कहानी- गंध
रंगीन शर्ट, गले में रुमाल का घेरा, ढीली-सी पायजामा नुमा पैंट, हाथ में बीड़ी पकड़े घीसू ने अपने बालों को हाथों से सुलझाया और ढेर सारा धुआंँ उगल दिया।
"काम करथस की बीड़ी फूके बर आए हस घीसू?" घीसू के साथ वाले ने उसे घूरते हुए कहा।
"काम-वाम करना तुम्हर मन के काम हे, मैं हा तो आराम करे बर आथों।" बेशर्मी से दाँत निपोरते घीसू ने, बची बीड़ी को पैरों से कुचल दिया।
एकाध घंटा यहाँ-वहाँ खपाकर उसने साइकिल उठाई और गेस्ट हाउस की ओर चल पड़ा। इस गाँव की दो-चार साइकिलों में उसकी साइकिल मॉडल से कम नज़र नहीं आती थी। टोकरी, घंटी, पहियों में लाल घूमने वाले रिंग से सजी इकलौती ही थी।
बस्तर के इन छोटे-छोटे गाँवों की आबादी हजार-दो हजार से अधिक नहीं रहती परंतु जीवन का अनूठा सौंदर्य दिखाई देता है। फल-फूल, कंद-मूल, जड़ी-बूटियों, छोटे जानवरों के शिकार और पशुपालन पर आधारित जनजीवन, बहुत सरल और सादा है। साल, सागौन, तेंदुपत्ता, चिरौंजी और बाँस जैसे कीमती वनोपज से समृद्ध यह स्थान, सरकारी खज़ानों के लिए भी हितकर था।
मौसम के बदलाव को तो यहीं महसूस किया जा सकता है। बसंत के खिलते टेसू से लगी जंगली आग, महुआ की मदमाती महक, कटहल, आमों की बौरों का सोंधापन और वर्षा में हर पहाड़ी से उतरते, उफनते चंचल झरनों का सात्विक सौंदर्य, यहाँ के लोगों में भी दिखाई देता है।
साइकिल के पैडल पर जोर आजमाता घीसू, आती-जाती युवतियों की टोह ले रहा था।
"जय जोहार समारू।" घीसू ने गेस्ट हाउस के चौकीदार को नमस्कार किया।
"जय जोहार घीसू। आज कैसे आ गए, साहब मन तो आए नइ हें।" चौकीदार समारू ने आश्चर्य से पूछा।
"हम दुनो भी साहब से कम हन का समारू।" घीसू ने मज़ाक से एक आँख दबाते हुए कहा।
दोनों जोर-जोर से हँसने लगे।
"अरे भीखू, कल के जंगली मुर्गी रखे हे, खुसबू वाला छोटा चाउर भेजे रहिस सदकू, पका दे बढ़िया। जल्दी पका अऊ भाग जा।" गेस्ट हाउस के रसोइए भीखू को काम बताकर, दोनों कुछ सलाह मशविरा करने में जुट गए।
शाम गहराते ही जंगल अपनी जवानी में आ जाता है। पंछी घोंसलों में सिमट जाते हैं और जानवरों की लाल-लाल आँखें रातभर जंगल को उजाला देती हैं।
फारेस्ट गेस्ट हाउस के अहाते के चारों ओर खंबों पर, तेज रोशनी के बल्ब थे। सौ मीटर दूर तक आने-जाने वाला छोटे से छोटा जानवर भी स्पष्ट दिख जाता और रोशनी की ओर आने की हिम्मत नहीं करता। गेस्ट हाउस के अंदर पलने, बढ़ने और शिकार करने वाले जानवरों पर नकेल कसने के लिए यहाँ कोई व्यवस्था नहीं थी।
बाहर खुले आंँगन में छोटी टेबल और दो कुर्सियांँ लगा, पका हुआ खाना टेबल पर रखकर भीखू गाँव की ओर निकल गया। साहबों के तलुए चाटने वाले दो वफादार, मुर्गी की टांग खींच रहे थे।
"महुआ के दारु, काल जमुनी लाए रहिस। साहब कब आहीं पूछत रहिस।" चौकीदार समारू ने गिलास भरते हुए बताया।
"दु-चार दिन में आहीं साहब मन, नवा माल चाहिए कहत रहिन।" समारू ने प्रश्न सूचक दृष्टि घीसू पर टिका दी।
"करता हूँ जुगाड़, मोर हिस्सा बढ़ाए बर बोलना। ते जानत हस भारी काम होगे हे अब।" घीसू ने आगे कहा, "माल नवा तो पइसा जादा लगेगा ना मितान।"
मोगरे, रातरानी और आमों की सुगंध में, देसी महुआ का नशा घुलने लगा था।
