शुक्रवार, 21 जून 2019

औरतें

राधेश्याम ने आज छुट्टी का मन बना रखा है । कल बहुत रात तक टैक्सी चलाया था । आराम से सो कर उठा , फिर दोनों बच्चों के साथ मस्ती करते हुए समय निकाल रहा था ।

आशा की आवाज से वह बिस्तर पर से उठ बैठा ।
"आज टैक्सी निकालना नहीं है क्या ? चलो उठो , बिस्तर छोड़ो । नहाओ , खाओ और गाड़ी लेकर जाओ । एक दिन थोड़ा ज्यादा काम किया तो दूसरे दिन आराम करोगे क्या ? ऐसे में पैसे कैसे जमा करेंगे ? " चिल्लाकर आशा ने कहा ।

"हाँ -हाँ  , तेरे को ही फिक्र है सब । इतनी फिक्र है तो क्यों जाती है हर साल मायके ? एक बार में दस-बारह हजार का खर्चा । रेल टिकट कितनी मंहगी‌ है , ऊपर से मेमसाब को वातानुकूलित डिब्बा चाहिए  । यहाँ आदमी दिन भर कमा कमा कर परेशान....।" राधेश्याम ने बड़बड़ाते हुए कहा ।
" अरे ऽऽ.. पिछले साल भतीजे की शादी पड़ी थी , नहीं तो क्या हर बार इतना खर्च होता है । वो भी , शादी में बहू को जो दिया सो दिया , मेरे लिए तो रो-रोकर एक साड़ी ही लिए । कानों में झुमके पहनने का शौक मन में रखे जिंदगी बीत जाएगी । माँ-बाप को बोझ थी जो तुम्हारे गले बाँध दिया ।" रुआंसी हो कर आशा ने कहा ।

  "ठीक है बाबा , मैं चला गाड़ी लेकर । काम करके मरुँ , तो तुम झुमके पहनकर नाचना ।" गमछा उठाकर राधे ने चिल्लाते हुए कहा ।

पूरे समय आशा बड़-बड़ करके अपनी किस्मत को कोस रही थी ।
राधे तैयार होकर बिना कुछ खाए पीए घर से निकल गया । रास्ते में सोचा कि दादर स्टेशन से जरा इलाहाबाद की रेल टिकट की जानकारी कर लूंँ । मुंबई से उत्तरप्रदेश जाने वाली सभी रेलें बहुत जल्दी आरक्षित हो जाती हैं।

  आजकल काली-पीली टैक्सी का धंधा भी कम हो गया है । लोग  ओला-उबर गाडियाँ ले लेते हैं । वह भी अपनी इस टैक्सी को बेचना चाहता है , परंतु उससे लगाव के कारण फिर रूक जाता है  ।
  इस मुंबई शहर में दो समय की रोटी और  सिर छिपाने के लिए छत, इसी की बदौलत नसीब हो रही है ।

स्टेशन के सामने वाले चौक पर ही गाड़ी रोक दी । आज गुस्से से निकला था घर से , चाय नाश्ता भी नहीं किया । बारह बज रहे और पेट में कुछ गया नहीं । चाय की छोटी सी टपरी में जाकर , एक कप चाय और वड़ा पाव का बोलकर बैंच पर बैठ गया ।

अपने गाँव की याद में वो डूबने लगा । अम्माँ , बाबू और तीन बेटों का परिवार । बड़े भैया पढ़ लिखकर गाँव की शाला में शिक्षक हो गए । छोटा भाई दयाशंकर इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है । राधेश्याम दूसरे नंबर का बेटा है ।

  शुरू से ही उसका मन किताबों से ज्यादा कंचे , गुल्ली -डंडा और पतंगों में लगता था । कितनी ही बार बाबू ने इसी कारण उसे मारा -पीटा भी था । अनुत्तीर्ण होने का रिकॉर्ड बनाया था राधे ने ।
मैट्रिक की परीक्षा जब तीसरी बार में भी उत्तीर्ण नहीं कर पाया , तब बाबू का धैर्य सीमा पार कर गया ।

मेज़ पर लड़के ने चाय और वड़ा-पाव रख दिया ।चाय की प्याली मुँह में लगाकर सुड़कते  हुए वह आगे सोचने लगा ।

   अम्माँ , स्वर्ग सिधार गई और बाबू चिड़चिड़े हो गए थे । उसके साथ हाथापाई की ना ही उनकी उम्र रही थी और ना ही शक्ति ।

"अब तू अपनी रोजी-रोटी का देख । जा , अब मेरी छाती पर मूँग मत दल ।" उन्होंने हुक्म सुना दिया ।

फ़िल्मों के शौकीन राधेश्याम को अपना भविष्य मुंबई में ही दिख रहा था । एक छोटी सी पेटी और कुछ सपने लिए , बिना टिकट  राधे एक दिन मुंबई पहुँच गया ।

अपने चाय नाश्ते का पैसा देकर राधे वापस टैक्सी में आ बैठा । स्टेशन दूर से दिखाई दे रहा था लेकिन जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी । अभी तक हाथ में पूरे पैसे जमा नहीं हुए हैं और परिवार के साथ जाने में बहुत खर्च हो जाता है ।
आशा और बच्चों को राधे छोड़ आता है ससुराल जाकर , वापस वह हमेशा अपने भाई के साथ ही आती है ।

एकाएक , टैक्सी की खिड़की पर ठक-ठक हुई और वह चौंक गया। एक बूढ़ी अम्माँ थी । दक्षिण भारतीय वेशभूषा , एक बैग कंधे पर लटकाए चिल्लाई _ " अजी ऽऽ...ओ ऽऽ...। खोलो ना । गाड़ी चलाना नहीं है क्या तुमको ? गाड़ी खड़ा कर के सोने को आया इधर .. ।"

राधे ने दरवाजा खोल दिया । वो धड़ाके से टैक्सी में घुस गई । उसके बैग से मोगरे की खुशबू आ रही थी ।

" कहाँ जाना है अम्माँ ? " राधे ने पूछा ।

" हम तुम्हारा अम्माँ नहीं । हम किसी का अम्माँ नहीं है । महालक्ष्मी को जाता । तुमको मालूम , आज शुक्रवार , आज लक्ष्मी का दिन.....। " वो ना जाने क्या क्या बड़ बड़ कर रही थी ।

" ठीक है बाबा , गुस्सा मत करो।"
राधे ने गाड़ी स्टार्ट करके कहा ।

" मैं गुस्सा करती , मैं बड़ बड़ करती । मेरा हसबैंड भी येईच बोलता। पागल है वो ।" जरा सांँस लेकर उसने बात पूरी की _" मैं एवरी शुक्रवार महालक्ष्मी को जाके बोलती कि उसको  अभी लेके जा । दिनभर चिड़चिड़ करेगा  , सब जिंदगी खराब । मरेगा तो शांति मिलेगा ।" उसने इतनी आसानी से कहा कि राधे डर गया ।
"क्या तेज -तर्रार बूढ़ी है ये । " मन में सोचा कि आज दिन ही खराब है मेरा तो ।

  पिछली सीट पर आवाज हुई तो उसने देखा कि उस बूढ़ी अम्माँ ने कपड़े के थैले में से छोटा सा थरमस निकाला । उसमें से काॅफी निकालकर पीने लगी ।

अब मोगरे की भीनी खुशबू को काॅफी की तीव्र गंध ने ढंकने की कोशिश की । काॅफी पीकर अम्माँ कुछ शांत नजर आईं ।

