शनिवार, 12 मई 2018

टेसू का फूल

सामने टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम को देखकर मीता की निगाह उसी पर जम कर  रह गई। जानी-पहचानी सी जगह, जाने-पहचाने पहनावे वाले लोगों को देख कर उसनेे आवाज थोड़ी और तेज कर दी।

बस्तर के आदिवासियों के ऊपर बनी कोई डाॅक्यूमेंटरी फिल्म चल रही है। वहाँ के लोकगीतों और पारंपरिक नृत्यों की जानकारी दी जा रही है। आदिवासी अपने पारंपरिक पहनावे में एक समान थिरक रहे हैं। सालों पहले की घटनाऐं चलचित्र की तरह आँखों के सामने चलने लगीं।

आज से तीस साल पहले, बाल विकास में स्नातकोत्तर की उपाधि के तुरंत बाद उसे बाल विकास अधिकारी की नौकरी मिली थी। सरकारी नौकरी, अच्छी तनख्वाह, जाने आने के लिए गाड़ी, मीता खुशी से फूली न समाती थी। प्रशिक्षण के लिए दो महीने बस्तर के आदिवासी क्षेत्र में रहकर काम करना था। रहने की सुविधा  विभाग ने की थी और मीता के साथ एक अन्य लड़की तथा दो पुराने कर्मचारी थे।

मीता को आज भी याद है कि अम्माँ नहीं मानी थीं।
"अरे.. बस्तर के जंगलों में क्या ये लड़की अकेली जाएगी?" अम्माँ ने घर सिर पर उठा लिया।
" मैं कोई अकेली तो नहीं हूँ अम्माँ और लोग भी साथ में हैं।" मीता ने विरोध करते हुए कहा "मैं जंगल में अकेली घूमती नहीं रहूँगी काम करने जा रही हूँ।"

अंततः अम्माँ भी एक  माह के लिए साथ आईं। वह तो बहुत खुश थी कि अम्माँ के रहने से उसको बड़ा सहारा हो जाएगा पर बाबूजी और छोटा भाई सिद्धू के चेहरे उतर गए थे।
"जाओ तुम बिटिया के साथ, यहाँ का खाना-पानी मैं संभाल लूंँगी। शहर है सब मिल जाता है। तुम निश्चिंत होकर जाओ।" दाई ने सालों काम करने का नाता निभाते हुए कहा था।

फिर महीने भर का जरूरी सामान लेकर मैं और अम्मां बस से जगदलपुर पहुँचे। बस अड्डे पर उतरने के बाद विभाग की गाड़ी मिल गई थी जिससे करीब दो घंटे की सड़क यात्रा के बाद हम केंद्र पहुँचे।

आज भी आँखों के सामने से वह  खूबसूरत मंजर हटाए नहीं हटता।
हरे-भरे जंगलों के बीच से गुजरते धूल भरे संकरे रास्ते, सागौन-साल के पेड़ों से बहकर आती हवा, मादक महुआ और तेंदु की खुशबू और दूर दूर तक फैले लाल लाल टेसू के पेड़, मानो होली का रंग उंडेल रहे हों।

एक छोटा सा भवन महिला एवं बाल विकास विभाग का कार्यालय था। कुछ ही दूरी पर चार-पाँच कमरे बने हुए थे, जिनमें प्रशिक्षणार्थियों के रुकने की व्यवस्था थी। पूरे इलाके में इतने ही  पक्के मकान थे, बाकी बाँस-बल्लियों, मिट्टी, घास-फूस और खपरैल के कच्चे घर थे।
मीता का कमरा छोटा पर प्रकाशदार था। एक पलंग, टेबल और एक आलमारी थी। सभी कमरों को जोड़ता हुआ एक लंबा बरामदा जिसमें दो बैंच रखी थीं।

