शुक्रवार, 13 अगस्त 2021

लघुकथा- रेस्क्यू

"रेस्क्यू"

"छोटी बहू, अब रसोई में क्या कर रही है? खाना नहीं खा रहे तुम लोग?" सास लीला देवी की आवाज से, बड़ी और मंझली बहू घबरा गए।
"अम्माँ, सब्जी थोड़ी ही बची है तो हम तीनों के लिए फिर से बना रही हूँ।" छोटी बहू ने उत्तर दिया।
"आदमियों का खाना तो हो गया था तो तुम लोग दाल, अचार से खा लेते। हमारे जमाने में मजाल नहीं थी कि हम औरतों के लिए दुबारा सब्जी बनाएँ। अब तो जमाना ही बदल गया है।" अम्माँ को गुस्सा आ रहा था।

 कई बार बहूओं ने अम्माँ की ज़ुबानी उनके ज़माने के किस्से सुने थे कि आदमियों को ही मेवा, दूध दिया जाता था। औरतों और आदमियों के खान-पान में बहुत फ़र्क होता था। आदमियों को घर से बाहर जाकर काम करना होता था इसलिए उनके भोजन में घी-दूध की अच्छी मात्रा देने का नियम था। इस भेदभाव की कसक, छोटी बहू ने अम्माँ की आवाज में महसूस किया था।

"जा मंझली, बाहर बैठक में बैठे सभी को दूध का गिलास दे आ।" आदमियों को रोज दूध पीने को दिया जाता था।

"अम्माँ, गर्मी बहुत थी तो मैंने दूध  की आइसक्रीम जमा दी थी।" कहती हुई छोटी बहू ने आइसक्रीम फ्रिज से निकाल कर, मंझली बहू को दे दिया।

"जीजी, हम सब ग्यारह लोग हैं तो आप ग्यारह कटोरियों में आइसक्रीम निकाल दीजिए।" अम्माँ के हाथों आइसक्रीम की कटोरी पकड़ाती छोटी बहू ने अम्माँ के चेहरे की ओर देखा। एक अलग सी संतुष्टि अम्माँ की आँखों से झलक रही थी।

शर्मिला चौहान

सोमवार, 2 अगस्त 2021

अप्रकाशित लघुकथाएं

        "परदे के पीछे"


सुरेखा जल्दी जल्दी हाथ चला रही है, काम खत्म होने के बाद वह अपनी सहेलियों के साथ पिक्चर देखने जाने वाली है। उसका पति बिरजू घर पर है, बच्चों की भी पंद्रह अगस्त की छुट्टी है तो आज उसने सहेलियों के साथ पिक्चर देखने का कार्यक्रम बना लिया।
उसकी मालकिन मंजूषा दीदी, किसी बड़ी जगह में स्वतंत्रता दिवस पर भाषण देने जाने वाली हैं। लाल किनारी की सफेद साड़ी में, पुराने जमाने की हिरोइन लग रही हैं दीदी।

"ये क्या पुरानी सूती की साड़ी पहन रखी है तुमने! जहाँ जा रही हो मुझे सब पहचानते हैं। कोई ढंग की साड़ी पहनो!" साहब की आवाज़ को अनसुना करते हुए सुरेखा बर्तनों पर हाथ चलाने लगी।
"बालों की बाँध तो लो, अब क्या तुम सोलह साल की हो जो खुले बाल रखोगी।" सुरेखा के कानों ने सुनी और दिल कह उठा, "बेचारी दीदी! ना मन का पहन सकती ना कुछ कर सकती। इतनी पढ़ी लिखी, होशियार है तभी तो सब अखबारों में, पत्रिकाओं में दीदी का लिखा छपता है‌। साहब बहुत रोक-टोक करते रहतें हैं।"

साफ धुली थाली में अपना चेहरा देखने लगी, गीले हाथों से बालों को संवारा और अपने बिरजू की सोच में खो गई।

"फोन ले लेते हैं तेरे लिए, बड़े काम की चीज है।" बिरजू ने चार महीने पहले पाँच हजार का फोन खरीदा था उसके लिए। रंग भी सुरेखा की पसंद का, चटक लाल। अब सुरेखा अपने फोन को निहार रही थी।