सुबह-सुबह घीसू घर वापस गया और साइकिल बाहर लगे बाड़ से टिका दी।
"कहांँ रहे रात भर?" घीसू की घरवाली सोना ने आँगन बुहारना छोड़ कर उससे प्रश्न किया।
"बिहाव-शादी के बाद मरद जात औरत बन जाथे का, साली..बात करे बर सीखत हे। रूक, तोर मस्ती निकारत हवों।" कहते हुए घीसू ने पैर की चप्पल से उसको पीटना शुरू किया। झाड़ू, डंडा जो मिला उससे उसने अपना मर्द होना साबित कर दिया।
जब तक दारू की एक एक बूँद और मुर्गी के टुकड़े की ऊर्जा चढ़ी रही, वो मारता रहा। सोना को घसीट कर झोपड़ी में पड़ी खाट पर ढकेल दिया, टूटी-फूटी, बेदम होती औरत अब खटिए पर दम तोड़ रही थी।
छह महीने पहले इस आदमी से ब्याह हुआ था उसका। कारखाने के चार लोगों को लेकर घीसू, एक लुगड़े में उसे ब्याह लाया था।
रोती-बिसुरती सोना को अपनी माँ की कही बात याद आ गई।
"तोर बिहाव के बाद भगवान घर चले जाहू सोनवा। घीसू बीड़ी कारखाना में कमाथे, तोला पोस लेही बेटी।" और सचमुच ब्याह के एक महीने बाद ही वो मर गई।
दोपहर बाद घीसू अंगड़ाई लेते हुए उठकर आंँगन में आया। पीपे, बाल्टी में भरे पानी से नहाकर, धुली कमीज़ पहनकर, इत्र लगाकर दूल्हे की तरह सज-धज कर फिर बाहर निकल गया।
जाते-जाते, कमरे के कोने में बैठी उस औरत को दो-चार गालियांँ देना नहीं भूला जो अभी तक अपने दर्द से कराह रही थी।
गाँव का बस स्टैंड एक छोटी सी झोपड़ी था। वहीं चाय की टपरी लगा रखा था शंभू ने। शंभू चार साल शहर रहकर आया था उसका रुतबा गांँव के लोगों पर चलता भी था।
दिनभर में कोई तीन-चार बस आती थी यहाँ। बारिश में तो वो भी बड़ी मुश्किल में पड़ जाती थी जब सड़कें टूट जातीं और जंगल के इस क्षेत्र का संपर्क बाहर से कई कई दिनों टूटा रहता।
फारेस्ट वाले, कारखाने के ठेकेदार, मालिक, नेता लोग अपनी बड़ी बड़ी गाड़ियों में आते, जंगल में मंगल करके निकल जाते। अपने साथ शहर से अपने आराम की खास चीजें बाँध लाते वो।
"शंभू, एक चाय दे।" घीसू ने कहा।
"आज कारखाना नहीं गया क्या घीसू? तेरा क्या, जा चाहे मत जा साहब लोगों के आगे-पीछे करके काम बना लेता है।" मुँहफट शंभू ने चाय रखते हुए कहा।
शंभू को घूरते हुए घीसू चाय सुड़कने लगा। शंभू की तीखी बातों से उसको चाय बेस्वाद लगने लगी।
साइकिल पर पैडल मारते हुए वह कारखाने की ओर चल पड़ा।
पिछले कुछ सालों से बस्तर का यह अंदरुनी खूबसूरत भाग, यहाँ की सादगी बाहरी लोगों के दिमाग पर अंकित हो गई थी। अब यहाँ की प्रकृति और आदिवासियों ने शहरी साहबों को झेलना शुरू कर दिया। सरकारी नीतियों के तहत टेंडरों में बोली लगी और तेंदुपत्ता के ठेकेदारों ने, इस क्षेत्र में घुसपैठ कर ली। गाँव के बाहरी छोर पर बीड़ी का कारखाना भी लग गया।
आदिवासी स्त्री-पुरुषों को तेंदुपत्ता बटोरने, बीड़ी बनाने का काम भाने लगा था। हाथ में पैसों का मिलना, इन लोगों के लिए बहुत बड़ी बात थी। फारेस्ट आफिसर्स, बीड़ी पत्ता ठेकेदारों, कारखाने के मालिकों, मैनेजरों और व्यापारियों की अक्सर मीटिंग होने लगी। मीटिंग के नाम पर यह सुंदर जगह मौज-मस्ती का केंद्र बनते चली गई।
इन सब कामों के लिए गाँव के कुछ कुकर्मी, सिरफिरे पिट्ठुओं का समूह, साहबों के आगे पीछे करने को हमेशा तैयार रहता।
