कुछ दिनों से हैरान-सी हूँ मैं ,
आजकल सपने नहीं आते मुझे ।
जिन सपनों की अनूठी दुनिया थी ,
मेरी हर बात में जिनका जिक्र था ,
कोई ओर-छोर नहीं था उनका ,
बड़े रंगीन, हसीन ,अनूठे -से सपने ।
ना -जाने आजकल क्यों आते नहीं ?
रंग-बिरंगी तितलियों से ,परियों तक ,
पहाड़ों की ऊँचाइयों से,समुद्र की गहराई तक ,
क्या पता पल में कहाँ चली जाती थी मैं ,
खेल खेल में दुनिया घूम आती थी अक्सर ।
शायद, बेफिक्र नींद में आते हैं सपने ,
चारों ओर के शोर से घबराते होंगे ।
धुएँ, धूल की धुँध में गूथकर ,
पहुँच नहीं पाते हैं वो मुझ तक ।
परेशान हूँ कि क्यों नहीं आते हैं सपने ?
सपने देखना भी सपने-सा लगता है ,
देखकर दुनिया का आलम डरते होंगे ।
प्रतीक्षा कर रही हूँ कि कब आओगे ?
एक बार उसी खुबसूरत दुनिया में फिर ले जाओगे ।