  राधे टैक्सी चला रहा था और उसके कान अम्माँ की बड़ बड़ सुन रहे थे ।
"मेरा हसबैंड चल नहीं सकता ‌ पोलियो का असर था फिर लकवा भी मारा । बिस्तर पर पड़ा  सालों से । सरकारी नौकरी थी तो पेंशन मिलता है । मैईच लाती बैंक जाके । मैईच खुशामत करती , मेरे को गाली देता ।" अम्माँ न भड़ास निकाली ।

"आपके बच्चे नहीं हैं क्या साथ में ? " अनायास राधे पूछ बैठा ।

" नाम नहीं लेने का , मर गया सब बच्चा । दो बेटा है , दोनों अमेरिका में रहता । इंडिया आने को डरता है । " चेहरे पर मातृत्व की जगह नफरत ने ले ली ।
" पहले फोन करता , अभी साल में तीन-चार बार करता है । डरता है कि माँ बाप पैसा माँगेगा ।" स्वर में दुःख का आभास हुआ ।

रास्ते में टैक्सी रोककर वो नारियल खरीद लाई ।
" मंदिर के सामने तो लूटता है  सबको । दस का नारियल बीस में देता है । " कुछ देर रुककर बोली _ " आज  हसबैंड की काॅफी में नींद का गोली दिया । सोएगा , शांति मिलेगा । बाहर से ताला भी मारा  । अभी कोई टेंशन नहीं ।"

अचानक राधे को घूरते हुए अपना बैग कसकर बगल में दबा ली और जोर से बोली _" तू सब क्यों पूछता है । पैसा लेगा मेरा , मारेगा मेरे को । ठहर , पुलिस को बुलाती है मैं । बूढ़ी औरत देखकर लूट करेगा , बदमाश ऽऽ...। " और वह हाॅफने लगी ।

  राधे के हाथ पाँव फूल गए ।
" हे महालक्ष्मी माता , मैंने क्या किया ? इस बूढ़ी बला से मुझे बचा लो ।"
वह बोला _  " आप उतर जाओ । आगे ही मंदिर है । आगे गाड़ी नहीं ले जाता मैं । " घूरते हुए वह उतर गई ।
बैग बगल में दबाकर , बड़-बड़ करती तेजी से लोगों के बीच गायब हो गई ।
उसकी आवाज राधे के कानों में गूंज रही थी _ " बूढ़ी को मारकर पैसा लेगा , मैं मेरा पैसा नहीं देगी  ....। " और राधे की हिम्मत नहीं हुई कि वो भाड़े के पैसे माँग ले ।
मंदिर की ओर देखकर राधे ने हाथ  जोड़ा और फिर गाड़ी आगे बढ़ा दी ।

  थोड़ी दूर बाद ही एक लड़की, हाथ से टैक्सी रोकने का इशारा करते हुए सड़क पार कर रही थी । एक हाथ से फोन कान पर लगाए  , बात कर रही थी और दूसरे से टैक्सी रोकने की कोशिश कर रही थी ।

    किनारे पर टैक्सी रोकते हुए राधे ने देखा कि लड़की सुंदर थी ‌करीब तीस के आसपास की होगी।
गाड़ी का दरवाजा खोलकर , पिछली सीट पर आकर बैठ गई ।
  " कोलाबा " उसने बताया और फिर फोन पर व्यस्त हो गई ।

  राधे ने देखा , उसने पतला सा , छोटा-सा फ्राॅक जैसा पहना था । चेहरे पर मेकअप और गाढ़ी रंग की लिपस्टिक लगाए हुए थी ।

  " हाँऽऽ.. आज मुझे देर हो जायेगी । तुम खाना गरम करके खा लेना डार्लिंग । मुझे आने में दस तो बज ही जाएँगे । थोड़ी देर बाद फोन करूँगी । अभी दस मिनट के बाद मीटिंग शुरू हो जाएगी। मेरा फ़ोन बंद रहेगा । तुम घर जाते समय ब्रेड और दूध लेकर जाना । ओ.के. बाय....। " कहकर फोन बंद कर दिया ।

  उसने एक क्षण इधर उधर का जायजा लिया और फोन पर देखकर अपना मेकअप ठीक करने लगी ।

राधे को यह लड़की कुछ अजीब सी लगी । रोज सवारियांँ बिठाकर उसे शक्ल पहचानना आ गया था ।
दो मिनट रुक कर उसने फिर फोन लगाया । इस बार बहुत ही अदा और नखरे वाली आवाज में बोली _ " बस्स ..., पहुँच ही रही हूँ  , दस पंद्रह मिनट में । आज आॅफिस से हाफ डे लिया है सिर्फ तुम्हारे लिए । प्लीज़ सैंड मी द होटल्स नेम एंड रूम नंबर । "
 
दूसरी ओर से किसी ने कुछ पूछा और वह जोर से ठहाका मारकर हंस पड़ी _ " वो मेरा पति है ना बेचारा , सोचता है कि मैं दिन रात काम करती हूँ  । अपना घर खरीदने का भूत सवार है सिर पर । बोलता है  "अपना घर " लेंगे ।  हा हा हा..., मैंने दस बजे तक आने का बोला है । तब तक मीटिंग का बहाना ..हा हा...। " कुटिलता से हंस रही थी वो ।

  गाड़ी के स्टीयरिंग पर राधे का हाथ जम सा गया । उसका मन कड़ुवा हो गया।
उस लड़की के शरीर से आती इत्र की खुशबू उसको असहनीय लगने लगी ‌ वह गुनगुनाती हुई फोन पर मैसेज देख रही थी ।

  उसने जो पता बताया राधे ने उसे पहुँचा दिया । एक बड़ा और महंगा होटल था । टैक्सी रूकने पर वह उतरी और राधे के हाथ में एक बड़ा नोट पकड़ा दिया ।

वह तेजी से होटल के दरवाजे की ओर बढ़ गई । मुट्ठी में रखे रूपए , भाड़े से करीब दुगुने थे , परंतु उसे पैसे वापस लेने का फालतू समय नहीं था ।

   "कैसी औरत है ये ? घरवाला इतना प्यार और विश्वास करके काम पर भेजता है और ये है कि ..छी ऽऽ...। "  रूपये जेब में रख कर राधे ने गाड़ी आगे बढ़ा दी ।

   मुंबई का दिल है ये जगह । गेटवे ऑफ इंडिया , ताज होटल , एक से बढ़कर एक कैफे और फोर्ट में लगी दूकानें  , लोगों को आकर्षित करती हैं ।

  राधे ने याद किया कि जब वह शादी के बाद आशा को गाँव से पहली बार मुंबई लाया था । दोनों बहुत घूमे और मजा किए थे । फोटो भी खिंचवाई थी ।
  अब तो दो बच्चों के साथ निकलना ही नहीं होता । कितनी सवारियों को घुमाता है वो परंतु अपने परिवार के लिए ना समय और ना पैसा ही हो पाता है । किराया , किराना , बच्चों के खाने पीने और दवाईयों का ही खर्च भारी पड़ जाता है ।

   " ऐ... गाड़ी जरा किनारे पर लगा ना । पूरी सड़क खरीद कर लिया है क्या ? " बाजू से निकलते हुए कार वाले ने गुस्से से कहा ।
   " हाँ बाबा , लगा ही रहा हूँ , जगह तो मिले । " कहते हुए उसने एक किनारे टैक्सी खड़ी कर दी ।
सामने ही झुनका भाकर केंद्र है , सस्ता , स्वादिष्ट और ताजा खाना । राधे जब भी इधर की कोई सवारी मारता , इस जगह पर ही खाना खाता था ।

