आप सभी के समीक्षार्थ बहुत दिनों बाद मेरा प्रयास 🙏(संशोधित रूप)
फिलबदीह क्रमांक -19
प्रथम प्रयास
शाकिर/शाइरा- निज़ाम फतेहपुरी
122 122 122 122
ज़रा देखकर ही कदम तुम बढ़ाना
कि मुश्किल है काँटों से दामन बचाना।1।
गमों की जो चादर हुई खूब भारी
झटकना उसे और हल्की बनाना।2।
गज़ब का दिखावा अजब है ये दुनिया
बिना स्वार्थ के ना हो मिलना मिलाना।3।
मुखौटा चढ़ाये जिये जा रहे हो
कभी तो ज़रा खुद को खुद से मिलाना।4।
चुभे बात नश्तर सी जो दिल को हरदम
बहुत जल्द उसको है दिल से हटाना।5।
गिरह:
नज़र चार लोगों में आने के डर से
जुदा हो गए वो बनाकर बहाना।
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शर्मिला चौहान
आदरणीय अनिल सर एवं सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏 (आदरणीय अनिल सर एवं मित्रों के सुझाव से संशोधित)
फ़िलबदीह क्रमांक 19
दूसरा चरण
122 122 122 122
ये नफ़रत की फैली जो चिंगारियां हैं।
कहीं गुम हुईं इनमें किलकारियां हैं।।1।।
बहन माँ बहू और पत्नी का जीवन
हरिक भूमिका में दिखीं नारियां हैं।।2।।
बुजुर्गों से बढ़कर कहीं उनके अनुभव
उन्होंने तो खेलीं कई पारियां हैं।।3।।
अमीरी गरीबी में सरहद हमेशा
निभी कब जो इनमें हुई यारियां हैं।।4।।
खुशी का दिखावा जो करते हैं अक्सर
दुखों की दिलों पर चलें आरियां हैं।।5।।
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शर्मिला चौहान