घीसू, उनमें से एक था जो घुटने तक अंगोछा की जगह अब साहबों की उतरन पैंट कमीज़ पहनने लगा था। अब महुआ और चावल की देसी नहीं, उसे साहब लोगों की अँग्रेजी का चस्का लग गया था। साहबों के लिए जंगली मुर्गा, खरगोश, तीतर का मांस पकवाना, गेस्ट हाउस की व्यवस्था करना इन पिट्ठुओं का काम था। जंगली मसालों, चूल्हे या उपलों में पका भुना मांस, शहरी लोगों की जुबान पर चढ़ गया।
बीड़ी कारखानों में आने वाली, जंगलों से पत्ते जमा करने वाली आदिवासी युवतियों का सांवला, कसा हुआ, अछूता, सादा सौंदर्य इन बाहरी लोगों से कब तक बचा रहता। एक दिन इन मालिकों ने, सांवले देह की माँग सामने रखी।
"नइ साहेब, गाँव में मुसकिल हे। इहीच गाँव मा रहथन मालिक, नइ बनही।" समारू, घीसू और दो पिट्ठुओं ने विरोध किया।
"ठीक है, एक रात का जितना पैसा बोलो, उतना मिलेगा। ऊपर से अँग्रेजी की बोतल, बढ़िया वाला इत्र, कपड़ा सब मिलेगा तुम लोगों को। किसको पता चलेगा, जब तक तुम नहीं बताओगे, कोई आदिवासी टूरी खुद बताएगी क्या? उसका भी मुँह बंद करेंगे पैसे से।" शातिरों ने बिगड़ैल दिमागों को तौल लिया था।
साइकिल पर पैडल मारते घीसू ने अपने दिमाग़ पर जोर दिया। कारखाने में तेंदु पत्ता लाने वाली बीस साल की सोजो, पहली शिकार थी। सांवले में सांवली, सादे नाक नक्श और कसे, गठीले बदन की मालकिन सोजो से उसी ने खुद बात की थी।
"तोर बर नवा लुगड़ा (साड़ी) भेजे हवै साहब मन। गेस्ट हाउस में आ जाबे मुर्गा पकाए बर, पैसा देहीं तोला।" घीसू ने चारा डाल दिया।
लाल रंग की सूती साड़ी में, काले सांवले बदन को समेटी, छातियों को कसकर आँचल कमर में खोंसी, दोनों नथुनों में फुल्ली, कानों में तीन-चार बालियाँ पहनी सोजो के खुले शरीर पर नीले गोदने से कई नमूने बने थे।
चुपचाप एकटक घीसू को देखती रही। चेहरे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं थी।
"सुनत हस का?" घीसू ने उसके हाथ की साड़ी को हिलाया।
उसने बिना कुछ बोले, हाँ में सिर हिलाया।
उस दिन घीसू समय से पहले ही कारखाने से निकल गया। कमीना तो था वो परंतु इतने कमीनेपन का काम, पहली बार कर रहा था।
"ते काबर हफरत (हांँफ) हस घीसू?" गेस्ट हाउस में घुसते ही समारू ने पूछा।
"भागता-दौड़ता, लुकता-छिपता आ रहा हूँ समारू। सोजो आही की नइ आही, साहब मन ला का कहहू?" आदिवासी युवती सोजो के आने पर संशय था उसे।
दोनों, शाम को गेस्ट हाउस की ओर आने वाली पगडंडी पर आँखें टिकाए बैठे थे। इस पगडंडी पर चलकर उनका पैसे वाला भविष्य आने वाला था। सहसा, एक स्त्री की धुंधली छबि दिखाई देने लगी। दोनों के चेहरे खुशी से खिल गए।
"पीछे दरवाजा से लाबे ओला, सामने से साहब लोग आहीं।" कहते हुए समारू गेट से हट गया।
घीसू पिछले दरवाजे से सोजो को रसोई में ले गया। गेस्ट हाउस के रसोइए भीखू के साथ, सोजो को काम में लगा दिया। सब कुछ योजना के अनुसार हो रहा था।
सोजो, अपने बूढ़े बाप का दो समय खाना और दारू पूरा करने के लिए बीड़ी कारखाने में काम करने गई थी। उसकी माँ कुछ बरस पहले ही दूसरे गाँव के मर्द के साथ भाग गई थी। महुआ और धान की उतारी देसी दारू और हाथ से बनाई बीड़ी पीकर, उसका बाप मस्त पड़ा रहता था।
बेहद सांवली, बीस साल की जवान इस लड़की का शरीर पसीने से लथपथ हो गया था। बाल बिखरे हुए थे और साँसें तेज़ चल रही थीं। टुकुर-टुकुर देख रही थी।