पेट भर खाना खाने के बाद टैक्सी लेकर राधे मेरीन ड्राइव की तरफ निकल गया । गाड़ी खड़ी करके खुद घूमने लगा ।

  शाम के पाँच बज रहे हैं, घूमने , चलने वालों का समय हो गया है।
वैसे तो मुंबई दिन रात चलती है , समय का ज्यादा असर नहीं पड़ता ।

  समुद्र की लहरों को देखते रहना , राधे को बहुत पसंद है ‌। उफनती लहरें तेजी से आकर , किनारों से टकराकर लौट जाती हैं । उनकी टकराहट का एक शोर हमेशा होता है । दूर दूर तक अथाह जलराशि , जो अंत में आकाश से मिलकर एकाकार हो जाती है ।
  जितनी हलचल सागर के सीने में रहती है , उतनी ही उसके किनारे पर लोगों में भी । शोर -शराबा और जिंदगी की तमाम हलचलें हमेशा नजर आती हैं ।

काॅलेज के कुछ लड़के-लडकियों का झुंड मस्ती का माहौल बनाए हुए हैं । फोटो खींचने और खिंचवाने की होड़ लगी हुई है । कुछ बुजुर्ग बैठकर मूँगफलियाँ और भूनें चने चबाने की कोशिश कर रहे हैं । साथ ही अपने हमउम्र साथियों का इंतजार कर रहे हैं ।

   कुछ लोग अपने परिवारों के साथ आए हैं । खाने पीने की चीजें , पानी की बोतलें रखें हैं ।
बच्चे किनारों पर दौड़ रहें हैं , कुछ गुब्बारों के लिए रोना धोना मचा रहे हैं ।

थोड़ी देर वहांँ बैठने के बाद राधे ने अपनी टैक्सी की ओर कदम बढ़ाए । सामने एक तीस-बत्तीस साल की औरत , बच्ची के साथ टैक्सी की तलाश में खड़ी थी । साधारण सी साड़ी पहने , चोटी बनाए , गले में मंगलसूत्र और हाथों में हरी चूड़ियां पहने वह हाथ से टैक्सी को रूकने का इशारा कर रही थी ।

बच्ची दस-बारह साल की होगी , सुंदर फ्राक पहने हुए थी । हाथों में गुब्बारे का गुच्छा लिए , बहुत खुश नजर आ रही थी ।

जैसे ही राधे को टैक्सी का दरवाजा खोलते हुए देखा , दौड़कर आई _ " भाऊ , सवारी घेता का ?  आम्हाला परेळ ला जायचं आहे । "

  " बैठिए " कहकर राधे ने गाड़ी स्टार्ट कर दी ।

उसने बच्ची को संभालकर बिठाया , फिर खुद बैठी । टैक्सी आगे बढ़ गई । बच्ची  थकी सी , कमजोर आवाज में बोली _ " आई , खूप दमले ग मी । तुझ्या मांडीवर झोपू का ? "
उसने पैर सिकोड़ कर, बच्ची का सिर अपने गोद में रख लिया और पैर  सीट पर सीधे करने लगी ।बच्ची के हाथ के गुब्बारे गाड़ी में इधर-उधर उड़ रहे थे ।

बच्ची के माथे पर हाथ फेरते हुए उसने अपनी आंखें बंद कर ली ।
  " आई आज माझं वाढदिवस , किती छान साजरा केला । खूपच मजा आली मला । पुढच्या वर्षी पुन्हा आपण असाच मजा करणार आहोत ना ।" बच्ची खुशी से बोली ।

उत्तर में उसने भरी आंखों से सिर हिलाया । गरम बूँदें बच्ची के चेहरे पर टपक पड़ी और वह उठ बैठी।

"  आई , कशाला रडते तू ? काय झालं , सांग ना मला पन ।" वह अपनी मांँ के आँसू पोंछ रही थी ।
" काही नाही बाळं , झोप तू  ।" उसने बच्ची को वापस लिटा दिया।

थोड़ी देर बाद बच्ची सो  गई शायद , क्योंकि अब उसकी आवाज नहीं आ रही थी । सिग्नल पर गाड़ी रूकी तो राधे ने सहज बोला _ " आप क्यों रो रही हो बहनजी ?  बच्ची को दुःख होगा , आज उसका जन्मदिन है लगता। "

  उसने राधे को एकटक देखते हुए कहा _ " रोना तो जन्म भर का है भाऊ  । बेटी है मेरी , बहुत बीमार है , टाटा अस्पताल में इलाज चल रहा है । आज वाढदिवस है तो स्पेशल मांग कर इसे बाहर घुमाने लाई थी । " उसकी आवाज भरभरा रही थी ।

" हे भगवान , दया करो । इतनी छोटी , फूल सी बच्ची को ऐसी बीमारी ? बहुत बुरा लग रहा है मुझे सुनकर । भगवान आप दोनों को शक्ति प्रदान करें , ताकि आप इस बीमारी से लड़ सको ।" आगे बात करते हुए कहा _ " इसके पापा साथ नहीं आए आज ? काम पर गए होंगे ।"

सिग्नल से आगे निकल कर टैक्सी सड़क पर तेज़ी से फिसलती जा रही थी और उस स्त्री की कहानी भी ।

" जब मेरी बेटी सिर्फ छ: महीने की थी , तभी मेरे पति ने मुझे छोड़ दिया था । उनको बेटा चाहिए था और हुई बेटी । बस इसी बात को लेकर रोज़ लड़ाई झगड़ा होता रहता था । छः महीने में उन्होंने मुझे छोड़ दिया और तुरंत दूसरी शादी कर ली । " एक लंबी सांस लेकर वह खिड़की से बाहर झांकने लगी । " तब से अपनी बेटी को माँ -बाप  दोनों बनकर पाला है मैंने ।"  उसने बात पूरी की ।

" डाक्टर क्या कहते हैं , बच्ची की बीमारी के बारे में ?"  राधे ने सहानुभूति से पूछा ।

  "  जब तक साँस है उम्मीद है भाउ । कपड़ों की सिलाई करती हूंँ  । उस अस्पताल में  बहुत से मरीज़ हैं , कोई अच्छा होता है , कोई नहीं । दिन रात मेहनत करूँगी , कोई कसर नहीं छोडूँगी  । " आत्मविश्वास से भरी माँ बोल रही थी ।

टैक्सी को अस्पताल से कुछ पहले ही रोकते हुए उसनेे कहा _ " बस बस  , यहीं रोक दो । इसको मौसंबी का रस पिलाकर ले जाऊँगी अस्पताल । "

" उठ बेटा , ताई ..। तुला मौसंबी रस आवडते ना । उठ मग , चल आपण रस पिऊन मग  जाऊया ।"
बच्ची ने सुना और उठ बैठी । वो दोनों उतर गए । पर्स निकाल कर भाड़ा देने लगी ।

  "  रहने दो बहनजी । आज बच्ची का जन्मदिन है । टैक्सी की एक छोटी सी सैर मामा की तरफ से तोहफा समझ लो । भगवान आप दोनों को हिम्मत दें , जिससे आप इस बीमारी को हरा सकें । " बच्ची की ओर देखकर राधे ने हाथ हिलाया और टैक्सी आगे बढ़ा दी।

" शक्ति का रुप है यह औरत ।" मन ही मन प्रणाम करते हुए वह सड़क पर देखने लगा ।

अभी अपनी सोच में डूबा , कुछ ही दूर चला था कि दो औरतें एकदम  सड़क के बीच में आ गयी , टैक्सी की ओर हाथ दिखाते हुए । राधे ने अचानक  , जोर से ब्रेक मारा ।