कार्यालय का चपरासी बाबूलाल वहीं का निवासी था। ऑफिस खोलना, बंद करना, प्रशिक्षार्थियों की मदद करना, जगदलपुर जाकर आदेश लाना और काम की जानकारी ले जाना, अनेक कामों की एक तनख्वाह लेता था बाबूलाल।

"ये दुलारी है, सब काम जानती है। शहर वालों से बात भी कर लेती है। आपका जो काम हो कर देगी, आप  समझ कर जितना पैसा देना चाहो दे देना।"
बाबूलाल ने उसका परिचय देते हुए कहा।
" ऐ दुलरिया .. काम ठीक करबे , पैसा दिहीं तोला।" बाबूलाल ने उसको समझाया।

दुलारी का यह पहला परिचय था। सामने अट्ठाइस-उनतीस साल की युवती, साँवला रंग, मध्यम कद-काठी, कसी देह, घुटने तक की साड़ी पहने, बालों का खोपा(जूड़ा) बांधे, गले में काला धागा, पैरों में तोड़ा, हरे रंग की साड़ी और ढीला सफेद ब्लाउज़ पहने हुए, सिर झुकाए खड़ी थी।

हाथों में अलग-अलग रंगों की, ढेर सारी काँच की चूड़ियाँ, शरीर के खुले भाग में गोदना के नमूने बने थे। ठुड्डी पर बना त्रिभुजाकार गोले वाला नमूना उसके चेहरे पर बहुत खिल रहा था। वह यहाँ के खुले , सुंदर वातावरण की तरह ही मोहक लगी।

उसने बाहर से कुछ पत्तियाँ, बाँस की छीलन और सींकें जमा की, सबको कपड़े की एक चिंदी से बाँधकर झाड़ू बना लिया। आनन-फानन में घर की सफाई कर दी। अम्माँ ने सारा सामान जमा लिया। वो अपनी झोपड़ी से चाय और मटका भर ठंडा पानी ले आई।
मीता को आज भी उस समय की याद करके हँसी आ गई कि अम्माँ  दुलारी के लाए पानी को पीने से इंकार कर दिया था।

कुछ-कुछ दूरी पर छोटे-छोटे, सुंदर मिट्टी और बाँस के घर बने थे। छुई, चूने से पोते हुए बड़े ही साफ-सुथरे और प्यारे घर। इन पर लाल गेरू से कलात्मक नमूने बनाए गए थे जिनमें मुख्यतः मोर, कलश, देवी-देवताओं के चित्रों की कलाकारी अनुपम थी‌। मीता उनकी कलाकारी देख कर दंग रह थी।

विभाग के आदेशानुसार प्रशिक्षण का काम शुरू कर दिया गया। आसपास के क्षेत्रों में जाकर महिलाओं-बच्चों को स्वास्थ्य और शिक्षा के बारे में जानकारी देना, स्वच्छता और टीकाकरण अभियान के तहत मुफ्त  जरूरी दवाइयां एवं टीकाकरण की व्यवस्था करना और सरकार की नीतियों की जानकारी देते हुए उनको पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना, यही काम मीता और उसकी टीम कर रही थी।

बिल्डींग के बाहर सड़क पर से एक कार जोर से हार्न बजाते निकली और मीता की तंद्रा मानो टूट गई। उसने उठकर टेलीविजन बन्द कर दिया, अब विदेश के किसी जगह को दिखाया जा रहा था पर मीता का मन तो बस्तर के उस गाँव की पथरीली, धूलभरी सड़कों पर भटक रहा था।

अम्माँ स्टोव साथ लेकर आईं थीं। मिट्टी तेल की व्यवस्था बाबूलाल कर दिया करता था। अम्माँ कभी-कभी चाय-नाश्ता उसको भी दिया करतीं थीं। रसोई की जरूरत का सामान सब्जी, दूध, मसाला सब दुलारी लाती थी।

