर परेशान करती रहीं।
"पलंग पर चढ़कर बैठी है, अपने को कोई अप्सरा समझती है क्या, उतर नीचे और जूते उतार मेरे।" अठारह साल की लता का, विवाह के बाद पहली रात पति सुनील ने स्वागत किया था।
सारे सपने एक झटके में चूर हो गए थे उसके। हृदय में बसी प्रियतम की तस्वीर चटक गई थी।
सहेलियाँ कहतीं, "बड़ी किस्मत वाली है तू तो, लड़के ने बिना देखे ही शादी के लिए हाँ कर दिया।" सुनील के माता-पिता आए और लता के साथ बेटे का रिश्ता तय कर गए थे।
"किस्मत वाली तो है ही लता बेटी, इसके जन्म लेते ही हमने पुश्तैनी जमीन का मुकदमा जीता था।" गर्व से कहते लता के पिताजी।
"अच्छा हुआ जो लड़का नहीं आया, जानबूझकर कौन अमावस की रात घर ले जाता है।" कहती हुई सौतेली मांँ की जुबान, एक क्षण भी नहीं काँपती।
काँप जाती थी लता, अपनी सौतेली माँ की अपने प्रति घृणा देखकर। तभी पिताजी का छलकता स्नेह उसे जीवन के प्रति स्थिर कर देता।
"अच्छा घर है बेटी, खाते पीते लोग हैं। सास ससुर को तो देख लिया तुमने, लड़का मैं देख आया था। शांत, थोड़ा चुपचाप सा था, अब शादी की बात में क्या ही बड़बड़ करेगा बेचारा।" पिताजी की बात उसके दिल में उतरती चली गई।
"जो दान-दहेज दे रहे हो शादी में, इसके बाद घर-मकान, ज़मीन पर कोई आशा मत रखना। जब आओगी-जाओगी तब भी तो लेना-देना करेंगे तुम्हारे पिताजी।" सौतेली मांँ ने अपना आँचल उससे समेट कर अपने दोनों बेटों पर फैला दिया।
मौन, शांत अपने भविष्य की कल्पना लिए दुल्हन बनी थी लता। सचमुच उसे ऐसा रंग क्यों दिया ईश्वर ने? इस स्याह रंग में उसके नैन-नक्शों की सुंदरता, हृदय की निश्छलता सब ढंक जाती थी।
"भगवान कृष्ण, राम जी सब ही तो साँवले थे बेटा। दुनिया उनको पूजती है ना, उनके कर्मों से, उनके गुणों से। गोरे-काले रंग से कुछ भी फ़र्क नहीं पड़ता, यही तो बताया ना मनुष्य बनकर।" पिताजी बोलते कई बार उसे।
"वो भगवान थे, पुरुष थे पिताजी, मैं एक साधारण लड़की। इस दुनिया का दृष्टिकोण दोहरा होता है, आप भी समझते हो।" ज़ोर से तो नहीं कह पाई लता परंतु मन में यही चलता था।
खैर, सौतेली मांँ के तीक्ष्ण बाणों को झेलकर, दिल पक्का होता जा रहा था उसका। बम्बई शहर से लगे, छोटे शहर में जा रही थी वो ब्याह कर, खुश थी कि कोई बड़ा शहर देखेगी, वरना गाँव के स्कूल से घर और कभी कभार हाट बाजार, बस यही देखा था।
पहली रात का आघात, धीरे-धीरे हर रात की बात हो गई। लगा सास-ससुर भी इसके लिए तैयार ही थे, उनके चेहरों पर कोई शिकन नहीं होती।
"तुझे बोलकर जाऊं कि कहाँ जा रहा हूँ, कितने बजे आऊंगा सब। अपना चौखटा देखा है, देखना तो क्या, थूकने का मन नहीं होता।" सास-ससुर तो कुछ दिनों बाद चले गए और पति से मिलता यह ज़हर रिस रिस कर, कोमल दिल में जमने लगा।
पिताजी की दो-तीन चिट्ठी आई, वो उसका हालचाल जानना चाहते थे। कैसे लिखतीं, क्या बताती कि उनकी किस्मत वाली बेटी को, किस्मत ने एक नर्क से महानर्क में पटक दिया है।
