गुरुवार, 11 अगस्त 2016

बाजार

आज मैं बाजार गई थी ।

खाली झोली को ,
मस्ती से उछालती-सी ।
अलग अलग आवाजों को,
मन में उतारती चली ।

एक मासूम-सी शक्ल ,
हाथों में भाजी की गट्ठी लिए ।
अपनी आँखों में आशा की ,
नन्ही ज्योत चमकाते हुए ।
अनबोले ही उसने ,
क्या कुछ कह डाला ,
बयाँ नहीं कर सकती मैं ।।

मिट्टी के खिलौनों की टोकरी ,
चाकी,बैल, दीए और सकोरे ।
कंपकंपाते हाथों से अपने ,
मिट्टी के दीए थमा गई मुझे ।
हाथों के स्पर्श का जादू
जमीन पर ले आया मुझे ,
चेहरे की झुर्रियों ने
तमाम उम्र का फलसफा कह दिया ।

भरी झोली को कंधों पर लादे,
अनमने ,थके से कदम ।
इस झोली में क्या कुछ नहीं ,
आशाएँ, सपने और तजुर्बा ।
आज मैंने कुछ खरीदा ,
नन्ही आँखों की खुशी ।
डूबती आवाज की दुआ ।

आज मैं बाजार गई थी ।।

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