सोमवार, 17 अक्टूबर 2016

"यादें"

गर्मियों की लंबी दोपहरी
चरमराकर चलता मेज पर रखा पंखा ,
कभी तो उसकी आवाज ही,
उसके वजूद का अहसास देती है ।

सामने लगा बडा सा इमली का पेड़
उस पर अठखेलियाँ करते पंछी ।
उछलती फुदकती गिलहरियाँ ,
इमली के लिए झगड़ते बच्चों की टोली ।।

बाँस की कुर्सी पर पसरकर ,
ठंडी हवा के झोके का इंतजार करती ।
बाजू में रखी सुराही का पानी ,
अंतरात्मा तक को ठंडक दे जाता है ।।

कुछ तस्वीरें लगा रखी हैं दीवारों पर
अतीत की यादों में घसीट ले जातीं हैं अक्सर,
उठकर साडी़ के पल्लू से पोंछकर ,
साफ देखती हूँ अतीत को ।।

खुशनुमा दमकते चेहरे ,
हराभरा परिवार हमारा ।
समय की धारा में बँट गया ,
अब यादें ही शेष हैं ।।

यादों को संजोए रखना है मुझे ,
साथी हैं मेरे जीवन भर की ।
अपनी ऐनक निकालकर साफ किया ,
ना जाने कब नम हो गई थी ।।

गुरुवार, 11 अगस्त 2016

बाजार

आज मैं बाजार गई थी ।

खाली झोली को ,
मस्ती से उछालती-सी ।
अलग अलग आवाजों को,
मन में उतारती चली ।

एक मासूम-सी शक्ल ,
हाथों में भाजी की गट्ठी लिए ।
अपनी आँखों में आशा की ,
नन्ही ज्योत चमकाते हुए ।
अनबोले ही उसने ,
क्या कुछ कह डाला ,
बयाँ नहीं कर सकती मैं ।।

मिट्टी के खिलौनों की टोकरी ,
चाकी,बैल, दीए और सकोरे ।
कंपकंपाते हाथों से अपने ,
मिट्टी के दीए थमा गई मुझे ।
हाथों के स्पर्श का जादू
जमीन पर ले आया मुझे ,
चेहरे की झुर्रियों ने
तमाम उम्र का फलसफा कह दिया ।

भरी झोली को कंधों पर लादे,
अनमने ,थके से कदम ।
इस झोली में क्या कुछ नहीं ,
आशाएँ, सपने और तजुर्बा ।
आज मैंने कुछ खरीदा ,
नन्ही आँखों की खुशी ।
डूबती आवाज की दुआ ।

आज मैं बाजार गई थी ।।

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बुधवार, 16 मार्च 2016

होरी खेलें रघुराई ।।

होरी की धूम मची है ,अवध में होरी खेलें रघुराई ।।

श्याम वर्ण रघुबीर सुहाए ,गौर वर्ण सब भाई ,
रंग-रंगीली भई री अयोध्या ,कौतुक करें सब माई ।
सरयू में केसर घुल गई ऐसे ,ह्रदय में साँसें समाई ,
कंगन-नग से निरखे जानकी ,नवधा भक्ति समाई ।।
अवध में होरी खेलें रघुराई ....।।

पिचकारी बड़ी कारीगरी की ,पंचधातु से बनाई ,
हीरा, पन्ना, मोती , माणिक ; नवरत्नों से सजाई ।
काया जो रघुबीर ने गढ़  दई ,पाँच तत्व है समाई ,
लोभ, मोह, सत ,रज गुण डाला ; प्रेम-सुधा बरसाई ।।
अवध में होरी खेलें रघुराई .....।।

जिसके रंग सारा जग रंगता ,रंग खेलें रघुराई ,
मुक्ति,  ज्ञान ,भक्ति के सागर , कर रहे ठुकुरसुहाई ।
खेल रे मनवा जी भर होरी, ऐसी होरी ना आई ,
राम साथ जो खेलें होरी ,धन्य वो लोग-लुगाई ।।
अवध में होरी खेलें रघुराई ...।।

होरी की धूम मची है ,अवध में होरी खेलें रघुराई ।
राम-सिया की फाग गा रहे ,चरण-कमल चित लाई ।।
            ।   "होरी है भई होरी है ।"

बुधवार, 20 जनवरी 2016

"सपने "

कुछ दिनों से हैरान-सी हूँ मैं ,
आजकल सपने नहीं आते मुझे ।

जिन सपनों की अनूठी दुनिया थी ,
मेरी हर बात में जिनका जिक्र था ,
कोई ओर-छोर नहीं था उनका ,
बड़े रंगीन, हसीन ,अनूठे -से सपने ।

ना -जाने आजकल क्यों आते नहीं ?

रंग-बिरंगी तितलियों से ,परियों तक ,
पहाड़ों की ऊँचाइयों से,समुद्र की गहराई तक ,
क्या पता पल में कहाँ चली जाती थी मैं ,
खेल खेल में दुनिया घूम आती थी अक्सर ।

शायद, बेफिक्र नींद में आते हैं सपने ,
चारों ओर के शोर से घबराते होंगे ।
धुएँ, धूल की धुँध में गूथकर ,
पहुँच नहीं पाते हैं वो मुझ तक ।

परेशान हूँ कि क्यों नहीं आते हैं सपने ?

सपने देखना भी सपने-सा लगता है ,
देखकर दुनिया का आलम डरते होंगे ।
प्रतीक्षा कर रही हूँ कि कब आओगे ?
एक बार उसी खुबसूरत दुनिया में फिर ले जाओगे ।

शुक्रवार, 1 जनवरी 2016

पल

हर पल एक नए पल की तलाश में ,
हर लम्हा बीत जाने को व्याकुल ।

पलों की अपनी सुंदर दुनिया है ,
निरंतरता की कसौटी पर कसे पल ।

हर पल ,एक पल को समझाता हुआ-सा ,
तुझे भी बीत जाना है अगले पल ।

जो पल बीतते हैं वो गुजर नहीं जाते ,
जहन में अपनी तमाम यादें संजोये ।

वक्त थमता नहीं , पर पल एक पल को ठहर जाते हैं ,
पल -पल का साथ निभाते हैं ।

इन पलों को जी भर जीना चाहिए ,
हर एक पल के साथ इंसाफ करना चाहिए ।

लम्हों के चंद टुकडों को संजो लेंगे ,
पलों की इस दुनिया में जिंदगी जी लेंगे ।