शनिवार, 26 जून 2021

साहित्य संवेद हेतु

"डिटाक्सिन"


कठोर लाॅकडाउन के बाद अभी कुछ दिनों से थोड़ी छूट मिली। पिंजरे में बंद पंछी की तरह महसूस कर रहे थे मोहन बाबू। अपने आठ साल के पोते को साथ लिए सोसायटी के बाग में बैठे थे। पोता जय, झूलों पर झूल रहा था और थोड़ी देर घूमने के बाद मोहन बाबू बैंच पर बैठ गए। जून की उमस भरी शाम में पेड़ों से छनकर बहती हवा, एयरकंडीशनर की थकी हवा से ज्यादा आनंद दायक लग रही थी।
साथ में लाया समाचार पत्र खोल कर फिर से पढ़ने लगे। पिछले दिनों हथिनी की हत्या के समाचार से व्यथित थे मोहन बाबू क्योंकि प्राणियों से विशेष लगाव था उन्हेें। जब शहर के चिड़ियाघर में पेंगुइन लाए गए थे तो सपरिवार उसे देखने गए थे। चिड़ियाघर के उस भाग को उत्तरी ध्रुव की तरह बनाने का प्रयास किया गया था। बर्फीली पहाड़ियों और ठंडे पानी के कृत्रिम ताल बने थे। 
"कैसे रहेंगे ये पेंगुइन? प्राकृतिक ठंडे, बर्फीले जगह के निवासी हैं।" मोहनबाबू की चिंता जायज थी क्योंकि उनमें से एक पेंगुइन, संक्रमण से मर गया था।
"दादाजी, ये पींगु तो चुपचाप एक कोने में बैठे हैं।" पोते के प्रश्न पर उसकी उम्र के अनुसार समझाया था दादा ने। 
पेंगुइन के आने से चिड़ियाघर की आमदनी बढ़ गई थी।
मोहन बाबू उठ खड़े हुए, शाम के साथ ही बाग से निकलने का समय है गया।
"जय, चलो बेटा। क्या कर रहे हो?" बाग के एक कोने में बैठे जय को देखने दादाजी गए।
"दादू, इसे भूख लगी थी। मुझे देखकर कूँ कूँ करने लगा।" जय के हाथों में कुत्ते का छोटा सा पिल्ला था।
अपनी जेब से बिस्कुट निकाल कर, छोटे टुकड़े करके जय उसके मुँह में डाल रहा था। कुत्ते का पिल्ला, प्यार से उसकी गोद में बैठा था।
मोहन बाबू को, शाम के सूरज की लालिमा में प्रेम की चमक दिखाई दे रही थी। न जाने क्यों, वे अपने को डिटाॅक्सिक महसूस कर रहे थे।

शर्मिला चौहान

गुरुवार, 10 जून 2021

हिंदी विश्व कोश edit हेतु

हिंदी विश्व कोश में  edit करने हेतु

लघुकथा-2020 blog
संपादक- बीजेंन्द्र जैमिनी
लघुकथा- पेट भर

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महाराष्ट्र के प्रमुख हिंदी लघुकथाकार (ई-संकलन)मई 2021
संपादक-  बीजेन्द्र जैमिनी

१)  तलाश
२) विनिमय
३) उजियारा
४) नसीहत
५) अपना आसमान
६) मीठे आँसू
७) छत्रछाया
८) कथनी-करनी
९) ओरिजनल
१०) यात्रा
११) भूख

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लघुकथा शोध केंद्र भोपाल "लघुकथा वृत्त" ( अनियतकालीन पत्रिका)
प्रधान संपादक- कान्ता राॅय
लघुकथा- मुक्ति

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लघुकथा संकलन आयोजन 2020 एक समग्र प्रयास
वनिका प्रकाशन
संपादक- डॉ. नीरज सुधांशु
लघुकथा- सोंधी महक

बीजेंद्र जैमिनी के blog 2020 लघुकथा

पेट भर                                 


                                                 - शर्मिला चौहान

                                                    ठाणे - महाराष्ट्र


          आज खुशी से फूली ना समा रही थी नीमा। मैडम जी ने खाने -पीने का ढे़र सारा सामान दिया है।
कल पार्टी हुई थी बंगले पर और खाना बच गया था। रात तक तो नीमा थी सरजू और गीता की मदद करने। वो दोनों खाना बनाते और नीमा साफ -सफाई करती। 
आज तो बच्चों को और पति को स्वादिष्ट खाना पेटभर मिलेगा। एक सप्ताह से, संतोष घर पर ही है , सर्दी - ताप से कमजोर हो गया है। काम करने की कौन कहे, बिस्तर से उठने पर भी सिर चकराने लगता है उसका।
सरकारी अस्पताल में दिखाया तो डॉक्टर ने गोली - दवाई थमाते हुए कहा , "शरीर को ताकत की जरूरत है, अच्छा खाना, फल- फूल, सब्जियांँ खिलाना।" 
उसी समय से नीमा सोच में पड़ गई कि पेट भर रोटी-भात तो जुट नहीं रहा, काम बंद और ऊपर से तीन जवान होते बच्चे।
कल का बचा खाना जब बांधकर रख रही थी तभी सरजू और गीता ने खुद को मिले सेब और केक भी उसे ही पकड़ा दिया ,"घर ले जा बच्चे खाएंगे, हम दोनों को तो दो जून खाना यहां मिलता ही है।" कृतज्ञता से नीमा ने उनको देखा और बड़ी सी पोटली बांध लहकती चली।
छोटू तो केक देखकर पगला ही जाएगा,  सेब छुपाकर रखेगी बच्चों से, सिर्फ संतोष को देगी, हिस्से-बाटे का ताना-बाना बुनते चल ही रही थी कि पीछे से जोर-जोर की आवाजों से पलटी।

मोटरसाइकिल पर सवार कई लोगों का हुजूम चला आ रहा था। वो रास्ते पर आने वाली सभी चीजों को तोड़ते- फोड़ते, चिल्लाते तेजी से आगे बढ़ रहे थे।
अगले कुछ पलों में जमीन पर गिरी नीमा ने, दबी कुचली पोटली को समेटते हुए, आँखें मूंद लीं।

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