"अम्माँ, कालि हाट भरही जाबो का।  अच्छा जीनिस रहिथे।" मीता ओर देखते हुए दुलारी ने कहा।
हाट वाले दिन दुलारी के साथ अम्माँ, मीता और उसकी सहेली गए। बाजार क्या था, पूरे बस्तर को एक साथ सिमटे देख रहे थे वे वहाँ।
चूड़ी-बिंदी, रिबन, फुँदना, कंघी-तेल, रंग-बिरंगी मालाऐं, कौड़ियों के गहने, सब्जियाँ, चार, महुआ, तेंदु, जामुन, अनाज, मसाले, मिट्टी और लकड़ी के खिलौने ... और ना जाने क्या क्या?
सूप और टोकरियों के एक से एक नमूने थे। अम्माँ ने कुछ सब्जियाँ, मसाले खरीदे। मीता ने दोनों में बिक रहे तेंदु खरीदे। दुलारी के लिए अम्माँ ने, लाल रंग की काँच की ढेर सारी चूड़ियाँ लेकर दीं।

उस दिन से दुलारी रोज  जंगल से जामुन, चार, तेंदु  लाती और पत्ते से दोना बनाकर उसमें हमें देती। कभी पैसे नहीं लिए , कहती " झाड़ से तोड़े हवौं, खरीदे नहीं हौं।"

एक महीने बाद जब अम्माँ वापस गई, तब दुलारी से एक आत्मीय रिश्ता बना गईं।
"दुखियारी है बेचारी दिन-रात मेहनत करती है, पैसे घरवाला ले लेता है। शराब पीकर मारता-पीटता भी है। गेस्ट हाउस में खाना बनाकर भेजती है, हमारु सारे पैसे बर्बाद कर देता है।" उस दिन मीता को दुलारी के पति का नाम पता चला।

अम्माँ को छोड़ने मीता और उसकी  सहेली जगदलपुर  बस अड्डे तक गए। जीप में बैठे, तभी दुलारी दोनों हाथों में दो कटहल लिए आई और अम्माँ की गोद में धर दी। अम्माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया मानो कह रही हो "इस नई जगह मेरी बेटी का ध्यान रखना।"
ड्राईवर ने गाड़ी बढ़ा दी और दुलारी देर तक हाथ हिलाकर विदा कर रही थी।

अचानक मीता को दूध जलने की बू आई। ओह! दूध का पतीला गैस पर रखा था और भूल गयी। रसोई में जाकर देखा तो दूध गिर कर फैल गया था। वह साफ किया और अपने लिए एक गिलास दूध लेकर बाहर आई।

सुमित भी नहीं हैं, बेटी के पास पूना गए हैं। २_३ दिनों में बच्चों को लेकर आने वाले हैं। गिलास हाथ में लेकर वह, खिड़की के पास आ गई। आज पूर्णिमा का चाँद अपनी पूरी छटा बिखेर रहा है। बादलों में तारे यूँ छिटके हैं मानो किसी सुंदरी ने अपने लंबे काले बालों में छोटे छोटे सफेद फूल सजाएँ हों।

ऐसी ही पूर्णिमा की चाँदनी रात थी जब आदिवासी लोग अनाज कटने की खुशी मना रहे थे। सारा इलाका सजाया गया था। घर घर में पत्तों और फूलों के तोरण बँधे थे।गाँव की देवी के मंदिर के सामने, औरत-आदमियों एवं बच्चों का जमघट लगा था। शाम से ही ढोल-नगाडे़ की थाप सुनाई दे रही थी और लोकगीतों का सुर वातावरण में गूँज रहा था। सज धजकर लोग, देवी को नया अनाज चढ़ाने आए थे।

नई टोकरियों में चावल, सूप में गुड़ और मटकियों में चावल और महुए की शराब रखी थी। जैसे जैसे रात बढ़ रही थी, लोगों का जोश भी बढ़ता जा रहा था। ढोल की थाप पर आदिवासी बालाओं का नृत्य समां बांध रहा था। पत्तों के दोने में प्रसाद के रूप में शराब दी जा रही थी।