"पिताजी को चिट्ठी लिखनी है, एक अन्तर्देशीय ला दीजिएगा।" आइने के सामने अपने बालों पर, दस मिनट से कंघी फिराते सुनील से सहमी आवाज़ में कहा था लता ने।
"तेरे बाप का नौकर हूँ क्या, कि तेरा जो जी चाहे आर्डर कर रही है।" तमकते हुए उसने अपनी बड़ी कंघी लता के मुँह पर दे मारी थी। बिलबिला उठी थी और आँखों के कोर से गालों तक लाल रेखा खींच गई थी।
"सिर्फ नौकरानी है तू, घर का काम करना और पगार की जगह खाना मिलेगा दो टाइम, दोबारा कोई बात ना करना ना पूछना, वरना छोड़ दूँगा उसी गाँव में वापस।"
समझ गई लता विशेष है वह। होश संभालने के बाद से, अलग-अलग पाशविक शक्तियों को झेलने का अदम्य साहस जो दिया है भगवान ने।
अचानक, ज़ोर की हवा आई और टेबल के ऊपर रखी रोहित की तस्वीर फ्रेम गिर पड़ी।
"साहेब, फोटो गिर गई। अपना दुःख नहीं बताना होगा साहेब को।" मंगली की आवाज़ से डायरी पढ़ता पुलिस अधिकारी रुक गया।
"अंतिम संस्कार, अंतिम निर्णय लेने के पहले डायरी पढ़ना ज़रूरी है। इस व्यक्ति के हृदय का दुःख, उसकी तकलीफ़ शब्दों में दिखती है।" पुलिस अधिकारी ने कहा और डायरी आगे पढ़ने लगा।
मुश्किलों का नया दौर लता के लिए ज़्यादा कठिन था क्योंकि घावों पर अपने प्रेम का मरहम लगाने वाले पिताजी यहाँ नहीं थे।
एक दोपहर अचानक, गाँव से एक आदमी को साथ लेकर पिताजी इस घर में पहुंच गए। उन्हें अपनी बेटी से पत्रों के उत्तर की अपेक्षा थी जिसके पूरा ना होने पर मिलने चले आए।
घर के दरवाजे पर ताला लगा देखकर, वो विचलित हो गए। सामने की छोटी सी जगह पर बैठकर विचार करने लगे कि कहाँ गए होंगे।
"मेरी भी गलती है। पत्र लिखकर बताना था कि आ रहा हूँ।" अपने साथ वाले से कहते वो पछता रहे थे। गमछे से सिर माथा पोंछते हुए, आसपास से कुछ पूछते कि घर के अंदर से, कपड़े धोने की आवाज़ आई।
"घर में कोई है रघु।" कहते हुए उन्होंने दरवाजा खटखटाया, आवाज़ दी।
"घर पर कोई है क्या, मैं लता का पिता आया हूँ।"
बेटी की ख़बर की आशा से आवाज़ खुशी से भर गई।
लगातार खटखटाने के बाद, बगल की खिड़की चरमराई।
"मैं यहाँ हूँ पिता..जी..!" खिड़की से आई आवाज़ सुनकर दोनों व्यक्तियों ने उसी दिशा में कदम बढ़ाए।
खिड़की में एकदम पास-पास लगी, लोहे की मोटी-मोटी सलाखों के पीछे उनकी अपनी बेटी का चेहरा नज़र आया।
"बेटी लता, बाहर से बंद क्यों है तू? खिड़की से दिखती नहीं बेटा, उजाला कर।" बाप का करुण स्वर गूंज उठा।
"मैं अपनी किस्मत का फल भोग रही हूँ पिताजी। माँ सच कहती थी, अमावस को कौन ले जाता है? आपके तीन पत्र मिले थे, उत्तर दे नहीं सकी।" आवाज़ में स्थिरता, निर्मोहीपना और शुष्कता थी।
"जब रात को या कल सुबह आएंगे तो ही ताला खुलेगा, पहले खुला तो वो मुझे छोड़ देंगे। आप गाँव लौट जाओ पिताजी। माँ से कह देना, उनकी बात सही थी।" खिड़की बंद हो गई।
बूढ़ा बाप अपने दोस्त के कंधों पर सिर रखे रोता रहा, बंद खिड़की के पीछे भी दो आँखों ने समंदर बना दिया था।
नारकीय जीवन की एक रात लता के लिए कुछ अलग थी।
