बुधवार, 17 मई 2023

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( आदरणीय सर के सुझावों पर संशोधित ग़ज़ल) ( मिली खाक में मोहब्बत..)

1121 2122  1121 2122


डरा सा दिखे हमेशा, रहे मौन ये बश़र है
सहे घात सारे जीवन, बड़ा ही विकट समर है ।।1।।

रखे बाँधकर थे रिश्ते, लगे दूर बिखरे बिखरे
लगा खोजने मेरा मन, रही कौन सी कसर है।।2।।

जो बिना कहे समझ ले, पढ़े दिल की बात दिल से
बड़ी पारखी सी रहती, वो जो माँ की इक नज़र है।।3।।

 थे जो बाग ताल पोखर, नहीं  दिखते अब यहांँ सब
बिना उनके सूना सूना, पड़ा ये बड़ा शहर है।।4।।

कली दिल की खिल गई जब, मधुमास सा लगे सब
खुली आँखें बुनती सपने, तेरी प्रीत का असर है।।5।।

करे दूर तम के साए, खुले द्वार ताके रवि को
भरे आस सबके मन में, ये तो भोर का पहर है।।6।।

बने कागज़ों से कश्ती, चली थोड़ी डूबी फिर वो 
जहांँ खेलता था बचपन, नहीं अब वहाँ नहर है।।7।।


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शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)

सोमवार, 15 मई 2023

काके लागूं पाय (व्यंग्य)

"काके लागूं पाय" (व्यंग्य)


अपनी इकलौती सफ़ेद कमीज़ पहने, कंघी से बालों को लच्छेदार बनाते हुए अच्छे लाल ने पत्नी से कहा,"आज का दिन शुभ है, हमारे सितारों का भाग्यांक प्रतिशत बहुत बढ़िया है। लाओ नाश्ता कर के चलूंँ, देखें कुछ काम आज बन भी जाय।" उनका बोलना खत्म होने के पहले ही पत्नी उमा ने, दो रोटी गुड़ की डली के साथ प्लेट में धर, सामने पटक दिया।
"काम से तो तुम्हारा नाता नहीं है नाता तो बस हमारे से जोड़ लिया। माथा खराब था हमारे बाप का जो तुम्हारे टूटे फ़ूटे बड़े घर को देख ब्याह गए।" छिली फटी दीवारें, बोझ से दबी कराहती दिखतीं ईंटों की ओर अँगुली दिखाती उमा बिफर पड़ी।
"अरे, अब जा ही तो रहें हैं। तुम भी बस भरी पड़ी रहती हो, शत्रु दिखा की तोप बरसाने को तैयार।" सूखी रोटी, गुड़ देख अच्छे लाल ने बिना खाए जाने में ही भलाई समझी।
"पाय लागूं अम्माँ।" आँगन में बैठी, धूप का आनंद लेती अम्माँ के चरणों को छूने लगा अच्छे।
"हमाए पाय काहे लग रहे बेटवा, जाओ उसके लगो जिसे ब्याह कर हमाए सिर मढ़ गए तुम्हाए बापू।" अम्माँ ने बुरा सा मुँह बनाया और अपने पैर सिकोड़ लिए।
अच्छे ने बरामदे में लटकी बड़ी दीवार घड़ी को देखा, चम्मच सा काँटा दोनों कोनों के बीच नाच रहा था। कमरे की चौखट से उमा घूर रही थी और आँगन में अम्माँ। 