आज दुलारी का रूप-सौंदर्य देखते ही बनता था। बाँहों में बंद, कमर में करधन, पाँवों में तोड़े, कौड़ियों की बनी मालाऐं, फूलदार साड़ी और कलाई में काँच की लाल चूड़ियाँ जो अम्माँ ने हाट से लेकर थी।
आज बालों को भी खूब सजाया था। सधे खोपे में बाँस की सींके और उसके चारों ओर टेसू के लाल लाल फूलों की सजावट की थी।

चाँद की शुभ्र किरणें जब उसके साँवले शरीर पर पड़ रही थीं तो उसका अंग-अंग चमक जाता। बहुत खुशी से थाप पर थिरक रही थी। हमने थोड़ी देर देखा और वापस आ गए। रास्ते में हमारू मिला जो नशे में चूर मंदिर की ओर जा रहा था।
गीतों और ढोल की आवाज बहुत रात तक आती रही।
सुबह आँख थोड़ी देर से खुली तो बाहर के शोर-शराबे से मीता चौंक पड़ी। खिड़की खोलकर देखा तो दुलारी के घर के बाहर भीड़ जमा थी और पुलिस की गाड़ी भी खड़ी थी।

"अरे ये क्या हुआ ! दुलारी के घर पुलिस क्यों आई है?" मन में सोचती हुई उसने अपनी दोस्त के कमरे के दरवाजे पर दस्तक दी। चप्पल पैरों में डालते हुए वो दोनों दौड़ते हुए उस भीड़ में शामिल हो गए।

सामने का दृश्य दिल दहला देने वाला था। पुलिस दुलारी को पकड़कर ले जा रही थी।

दुलारी का सारा साज-श्रृंगार उजड़ा हुआ, पीठ पर फटा ब्लाउज़ झूल रहा था जिसमें से उसकी जली, झुलसी खाल लटक रही थी। मांस के टुकड़े जैसे जलकर चिपक गए थे। उसके हाथ में लाल लाल कुछ चूड़ियाँ और रक्तरंजित कुल्हाड़ी थी। सुंदर जूड़ा बिखर गया था और उसमें टेसू का एक फूल अटका हुआ था।

मीता को देखकर वो एक क्षण ठिठकी मानो अपना सारा दर्द आँखों से बता देना चाहती हो। उसने एक बार चारों तरफ दृष्टि घुमाई और फिर गाड़ी में बैठ गई।
पुलिस की जीप धूल उड़ाती सड़कों पर आगे बढ़ गई।

"रात हमारू उत्सव से ले आया था उसको, बहुत मारा-पीटा सलाखों से दागा। उसे जबरदस्ती गेस्ट हाउस में किसी साहब के पास ले जाने की जिद कर रहा था। एक साइकिल के लिए उसका सौदा किया था।" बाबूलाल अपनी जानकारी के अनुसार बता रहा था।
"दुलारी बड़े अच्छे चरित्र की थी। आँगन से बाहर जब उसको हमारू घसीटते हुए ले जा रहा था तब उसने कुल्हाड़ी उठा ली और हमारू का सिर अलग कर दिया।" बाबूलाल की आवाज काँप रही थी।

आज भी उस वाकिए को याद करते हुए मीता का रोम रोम सिहर उठा।
कितना दुःख, कितनी पीड़ा, कितना अपमान सहन कर रही थी, आखिर एक ना एक दिन जवालामुखी को फूटना ही था।
दुलारी के हाथों की लाल लाल चूड़ियाँ और उनमें वो रक्तरंजित कुल्हाड़ी, आज भी मीता को बैचेन कर रही है।

अब दूध पीने की इच्छा बिल्कुल मर गई और दूध का गिलास ढाँककर, मीता बिस्तर पर पड़े हुए सोने का असफल प्रयास कर रही है।

शनिवार, 5 मई 2018

"परछाईयाँ "