  गाड़ी से गरदन बाहर निकाल कर बोला _ " ये क्या कर रही हो ? कुछ हो जाएगा तो फिर टैक्सीवाले की आफत । ऐसे कैसे सड़क के बीच में आकर टैक्सी रोक रही हो आप ? "

  " आओ माई ..। " उसने राधे  के बातों की परवाह किए बिना ही साथ की बूढ़ी स्त्री को हाथ पकड़कर पिछली सीट पर बिठाने लगी ।

    " अरे बहनजी ... मुझे कोई सवारी नहीं लेनी है ‌ घर जा रहा हूँ  मैं । आप दूसरी टैक्सी देख लो । " राधे ने इंकार करते हुए कहा ।

" बस थोड़ी ही दूर जाना है भैया।माई की  तबियत ठीक नहीं है , जरा पहुँचा दो ना ।" उसने आवाज में विनम्रता लाकर कहा ।

माई को देखा तो राधे को अपनी अम्माँ की याद आ गई । करीब वैसा ही पहनावा , वैसी ही कद-काठी । सिर्फ अम्माँ के माथे पर लाल टीका और माँग में सिंदूर रहता था , ये माई नहीं लगाई है , शायद विधवा स्त्री हैं ।

उनके पास सामान भी था । एक पेटी , एक थैली और एक दो गठरियाँ ।

"  तबियत खराब है और इतना सामान लेकर अस्पताल जा रहे हैं ।" मन ही मन राधे ने सोचा और उस औरत को देखा जो डिक्की में सामान रख रही है ‌। उसके बैठ जाने पर राधे ने गाड़ी शुरू करते हुए पूछा _ " कहाँ जाना है ? "
"चलो , सीधे ही चलो । मैं रास्ता बता दूँगी । " उसने "कहाँ " का इस प्रकार उत्तर दिया ‌

कुछ दूर चलने के बाद माई की आवाज आई । कह रहीं थीं कि _ " लल्लन को आ जाने देती दुल्हन , दो चार दिन में आ जाएगा ना  । बुढ़ापे में इतना तो होता रहता है । बेटवा आ जाता , फिर ले चलती अस्पताल । आज ही क्यों लिए जा रही हो ? " धीमी और थकी आवाज थी ।

  " माई तुम समझती नहीं हो । अब गाँव गए हैं तो चार दिन लगेंगे या आठ , बता नहीं सकते । तब तक तुम्हाई तबियत और ना बिगड़ जाएगी ।" बहू ने  समझाया ।
"हमरी तबियत को कछु ना हुआ दुल्हन । अब अपनी घर -जमीन सब बेचकर तुम्हाए साथ आए । पुरानी बातें , पुराने लोगों की याद आ जाती है बस । मन उदास हो जाता है । और हमको कोई बीमारी नहीं है । लल्लनवा काहे फिर गाँव गया है ? " माई ने प्रश्न किया ।

  " भैय्या , आगे दाहिने से सीधे एक बड़ा बगीचा है , वहाँ तक चलो । आगे फिर बताऊँगी ।" बहू ने रास्ता बताया ।

  " गाँव के मकान जमीन के कुछ रुपए बचे थे , वही लाने गए हैं ‌। हिसाब -किताब सब पूरा करके ही आएँगे । यहाँ एक फ्लैट देखा है उसकी रजिस्ट्री भी करना है ।" बहू ने बताया _ " हमारी बात हो गई है उनसे । कहत रह, माई को सब आराम मिले चाही ‌। एही खातिर हम तोहके ले जा रहे माई ।" अपनी जुबान में उसनेे समझाया ।

राधे को लग  रहा था कि मानो आज उसकी गाड़ी में अम्माँ बैठी हैं । सादी सरल , प्रेम से भरी अम्माँ ।

  " यह देखिए , बगीचा आ गया । अब आगे किधर लूंँ ? राधे ने पूछा ।

  " बाएं लेकर , सीधे चलो । आखिरी गली का सबसे बड़ा मकान है ।" उसने बताया ।

" इधर अस्पताल का कोई बोर्ड भी नहीं लगाया ।" मन ही मन राधे सोचा ।

" लल्लन जबै आवेगा , हमको घर में ना पावेगा तब पूछताछ करेगा । एही खातिर कहत रहे कि  उहका आ जाए दे ।" शायद बुढ़ापे में अस्पताल जाने से डर रही थीं वो ।

जिस बड़े मकान का पता दिया वो सचमुच ही बहुत बड़ा था ।खुली जगह , बगीचा भी था । राधे ने टैक्सी रोक दी ।
  " कितना हुआ ? " उसने पैसे पूछे और बताने पर पर्स से पैसा  दे दिया ।

  वह डिक्की से सामान निकाल रही थी । ना जाने क्यों , राधे अपनी सीट से उठकर पीछे गया और माई को सहारा देकर उतारने लगा । एक बार उसको लगा कि यह अम्माँ का हाथ है ।

उस औरत ने फटाफट सामान गेट पर रखा । चौकीदार से बात की , रजिस्टर में दस्तख़त किए ‌ चौकीदार ने दरवाजा खोल दिया ।

हाथ पकड़कर वह माई को अंदर ले जाने लगा  और साथ ही कुछ सामान भी उठा लिया ।

खुले दरवाजे के अंदर का बोर्ड राधे ने पढ़ा ....
  " लक्ष्मी नारी निकेतन "
  राधे का सिर चकरा गया , दिल बेचैन हो गया । आखिर उसने इतनी पढ़ाई भी क्यों की , जिससे यह बोर्ड पढ़ गया ।

अनमने मन से , आज के दिन को कोसता हुआ राधेश्याम अब वापस अपनी संकरी गलियों की ओर बढ़ रहा था ।

गुरुवार, 20 जून 2019

लेखक परिचय

मैं शर्मिला चौहान , अपनी कल्पनाओं को एक पुस्तक के रूप में संकलित करने का प्रथम  प्रयास कर रही हूँ।
रायपुर (छत्तीसगढ़) में मेरा जन्म और शिक्षा हुई ।

मैंने  बतौर शिक्षिका अध्यापन का कार्य किया और आज भी व्यक्तिगत रूप से अध्यापन से जुड़ी हूँ ।

हिंदी के प्रति विशेष लगाव के कारण , मैं प्रारंभ से ही कविताएं और कहानियां लिखती रही , जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं ।

मेरी लिखित तेरह कहानियों को पुस्तक के रूप में मैं पाठकों तक पहुंचाने के लिए प्रयत्नशील हूंँ ।

शर्मिला चौहान
9967674585
sharmilachouhan.27@gmail.com

रविवार, 2 जून 2019

" संकल्प "

चांद अपनी पूर्ण कलाऐं दिखाता हुआ , चांदनी में नहाई धरती को देख गर्व से इठला रहा था । शुभ्र ज्योत्स्ना का सृष्टि पर अनवरत बरसता स्नेह , मंत्रमुग्ध कर रहा था ।
फागुन महीने की पूर्णिमा, वैसे भी वसंत की मादकता समेटे , उन्मुक्तता लिए , वातावरण को बौरा देने का सामर्थ्य रखती है । प्रकृति के इस अद्भुत सौंदर्य का असर जड़ और चेतन में गोचर हो रहा था ।

गांव के चौक में , होलिका दहन की तैयारी पूरे जोश-खरोश के साथ हो रही है । ठाकुर सूरजभान का पूरा परिवार भी इस होली को यादगार बनाना चाहता है ।
इस होली में उनका बेटा कैप्टन प्रतापसिंह  , एक महीने की छुट्टी पर आया है । दीपावली के समय , सिर्फ दो दिनों में ही वापस लौट गया था क्योंकि छुट्टियां रद्द कर दी गई थी । यही कारण है कि इस बार पूरे एक महीने के लिए वह घर आया है ।