"हाथ गोड (पैर) धो ले, बाल बना ले। साहब लोग खुसबू दे हवै लगा ले।" घीसू ने उसको बाहर भरे पानी की ओर इशारा किया और हाथ में इत्र की शीशी थमा दी। हाथ-मुंँह धोकर तैयार हुई सोजो के हाथों शर्बत पकड़ा कर, रसोइया भीखू गाँव की ओर चला गया।
शहरी लोगों ने आदिवासी मादकता को देखा, सुना और पढ़ा था परंतु इतने करीब से आज महसूस कर रहे थे। सूती की घुटनों तक बँधी साड़ी ही इकलौता वस्त्र थी उस जवान औरत की देह पर। साड़ी में लिपटा हर अंग, जैसे बाहर आने को उत्सुक था। माथे और कान के पीछे से टपकता पसीना, उसकी छाती और पीठ को भिगो रहा था। जवान जंगली स्त्री देह की गंध पूरे कमरे में फैल गई। कमरे में दो जानवरों की जीभ लपलपाने लगी।
सोजो को वहीं छोड़कर, अपनी गर्म जेब और साहब की उतरन शर्ट डटाकर घीसू भी अपने घर की ओर चल पड़ा। उस रात गेट का चौकीदार समारू और स्वयं गेस्ट हाउस ही एक युवती के औरत बनने के साक्षी थे। सुबह-सुबह सोजो गांँव पहुंँच गई। चार दिनों तक उन साहबों के सामने सोजो पहुंँच जाती। हाथ में मिले पैसे, लुगड़ा और साज श्रृंगार का सामान कमाना अब उसे आसान लगने लगा था।
इन क्षेत्रों में अचानक सरकारी अधिकारियों, लोकल नेताओं, व्यापारियों की आवक बढ़ गई और घीसू गैंग का सप्लाई का काम भी।
घुटने तक की लुंगी की जगह अब वह उतरन में मिली कमीज़ पायजामे नुमा पैंट पहनने लगा था। देसी की जगह कभी-कभी साहब लोगों से बची-कुची अँग्रेजी पीने मिल जाती थी और एकाध बार सिगरेट। इलाके की लड़कियों को सूँघकर गेस्ट हाउस तक लाने वाला माहिर दलाल बन गया घीसू।
कारखाना जाना तो नाम का काम था उसका, ऊपर बैठे लोग भी आँख मूँद लेते क्योंकि मजे लेने में उनका भी हिस्सा था। पुलिस चौकियों तक भी हिस्सा पहुँच जाया करता था तो उनका आँखें बंद कर लेना निश्चित ही था।
गाँव में बदलाव की हवा बहने लगी थी। आदिवासियों के बीच रुपयों-पैसों का प्रेम बढ़ गया और वस्तु विनिमय की जगह को रूपयों ने हथियाना शुरू कर दिया। हाइवे से जाने वाली कारों, मोटरसाइकिलों ने कहीं न कहीं यहाँ के लोगों में साइकिल के सपने तो जगा ही दिए थे।
समारू के पास इस गाँव की पहली साइकिल आई जो रेंजर साहब के घर की पुरानी साइकिल थी। सीखने की पुरजोर कोशिश करते समारू ने, उस पर सवारी कर ही ली। बीड़ी कारखाने के तेंदुपत्ता मजदूरों को, नियंत्रित, व्यवस्थित करने वाले बाबू को नई साइकिल उपहार में मिली।
"मालिक, जूना पुराना साइकिल मोर बर लाबे ना, चलत-चलत गोड पिरा जाथे।" एक दिन गेस्ट हाउस के बरामदे में बैठे एक नेता से घीसू ने कहा।
"जंगल में पैदा हुआ, बड़ा हुआ अब चलने से पैर दुखता है स्याला..बोल ना बे कि भाव बढ़ गया है तेरा।" नेता ने गिलास फिर से भरते हुए कहा।
घीसू झट नेताजी के लटके पैरों को दबाने लगा।
"मालिक, कल एकदम नया माल लाहुं, तब देबे ना साइकिल?" मालिक के लगाए इत्र की महक घीसू के सिर पर चढ़ने लगी थी।
"कल कौन सी गोरी मेम लाएगा बे, कोयले की खान है यह जगह। आज का क्या है वो बता।" सुर्ख आँखों से नेताजी घीसू को देखने लगे।
"आज मिरली आही मालिक। तुमन पसंद करे रहो ना ओला।" कहते हुए गेट के पास खड़ा होकर घीसू भेड़िए की तरह पगडंडी को सूँघने लगा कि शिकार कब आएगा?
