बुधवार, 20 जनवरी 2016

"सपने "

कुछ दिनों से हैरान-सी हूँ मैं ,
आजकल सपने नहीं आते मुझे ।

जिन सपनों की अनूठी दुनिया थी ,
मेरी हर बात में जिनका जिक्र था ,
कोई ओर-छोर नहीं था उनका ,
बड़े रंगीन, हसीन ,अनूठे -से सपने ।

ना -जाने आजकल क्यों आते नहीं ?

रंग-बिरंगी तितलियों से ,परियों तक ,
पहाड़ों की ऊँचाइयों से,समुद्र की गहराई तक ,
क्या पता पल में कहाँ चली जाती थी मैं ,
खेल खेल में दुनिया घूम आती थी अक्सर ।

शायद, बेफिक्र नींद में आते हैं सपने ,
चारों ओर के शोर से घबराते होंगे ।
धुएँ, धूल की धुँध में गूथकर ,
पहुँच नहीं पाते हैं वो मुझ तक ।

परेशान हूँ कि क्यों नहीं आते हैं सपने ?

सपने देखना भी सपने-सा लगता है ,
देखकर दुनिया का आलम डरते होंगे ।
प्रतीक्षा कर रही हूँ कि कब आओगे ?
एक बार उसी खुबसूरत दुनिया में फिर ले जाओगे ।

शुक्रवार, 1 जनवरी 2016

पल

हर पल एक नए पल की तलाश में ,
हर लम्हा बीत जाने को व्याकुल ।

पलों की अपनी सुंदर दुनिया है ,
निरंतरता की कसौटी पर कसे पल ।

हर पल ,एक पल को समझाता हुआ-सा ,
तुझे भी बीत जाना है अगले पल ।

जो पल बीतते हैं वो गुजर नहीं जाते ,
जहन में अपनी तमाम यादें संजोये ।

वक्त थमता नहीं , पर पल एक पल को ठहर जाते हैं ,
पल -पल का साथ निभाते हैं ।

इन पलों को जी भर जीना चाहिए ,
हर एक पल के साथ इंसाफ करना चाहिए ।

लम्हों के चंद टुकडों को संजो लेंगे ,
पलों की इस दुनिया में जिंदगी जी लेंगे ।