सोनल जब नहाकर बाहर आई तो  फूलदान में सजे , सुंदर, चटकीले रंग के पहाड़ी फूलों को देखकर हैरान हो गई । कुछ देर पहले यह फूलदान खाली था ।
"किसने सजाया इस फूलदान को ? बहुत ही खूबसूरत फूल हैं ।" फूलों की ओर निहारते हुए सोनल ने कहा ।

"एक लड़की आई थी , बिना कुछ कहे चुपचाप फूल सजा गई । शायद गेस्ट हाउस की ओर से होगी ।" अमित ने अखबार पलटते हुए कहा ।
" अच्छा! अब चलो , बाहर जाना है ना घूमने । तुम तैयार हो ही नहीं रहे ।" प्यार से सोनल ने कहा ।

" अरे...कल शाम तो आए हैं । अभी आठ दिन यहीं रहना है । आराम से घूमेंगे । जीजाजी ने माॅल रोड , बाजार और भीड़ भाड़ से दूर यह जगह हमारे हनीमून के लिए पक्की की है । शांति से यहीं गुजारते हैं ये आठ दिन ।" अमित ने मस्ती से कहा ।

"ठीक है मैं ही घूम आती हूँ , तुम अकेले बैठे रहो ।" सोनल ने जरा तुनकते हुए कहा ।
"अच्छा बाबा , चलते हैं । सिर्फ दस मिनट ‌लगेंगे मुझे ।" कहते हुए अमित बाथरूम में घुस गया ।

थोड़ी देर बाद दोनों हाथों में हाथ डालकर बाहर निकल पड़े । शादी के एक माह हुए , यह जोड़ा हनीमून के लिए कौसानी आया है।

कौसानी , जिसकी सुंदरता ने पंतजी को "प्रकृति का सुकुमार कवि" बना दिया । दूर दूर तक फैली पर्वत श्रृंखलाऐं , नंदा देवी के  उत्तुंग शिखर , हरी भरी वादियाँ , सीधे खड़े चीड़ और देवदार के वृक्ष , मानो उचक कर बादलों को छूना चाहते हैं । फूलों और झाड़ियों से टकराकर आने वाली ठंडी हवाऐं , मन को प्रसन्न कर देती हैं । यूँ ही इस जगह को भारत का स्विट्जरलैंड नहीं कहते।

ठंडी हवाओं को अंदर तक महसूस करने के बाद सोनल ने अपनी शाॅल अच्छी तरह लपेट ली। धूप का एक छोटा-सा टुकड़ा भी शरीर पर  बहुत सुकून दे रहा था ।

दिसंबर की पहाड़ी ठंड का लुत्फ उठाते हुए यह नया जोड़ा , अपने जीवन के सुनहरे सपने बुन रहा था ।

चार दिन तो जैसे चार पलों में निकल गए । एक दूसरे में मस्त , वे प्रकृति की गोद में छिपे बैठे हैं। ना परिवार और रिश्तेदारों की झंझट , ना नौकरी का तनाव । एक दूसरे को करीब से समझने का सबसे अच्छा समय बीता रहे हैं ।

सुबह से ही हल्की सी धुंध छाई है। दोपहर को अमित ने कहा _" मुझे प्रोजेक्ट के बारे में कुछ बात करनी है ।यहाँ नेटवर्क ठीक नहीं आता । मैं माॅल रोड के किसी जगह से , काम कर के आता हूंँ । तुम यहीं आराम करो , मैं जल्दी वापस आ जाऊँगा ।"

"ठीक है लेकिन जल्दी आना । आज काफी धुंध छाई हुई है ।शाम मत करना । दोपहर में ही शाम लग रही है।"सोनल ने चिंता करते हुए कहा ।
" अरे..बस गया और दो घंटे में आ ही जाऊँगा । गेस्ट हाउस की कार में ही जा रहा हूँ ।" कहते हुए अमित बाहर निकल आया और सोनल ने हाथ हिलाकर उसे विदा किया ।