अगली सुबह उसने दूसरे गाँव की बस पकड़ लिया। आज की रात पहली बार, बाहर गाँव की लड़की मूरी गेस्ट हाउस में आई थी। इस लड़की की उम्र भी बहुत कम थी, माँ-बाप जंगल में तेंदुए के शिकार हो गए थे और वो घीसू की।
बस, उस दिन के बाद घीसू को साइकिल मिल गई और उसकी हिम्मत को पँख।
घीसू ने साइकिल रोक ली, पेड़ की छांँव में बैठ गया। कारखाना जाने का मन क्या होता जब जेब और पेट को वैसे ही भरा हो परंतु आज कुछ खाया नहीं था उसने। सोना को टूटते तक मारा था, खाना क्या मिलता उसे। वैसे कभी-कभी सोना के हाथों से बनी अंगाकर रोटी, मसाला भरी मुर्गी वो गेस्ट हाउस में ले जाता था। कम खर्चे में बढ़िया बनाकर दे देती थी वो। हरी सब्जी भाजी भी बढ़िया बनाती थी सोना। उसके हाथों बने खाने में ताजे पीसे, कच्चे मसालों की सुगंध से आधा पेट भर जाता था।
सोचने लगा कि इस गांँव में सोना जैसी कोई नहीं है। सबसे साफ रंग है उसका, नाक नक्श, देह का गठन तो सबके जैसा है परंतु उसका उजला रंग सबसे अलग है। अच्छा हुआ जो छह महीने पहले दूर गांँव से उसको ब्याह लाया, लोग और बदली पुलिस चौकी के पुलिस वालों ने उस पर आँखें रखना शुरू कर दिया था। घीसू ने तो सोना की बूढ़ी माँ के मरने पर भी जश्न मनाया था क्योंकि उसके गाँव की झोपड़ी के लिए पाँच सौ रुपए लेकर, सोना से अंगूठा लगवा कर बेच दिया था उसने उसी समय।
इन दिनों गाँव की युवतियों, स्त्रियों में भी बदलाव आने लगा था। शहरी हवा के साथ राजनीतिक परिवर्तन, आदिवासियों के लिए प्रकल्पों और योजनाओं ने गति पकड़ ली थी। प्रौढ़ शिक्षा, रात्रि कक्षाओं के लिए दूसरे गाँवों, कस्बों से लोग आने लगे थे। महिलाओं के स्वास्थ्य, जच्चा-बच्चा सुरक्षा पर सरकार लाखों खर्च कर रही थी, स्वाभाविक है कि रुझान इन क्षेत्रों की ओर बढ़ रहा था।
घीसू और साथियों के लिए शिकार ढूँढना कठिन होता जा रहा था। पुरानी लड़कियों से साहब लोग उकता गए थे उन्हें नए माल का इंतज़ार था।
फिर से साइकिल पर पैडल मारने लगा घीसू। कारखाने पहुंचा तो पता चला कि अगले सप्ताह वनविभाग, वनवासी कल्याण योजना, उनके संरक्षण पर पांच दिनों का कार्यक्रम रखे हैं। इस समय बड़े-बड़े लोगों का यहाँ रहना तय था।
जंगल कब तक अपनी सुवास को प्रदूषित होते देखता? अब उसने सरसराती हवाओं, पगडंडियों की उड़ती धूलों से अपनी कथा कहना शुरू किया। महुआ, चंपा, आम, चार, तेंदु और बनमोगरा की महक में मादा जिस्मों का पसीना समा गया था और नमक सबके मुंँह में लग चुका था। देह की फैलती गंध और लोगों की बढ़ती आवक के चलते इस क्षेत्र को समाचार पत्रों में स्थान मिला और कलम झोला लिए पत्रकारों ने भी इसे अपना गढ़ बना लिया।
"अब तो साहब मन के इंतजाम, बड मुसकिल हो गे।" गेस्ट हाउस के सामने बैठकर, दलालों की टोली अगले सप्ताह के बारे में सोच विचार कर रही थी।
इन सबके मुंँह में नमक इतना लग गया था कि इन्होंने अपने-अपने घरों में सूँघना शुरु कर दिया।
घीसू के लिए सोना के रंग-रूप को भुनाने का यही सुनहरा मौका था। उसने आज शाम से ही उसे सूँघना शुरु कर दिया।
