आदरणीय अनिल सर एवं आप सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏( संशोधित रूप)
फ़िलबदीह क्रमांक -34
पहला चरण
मिसरा ए तरह-
समझ रहा है ना-समझ कि दांव उसका चल गया।
1212 1212 1212 1212
समय था बंद मुट्ठी में, न जाने कब फिसल गया
खड़ी मैं देखती रही, गुबार बन निकल गया।।1।।
अलाव रात भर जला, बची थी सुब्ह राख ही
पड़ी जो ओस राख पर, तो उसका दिल मचल गया।।2।।
कड़क रही थी धूप जब, बरस गए थे मेघ तब
शरद के श्वेत वर्ण पर, बसंत रंग मल गया।।3।।
जलाया खुद को धूप में, डटा था बारिशों में भी
तो एक वक्त रोटी से, मजूर क्यूँ बहल गया?।।4।।
कुदाल पकड़ी माँ ने जब, कलम थमा दी बेटी को
चमकती आस आँखों में नवीन स्वप्न पल गया।।5।।
तरही मिसरा-
झुकाया संस्कार से, जो सर किसी के सामने
समझ रहा है ना-समझ कि दाँव उसका चल गया।।
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1212 1212 1212 1212
जो अपनी धुन में मग्न है, मलंग जिसकी चाल है
युगों को पाले अंक में, समय बड़ा विशाल है।।1।।
कदम थमे जो पल घड़ी, तो वक्त आगे बढ़ गया
जो सोचा था मिला नहीं, तो मन में क्यूँ मलाल है।।2।।
दुखों में जो संभाल ले, खुशी में गीत बन बजे
दिलों का हौंसला बने, समय तो बेमिसाल है।।3।।
गवाह है ये सृष्टि का, विनाश हो सृजन हो या
जो न्याय इसके हाथ हो, वो न्याय का मिसाल है।।4।।
लहू तो फिर लहू ही है, कभी तो वो भी खौलेगा
सफ़ेद वो हुआ नहीं, अभी भी रंग लाल है।।5।।
दबाये राज़ गाल में,
समय तो आगे बढ़ गया
पता नहीं उगल दें कब, कि क्या ही गोलमाल है।।6।।
कभी कठोर हो बड़ा, कभी दयालु सा लगे
मिज़ाज बदले हर घड़ी, इसी से सब बवाल है।।7।।
हमेशा दे ये कर्म फल, बड़ा ये न्यायधीश है
रखे नज़र सभी तरफ़, त्रिनेत्र इसके भाल है।।8।।
है आज जो वो कल नहीं, अनंत है तो बस यही
बने जो पल घड़ी प्रहर, ये काल का कमाल है।।9।।
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शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)400610
महाराष्ट्र
9967674585