" अरे..भई  मैं तो चला होलिका दहन की तैयारी करने । आप सब आना आराम से । दो साल हो गए गांव की होली देखे । नहीं तो बस्स... अपने फौजी साथियों के साथ ही थोड़ी-बहुत होली हो जाती थी । " बरामदे में आते हुए प्रताप ने सबको आवाज लगाई ।

" हां-हां , बेटवा जाओ । तुम्हारे बिना तो फगुआ का कौनों मजा ही ना रहा । फाग तो सभै गा लेत रहे  , मुई ढोलक कौनों ना बजा पाएं । जाओ तुम , हम सब पीछे पहुंचत हैं  ।  चाहो तो अपने बाबू को लै जाओ संगे । "  अम्मां ने प्रताप के पीठ पर हाथ रख कर कहा ।

" अरे..जाए दो प्रताप का । हम का करब बच्चन के बीच । हम तो अपनी बहुरानी के साथ चलब । हमारी कैप्टन तो हमरी बहुरिया ही है । एक महीने बाद ऐ तो चले जाएंगे , हमारी बहु हमारी साथिन है भाई । " ठहाका मारकर ठाकुर साहब ने शोभा की ओर गर्व से देखा ।

शोभा का दिल अपने ससुर की जिंदादिली और  गांव में उनके रूतबे का कायल था । व्हील चेयर पर बैठे उस व्यक्ति को देखकर वह गर्व का अनुभव करती थी जिसने  देश की खातिर , स्वयं के दोनों पैर गंवाकर भी दुश्मन को जिंदा ना जाने दिया।

" ठीक है, तो फील्ड मार्शल शोभाजी , आप अम्मां - बाबू के साथ समय पर पधार जाना । और हां.. पूजा की कोई सामग्री भूलना मत , वरना इस कैप्टन को ही वापस भेजा जाएगा ।" शरारत से प्रताप ने कहा और अपनी भूलने की आदत पर व्यंग्य सुनकर शोभा उसको घूरने लगी ।

तभी बाहर से टोली की आवाज आने लगी _ " प्रताप , आओ चलें । एक घंटा रंग जमाते हैं यार । आज तो फगुआ पर तुम्हारी ढोल का मजा आएगा । " सुनकर लगभग दौड़ता हुआ प्रताप हाथ हिलाकर बाहर निकल गया ।
अनायास ही शोभा ने हाथ हिलाकर उसको विदा किया और फिर उसी की सोच में जकड़ गई ।
उसका पति , छह फीट ऊंचा , कसा शरीर , सांवले रंग का बेहद जिंदादिल और खुशमिजाज इंसान है । एक ही नजर में किसी का भी मन मोह लेता है ।

चार साल पहले जब शोभा को देखने आए थे तो बिना किसी प्रश्र के , दोनों परिवारों के बीच रिश्ता जम गया था । शोभा , दिखने में बहुत ही सुन्दर और एक मध्यम वर्ग के परिवार की दूसरी नंबर की बेटी थी । विज्ञान में स्नातक होने के बाद ही यह रिश्ता आया और बात तय हो गई ।

वैसे दोनों परिवारों में जमीन आसमान का अंतर है ‌ ।
एक साधारण सोच के साथ , दो बेटियों को पढ़ा लिखाकर , अच्छे घरों में विवाह करने के लिए प्रयत्नशील परिवार । पिताजी बैंक में लिपिक के पद पर कार्यरत थे और दो वर्ष पूर्व ही दीदी का विवाह किया था ।

दूसरी ओर यह परिवार , जिनके रग-रग में वीरता और देशप्रेम मानो उबाल ले रहा था । बाबू रिटायर्ड सूबेदार मेजर और प्रताप तभी कैप्टन हुए थे । अम्मां , मानो धरती का कर्ज अदा कर चुकी थी।

बातों ही बातों में बाबू ने शोभा के परिवार वालों को  बताया _ " आपका और हमारा परिवार एक सा है । आपके घर दो बेटियां और हमारे दो बेटे । " खुशी से भरी आवाज थी उनकी ।
" आपका दूसरा बेटा कहां है ठाकुर साहब ? उसे साथ नहीं लाए ? " लड़की के पिता का स्वाभाविक प्रश्न था ।

" समधी साहब , वह पहला बेटा था । प्रताप दूसरा बेटा है हमारा ।" ठहाका मारकर आगे कहने लगे _ " बड़ा बेटा , आजाद सिंह था । राजस्थान सीमा पर घुसपैठियों से मुठभेड़ जारी थी । कर्नल साहब ने बताया कि मेरा आजाद आठ-दस पर अकेले भारी था । दुश्मन की एक गोली पर उसका नाम लिखा था । भारत माता के ऋण से मुक्त हो गया ।" आंखों में नमी पर आवाज में गुरूर था बाबू के ।

एक क्षण के लिए मानो सन्नाटा पसर गया । शोभा तो ठगी सी , मूर्तिवत उस व्यक्ति को देख रही थी जो खुद व्हील चेयर पर थे और अपने जवान बेटे की शहादत का गौरव गान कर रहे थे ।

अम्मां , उस क्षण थोड़ी व्याकुल हो गई और प्रताप ने अपना हाथ उनके हाथ पर रख दिया ।
एक सामान्य असैनिक परिवार के लिए तो मानो शांत रिहायशी इलाके में बम विस्फोट हो गया ।

कैसा परिवार है यह ? कैसे लोग हैं जो भारत माता के कर्ज को चुकाने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं ? इतना खो चुके फिर भी कोई शिकायत, कोई आलोचना कोई परेशानी नहीं दिखाते ।

शोभा की मां ने तो डरकर शादी नहीं करने की बात कह दी ।

प्रताप के व्यक्तित्व का जादू , परिवार का निश्छल प्रेम शोभा के मन में बस गया । वह समझ गई थी कि पति के रूप में एक आकर्षक , प्रतिभावान और देशभक्त नवयुवक को पाना उसका सौभाग्य होगा ।
" शोभा बेटी , प्रताप के साथ पहली होली मनाने का मौका मिला है । सज-धज कर चलो  , बेटा फाग गाएगा तो हमारी बहू राधा से कम है क्या ?" अम्मां ने पास आकर जैसे शोभा को झकझोर दिया ।

" ओह...! अभी तैयार होती हूं । " कहते हुए शोभा कमरे में भाग गई और अम्मां -बाबू हंस पड़े ।

शोभा ने अपनी शादी की लाल बनारसी साड़ी पहनी , गहनों से लदी, अपने को शीशे में निहारने लगी । गोरा रंग , माथे पर चटक लाल बिंदी , भर मांग सिन्दूर , ढ़ीली गूंथी चोटी और उस पर मोगरे की लड़ियां ।
मोगरे के फूलों की महक , जी भर श्वास से पी लेना चाहती है वह ।

शाम को चुपके से प्रताप ने हाथ में थमाते हुए कहा था_ " मेरी सुंदर परी के लिए होली का खूबसूरत तोहफा ।" शरमा कर शोभा ने हाथ में लेते हुए बनावटी गुस्से से कहा _ " फौजी आखिर फौजी ठहरे । लाए भी तो सिर्फ फूल।"

" पूरी दुनिया में इनसे कोमल , सुंदर , मासूम और क्या हो सकता है ? तुम कहो तो दो चार दुश्मनों का सिर काट कर तुम्हारे सामने रख दूं ? " खिलखिलाता हुआ प्रताप उसके सामने से ओझल ही नहीं होता ।