"तोर बर लुगड़ा भेजे हे साहब, खुसबू घलोक हे सीसी मा।" उसे नई साड़ी और इत्र की एक शीशी पकड़ाते हुए घीसू ने कहा। पैसे उसे समारु ने दिया था और इत्र तो गेस्ट हाउस में रखा ही रहता था।
दूसरे दिन दोना भर मिठाई, बिंदी-चूड़ी, पावडर फीता सब ले आया।
"तोर हाथ के मसाला वाला मुर्गी अब्बड पसन आइसे। मोर संग चलबे अउ बना देबे एक-दु दिन। खुस होहीं तो खूब पइसा मिलही।" शिकारी जाल बिछाने लगा।
एक सप्ताह तक घीसू अपने साथियों के साथ योजना बनाता रहा। इस बार ज़्यादा लोग, ज़्यादा दिनों तक रूकने वाले थे।
"बड पइसा देहीं ए बार, मोर घरवाली साली अभी पेट से हे, चार पइसा कमा लेतिस तो पेट में बच्चा भर ले हे।" चौकीदार समारू अपनी घरवाली के असमय गर्भवती होने से, अपने जेब के नुकसान से चिढ़ रहा था।
"मोर हा आही, तोला दुहूं सौ-दोसौ, हमन दोस्त हन।" घीसू ने उसको अपने नक्शे में उतार लिया।
इस सप्ताह उसने सोना को छुआ भी नहीं, धंधे में कोई समझौता, कोई अड़चन नहीं लाना था उसे।
घीसू जिस काम में महारथी था वही सूँघने का हुनर हर औरत अपनी माँ की कोख से सीख कर आती है। बाहर की दुनिया की महक, माँ के फेफड़ों से सूँघकर वह अपने भविष्य का ताना-बाना बुन लेती है। सोना भी जंगलों में जन्मी, पली-बढ़ी औरत थी जिसे प्रकृति की हर नब्ज़ का अंदाजा था।
रोज रात घीसू घर जल्दी आता, देसी-विदेशी जो मिली होती चढ़ाकर, सो जाता।
आज की रात आखिरी रात थी, कल से गेस्ट हाउस में इस जंगली देह गंध की कीमत मिलने वाली थी, इसलिए बोतल की बची-खुची सब पीकर चादर ओढ़े, गाना गाते घीसू अपने हाथ के लिए घड़ी के सपने देखने लगा।
आकाश में चमकता चाँद नीचे देखने की कोशिश करता परंतु बीच-बीच में बादलों के टुकड़े उसकी इस कोशिश को नाकामयाब कर देते थे।
सोना ने घीसू का लाया हुआ नया लुगड़ा बाँधा, इत्र की शीशी शरीर पर उड़ेल लिया। लाली, बिंदी लगाकर वह घर से निकल पड़ी। उसके जंगली कच्चे मसालों की कल परख होने वाली थी इसीलिए ताज़ी हल्दी, तेजपान और दूसरे मसालों के लिए, उसने रात का समय चुना।
रात को जंगल के पंछी आराम से घोंसलों में शांत बैठते हैं परंतु जानवरों और वनस्पतियों की हलचल, जंगल को भयानक बना देती है। सोना के कदम पगडंडियों से उठते हुए, जंगलों में समा गए। चंपा और बनमोगरे से महकती शुद्ध हवा उसके पोर-पोर से घुसने लगी। ज़िंदगी की उमस से दूर, वह इस शुद्धता में डूब जाना चाहती थी। रात की जंगली भयावहता में उसे सुकून मिल रहा था।
जंगल की खुली, मत्त हवा में अचानक उसके देह की गंध समाने लगी। कुछ ही समय में देह गंध ने बाकी सभी सुगंधों पर अपना आधिपत्य कर लिया और जंगल ने सिर झुकाकर स्त्री गंध की सत्ता स्वीकार कर ली।
सोना व्याकुल हो उठी, अपने इस देह की गंध से दूर भाग जाना चाहती थी वो। स्त्री ही प्रकृति है तो आज एक स्त्री अपनी गंध से मुक्त होने के लिए आकुल थी।
कितनी देर तक वह जंगल में भटकती रही, किन-किन पौधों, जड़ों को तोड़कर अपने आँचल से बाँधा, पता नहीं। बोझिल कदमों से वापस लौट आई और सो गई।
दूसरे दिन सुबह ही घीसू ने उसे बढ़िया मसाला बनाकर ले चलने की याद दिला दी।