नशे में धुत्त, हाथों में मोगरे की माला लपेटे उसका पति परमेश्वर, आधी रात घर आया था। दरवाजे से अंदर घुसते हुए उसने अपनी पत्नी को जिन नज़रों से घूरा, किसी भी स्त्री के लिए अस्वीकार्य करने लायक था।
"खाना लाऊँ।" पैरों से जूते उतारते हुए, सहमी औरत पूछ रही थी।
"आज तू अपना चौखटा ठीक कर ले, तेरा उद्धार कर देता हूँ। तेरे बाप की आत्मा को शांति मिल जाएगी।" उसका एक-एक शब्द चिंगारी सा हृदय में घुसता चला गया।
जैसे ही चिंगारियों ने ज्वालामुखी का रूप धरा, मौन पर शब्दों के लावे ने अधिकार कर लिया।
"क्या हुआ पिताजी को, बोलो क्या हुआ ? तुमने उनका नाम क्यों लिया, बताओ?" उसके पैर को कसकर पकड़ते हुए लता चिल्लाई।
"छोड़ मेरा पैर, छोड़ साली, बदसूरत औरत।" विद्रोही औरत ने अपना आक्रोश, अपनी शक्ति से उस रीढ़विहीन प्राणी को जकड़ रखा था।
"मर गया तेरा बाप, मर गया। उसने तेरे जैसी बदसूरत को जन्म दिया, मुझे तो सिर्फ अपने माँ-बाप के लिए शादी करना था, जायदाद चाहिए थी उनकी। मेरी जान, मेरी लाली तो पहले से ही पत्नी की तरह रहती थी मेरे साथ।"
शब्दों के बढ़ने के साथ-साथ लता के हाथों का कसाव ढीला होता गया। वह निढाल हो कर वहीं गिर पड़ी। पिताजी का आना, खिड़की से देखना उसके दिमाग़ में चलता रहा।
पति के रूप में, उसके पिता ने जिस कथित आदमी के हाथों उसका हाथ रखकर, पवित्र जल डालकर सात जन्मों का बंधन बनाया था, उनकी मृत्यु का समाचार देकर वह आदमी आज उसके पति होने का धर्म निभा रहा था। निष्प्राण देह पड़ी थी, उसपर झुका आदमी किसी जानवर से कम नहीं था।
"उफ्फ़ भगवान! कोई इंसान ऐसा कैसे कर सकता है?" कहते हुए पुलिस अधिकारी के सामने खड़ी एक फ्लैट वाली आंटी रो पड़ी।
"देवा-देवा, कसा जानवर होता तो?" मंगली भी सिसक रही थी।
"ऐसे मानसिक रूप के अपराधी, कानून की पकड़ से बाहर रहकर मनमानी करते रहते हैं।" पुलिस अधिकारी ने कहा और आगे पढ़ने लगे।
लता के गर्भ में पड़ा बीज अंकुरित होने लगा और सुनील ने धीरे-धीरे अपना डेरा, उस औरत के घर बसा लिया जो उसे पसंद थी। अपने खुद के माँ-बाप से भी कभी कोई रिश्ता नहीं रखा, ना आना-जाना।
"घर में सब खत्म हो गया, चावल, आटा कुछ भी नहीं है। आप आते नहीं तो कुछ राशन भी नहीं लाते आजकल। मैंने तीन दिनों से कुछ नहीं खाया है।" अपने बढ़ते पेट पर हाथ फेरती भावी माँ, उस पुरुष की ओर आशा भरी दृष्टि से देख रही थी जो उसके होने वाले बच्चे का पिता है।
"तू बैठे-बैठे खा, इस पिल्ले को पाल, मैं कमाकर राशन लाऊं? मुझे यह घर बेचना है, खाली चाहिए। तू अपना सामान बाँध और जा अपने गाँव, मैं तेरे को छोड़ रहा हूँ। ये पैसे ले टिकट के और निकल जा।" अपने घर को देखता हुआ बोला, "कल इस समय आऊंगा तू नहीं दिखना चाहिए मुझे, वरना..इसको पेट में ही मरना होगा।" बोलकर लात से सामने पड़े खाली डिब्बे को मारते वह निकल गया। आज बाहर से ताला नहीं लगाया उसने।
अब लता से माँ बनने का सफ़र शुरू हुआ। अकेली, बेसहारा गर्भवती स्त्री, इस परित्यक्ता को कौन वाल्मीकि मिलता?