सोनल , वहीं बरामदे में बैठ गई । बाँस की जालियों से छनकर ठंडी हवा आ रही थी । सूर्य को आज बादलों ने ढंक रखा है । कोहरे की पतली सी चादर , वादी के सब रंगों को , लपेटे हुए थी ।

सहसा ,सोनल का ध्यान फूलदान की ओर गया । आज फूल बदले नहीं किसी ने । उठकर वह फूलों को निहारने लगी । ऐसे फूल शहरों में नहीं मिलते । दरवाजे पर  दस्तक हुई , पलट कर देखा तो वो लड़की खड़ी थी । हाथों में चटकीले , रंग-बिरंगे फूलों का गुच्छा लिए , उसी की हमउम्र , बहुत सुंदर , गोरी , लंबी , छरहरी काया , तीखे नैन-नक्श की पहाड़ी युवती सामने थी । कानों में बड़ी बड़ी बालियांँ और माथे पर गुलाबी रंग की बिंदी थी ।

सोनल उसको ठगी सी देखती रह गई ।'भगवान ने बड़ी फुर्सत में बनाया है इसको ' मन ही मन सोनल ने सोचा ।

" फूल लगाने आई हो?" हाथों में फूल देखने के बाद भी बेतुका सवाल किया ।
" जी हाँ , आज देर हो गई ।धुँध के कारण फूल अभी तोड़ी ।" फूलदान की ओर बढ़ते हुए उसने कहा ।
फूलदान साफ करके , बड़े ही प्यार से उसने फूल लगाए । पुराने फूल लेकर वापस जाने लगी तो सोनल का मन उससे बात करने का हुआ ।

" यहीं रहती हो आसपास ? फूल कहां से लाती हो ? बहुत ही खूबसूरत हैं ।" उसे बातों में उलझाते हुए सोनल ने पूछा ।
"हाँ , यहीं रहती हूँ , नीचे गाँव में । पहाड़ियों में ये फूल सब तरफ होते हैं । शहर वालों को अच्छे लगते हैं इसलिए हम फूल सजाते हैं ।" उसने बड़ी शांति और शालीनता से कहा ।
" पहाड़ों के बारे में जितना सुना और पढ़ा था , उससे भी कहीं ज्यादा खूबसूरत हैं ये पहाड़ और यहांँ के लोग ।" उसकी सुंदरता निहारते हुए सोनल ने कहा ।

" आज साहब नहीं हैं क्या ?" उसने सीधा प्रश्न किया ।
" बाहर गए हैं काम से । शाम के पहले आ जाएँगे । तुम बैठो ना , मुझे यहाँ के बारे में कुछ जानकारी लेना है ।" उससे सोनल ने आग्रह किया ।

सोनल ने लकड़ी का दरवाजा टिका दिया परन्तु ठंडी हवा जालियों से घुसपैठ कर रही थी ।वह पुराने फूल हाथ में लिए , वहीं जमीन पर बिछे गलीचे पर बैठ गई ।

" अरे.. ऊपर बैठो ना । कितनी ठंड है  ।" अपनेपन से सोनल ने कहा ।
" हम पहाड़ों में रहने वाले नीचे ही बैठते हैं । आदत है हमें ।" उसने कहा ।
"मुझे यहांँ के बारे में कुछ बताओ।
जानना है मुझे , फिल्मों और अखबारों से ही जाना है । अब तुम कुछ बताओ  ।" उत्सुकता से सोनल ने पूछा ।
" क्या बताऊँ , क्या सुनेंगी आप ?" सधी आवाज में बोली ।
" कुछ भी , कोई सच्ची घटना , कोई कहानी जो यहाँ की छाप छोड़ दे ।" बच्चों की तरह सोनल ने कहा ।
" एक कहानी है जो पहाड़ी कहते हैं , पर आप शहरी लोग विश्वास नहीं करते ।" उसने कहा ।
" नहीं नहीं , मैं विश्वास करूँगी ।" सोनल ने मन ही मन सोचा कि अमित के आते तक अच्छे से समय कट जाएगा ।