"संझा बेर मोर संग जाबे गेस्ट हाउस, मुर्गा पकाए बर बढ़िया ताजा मसाला पीस ले। साहब मन खुस होहीं तो अब्बड पइसा देहीं।" खूब पैसे उसकी आँखों के सामने नाचने लगे।
शाम को वही साड़ी, श्रृंगार करके वह घीसू के पीछे-पीछे चल पड़ी। हाथ की पोटली में चावल आटे की बनी रोटियांँ और पीसे हुए मसाले का गोला रख लिया था सोना ने।
आज घीसू ने अपनी सायकिल नहीं ली, उतने चढ़ाव पर दो सवारी चलाना, उसको मंजूर नहीं था। गेस्ट हाउस के दरवाजे पर समारू से उसकी कुछ बातें हुईं और सोना को वे अंदर ले गए।
गेस्ट हाउस के चारों ओर उजाले के लिए खंबों पर बड़े-बड़े बल्ब लगे थे। पक्का अहाता, साफ-सुथरा बड़ा सा गेस्ट हाउस, बेलों और झाड़ियों के खुशबूदार फूलों से महक रहा था।
भीखू के साथ सोना को रसोई में छोड़कर, घीसू और समारू ने हमेशा की तरह अपना काम संभाल लिया। साहब लोगों के खाने-पीने की व्यवस्था बरामदे में और फिर उनके पलंग पर धुली चादर डालकर तैयार कर दिया। साहबों के बताए अनुसार आलमारी में रखी खुशबू वाली बोतल से कुछ बूँदें बिस्तर पर बिखेर कर, वो दोनों गेट के पास खड़े इंतज़ार करने लगे।
इधर रसोई में भीखू दबी-छुपी आँखों से, सोना को ताड़ रहा था। इस तो क्या आसपास के दो-तीन गाँवों में उसने ऐसे रंग की औरत नहीं देखी थी। उसने अंदाजा लगा लिया कि कल सुबह जब वह गेस्ट हाउस आएगा तो इस बार साहब लोग उसे हमेशा से ज़्यादा बख्शीश देंगे।
"तोर लाए मसाला के खुसबू बड बढ़िया हे, आज तो साहब मन तोर से खुस हो जाहीं।" उसने सोना की मदद से मुर्गा और भात पका दिया।
"मोर काम होगे, साहब मन आहीं तो सरबत, खाना दे देबे, मे जावथ हों।" कहते हुए वह बाहर निकल गया। इतनी गोरी औरत से बात करने का मौका भीखू गंवाना नहीं चाहता था। गेट के पास खड़े घीसू और समारू से कुछ बात करके, गाँव की पगडंडी से उतरता चला गया।
जीप की आवाज़ और घूमती लाइट्स से घीसू और समारू ने दौड़कर गेट खोल दिया। आज तो जीप के साथ एक कार भी थी। सचमुच इस बार ज्यादा कमाई के आसार जानकर, दोनों बड़े उत्साह से दौड़ने लगे।
"जय जोहार साहब।" दोनों झुक गए।
"ठीक है, ठीक है। आज की तैयारी पक्की है ना। स्पेशल दारू लाया हूँ तुम दोनों के लिए, आज रात स्पेशल है ना, क्यों बे घीसू?" प्रश्न भरी दृष्टि थी उस अधिकारी की।
समारू उसके कान के पास फुसफुसाया और उसकी आँखें फैल गईं।
"अबे घीसू...आज तेरे घर का माल चखाएगा? साले... कितना कमीना और हरामी है बे। चल, अब कल से तीन-चार औरतें लगेगी। सात-आठ साहब रहेंगे यहाँ।" सिगरेट फूँकते वो चारों बरामदे में रखी बेंत की आराम कुर्सियों पर पसर गए।
घीसू रसोई में चला गया। शर्बत तैयार था उसे चार गिलासों में भरकर, एक थाली में रखकर सोना से कहने लगा, "साहब मन ला जोहार करबे। उही मन पइसा, लुगड़ा देहीं।"
उसके चेहरे पर बिखरे बालों को झट से, जूडे में खोंसने लगा। सोना टकटकी बांँधे देख रही थी, पिछले कुछ दिनों से गाली-गलौज, मारपीट और शरीर को जबरन खसोटना, पीड़ा देना बंद कर देने वाले इस आदमी ने, पहली बार इतनी कोमलता से उसके चेहरे को स्पर्श किया था। इस एक स्पर्श में विवाह के सात भांवर, माथे से माँग सिंदूर भरना, देवी-देवता की पूजा, सब कुछ अनुभूत कर लिया उसने।