बात ऐसी है कि घरवालों को कद्र नहीं थी अच्छे के अच्छाइयों की, उनकी साख तो बाहर वालों में जबर्दस्त थी। उनके बिना तो पूरा मोहल्ला निष्प्राण रहता। 
चाय की टपरी पर अच्छे लाल की बिरादरी का मजमा लगा हुआ था।
"आओ आओ अच्छे भैया। अरे, बड़ी देर से निकले आज। हम सब आप ही का रास्ता देख रहे हैं।" किशोर बोलने लगा।
"दे भाई सबको कटिंग चाय पिला और अच्छे भैया का हुकुम हो तो गरम समोसे भी चलेंगे।" गोविन्दा ने टपरी वाले मुन्ना से कहा।
"अच्छे भैया आ जाते हैं तो हमारी टपरी में बहार आ जाती है।" खींसे निपोरता  मुन्ना, सुबह से सैकड़ों बार खौली चाय को फिर से खौलने के लिए चढ़ा दिया।
"समोसा भी दे मुन्ना और भजिया भी, आज हम नाश्ता नहीं किए हैं।" अच्छे लाल ने खाली की हुई कुर्सी पर बैठते हुए कहा।
कुर्सी के लिए पागल दुनिया में अच्छे की अच्छाई का प्रताप था कि आज भी उनके ये दोस्त कुर्सी खाली कर देते हैं।
"लखनवा नहीं दिख रहा, कहाँ है रे।" अच्छे ने चारों ओर नज़र घुमाई। अपनी बिरादरी का ध्यान रखना हर लीडर का दायित्व है।
"भैया आपको नहीं मालूम, लखन की नौकरी लग गई है। मुंबई जाएगा आज रात, कोई कंपनी में काम मिला है।" आँखें चमकाते हुए गोविन्दा कह पड़ा।
"हमको नहीं बताया लखनवा, चलो भली करें रामजी।" अच्छे ने चाय सुड़कते हुए कहा।
कल ही तीनों किराएदारों से किराया ले लिया था सो आज जेब भी भरी है। अरे भाई, जब भाग्य का प्रतिशत बढ़िया हो तो फिर क्या पूछना।

"आज वकील से मिल आते हैं।‌ बरसों से थोड़ा किराया देने वालों से निजा़त पाना ही होगा। नए किरायेदार रहेंगे तो दोगुना किराया तय कर देंगे।" अपने मित्रमंडली से कहते हुए, अच्छे लाल की आँखें में भविष्य के सुनहरे सपने तरंगित हो रहे थे।
"जब रेंट ज़्यादा तो ख़र्च भी तो बढ़ ही जाएगा ना। तब एक दर्जन सफेद कमीज़, दो-चार जोड़ी नए जूते, एक घड़ी, और अम्माँ के लिए रेशमी साड़ी भी लें लेंगे। उमा को सोने की चूड़ियांँ पहनने का बड़ा मन है, बस बढ़े किराए से एक एक चीजें खरीद लेंगे।" अंतहीन लिस्ट के बीच में दोस्तों ने झिंझोड़ कर कहा, "चलो भैया हम तो चले, जरा कुछ काम है।" सब निकल गए और टेबल पर रखा बिल फड़फड़ा रहा था।
अच्छे लाल ने, अच्छे मन से, अच्छे लोगों के खाने का, अच्छा सा बिल पटा दिया। 
टपरी वाले मुन्ना ने एक बड़ी सी सलामी ठोक दी।
"इसके आने से धंधे में बरकत है भाई। बाप दादा के बनाए घर के किराए पर ऐश करता और कराता है।" पलटकर उसने अच्छे को हाथ दिखाया, "भैया फिर आइएगा।" 
सामने सड़क के उस पार मंगल काका अपनी दुपहिया को आड़ा कर चालू करने की पुरजोर कोशिश कर रहे थे।
लपक कर अच्छे लाल सामने पहुँच गए। 
"पाय लागूं काका।"
मंगल काका एक क्षण घूरते रहे फिर अपने पैर पीछे हटा लिया। 
"हमारे पैर ना छुओ अच्छे! जरा अपनी महतारी, मेहरारू का सोचो ‌ दिन रात बेकार के दोस्तों को भिनकाए रखते हो।" काका ने स्टार्ट किया और एक बार में ही स्कूटर भुर्रर चल पड़ी। 
"आज तो हम जिनके पांँव पकड़ रहें हैं वही दिल तोड़ कर निकल जाता है।" आशीर्वाद की इच्छा को रुमाल में बाँध अपनी जेब में रख लिया। सामने मंदिर की घंटी बजी और अच्छे ने सामने देखा, पुजारी जी को देखकर उधर ही लपक लिए।

"जय राम जी की पुजारी जी।" अच्छे लाल तपाक से पुजारी जी के चरणों में झुक गए।

पुजारी जी, ऐसे छिटक कर दूर हट गए मानो बिजली का नंगा तार छू लिया हो।
"दूर हटो! अभी अभी स्नान करके चले आ रहें हैं। भोग लगाना है भगवान को। हमारे पैर ना छुओ, जाओ भगवान का मंदिर है उन्हीं के पाँव पकड़ो।" 
हाथ को जस का तस धरे अच्छे ने सिर ऊपर उठाया, तब तक तो पुजारी जी गर्भ गृह में प्रवेश कर चुके थे।