" कहाँ से शुरू करूँ ?  चलो इन पहाड़ी फूलों से ही करती हूंँ ।" कहते हुए मानो वो उस कहानी का अनुभव करने लगी ।

" पहाड़ी फूलों की तरह ही सुंदर , चटकीली और खुशनुमा थी वो । नाम भी  था फुलवा । अपने पति के साथ नीचे वाले गांव में रहती थी । बंगलों और गेस्ट हाउस की साफ-सफाई और देखभाल करते थे दोनों । गेस्ट हाउस से बंधी तनख्वाह मिल जाती थी और आने वाले लोगों से बख्शीश भी।

मंगलू बहुत प्यार करता था उसको , कहता_" ना जाने , कौन सा जल चढ़ाया था कि तेरे जैसी घरवाली दी भोलेनाथ ने ।" फुलवा शरमा कर लाल हो जाती । बड़ी खुश थी मंगलू के साथ ।

सुबह से शाम तक काम करते थे । घर से रोटी लाते और दोपहर को दोनों साथ बैठकर किसी पेड़ की छांव में खाते । एक दिन मंगलू ने कहा_" ऐ फुलवा ! अरी दिन भर फूल पत्ते देखती हो , कमरों में सजा दिया कर । ये शहरी लोग पहाड़ी फूलों को बड़ा पसंद करते हैं । खुश रहेंगे तो बख्शीश भी ज्यादा मिलेगी फिर तेरे लिए पायल ले दूँगा । छम छम करती घूमना ।" मंगलू ने राज की बात बताई ।

"  ठीक है तू कहता है तो सजा दिया करूँगी । सिर्फ गेस्ट हाउस में ही , वो ही हमें तनख्वाह देते हैं।" बड़ी इतराती हुई बोली फुलवा ।
" ठीक है बाबा , गेस्ट हाउस में ही लगा दिया करना ।"  बात खत्म करते हुए मंगलू ने कहा ।

अब फुलवा को उसका मनपसंद काम मिल गया था । रोज लाल-पीले , सफेद-बैंगनी , फूलों का गुलदस्ता बनाकर रख दिया करती । एक दिन जब मंगलू ने उनमें से एक फूल लेकर उसके बालों में लगा दिया , तो शरमा कर भाग गई फुलवा ।

" ये बारिश का मौसम बड़ा खतरनाक होता है पहाड़ों पर मेमसाब ।"पीठ सीधी करते हुए वह बोली ।
" पैर सीधे कर लो , दर्द हो रहा होगा ।" सोनल ने कहा ।
" नहीं मैं ठीक हूँ । साहब जल्दी आ जाते तो अच्छा होता । एक बार घनी धुँध ने घेर लिया तो रास्ता दिखता नहीं ।" अमित के प्रति उसकी ये चिंता , ना जाने क्यों सोनल को अच्छी लगी ।

" हां , काम होते ही आ जाएंगे । अब मंगलू और फुलवा के बारे में आगे बताओ ना ।" उत्सुक सोनल ने पूछा ।

" आप दोनों की तरह ही खुश और एक दूसरे में डूबे रहते थे ।" मुस्कुराते हुए वह बोली ।
जाने क्यों सोनल शरमा गई ।
आगे वह कहने लगी _" एक दिन गेस्ट हाउस में कुछ बड़े लोग आए थे ।बादल छाए हुए थे और हल्की बारिश हो रही थी । मंगलू को कुछ सामान लेने के लिए उन्होंने नीचे गाँव में भेजा था । फुलवा काम करके मंगलू का इंतजार कर रही थी कि वह जल्दी आए और बारिश तेज होने के पहले वो घर पहुँच जाएंँ ।" ये शहर के लोगों को मौसम का कुछ पता नहीं होता , कभी भी काम बता देते हैं भोला है मेरा मंगलू जो ऐसे मौसम में 'ना' नहीं कर सका । " मन ही मन वह बड़बड़ा रही थी।

