कठोर लाॅकडाउन के बाद अभी कुछ दिनों से थोड़ी छूट मिली। पिंजरे में बंद पंछी की तरह महसूस कर रहे थे मोहन बाबू। अपने आठ साल के पोते को साथ लिए सोसायटी के बाग में बैठे थे। पोता जय, झूलों पर झूल रहा था और थोड़ी देर घूमने के बाद मोहन बाबू बैंच पर बैठ गए। जून की उमस भरी शाम में पेड़ों से छनकर बहती हवा, एयरकंडीशनर की थकी हवा से ज्यादा आनंद दायक लग रही थी।
साथ में लाया समाचार पत्र खोल कर फिर से पढ़ने लगे। पिछले दिनों हथिनी की हत्या के समाचार से व्यथित थे मोहन बाबू क्योंकि प्राणियों से विशेष लगाव था उन्हेें। जब शहर के चिड़ियाघर में पेंगुइन लाए गए थे तो सपरिवार उसे देखने गए थे। चिड़ियाघर के उस भाग को उत्तरी ध्रुव की तरह बनाने का प्रयास किया गया था। बर्फीली पहाड़ियों और ठंडे पानी के कृत्रिम ताल बने थे।
"कैसे रहेंगे ये पेंगुइन? प्राकृतिक ठंडे, बर्फीले जगह के निवासी हैं।" मोहनबाबू की चिंता जायज थी क्योंकि उनमें से एक पेंगुइन, संक्रमण से मर गया था।
"दादाजी, ये पींगु तो चुपचाप एक कोने में बैठे हैं।" पोते के प्रश्न पर उसकी उम्र के अनुसार समझाया था दादा ने।
पेंगुइन के आने से चिड़ियाघर की आमदनी बढ़ गई थी।
मोहन बाबू उठ खड़े हुए, शाम के साथ ही बाग से निकलने का समय है गया।
"जय, चलो बेटा। क्या कर रहे हो?" बाग के एक कोने में बैठे जय को देखने दादाजी गए।
"दादू, इसे भूख लगी थी। मुझे देखकर कूँ कूँ करने लगा।" जय के हाथों में कुत्ते का छोटा सा पिल्ला था।
अपनी जेब से बिस्कुट निकाल कर, छोटे टुकड़े करके जय उसके मुँह में डाल रहा था। कुत्ते का पिल्ला, प्यार से उसकी गोद में बैठा था।
मोहन बाबू को, शाम के सूरज की लालिमा में प्रेम की चमक दिखाई दे रही थी। न जाने क्यों, वे अपने को डिटाॅक्सिक महसूस कर रहे थे।
शर्मिला चौहान