उठकर अच्छे ने इधर उधर देखा, किसी ने कुछ देखा नहीं था। अपनी कमीज़ की सिलवटों को, हथेली से झटक कर ठीक किया और मंदिर के अंदर चले गए।
नटवर, नंदलाल पीले रेशमी वस्त्रों में, मुकुट बैजयंती माला का शृंगार किए हुए चैन की बंसी बजा रहे थे। पुजारी जी ने माखन मिसरी, फल, मिठाई उनके सामने सजा दिया।
"हे भगवान! आप तो अंतर्यामी हैं। हमें कुछ ऐसा आइडिया दे दें कि हम आराम से जीवन बिता सकें। आपकी तरह फल, मेवा खाते रहें और चैन का जीवन जिएँ।" अच्छे ने इधर उधर देखा और बुदबुदाए, "अम्माँ और उमा को सद्बुद्धि दें प्रभु, उन्हें लगता है कि हम काम ही नहीं करते।" हाथ जोड़े आँख बंद किए अच्छे लाल ने, गोपाल के सामने दिल खोल कर रख दिया।
"भगवन, मित्र मंडली तो आपकी भी थी। मित्रो के लिए क्या क्या करना पड़ता है आपसे बेहतर कौन जानेगा प्रभु।" खंखार कर गला साफ किया ताकि स्पष्ट आवाज़ प्रभु तक पहुँचे।
"आपने दही माखन चुराया, खेल खेल में जमुना में कूद पड़े, रास रचाया, सब दोस्तों के साथ ना। हमने किराए का आधा पैसा मित्रों पर खर्च किया, तो कौन सा जुल्म हो गया।" ईश्वर से आशीर्वाद लेने के लिए अच्छे लाल जैसे ही फर्श पर टिकते, घंटी बजने लगी। सामने देखा तो पुजारी जी ने परदा खींचकर, कन्हैया को छुपा दिया था।
"हे भगवान! हम साष्टांग दंडवत करते कि पहले ही आप अंतर्धान हो गए। और ये क्या, आपको भी लोगों से छिपकर खाना पड़ रहा है।"  कदम पीछे पीछे लेते अच्छे मंदिर से बाहर आ गए।
देखा तो सामने वकील साहब थे। 
"नमस्कार वकील साहब, आप ही की तरफ़ आ रहे थे।" वकील साहब का गर्मजोशी से अभिवादन करते हुए अच्छे लाल ने कहा।

"क्या खाक आ रहे थे, फालतू केस ले आते हो। दो केस हार गए तुम्हारे चक्कर में, फटीचरों की टोली लिए घूमते हो और फीस के नाम पर उस टपरी में चाय पिलाते हो।" आग बबूला हो रहे थे वकील साहब।
"तुम्हारे पिताजी की साख थी जो तुम्हारे केस ले लिया करते थे। अब नहीं होगा हमसे। हमारा भी घर परिवार है, तुम्हारे जैसे निठल्ले घूमने के दिन आ जाएंगे।" कहते हुए वे झटके से मंदिर में घुस गए।
अब तो अच्छे लाल के सपनों का महल चूर-चूर हो गया। 
ना ये वकील केस लेगा, ना किराएदार घर खाली करेंगे, ना नया रेट मिलेगा..।‌ लटकती दर्जन भर कमीज़ें, वो जूतों की जोड़ियांँ सब आँखों के सामने नाचने लगीं।

आज तो हमारा भाग्यांक प्रतिशत बढ़िया था, सुबह से किसी का आशीर्वाद तक ना मिला। दुःखी अच्छे लाल ने, हारे थके कदम आगे बढ़ाए थे कि कोने में बैठे एक वृद्ध व्यक्ति के गीत ने रोक लिया।
तंबूरा पकड़े वह गा रहा था, "गुरू गोविंद दोउ खड़े, काके लागूं पाय..।"
अच्छे लाल लपक कर उसके सामने चले गए।  आव देखा ना ताव, चरण धर कर प्रणाम करने लगे।
वृद्ध भिखारी ने पैर सिकोड़ते हुए कहा, "कुछ दान दक्षिणा हो तो डालो। पाँव छू लोगे तो मेरा पेट नहीं भरेगा।" 
अच्छे लाल को दिन में तारे नज़र आने लगे। क्रम में जमे वो सभी, मुस्कुरा कर अच्छे लाल के भाग्यांक का प्रतिशत बना रहे थे।


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शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
9967674585