धीरे धीरे बारिश तेज हो गई । बीच-बीच में बिजली चमक जाती। बादलों के गर्जन पर बिजली का नर्तन , पूरी वादी खामोशी से देख रही थी ।

लंबी सांस भरकर  , पहाड़ों की ओर देखते हुए उसने कहा _" ये सुन्दर पहाड़ , बारिश में भयानक लगने लगते हैं  ।" आगे बताने लगी _" अचानक गेस्ट हाउस की बिजली कट हो गई । बारिश में अक्सर ऐसा होता है । गेस्ट हाउस के लोग आवाज देने लगे कि मोमबत्ती कहाँ है ?

फुलवा भागकर कमरे में गई । "अभी जला देती हूँ साहब " कहते हुए फूलदान के नीचे के भाग में रखी मोमबत्ती और दियासलाई निकाल ली।"
वह एक क्षण के लिए रूक गई । बाहर देखते हुए बोली _"   धुँध बहुत गहरी हो गई मेमसाब , देखो बाहर का कुछ भी दिखाई नहीं देता ।"

सोनल ने उचककर बाहर देखा तो सचमुच सामने के पहाड़ , बड़े बड़े देवदार और चीड़ के पेड़ , कुछ भी नजर नहीं आ रहे थे । "  चार बज गए अमित को  आ जाना चाहिए कितना घना कोहरा है लगता है जैसे रात के आठ बज गए हो "सोनल ने चिंता करते हुए फोन लगाया पर नेटवर्क आ नहीं रहा था ।

" चिंता मत करो आप,  आ जाएंगे साहब । गाड़ी यहीं की है तो कोई बात नहीं । " उसने समझाया ।
" आगे बताओ ना ?" सोनल ने पैर ऊपर समेटते हुए कहा ।

" मोमबत्ती जलाकर फुलवा पलटी तो तीन जोड़ी वहशी आँखें उसे  घूर रही थीं । दरिंदगी टपकाते वो आगे बढ़े , फुलवा भागने की कोशिश में गिर पड़ी । उन्होंने दरवाजा बंद कर दिया और बादलों की गड़गड़ाहट में फुलवा की मासूम आवाज दब गई।

देर रात जब भीगता , हाँफता मंगलू वापस आया तो फुलवा सीढ़ियों पर पड़ी थी । उसे उठाकर देखा तो नाक -मुँह से बहुत खून बह रहा था । जैसे ही मंगलू की बाँह में आई , दम तोड़ दिया ।
उसको छाती से चिपका कर मंगलू जोर जोर से रोता रहा ।जब तक उसके शरीर में जान रही , फुलवा को लेकर बैठा रहा और उसकी फुलवा खुली पथराई आँखों से देख रही थी ।

"  फिर क्या हुआ ?" दुःखी स्वर में , आँखें पोंछती सोनल ने पूछा ।
" क्या होगा मेमसाब ?  दूसरे दिन जब बारिश थमीं तब लोगों ने दोनों को मृत पाया ।
एक दूसरे के पास , अकड़ गए थे ठंड और पानी से । मर गए , पर साथ नहीं छोड़ा । सच्चा प्यार करते थे एक-दूसरे से । "

लंबी साँस लेकर कहने लगी _" उनके प्रेम की मिसाल देते हैं पहाड़ियों में । इस बात को आज चालीस-पचास साल हो गए हैं और तब से आज तक हर दिन फूल बदलती हूँ  । कोई दिन , किसी भी मौसम में छुट्टी नहीं करती । प्यार है मुझे अपने मंगलू से और फूलों से । आखिर उसकी फुलवा हूँ मैं ।" पुराने फूल उठाकर दरवाजे से बाहर निकलते हुए उसने पलट कर देखा तो सोनल की चीख निकल गई ।

सत्तर-पचहत्तर  साल का , बूढ़ा, थका निस्तेज चेहरा , पथराई आँखों से उसे अलविदा कह सामने की धुँध में विलीन हो गया।