बाबू की व्हील चेयर की चरमराती आवाज  से शोभा संभल गई । बरामदे में आई तो  अम्मां ने पूजा की थाली  सजा ली थी ।
नारियल , बताशे का हार , अबीर-गुलाल और उपलों की माला , सब रख लिया था ।

शोभा जब थाली की सामग्री देख रही थी तब  ठकुराइन अपनी बहू की भोली सुंदरता का रसपान कर रही थी । कानों के नग जडे झुमके , जो उन्होंने अपनी इस प्यारी बेटी को शादी में चढ़ाए थे  , एक समय पूरी ठाकुर टोली की औरतों में चर्चा का विषय रहता था । आज भी उसकी चमक बरकरार है, नक्काशी के एक एक तार सजीव जान पड़ते हैं ।

नगों की चमक में ठकुराइन ने ठाकुर साहब की ओर निहारा और उन्हें अपनी ही तरफ ताकते देख संकोच से भर गई ।बहू के बालों में महकते गजरों को देख वृद्ध माता-पिता सुख और तृप्ति से उसे ही देखते रहे ।

" अम्मां , अब चलें क्या ? " अपनी ओर सास - ससुर को टकटकी लगाए देख कर शोभा असहज होती हुई अपने बालों को पल्ले से ढांकने लगी।
" हां-हां , चलो चलें । फूलों को मत ढांकों बहू । सुंदर दिखते हैं , खुला ही रहने दो ।" अम्मां ने प्रेम से कहा ।
अम्मां हमेशा ही शोभा से शुद्ध हिंदी में बोलने का असफल प्रयास करतीं थीं ।

घर से निकलते ही कई लोग मिल गए जो बाबू की व्हील चेयर लेने के लिए आगे आ गए । सब लड़कियां , बहुएं आपस में हंसी ठिठोली करते , एक-दूसरे को रंग में सराबोर करने की योजना बनाते चल रहीं थीं ।

" कैसे जाऊं सखी री , होरी खेलत हैं कन्हाई ।
होरी खेलत हैं कन्हाई , होरी खेलत हैं कन्हाई .....। " फाग गीत के शब्दों की स्पष्टता बढ़ती जा रही थी और लय के साथ मिलती ढोलक की थापों का नशा पूरे गांव को होलिका के पास खींच कर ला रहा था ।

दूर से ही शोभा ने देखा , प्रताप रमकर ढोलक बजा रहा है । बीच-बीच में गीत का मुखड़ा दोहराता जाता है ।

चंद्रमा अपनी चांदनी बिखेर रहा है , शुभ्रता के आवरण में लिपटी प्रकृति होली के दिन रंगीन हो जाने को बेताब नजर आ रही थी ।
ढोलक बजाते हुए प्रताप ने ऊपर नजर उठाई और सामने लाल बनारसी साड़ी में लिपटी , मोगरे के फूलों से बाल सजाए शोभा को देखा , तो बस.. देखता ही रह गया।

निगाहें मिलीं और चेतन जग जड़ हो गया । जो बातें जुबान से भी ना कही जा सकती थी वो चांदनी से पिघलकर दिलों से बहने लगी ।
फागुन की पूर्णिमा , फगुआ के बोल  , होली का उन्माद और हृदय से बहता असीम स्नेह प्रवाह।

प्रताप के हाथ रूक गए । उसे यूँ टकटकी लगाए देखकर  , युवकों की टोली ने गाना शुरू किया _
" राधा बन गई भौजी हमार , कान्हा हैं भैया फौजदार ।
छुट्टी मिल गई है इस बार ,
फगुआ मनेगा जी भर यार ।

प्रताप चौंककर फिर मुस्कुराने लगा । बाबू भी सबके साथ ताल में ताल मिला कर गा रहे थे ।

चार दिन पहले यही बाबू , पत्ते के खड़कने से भी अपनी व्हील चेयर लिए सामने जाते थे कि कहीं प्रताप तो नहीं आ गया ।
जीवन भर सेना में रहने वाला  सख्त , अनुशासन प्रिय , देशभक्त व्यक्तित्व , कहीं ना कहीं पितृत्व में दब गया था ।

रात खाना खाते समय अम्मां ने घोषणा कर दी _ " शोभा बिटिया ने यह जिम्मा हमरे कांधे सौंपा है कि यह बताया जाय कि अबकी दिवाली हम चार नाही , पांच लोग मनाइब । प्रताप बेटवा , ये बार दिवाली में सप्ताह -पंद्रह दिन की मंजूरी डालना । "
अम्मां के ऐलान करते ही मानो गोले दग गए _ " तुमने मुझे बिल्कुल अनजान रखा । हेडक्वार्टर से आए आदेश की तरह अम्मां ने संदेश दिया ..।" कहते हुए प्रताप ने लड्डू शोभा के मुंह में ठूंस दिया ।
दिन क्षणों में बीतने लगे । मोटरसाइकिल पर दोनों रोज घूमने जाते थे ।

" शोभा जरा आराम से , प्रताप अपनी गाड़ी तनिक धीरे चलाना ।" अम्मां सावधान करती ।

" प्रताप की अम्मां , नाहक चिंता ना किया करो । सूबेदार का पोता , फौजी बाप का बच्चा इतनी कच्ची मिट्टी का नहीं बना है। जाओ बच्चों , घूमो-फिरो ।" बाबू ने मूंछों पर ताव देते हुए कहा और अम्मां मुस्कुरा पड़ी ।

प्रताप के जाने के एक दिन पहले ही शोभा ने अपने मन की बात कही _ " प्रताप , हम अपने बेटे को इंजीनियर या डाक्टर बनाएंगे। यहां आसपास कोई अच्छा डाक्टर नहीं है, शहर जाना पड़ता है । जरूरी है क्या कि वह भी फौज में जाए ।" शोभा की आंखों में छिपा डर प्रताप ने पढ़ लिया।

" अरे.. अभी से ये सब मत सोचो । बेटी भी हो सकती है ‌। तुम पढ़ी लिखी लड़की हो , स्वस्थ बच्चे के विषय में ही सोचना चाहिए । वो क्या करेगा , कैसे करेगा..,सब बाद की बात है ‌।" समझाते हुए प्रताप ने कहा ।

प्रताप को लखनऊ तक दोस्तों ने पहुंचाया । जाते समय भी प्रताप सबकी नजर बचाकर  शोभा को आश्वस्त कर रहा था कि बच्चा दोनों का है और मां का अधिकार ज्यादा होता है ।

करीब सप्ताह घर में सन्नाटा रहा । प्रताप की चिट्ठियों से समाचार मिलते रहे । ठाकुर साहब के घर फोन भी था परन्तु ज्यादातर समय वह खराब ही रहता था । अभी भी संचार व्यवस्था उतनी सुधर नहीं पाई  थी ।

अम्मां बाबू तो पोते के सुंदर स्वप्न में खोए रहते । बीच में शोभा एक महीने के लिए मायके भी गई ।

शोभा की मां , उसकी पसंद का खाना बनाती , पिताजी भी पूरे समय ध्यान रखते थे । पता नहीं क्यों , पर शोभा का मन अपने उस घर के आंगन में अटका रहता जहां वृद्ध बाबू व्हील चेयर पर और अम्मां चारपाई पर बैठे एक एक पल काट रहे थे ।

" मां , पन्द्रह दिन हो गए । अब मुझे वापस घर जाना चाहिए । फोन भी लगता नहीं है पता नहीं अम्मां बाबू कैसे होंगे ? " दबी आवाज में जब कहा तो पिताजी हैरान रह गए पर मां ने इशारों में उनको दुनियादारी समझा दी ।

