आदरणीय अनिल सर एवं आप सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏
फ़िलबदीह क्रमांक 26
प्रथम चरण
क़ाफ़िया - आर
रदीफ़ - कर
मिसरा-ए-तरह
यहीं हूँ आपके करीब देखिए पुकार कर
1212 1212 1212 1212
चला गया बसंत कुछ समय यहाँ गुज़ार कर
बनी है फूल हर कली उसी से आँखें चार कर।।1।।
जला जो सूर्य तो लगी है आग सी गली गली
हुआ पलाश लाल अब हरित वसन उतार कर।।2।।
हो दग्ध अपनी ही अगन से सूर्य बावरा फिरे
मिला घटा से तब कहा कि मुझसे अब करार कर।।3।।
फुहार बरसे मेघ की तने से लिपटी बेल है
है झांकता इधर-उधर कभी तो बातें चार कर ।।4।।
धवल शरद का चाँद है बयार मंद शीत की
मैं श्वेत कांस से हुई कहे धरा पुकार कर।।5।।
तरही मिसरा-
चले हो क्यों इधर-उधर लगे किसी तलाश में
यहीं हूँ आपके करीब देखिए पुकार कर।
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आदरणीय अनिल सर एवं आप सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा दूसरे चरण का प्रयास 🙏
फ़िलबदीह क्रमांक 26
दूसरा चरण
1212 1212 1212 1212
जो अपनी धुन में मग्न है, मलंग जिसकी चाल है
युगों को पाले अंक में, समय बड़ा विशाल है।।1।।
कदम थमे जो पल घड़ी, तो वक्त आगे बढ़ गया
जो सोचा था मिला नहीं, तो मन में क्यूँ मलाल है।।2।।
दुखों में जो संभाल ले, खुशी में गीत बन बजे
दिलों का हौंसला बने, समय तो बेमिसाल है।।3।।
गवाह है ये सृष्टि का, विनाश हो सृजन हो या
जो न्याय इसके हाथ हो, वो न्याय का मिसाल है।।4।।
कभी कठोर हो बड़ा, कभी दयालु सा लगे
मिज़ाज बदले हर घड़ी, इसी से सब बवाल है।।5।।
हमेशा दे ये कर्म फल, बड़ा ये न्यायधीश है
रखे नज़र सभी तरफ़, त्रिनेत्र इसके भाल है।।6।।
है आज जो वो कल नहीं, अनंत है तो बस यही
बने जो पल घड़ी प्रहर, ये काल का कमाल है।।7।।
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शर्मिला चौहान