टिकट लेकर बस में बैठ गई, अनजाने से किसी गाँव में उतर पड़ी। गाँव के मंदिर की आरती में पहुँच गई, प्रसाद पेट में गया तो दिमाग भी चला।
अपना दुखड़ा सुनाया तो पुजारी के परिवार ने, मंदिर की साफ सफाई करने वाली अधेड़ स्त्री के साथ ही खोली में रहने की मंजूरी दे दी।
मंदिर की साफ सफाई, परिसर झाड़ना, लीपना सब करती थी लता, साथ ही फूलों की माला बनाकर बेचने भी लगी।
एक औरत अपने अंदर पलने वाले बच्चे को, हर हालत में जीवित, स्वस्थ रखना चाहती थी। मंदिर में आते जाते लोग उसे 'बेचारी' कहते, दबा हुआ रंग और पति से छोड़ी स्त्री की दयनीय स्थिति, समाज ही बनाता है।
रोहित का जन्म, उसकी प्राथमिक शिक्षा तक लता उसी मंदिर में रही। धीरे-धीरे, उसने अपनी स्कूली पढ़ाई का उपयोग करना शुरू किया।
शाम को सभी घरेलू लड़कियों, महिलाओं को मंदिर परिसर में प्रारंभिक शिक्षा देने की शुरुआत की लता ने। बदले में थोड़ा अनाज, सब्जी-भाजी, कभी कुछ सिक्के मिल जाते। रात को खोली के अंदर, लालटेन की रोशनी में लता गाँव की औरतों के लिए चोली सिलती।
छोटे रोहित के कई प्रश्न रहते थे, "माँ, दिन-रात काम ही करती हो, सबकी माँ ऐसा ही करती है क्या?"
"माँ, मेरे बाबा कहाँ हैं? वो कैसे थे? हमारे पास क्यों नहीं रहते, सबके बाबा तो रहते हैं।"
"माँ, शाला में गुरूजी मेरे बारे में बोल रहे थे कि "गरीब लड़का है बेचारा, इसके जन्म के पहले ही बाप ने इसकी माँ को छोड़ दिया था। बेचारी औरत, किस्मत की मारी।"
इन प्रश्नों को टालमटोल करती है लता ने, हाईस्कूल की परीक्षा के बाद, जवान होते बेटे रोहित को अपने और उसके जीवन का विषैला सच बताया था।
सुनकर रोहित के पाँव के नीचे की जमीन खिसक गई। पूरी दुनिया बदल गई उसकी। उसने अपनी माँ को हर क्षण खपते देखा था। झोंक दिया था उसने अपने आपको पढ़ाई में, यही एकमात्र उपाय था जिससे वह माँ को दुनिया की हर खुशी दे सकता था।
कसौटी पर हमेशा कसे जानेवाले लोगों को शायद हर कसौटी का हल भी ईश्वर ही देता है। एक स्त्री की अथक कसौटियों से जूझने की क्षमता से, आने वाली कसौटियांँ भी घबराने लगीं। गाँव के हाईस्कूल में टॉप करके, रोहित आगे पढ़ने के साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लग गया।
मंदिर की कुछ जमीन थी, छोटे टुकड़े पर लता ने अपना दो कमरे का घर बना लिया। अब भी वह प्राथमिक विद्यालय के बच्चों को, रोज़ शाम पढ़ाकर, समाज की सेवा करती थी।
"बड़े इंजीनियरिंग कॉलेज की फीस बहुत होती है। मैं कैसे कर पाऊंगी सब?" रातों को इसी चिंता से सोती नहीं थी वह।
आई.आई.टी. का परिणाम आया और ईश्वर ने सारी बाधाओं को दूर कर दिया।