पिताजी खुद छोड़ने आए और अचानक समय से पहले बहू को सामने पाकर अम्मां निहाल हो गई। भूसी से सने हाथों से उसे छाती से लगा लिया ।
दरवाजे पर खड़ा पीपल भी झूम उठा ।

कैसा रिश्ता है अनोखा  , दिमाग की सोच से परे । बुरे लोग , बुरी ससुराल  , क्रूर सास , दहेज के लिए प्रताड़ना ,क्या ये सिर्फ कहानियों और  सिनेमा की कथावस्तु होती है ? "

आनन-फानन में ही अम्मां ने मोहल्ले भर को बता दिया कि बहू आ गई ।हम बूढ़ों को छोड़ कर रह ना सकी ।

अम्मां अपनी तैयारियों में जुटी रहती । गोबर के उपले सुखाकर ऊपर रखवा दिया ताकि बारिश में ‌ना भींगे । जच्चा-बच्चा के मालिश सेंक के लिए दाईं तय कर ली ।

कल ही नरम मुलायम कपड़ों की गुदड़ी सिलना शुरू कर दिया है ।

प्रताप का फोन कभी कभार ही आता था पर चिट्ठी हर सप्ताह पहुंचती थी ।
एक कठोर सैनिक के दिल की सहजता , स्याही की तरलता बनकर कागज पर उतर जाती थी।
प्रताप ने लिखा था कि उत्तर भारत में आजकल घुसपैठ और आतंकियों का जोर बढ़ गया है और इस कारण पूरी इकाई सावधान रहती है । कभी भी  , बिना कोई पूर्व सूचना के कहीं भी ड्यूटी का आदेश आ जाता है ।

चप्पे-चप्पे में इकाई के लोग फैल जाते हैं । कभी कभी तो एक स्थान से वापस लौटते ही , दूसरे जगह का आदेश दे दिया जाता है।

करीब महीने भर से प्रताप का ना फोन आया और ना ही कोई चिट्ठी। शोभा की निगाहें डाकिए पर टिक जाती थी ।अम्मां बाबू भी सोच में पड़ गए थे ।

बाबू ने पड़ोस के मनोज भैया को साथ लिया और तारघर जाकर सेना प्रमुखालय से संपर्क करने की कोशिश की । वहां के अधिकारियों ने बताया कि एक महीने से कश्मीर के अनंतनाग में प्रताप की ड्यूटी है और वहां से किसी भी प्रकार का संदेश देने की सुविधा नहीं है । सब कुशल है और टीम दो-तीन दिन में वापस आ जाएगी ।

इधर डाक्टर ने शोभा को पंद्रह-बीस दिनों का समय बताया था । अम्मां बाबू के कहने पर शोभा की मां भी आ गई ।

कमरे में टहलती हुई शोभा फोन की घंटी सुनकर चौंक गई ।
" अरे.... आज तो फोन ठीक हो गया है लगता " मन ही मन सोचते हुए शोभा ने फोन उठाया _ " हैलो...।" कुछ भारी और हांफती हुई आवाज में कहा ।

" वाह वाह शोभाजी , महीने भर दुश्मनों से लोहा मैंने लिया और हांफ आप रही हो ..भई कमाल करती हो । " इतने दिनों बाद प्रताप की आवाज सुनकर शोभा की आंखों से अविरल धारा बहने लगी ।

" एक महीने से ना फोन ना चिट्ठी । कुछ खबर पता ही नहीं रहता । सिर्फ हंसी मजाक सूझता है तुम्हें ।" शोभा सिसकने लगी ।

" रोओ मत प्लीज़ । मेरी ड्यूटी ही ऐसी थी कि कहां जाना है , कुछ भी पता नहीं था । अब नियमित फोन और चिट्ठी आएगी । पक्का...।" शोभा ने बाजू में खड़ी अम्मां को फोन दे दिया ।

आज घर का माहौल सामान्य हो गया । बाबू भी "आल्हा " की लाइनें गुनगुना रहे थे _

" खट-खट , खट-खट तेगा बाजे ,
छपक-छपक चली तलवार ।
खूब लडैया‌ हैं दो भाई
नाम कमाए महोबे क्यार ।"

प्रताप ने बताया कि उसे दिपावली में शायद एक महीने की छुट्टी मिल सकती है क्योंकि अभी की हुई ड्यूटी को ध्यान रखते हुए ऐसा हो सकता है ।

अगले सप्ताह की चिट्ठी में प्रताप ने अपना हालचाल बताया और शोभा के बारे में जानकारी ली ।

पंद्रह दिन पूरे हुए और अगली रात को शोभा को तकलीफ होने लगी । रात दस बजे शहर ले जाया गया ।

आश्विन मास की शुरुआत हो गई थी । हलकी गुलाबी ठंड पड़ने लगी थी । सुबह पांच बजे नन्हे-मुन्ने , गोल-मटोल ,गोरे प्यारे से स्वस्थ बच्चे ने दुनिया में कदम रखा ।  शोभा ने उसे भर आंख निहारा और फिर आंखें मींच ली ।
अम्मां ने घर पर खबर करवा दी थी तो पिताजी मिठाई लेकर आए और मिठाई बांटते हुए कहा _ " समधी जी बहुत ही खुश हैं । असली घी के लड्डू ले जाने का हुक्म दिया है ।"

प्रताप के मुख्यालय में खबर दे दी थी और अगले ही घंटे उसने अस्पताल में फोन किया और सब हालचाल पूछकर ही संतुष्ट हुआ ।

अम्मां बता रही थी कि _ " अब दौड़ा दौड़ा आएगा , बेटवा हुआ है । मुंह देखने के लिए भागा आएगा । तुम घर जाकर बात कर लेना बेटी ।" शोभा ने सिर हिला दिया ।

तीन दिन बाद जब घर गए तब बाबू दरवाजे पर व्हील चेयर पर स्वागत के लिए तैयार थे । आज पहली बार उसने बाबू को वर्दी में देखा था । ‌‌ बच्चे को " जय हिन्द " का नारा लगाकर गोद में ले लिया।

सप्ताह बीत गया पर प्रताप की चिट्ठी , फोन का पता नहीं था ।

बच्चे के काम काज में अम्मां और मां , पूरी तरह से व्यस्त हो गई । जब पालने में वो रोता तो बाबू बड़ी आवाज में सैनिक कारनामे सुनाते या देशभक्ति के गीत गाने लगते ।

" दादा बनकर तो तुम सठिया ही गए हो परताप के बाबू । दस-बारह दिन का बच्चा क्या समझ रहा है ।" अम्मां खिसिया जाती ।
" अरी भागवान .., पूत के पांव तो पालने में ही दिखाई देते हैं । जिसका दादा , ताऊ , बाप फौजी , उसको देशप्रेम सीखने में क्या बरसों लगेंगे ? " गर्व से चेहरा चमक रहा था ।
फिर प्रताप का समाचार मिला की वह धनतेरस के दिन पहुंच जाएगा और तभी बारसा कर लिया जाएगा ।

बारसा की तैयारी और शुभ समय  देखने के लिए चौबे जी महाराज पंचांग लेकर पहुंचे । बोले _ " बालक की जन्मपत्रिका भी बन जाएगी । अरे.... जिसका दादा फौलाद है उसके पोते की कुंडली में क्या मुसीबत आएगी ? " और चौबे जी ने अपने हिस्से के लड्डू साफ कर दिए ।