"ड्राइवर को लेकर जाना, तुम्हारी  ड्राइविंग की कोई गारंटी नहीं है।" साहब की आवाज़ से सुरेखा की भौं तन गई।
"दीदी, बहुत बढ़िया कार चलातीं हैं, साहब क्यों हर बात पर रोक टोक करते हैं क्या मालूम।" चार घरों का काम खत्म करके सुरेखा  को पिक्चर देखने जाने की जल्दी थी।
दीदी की हल्की आवाज आ रही थी शायद स्वतंत्रता दिवस के भाषण को एक बार पढ़ रहीं थीं।
"स्वतंत्रता की अलग अलग परिभाषाएँ हो सकतीं हैं.....।"


 थोड़ी देर बाद गेट खुलने की आवाज आई और एक बार फिर वही लाल किनारी की सफेद साड़ी पहने, बालों को खुला छोड़े, उसकी सुंदर मंजूषा दीदी ने कार की ड्राइविंग सीट संभाल‌ ली थी। सुरेखा का पिक्चर देखने का उत्साह दुगुना हो गया।

शर्मिला चौहान
२/८/२०२१
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       "बेड़ियाँ"


नया लहंगा, चूनर और पायल पहनी मुन्नो आँगन भर घूम रही थी।
"ऐ मुन्नो, क्या तेरा ब्याह तय हो गया है?" मुन्नो के साथ शाला जाने वाली, कक्षा आठ की संजो ने पूछा।
"हाँ हाँ! कल ही हुआ, देख ना ये नयी चूनर और पायल।" पायलों को छमकाती मुन्नो ने कहा।
"तू अब पढ़ाई ना करेगी, कक्षा सात ही पढ़ेगी।" संजो, जो मुन्नो से एक कक्षा आगे थी, ने थोड़ी चिढ़कर पूछा।
"अरी, मेरा होने वाला दूल्हा आठवीं पास है। मुझे तो उससे कम ही पढ़ना चाहिए ना।" अपने होने वाले रिश्ते का सार समझा दिया मुन्नो ने।
"तूने सुना नहीं, मास्टरनी जी कितनी बार समझातीं हैं कि,"छोरियों को खूब मन लगाकर पढ़ना चाहिए, नौकरी करना चाहिए।" संजो एक मित्र, बहन की भूमिका निभा रही थी।
"संजो,मेरी ससुराल वालों की बहुत खेती है। पैसेवाले हैं,अम्माँ कह रही थी कि ब्याह में वो मेरे लिए सोने के कंगन, हार और बिंदिया लाएंगे।" मुन्नो की मासूम आंखों में गहनों, कपड़ों की चमक तैर रही थी।
"तो तू गहनों के लिए ब्याह कर रही है?" संजो की आवाज थोड़ी धीमी हो गई।
"और क्या! अम्माँ से कितनी बार कहा कि पायल ले दो, मुझे पहननी है, हर बार कहती बापू से पूछकर बनवा दूँगी।" गरीबी की स्पष्ट छाप पड़ चुकी थी मन पर।
"अपनी सब मास्टरनी खुद कमातीं हैं, अपने पैसों से अपने बच्चों के लिए चीजें खरीद कर ले जातीं हैं। हमें भी पढ़ लिखकर अपने पैरों पर खड़ी होना चाहिए, तब हम भी अपने बच्चों के लिए सब खरीद सकेंगे।" अपने भविष्य को दूर तक सोचने लगा किशोर मस्तिष्क।
दोनों के बीच कुछ देर बात होती रही और फिर मुन्नो ने अपनी पायल उतारकर अम्माँ की हथेली पर रख दिया।
"अम्माँ, मुझे ब्याह नहीं करना, खूब पढ़ना है। ऐसी पायल, चूनर मैं अपने लिए भी और तेरे लिए भी खरीद सकूँगी अम्माँ।" कहती हुई बस्ता उठाकर संजो के साथ चली गई।
मुन्नो की अम्माँ कभी हथेली पर रखी पायल को देखती तो कभी खुद के पैरों की काली पड़ी पायल को।

मौलिक, स्वरचित एवं अप्रकाशित रचना।

शर्मिला चौहान
१/८/२०२१