गाँव का यह होनहार, भारत के अच्छे प्रौद्योगिकी संस्थान में प्रवेश के लिए तैयार था। लता गाँव में रहती और रोहित महानगर के हास्टल में, बहुत कम फीस भी लता के लिए अधिक थी और वह दिन रात सिलाई, मंदिर के कामों, घर के बने अचार, बरी, पापड़ सब कुछ ज़्यादा बनाने लगी।
"माँ, मेरी नौकरी लग गई है।" स्वर में उदासी थी रोहित के।
"अरे!! कितनी खुशी की बात है, इसी दिन के लिए हम मेहनत कर रहे थे ना। तू उदास क्यों है?" भगवान के सामने दीपक जलाते हुए लता बोली।
"मुझे दुबई भेज रहे हैं माँ। मुझे नहीं जाना भारत से बाहर, तुमसे दूर।" उसकी आँखों में आँसू थे।
"कैसी बातें करता है बेटा, सब बच्चे कामकाज के लिए जाते हैं ना। तू तो बड़ी किस्मत वाला है, अपने जन्म को सफल बनाने के लिए तो भगवान राम और कृष्ण ने भी अपने अपने घर-द्वार छोड़ दिए थे।" बेटे को ऊर्जा देती माँ का मन कच्चा हो रहा था।
दो साल में, दो बार आया था रोहित माँ से मिलने। बैंक में पैसे बढ़ रहे थे, लता के लिए सुख-सुविधाएंँ सब कर दिया था उसने।
आखिरकार, वह दिन भी आ गया जब दुबई से आकर रोहित अपनी माँ को लेकर दिल्ली चला गया।
पुलिस अधिकारी ने रूक कर आसपास की प्रतिक्रिया देखी। चुपचाप लोग उस डायरी की बातें सुन रहे थे।
"अच्छा हो गया बाबा, साहेब की माँ को अब जीवन में आराम मिल गया।" चमकती आँखों से मंगली बोली।
"घर में पानी हो तो एक गिलास पानी दो। देखो, सिर्फ़ पानी लाना और किसी चीज़ को इधर-उधर मत करना, हटाना सरकाना नहीं।" आदेश देकर वह आगे पढ़ने लगा।
लता के शुष्क जीवन में, बेटे ने उस स्नेह का सिंचन किया जिसके लिए वह बचपन से तरस रही थी। सारी सुख-सुविधाएं माँ के कदमों में देकर, अपने सान्निध्य का सुख देकर रोहित ने बेटे होने का धर्म निभाया।
बेटे का सुंदर घर, कार, पद-प्रतिष्ठा देखकर मांँ को उसके विवाह की चिंता होने लगी। रोहित के साथ काम करने वाली एक लड़की से उसकी नजदीकियों का आभास होते ही, लता ने खुले दिल से उसकी पसंद को अपनी बनाने पर सहमति जताई।
रोहित, कैसे कहता माँ से कि शोभना बहुत सुंदर है। उसका रंगरूप आकर्षक है। वह स्वयं को उसके आगे कमतर मानता है।
माँ को अपने शरीर के जिस रंग के कारण सारे जीवन बेरंग रहना पड़ा, उसके उसी रंग को रोहित ने शायद गर्भ से ही आत्मसात कर लिया था। शिक्षा, नौकरी, पैसे के बावजूद, अपने रंग से उसे एक प्रकार का डर, हीन भावना आती थी।
खैर, शोभना के बार-बार खुद पहल करने, विवाह का प्रस्ताव रखने पर, रोहित ने हामी भर दी। शोभना घर में आई और लता को जैसे दुनिया मिल गई।
एक परित्यक्त स्त्री का जब अपना परिवार पूरा होता है तब उसका पुनर्जन्म होता है।
