गुरुवार, 19 सितंबर 2024

1212 1212 1212 1212 पर ग़ज़लें

आदरणीय अनिल सर एवं आप सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏 


फ़िलबदीह क्रमांक 26
प्रथम चरण 
क़ाफ़िया - आर
रदीफ़ - कर
मिसरा-ए-तरह
यहीं हूँ आपके करीब देखिए पुकार कर 

1212 1212 1212 1212


चला गया बसंत कुछ समय यहाँ गुज़ार कर
बनी है फूल हर कली उसी से आँखें चार कर।।1।।

जला जो सूर्य तो लगी है आग सी गली गली 
हुआ पलाश लाल अब हरित वसन उतार कर।।2।।

हो दग्ध अपनी ही अगन से सूर्य बावरा फिरे
मिला घटा से तब कहा कि मुझसे अब करार कर।।3।।

फुहार बरसे मेघ की तने से लिपटी बेल है
है झांकता इधर-उधर   कभी तो बातें  चार कर ।।4।।

धवल शरद का चाँद है बयार मंद शीत की
मैं श्वेत कांस से हुई  कहे धरा पुकार कर।।5।।


तरही मिसरा-

चले हो क्यों इधर-उधर लगे किसी तलाश में 
यहीं हूँ आपके करीब देखिए पुकार कर।

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आदरणीय अनिल सर एवं आप सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा दूसरे चरण का प्रयास 🙏


फ़िलबदीह क्रमांक 26
दूसरा चरण 

1212 1212 1212 1212

जो अपनी धुन में मग्न है, मलंग जिसकी चाल है 
युगों को पाले अंक में, समय बड़ा विशाल है।।1।।

कदम थमे जो पल घड़ी, तो वक्त आगे बढ़ गया 
जो सोचा था मिला नहीं, तो मन में क्यूँ मलाल है।।2।।

दुखों में जो संभाल ले, खुशी में गीत बन बजे
दिलों का हौंसला बने, समय तो बेमिसाल है।।3।।


गवाह है ये सृष्टि का, विनाश हो सृजन हो या
जो न्याय इसके हाथ हो, वो न्याय का मिसाल है।।4।।

कभी कठोर हो बड़ा, कभी दयालु सा लगे
मिज़ाज बदले हर घड़ी, इसी से सब बवाल है।।5।।



हमेशा दे ये कर्म फल, बड़ा ये न्यायधीश है
रखे नज़र सभी तरफ़, त्रिनेत्र इसके भाल है।।6।।

है आज जो वो कल नहीं, अनंत है तो बस यही
बने जो पल घड़ी प्रहर, ये काल का कमाल है।।7।।


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शर्मिला चौहान

शुक्रवार, 6 सितंबर 2024

221 1222 221 1222 पर ग़ज़लें

आदरणीय अनिल सर एवं आप सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏 ( संशोधित)


फ़िलबदीह क्रमांक 25
प्रथम चरण 
वज़्न...
221 1222  221  1222

इस उजले से चंदा में, इक दाग सलोना है 
काजल से लगाया वो, मैयाँ का डिठौना है।।1।।

पागल हुआ मन‌ देखो, तृष्णा ही घुली हरदम
वो तृष्णा निकल जाए, मन इतना बिलोना है।।2।।

आदम की बुरी फितरत, पशुओं से हुआ नीचा
जब सामने हो नारी तब भाव घिनौना है।।3।।

माता-पिता या बीबी, हर मर्द गणित करता
होता न कभी हल ये, अनसुलझा तिकोना है।।4।।

कुछ कर्म तो हों सच्चे, जिनकी हो चमक असली
मोती से उन्हें अब तो, जीवन में पिरोना है।।5।।


तरही मिसरा-

चाहत के पिटारे को, खाली न कभी करना
मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है।।

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आदरणीय अनिल सर एवं आप सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏 

फ़िलबदीह क्रमांक 25 
दूसरा चरण 

221 1222  221  1222


जब भ्रूण का निज तन में, निर्धार करे नारी
तब सृष्टि सकल का फिर, विस्तार करे नारी।।1।।

मन चाँदनी सा उजला, तन लौह सदृश पक्का
भर भाव हृदय गागर, बौछार करे नारी।।2।।

नव पंँख से शिक्षा के, छूने लगी नभ सारा।
सपनों को प्रयासों से, साकार करे नारी।।3।।

व्रत कोई हो या उत्सव, सब रंग भरे लगते
परिवार सहित हरदम, त्यौहार करे नारी।।4।।

है शक्ति उपासक वो, अन्याय नहीं सहती
जब बढ़ते असुर जग में, संहार करे नारी।।5।।


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शर्मिला चौहान