धनतेरस के दिन सुबह पूजा कथा और शाम को नाश्ता का प्रावधान  रखा था । प्रताप सुबह आने वाले थे और शाम को जल्दी कार्यक्रम खत्म करने का प्रयास किया जाएगा जिससे लोग अपने घर में धनतेरस की पूजा कर सकें ।

शोभा के मन में लड्डू फूट रहे थे।होली की हुड़दंग और रंग वह भूली नहीं थी । अब दीवाली पर भी वैसी ही चहल-पहल रहेगी ।

शोभा को शादी के बाद की पहली दीवाली अच्छे से याद है । प्रताप को पता है कि वह पटाखों से बहुत डरती है इसलिए वह आंगन में पटाखे लगाकर उसका हाथ पकड़ कर सामने ले जाता ।

" प्रताप , मुझे पटाखों से डर लगता है। उनकी आवाज से धड़कन बढ़ जाती है । मुझे नहीं जाना है बाहर.. ।" कहते हुए वह हाथ झटक कर बरामदे में भाग आई ।

" वाह ! क्या बात है ? इनको पटाखों की आवाज से डर लगता है और वहां सेना में लड़कियों की बटालियन है , वायुसेना के विमान उड़ाती है लड़कियां । युद्ध श्रेत्र में रसद ले जाना , घायलों के इलाज की व्यवस्था , सारी जिम्मेदारी औरतें संभालती हैं । " एक लंबी सांस लेकर उसने आगे कहा _ "मुझे मालूम है कि तुम बड़ी हिम्मती हो । एक सामान्य परिवेश में बढ़ी लड़की ने , सबके विरोध के बावजूद एक फौजी से विवाह के लिए हामी दी । यह कोई साधारण बात नहीं है ।" गर्व और प्रेम से प्रताप ने स्वीकारा ।

" पर चाहे तुम जो भी कहो मैं पटाखे नहीं फोड़ सकती ।" कहकर वह घर के अंदर भाग गई थी ।

काफी रात हो चुकी थी और कल की सारी तैयारियां भी करीब हो गई थी । हलवाई अपना सामान रखवा गए थे।घर रंग-रोगन से चमचमा रहा था मानो पूरे देश की दीवाली इसी घर में आई है ।

बाबू व्हील चेयर पर घूम घूमकर मुआयना कर रहे थे कि सब बढ़िया तो है । आंगन में बिजली का  बड़ा सा लट्टू लगवा दिया था जिसकी सुनहली रोशनी  बिखर रही थी ।

अम्मां ने बाबू को शाल उढा़ते हए कहा _ " परताप के बाबू , अब सो जाओ । सुबह जब पूजा का विधान होई , हलवाईयन का काम होई ,तब तुम्हीं का  सब बाहर का काम देखे लागी । " व्हील चेयर अंदर की ओर घुमाते हुए अम्मां बोल रही थी _ " फूल , तोरण वाले भी भिनसार आ जाएंगे । बच्चे का झूला , दरवाजा सब सजाए का कहत रही शोभा ।"

अम्मां की कल की डायरी चालू ही थी कि फोन की घंटी घनघना गई।

बाबू ने तेजी से फोन की ओर चेयर का रूख किया और मन ही मन बड़बड़ करने लगे _ " ना जाने, अभी किसका क्या काम अटका है ? सबका हिसाब किताब तो तय हो गया है ।"

बाबू ने फोन उठाकर कहा _ " हैलो..। कौन बोल रहें हैं ? "  फिर दूसरे ओर से कुछ बात हुई ।

बाबू ने कहा _ " हाँ , मैं उसका पिता रिटायर्ड सूबेदार मेजर सूरजभान सिंह बोल रहा हूं ।"
दूसरे ओर से कुछ बात हुई और बाबू के हाथ से फोन छूट गया .." हैलो.... मेजर साहब.. हैलो ..." आवाज फोन से गूंज रही थी ।

शाल शरीर से गिर गई और उससे भी तेजी से आंखों से सैलाब बहने लगा ।
अम्मां की ओर निरीह भाव से देखने लगे फिर दोनों हाथ जोड़कर फफक-फफक कर रो पड़े ।
अम्मां ने कुर्सी का सहारा लिया। सारा आंगन , घर और दुनिया घूमने लगी । फोन को ऐसे दूर फेंक दिया जैसे बम हो और इस भरी बस्ती को आग लगा दी हो ।

दोनों हाथ जोड़कर बहू के सामने अपराध बोध से ग्रस्त खड़े थे ।
इस नन्हीं सी जान को क्या कहेंगे ? क्यों भेजा था बाप को फौज में ? उसने तो अपने पिता को देखा भी नहीं ।

शोभा मूर्तिवत, यंत्रवत बैठी रही ।  दिमाग की नसें फट रही थी । अंदर सब कुछ बिखर रहा था । आंखों से आंसू नहीं आ रहे थे वो भी मस्तिष्क के आदेश का इंतजार कर रहे थे ।

आंगन में लगा लट्टू , हवा से हिल हिल कर कई छोटे बड़े काले घेरे बना रहा था और यह पूरा परिवार उसके काली परछाइयों में घिर गया था ।

सारे गांव में यह खबर जंगल के आग की तरह फैल गई । लोगों का तांता लगना शुरू हो गया ।

सुबह ग्यारह बजे वे प्रताप को लाने वाले थे ।
लोगों ने सजावट निकालना शुरू किया तो बाबू ने हाथ के इशारे से मना कर दिया ।

कुछ रिश्तेदार भी आसपास से आ गए जो बारसे के लिए आने वाले थे ।
बाबू अपने जांबाज बेटे "  शहीद कैप्टन प्रतापसिंह "के सम्मान में वर्दी पहने दरवाजे पर थे ।

कश्मीर घाटी के दंगाग्रस्त क्षेत्र में नियंत्रण टीम में प्रताप गया था।
स्थानीय निवासियों को सुरक्षित रखने के लिए मुठभेड़ में प्रताप को गोली लगी थी ।
पूरे शासकीय सम्मान के साथ , तिरंगे में लिपटा प्रताप घर आ गया। उसकी वर्दी , उसकी घड़ी और सामान बाबू को दिया गया । बाबू ने उसे शोभा के हाथों में पकड़ा दिया और हाथ जोड़कर माफी की मुद्रा में फफक  पड़े ।

इस परिवार ने दो जवान बेटे देश की खातिर न्यौछावर कर दिया थे। अब वो कंगाल हो गए थे । उनका गर्व  , उनका राष्ट्र प्रेम , आज उन्हें तोड़कर रख दिया था ।

प्रताप को अंतिम विदाई देने और उसके बेटे से मिलवाने की जिम्मेदारी शोभा ने उठाई । वह कमरे में गई और जब बाहर आई तो शरीर पर  प्रताप की वही वरदी थी जो उसे शहीद का मान दिलाई थी ।

गोद में बच्चे को लेकर चलती हुई आई । प्रताप के पास ले जाकर बोली _ " आज इसका नामकरण है । तुम्हारी पसंद का नाम " कीर्ति प्रताप सिंह " ही रखना है ।
उसने सैल्यूट किया और बच्चे को अम्मां के गोद में डाल दिया ।

आज उसने पहली बार सही हिसाब किया है । इस घर ने दो फौजी बेटे खो दिए हैं । आज शोभा ने अपने मनोबल से परिवार को और देश को फिर से दो फौजी  देने का संकल्प कर लिया ।

दृढ़ संकल्प से तो बड़ी से बड़ी दुविधा की बेड़ियां कट जाती है ।
अब ना तो कोई डर , ना कोई चिंता और ना ही कोई मुश्किल है उसके सामने । क्षितिज तक सारा कुछ साफ नजर आ रहा है ।