विवाह के कुछ दिनों बाद ही शोभना, लगातार माँ के वापस गाँव जाने की बातें करने लगी। रोहित के मना करने पर आए दिन झगड़े होते।
बेटे का घर कैसे तोड़ सकती थी लता। जिसको एक-एक बूँद से सींचा था, उसको सूखने कैसे देती। एक दिन गाँव के घर, आसपास के लोगों से मिलने की उत्कंठा बताकर, वापसी की टिकट करवा ली। रोहित आया था छोड़ने, वापस लौटते समय उसका हृदय रीत गया था।
माँ से चिट्ठियों द्वारा लगातार संपर्क में रहता था वह।
साथ में रहने वाली संगिनी की अपने प्रति अरुचि, अनदेखी रोहित को कचोटती रहती। शोभना या तो बदल गई थी या सचमुच यही उसकी असलियत थी। घर में सब काम के लिए कामवालियांँ लगा रखी थी परंतु खुद घर में देर रात आती, खाना कभी खाती कभी नहीं। रोहित से बात करने का समय नहीं था उसके पास।
"ऐसा क्या हुआ तुम्हें शोभू, क्यों नाराज़ रहती हो। हम दो ही लोग हैं और वो भी बात कम करते हैं, ये ठीक नहीं है ना। तुम्हारे कहने पर माँ भी गाँव चली गई।" एक सुबह रोहित ने पूछा।
"क्या चाहते हो, गाँव की गंवार बनी तुम्हारे आगे-पीछे घूमती रहूँ। तुम्हारे बराबरी से कमाती हूँ, दब कर नहीं रहूंगी।" आइने के सामने होंठों पर लिपस्टिक लगाते हुए उसने उत्तर दिया।
"मैंने दबने, झुकने की बात ही नहीं की। हमारे आपस की बातचीत, संबंध इतना पराए से क्यों हो गए हैं?" रोहित ने प्यार से उसे समझाया।
"दूर हटो तुम, क्या सुबह-सुबह नाटक कर रहे हो। हूँ ना तुम्हारी बीबी, की है ना तुमसे शादी, यही पर्याप्त नहीं है क्या?" बैग उठाकर, चप्पल पहनती वह कार में बैठ गई।
पास की कुर्सी में बैठ गया रोहित। ये कैसी स्थिति है उसकी, यही प्रेम था इस औरत का जो साल भर भी नहीं टिका।
अनमना सा वह तैयार हुआ। आज ऑफिस जाने का बिल्कुल मन नहीं था। कार शोभना ले गई थी, उसके होंठों पर मुस्कान फैल गई।
सायकिल रिक्शे पर बैठकर बेवजह ही दिल्ली की सड़कें नापने लगा। लंबी-लंबी, अंतहीन, काली सड़कें सबको अपने गंतव्य तक पहुँचाने में सदियों से एक जगह स्थिर हैं। उनका संयम ही लोगों को मंज़िल तक पहुँचा रहा है।
रिक्शे से उतरकर यूँ ही भटकते हुए, एक रेस्टोरेंट में चला गया। आज सुबह से चाय भी नहीं पिया था उसने। एक टेबल पर बैठा वेटर के आने का इंतज़ार कर ही रहा था कि चिरपरिचित आवाज़ से कान सतर्क हो गए।
"पैसा है, नाम है तो काम बन रहा है वरना शक्ल रंग देखा है उसका। मेरे जैसी स्मार्ट लड़की उस के साथ चलती है तो कौए के चोंच मोती लगता है।" हँसने में एक मर्द की हँसी थी।
"कार, ऐशो आराम, नौकर सब है और क्या चाहिए। बाकी तो तुम हो ही मेरे।" एक-एक शब्द लावा बनकर कानों से दिल में उतरने लगा।
"बुड्ढी का क्या हुआ?" आदमी की आवाज़ थी।