चार जोड़ी आँखें एक साथ उसको घूरने लगीं। कल रात जंगल भी इतना भयावह नहीं लगा था सोना को। उन चारों की आँखें फैली रह गईं उसे देखकर।
"घीसू...ये तेरी औरत है बे, साले खुद गोरी मेम के साथ सोता था और हमको कोयले के खदान में ढकेल देता था।" सामने शर्बत रखकर सोना चली गई।
चारों ने आपस में बात की और घीसू से कहा, "देख, तेरी औरत का हर रात पाँच हजार देंगे। हम चार लोगों के लिए अब चार दिन इसे ही भेज। दूसरों के लिए पुरानी भी चलेगी।"
घीसू का मुँह खुला रह गया। उसकी औरत तो खरा सोना निकली, साहब लोग पांँच सौ-हजार से ज़्यादा कभी नहीं दिए थे। कुंवारी लड़की भी तो लाया था घीसू, हजार दिया था उसके लिए। पाँच सौ लड़की को और पाँच सौ सब पिट्ठुओं ने आपस में बांँट लिया था।
"होअ साहब।" मन ही मन अपने लिए नयी घड़ी, रेडियो का सपना सजाता हुआ वह सोना के पास पहुँचा।
"साहब मन ला, मसाला मुर्गा देबे, बाद में भात रोटी देबे। मैं अऊ समारू दरवाजा गेट के बाहर खा लेबो।" घीसू ने समझाया और बरामदे का इंतज़ाम देखने लगा।
कुछ देर बाद बरामदे की टेबल पर चार मर्द जीवन की रंगीनियों में डूबने को आतुर, कहकहे लगा रहे थे। मसाला लगे मुर्गे के टुकड़ों को प्लेट में परसती सोना की कमर पर हाथ सरकाते हुए, एक ने शराब का घूँट भरा। दूसरे ने उसकी छाती पर कुहनी लगा दी और सोना सिसकार उठी।
बड़े गेट के बाहर बोरा बिछाकर बैठे दो और मर्द सुबह हाथ में आने वाले पैसों की गर्माहट का मजा, अँग्रेजी दारू और मुर्गे में ले रहे थे।
लगातार प्रकृति को दूषित होते देख, आज हवा ने अपने पँख सिकोड़ लिए। रातों को होने वाले कृत्य का जैसे आज वह पुरजोर विरोध कर रही थी। पति-पत्नी के रिश्तों को ताक पर रखकर, एक दलाल ने एक स्त्री को चार पुरूषों के बीच फेंक दिया था। वनदेवी-देवता के कोप से आज प्रकृति ने साँस रोक ली। बोतलों, गिलासों की टकराहट, भद्दी गालियों और कहकहों के बीच में रहना, हवा को नामंजूर था।
थोड़ी देर बाद बरामदे की बत्ती को छोड़, सारी बत्तियांँ बंद हो गईं।
आज रात गेस्ट हाउस में पहली बार इतनी गोरी औरत रही थी। साहब लोगों से ज़्यादा बख्शीश मिलने की उम्मीद में, रसोइया भीखू हमेशा से जल्दी ही गेस्ट हाउस आ गया। बीस-पच्चीस तो वैसे ही देते थे उसको, कपड़ा-लत्ता, दारू के अलावा। आज सौ से कम तो नहीं देंगे उसके अनुभव का अनुमान था।
गेट के बाहर दो, बरामदे में चार और रसोई में एक, इतने मृत शरीरों को देखकर वह चीखने लगा। उस मृत औरत के गोरे हाथों में मसाले की खाली पोटली ने आज तक के अत्याचारों का, मौन प्रतिशोध ले लिया था।
एक-दो नहीं, सात-सात मौतों ने, मीडिया, सरकार, सामाजिक संगठनों को इस क्षेत्र में होने वाले शोषण का पूरा सबूत दे दिया। जाँच कमिटियों ने यहाँ होने वाले देहशोषण का खुलासा किया और बड़ी संख्या में गिरफ्तारियांँ हुईं।
सोना ने यहाँ की प्रकृति को एक बार फिर अपनी सुगंध बिखरने के लिए राजी कर लिया था। एक स्त्री ने अपनी देह गंध को प्रकृति से एकाकार कर लिया था।
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शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)