शनिवार, 18 जनवरी 2025

1212 1212 1212 1212 पर ग़ज़लें

आदरणीय अनिल सर एवं आप सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏( संशोधित रूप)


फ़िलबदीह क्रमांक -34
पहला चरण 
मिसरा ए तरह- 
समझ रहा है ना-समझ कि दांव उसका चल गया।


1212  1212  1212 1212


समय था बंद मुट्ठी में, न जाने कब फिसल गया 
खड़ी मैं देखती रही, गुबार बन निकल गया।।1।।

अलाव रात भर जला, बची थी सुब्ह राख ही
पड़ी जो ओस राख पर, तो उसका दिल मचल गया।।2।।

कड़क रही थी धूप जब, बरस गए थे मेघ तब
शरद के श्वेत वर्ण पर, बसंत रंग मल गया।।3।।

जलाया खुद को धूप में, डटा था बारिशों में भी
तो एक वक्त रोटी से, मजूर क्यूँ बहल गया?।।4।।


कुदाल पकड़ी माँ ने जब, कलम थमा दी बेटी को
चमकती आस आँखों में नवीन स्वप्न पल गया।।5।।


तरही मिसरा- 

झुकाया संस्कार से, जो सर किसी के सामने 
समझ रहा है ना-समझ कि दाँव उसका चल गया।।

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1212  1212  1212  1212


जो अपनी धुन में मग्न है, मलंग जिसकी चाल है 
युगों को पाले अंक में, समय बड़ा विशाल है।।1।।

कदम थमे जो पल घड़ी, तो वक्त आगे बढ़ गया 
जो सोचा था मिला नहीं, तो मन में क्यूँ मलाल है।।2।।

दुखों में जो संभाल ले, खुशी में गीत बन बजे
दिलों का हौंसला बने, समय तो बेमिसाल है।।3।।

गवाह है ये सृष्टि का, विनाश हो सृजन हो या
जो न्याय इसके हाथ हो, वो न्याय का मिसाल है।।4।।

लहू तो फिर लहू ही है, कभी तो वो भी खौलेगा 
सफ़ेद वो हुआ नहीं, अभी भी रंग लाल है।।5।।

दबाये राज़ गाल में, 
समय तो आगे बढ़ गया 
पता नहीं उगल दें कब, कि क्या ही गोलमाल है।।6।।

कभी कठोर हो बड़ा, कभी दयालु सा लगे
मिज़ाज बदले हर घड़ी, इसी से सब बवाल है।।7।।

हमेशा दे ये कर्म फल, बड़ा ये न्यायधीश है
रखे नज़र सभी तरफ़, त्रिनेत्र इसके भाल है।।8।।

है आज जो वो कल नहीं, अनंत है तो बस यही
बने जो पल घड़ी प्रहर, ये काल का कमाल है।।9।।


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शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)400610
महाराष्ट्र 
9967674585

शनिवार, 4 जनवरी 2025

2122 2122 2122 212 पर ग़ज़लें

फ़िलबदीह-33

2122  2122  2122 212

क़ाफ़िया -अर
रदीफ़- कहना उसे

है हवाओं में यहाँ की वो असर कहना उसे
भा रहा मुझको अनोखा ये शहर कहना उसे।।1।।

सहमी सी आँखों में उसकी थे हज़ारों प्रश्न जो
पढ़ लिया करता था उसकी हर नज़र कहना उसे।।2।।

कुछ समय का साथ उसका, याद बनकर रह गया 
रंग भरने का उसी में है  हुनर कहना उसे।।3।।

 उसके जाते ही ये दुनिया फिर हुई ख़ामोश सी
चूड़ियों से था खनकता मेरा घर कहना उसे।।4।।

क्या लिखूँ बस सोचता हूँ शब्द होते मौन अब 
गीत ग़ज़लें नज़्म बनते बेबहर कहना उसे।।5।।


तरही मिसरा-

फ़िक्र में उसकी धुआँ होता रहा मैं रात भर
वो‌ न समझा है, न समझेगा मगर कहना उसे।


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2122 2122 2122 212

धरती से करता ठिठोली सूर्य आवारा मिला 
शाम को गठरी में बाँधे एक बंजारा मिला।।1।।


अंक में नव रश्मियों के खेलता नित मोद से 
खोल पलकें मुस्कुराता नन्हा वो प्यारा मिला ‌।।2।।


पर्वतों के शिखरों पर  बादलों का राज था
भोर सूरज का उन्हीं को स्वर्ण उजियारा मिला।।3।।


शाम को लहरें मचलतीं पार जाने के लिए 
डूबते सूरज को साथी एक मछुआरा मिला।।4।।


ओढ़ मेघों की रजाई ऊँघता करवट बदल
बारिशों में अनमना सा वो थका हारा मिला।।5।।


बदले तेवर जेठ के वो दीदे फाड़े देखता
होड़ देता आग को उसका बढ़ा पारा मिला।।6।।


मुट्ठी में आकाश भर के चूम लेती सूर्य को 
पर हथेली को मिरी बस टूटा इक तारा मिला।।7।।


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शर्मिला चौहान