गर्मियों की लंबी दोपहरी
चरमराकर चलता मेज पर रखा पंखा ,
कभी तो उसकी आवाज ही,
उसके वजूद का अहसास देती है ।
सामने लगा बडा सा इमली का पेड़
उस पर अठखेलियाँ करते पंछी ।
उछलती फुदकती गिलहरियाँ ,
इमली के लिए झगड़ते बच्चों की टोली ।।
बाँस की कुर्सी पर पसरकर ,
ठंडी हवा के झोके का इंतजार करती ।
बाजू में रखी सुराही का पानी ,
अंतरात्मा तक को ठंडक दे जाता है ।।
कुछ तस्वीरें लगा रखी हैं दीवारों पर
अतीत की यादों में घसीट ले जातीं हैं अक्सर,
उठकर साडी़ के पल्लू से पोंछकर ,
साफ देखती हूँ अतीत को ।।
खुशनुमा दमकते चेहरे ,
हराभरा परिवार हमारा ।
समय की धारा में बँट गया ,
अब यादें ही शेष हैं ।।
यादों को संजोए रखना है मुझे ,
साथी हैं मेरे जीवन भर की ।
अपनी ऐनक निकालकर साफ किया ,
ना जाने कब नम हो गई थी ।।