"मर जाएगी, बीमार थी खूब। दो चिट्ठियां आई थी, मैंने फाड़ कर फेंक दी।" बेशर्मी से भरी हुई इस आवाज़ से जैसे भूचाल आ गया।
थरथराता, क्रोध से भरा रोहित उठकर बाहर आ गया। जेब में पड़े पैसे गिने और रेलवे स्टेशन की ओर निकल गया। जो भी पहली ट्रेन थी, टिकट लेकर बैठ गया।
"माँ, कैसी होगी? क्या हुआ था माँ को, इस औरत और ऑफिस के चक्कर में मैंने माँ को चिट्ठियां तो लिखीं परंतु जवाब ना आने पर गाँव क्यों नहीं गया?" अपने आपसे प्रश्न करते वह शाम को स्टेशन पर उतरा।
सवारी जीप में ठूँस कर, शीघ्र घर पहुँच जाना चाहता था। आसपास सूना था, दो-चार लोग आँगन में बैठे थे।
"अब आया रोहित, माँ तो गई रे बेटा।" बाजू वाले काका बोले।
"माँ गई, कहाँ गई काका? बोलो, कहाँ गई काका?" हकलाता हुआ सा रोहित बोला।
"हृदयाघात हुआ था, बस अस्पताल में चार दिन रही और कल भगवान के घर चली गई। कहती गई कि रोहित और बहू को अचानक मत खबर देना, घबरा जाएंगे।" काका की आँखें नम थीं जैसे परिवार की सच्चाई जानते थे।
निढाल होकर गिर पड़ा रोहित, सबकुछ छूट गया था आज। पैर के नीचे की जमीन, सिर पर से आसमान, ममता की छाँव और सब कुछ।
तेरहवीं तक रूककर अपनी अंतिम श्रद्धांजलि देते हुए, उसने घर जमीन सब मंदिर के नाम कर दिए। आने वाले समय में किसी भटकते अनाथ को सहारा तो यही से मिलेगा।
दिल्ली आकर अपनी नौकरी छोड़ दी, इसे तो वह खुद छोड़ सकता था, बाकियों ने तो उसे त्यज दिया था। कार, घर औने-पौने बेचकर, निकल गया। बहुत दूर जहाँ कोई अपना न हो, सिर्फ़ शांति हो, माँ की स्मृति हो।
"तेरी नौकरी दिल्ली लगी, मेरे को शुरू से बंबई देखने का शौक था रे रोहित। जाएंगे हम।" माँ ने एक दो बार कहा था उससे।
बंबई से लगे एक शहर में, एक छोटा फ्लैट खरीद लिया था। कुछ कपड़े, कुछ ज़रूरत का सामान और जीते तक दो समय खाने के लिए बैंक में पैसे थे। अब माँ की मुस्कुराती फोटो बैठक में लगी, बंबई का आनंद ले रही थी।
कुछ दिनों से तबीयत ठीक नहीं रहती, मंगली अच्छी स्त्री है। शांति से काम कर देती है, ध्यान रखती है मेरा। अगर कभी मेरी तबीयत ऊँच नीच हो जाए तो मंगली अंतिम संस्कार के पैसे ले लेना। माँ की फोटो के पीछे रखे हैं। मेरे इस घर में तुम अपने परिवार के साथ रहना, मैंने आलमारी में लिखित कागजात रख दिए हैं।
हम माँ-बेटा परित्यक्त थे, अपनों से, समाज से और भाग्य से, हमारा दोषी यह पूरा समाज है, सड़ी हुई सोच और बुरी मानसिकता।
डायरी बंद करके, पुलिस अधिकारी ने गहरी साँस ली। आगे कदम का कुछ सोचता कि बैठक में लगी फोटो के गिरने की आवाज़ आई।
सब दौड़कर बैठक में आए। फोटो पर अंतिम संस्कार के रूपए गिरे हुए थे।
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शर्मिला चौहान